रविवार, 15 फ़रवरी 2026

दासी प्रथा

दुनिया 20–30 साल चले एक “एपस्टीन मॉडल” पर हैरान है। फ़ाइलें खुलीं, हड़कंप मचा, लेकिन दुनिया शायद ये भूल रही है— भारत में एक फ़ाइल है, जिसके आगे एपस्टीन भी इंटर्न लगता है-: नाम है — देवदासी फ़ाइल™️

ये कोई 20–30 साल का घोटाला नहीं था, ये हज़ार साल से ज़्यादा चला “संस्कृति के नाम पर बना सिस्टम” था।

उद्देश्य बड़ा सीधा था— मंदिर सुरक्षित, देवता मौन, और पुजारी की “ज़रूरतें” पूरी। जो काम कोई तानाशाह
डंडे से नहीं करा सकता, वो काम पुरोहित ‘पुण्य’ का लालच देकर हँसते-हँसते करा देता है।

जनता को समझाया गया— “लड़की मंदिर को दो, देवता खुश होंगे, फल मिलेगा… इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में।”

और फिर क्या— भगवान के नाम पर, लोगों ने अपनी बेटियाँ चढ़ा दीं। मंदिर धीरे-धीरे आस्था के केंद्र से वीआईपी वेश्यालय बनते चले गए।

अमीर लोग टिकट लेकर आए, पुजारी मैनेजर बने,
और शास्त्र… मार्केटिंग ब्रोशर।

अंग्रेज़ आए, गए, झंडे बदले, क़ानून बदले— लेकिन ये “संस्कृतिक स्कैम” काफ़ी देर तक चलता रहा।

अगर कल फिर “ब्राह्मणी शास्त्रों का स्वर्ण युग”
लौटाया गया, तो याद रखना— देवदासी फ़ाइल 2.0
भी लौट सकती है।

संविधान ज़रूरी है, वरना इतिहास
दोहराने में देर नहीं लगती।

एपस्टीन 20 साल चला, देवदासी सिस्टम 1000 साल।
फर्क बस इतना है— वहाँ पावर का नाम “नेटवर्क” था,
यहाँ पावर का नाम “संस्कृति”।