मंगलवार, 18 अगस्त 2026

मनुवाद बेनकाब

मनुवाद बेनकाब
सुभाषनी अली सहगल
अखिल भारतीय जनवादी समिति 
उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी
प्राचीन भारतीय ग्रंथों, धर्म-शास्त्रों तथा मनुस्मृति द्वारा गैर-बराबरी का महिमा मंडन ही नहीं किया गया है, बल्कि उसको भारतीय समाज का आधार स्तम्भ बताकर बढ़ावा भी दिया गया है। इसलिए, संविधान निर्माण एवं अन्य बहुत से कानूनी सुधार तथा प्रगति के बावजूद जिस गैर बराबरी के विचार को बढ़ावा दिया गया था, वह भारत के जन मानस में बहुत गहरे तक अपनी जड़ें जमाये हुए है। यही कारण है कि आज भी भारतीय समाज स्तरीकृत तथा श्रेणीवद्ध अ-समानता पर आधारित समाज बना हुआ है।

नीचे उद्धृत मजमून, जो जी. वुलेर अनुवादित "दी लॉज ऑफ मनु" के पृष्ठ संख्या 3 से लिया गया है, इस प्रकार बयान करता हैः- "ब्राह्मणों के लिए उसने पढ़ने और अध्ययन (वेदों का) करने, स्वयं और अन्य लोगों के उपकार के लिए बलिदान करने, (भिक्षा) लेने और देने के कार्य नियत किये। क्षत्रिय को उसने लोगों की सुरक्षा करने, उपहार प्रदान करने, बलि देने, (वेदों का) अध्ययन करने तथा शारीरिक सुखों से विमुख रहने का आदेश दिया। वैश्य को मवेशियों की देखभाल करने, उपहार प्रदान करने, बलि देने, (वेदों का) अध्ययन करने, व्यापार करने, धन उधार देने, तथा जमीन जोतने का आदेश दिया। एकमात्र कार्य जो प्रभु ने शूद्र के लिए नियत किया है, वह है भक्ति भाव से इन तीनों (अन्य) जातियों की सेवा करना"।

इनके अतिरिक्त, दलितों, आदिवासियों तथा म्लेच्छों को, जो समाज के सबसे निचले पायदान पर अवस्थित थे, उनको अवर्ण अर्थात जाति विहीन और अछूत मानकर जाति व्यवस्था की सीमा से बाहर रखा गया।

प्राचीन काल से ही लेकिन बराबरी एवं मानव अधिकारों के इस निषेध के खिलाफ प्रतिरोध की प्रक्रिया भी जारी रही है। पहले जैन धर्म तथा बाद में बौद्ध धर्म ने इस प्रतिरोध की अगुवाई की। बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयायी बने, तथा चन्द्रगुप्त मौर्य, अजातशत्रु एवं सम्राट अशोक उन शक्तिशाली राजाओं की श्रेणी में शुमार होते हैं, जिन्होंने जैन एवं वौद्ध धर्मों को अंगीकार किया। खासकर बौद्ध धर्म तो भारत के विभिन्न हिस्सों में बारहवीं शताब्दी तक प्रभावशाली बना रहा।

अपनी सत्ता को चुनौती प्रदान करने वाले इन कारकों तथा अन्य का सामना करने के लिए ब्राह्मण वाद की ताकतों ने हर प्रकार के हथकंडे अपनाए। ब्राह्मणों की अन्तर्निहित श्रेष्ठता के 'सत्य' को जिस प्रकार उनके द्वारा गढ़े गए ग्रंथों एवं शास्त्रों के माध्यम से लगातार बल प्रदान किया जाता रहा, उसको इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।

मनुस्मृति-उसकी रचना की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ एवं उसका महत्व

मनुस्मृति महज पूर्ववर्ती ग्रंथों एवं धर्मशास्त्रों में से इकठ्ठा किये गए सूत्रों का संग्रह ही नहीं है, बल्कि इसमें तमाम मौलिक विचारों का समावेष भी किया गया है। इसी वजह से इसकी श्रेष्ठता तथा प्रभुत्व स्थापित हुए हैं। इसलिए, इसके महत्व को पहचानने के लिए इसकी रचना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

पैट्रिक ओलिवेल्ले नामक विद्वान के अनुसार, जिनको बड़े ही विद्वतापूर्ण तथा गवेषणा पूर्ण

अनुवाद का श्रेय दिया जाता है, मनुस्मृति की रचना ईसा युग की शुरुआत के ठीक पहले अथवा बाद के वर्षों में कभी हुयी थी। मनुस्मृति को और अधिक वैधता प्रदान करने के वास्ते वहुदा कालातीत, युगों पुराना एवं लगभग अ-लौकिक ग्रन्थ का दर्जा दिया जाता है। लेकिन हकीकत ये है कि यह अपने दौर का ही एक प्रतिफल है, और ब्राह्मणवाद की विचारधारा की प्रभुता के सामने उपस्थित चुनौतियों के खिलाफ सोचा समझा प्रत्युत्तर है।

ओलिवेल्ले की एक महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि मनुस्मृति की रचना की पृष्ठभूमि में अशोक द्वारा लाये गए राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक सुधार हो सकते हैं। अशोक ने पुरोहित वर्ग को उसके विशेषाधिकारों से पदच्युत कर दिया था, और राजसत्ता के साथ उसके विशेष रिश्तों को समाप्त कर दिया था। अशोक ने न केवल बौद्ध धर्म को अपना लिया था, बल्कि उसके सिद्धांतों का अपने साम्राज्य तथा साम्राज्य से परे प्रचार प्रसार किया था। उसने फिजूल एवं क्रूर पशु बलि तथा यज्ञों पर रोक लगा दी थी, जो ब्राह्मणवाद के प्रभुत्व के अत्यंत अंग महत्वपूर्ण अंग होते थे। साथ ही उसने अपने तमाम शिलालेखों में जाति प्रथा के उल्लेख की चाहे तो उपेक्षा की, अथवा उससे जानबूझकर परहेज किया।

नन्द एवं मौर्य राजाओं का शूद्र वर्ग से आने ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया। इस प्रकार से क्षत्रियों के राजसी विशेषाधिकारों को हथिया लेने एवं ब्राह्मणवाद की विचारधारा तथा प्रभुता का दमन करने को मनुस्मृति तथा अनेकानेक धर्मशास्त्रों में सामाजिक अनर्थ, सामाजिक दुराचरण, और वास्तव में तो कलियुग के आने की संज्ञा दी गयी है।

ओलिवेल्ले बताते हैं कि मनुस्मृति को पढ़ते वक्त कोई भी व्यक्ति, ब्राह्मणवादी विशेषाधिकारों का उसमें जिस शिद्दत से बचाव किया गया है, उसको देख और समझ सकने में चूक नहीं कर सकता है। जिस विचारधारा ने मनु को प्रेरित किया, उससे इस ग्रन्थ की योजना जाहिर हो जाती है। इस ग्रन्थ में 1,034 श्लोक, जो पूरे ग्रन्थ का 38.6 प्रतिशत हिस्सा होते हैं, पुरोहित वर्ग के बारे में और 971 श्लोक, (36 प्रतिशत) राजा से सम्बंधित मामलों की चर्चा करते हैं।

मनुस्मृति का उद्देश्य न तो आज न्याय दिलाना है, और न ही कभी रहा है। इसका उद्देश्य तो जन्म के आधार पर सबसे खराब गैर बराबरी का औचित्य साबित करना रहा है, जिसके चंगुल से कभी कोई निकल नहीं सकता है। वर्ण-व्यवस्था के संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि अंतरजातीय भोज तथा अंतरजातीय विवाह प्रथा का निषेध रहे। प्रतिलोम विवाह को, अर्थात महिलाओं की स्वयं की जाति से नीचे की जाति के पुरुष के साथ शादी को एक अभिशाप माना गया है। तमाम धर्मशास्त्रों में, जहां जाति प्रथा की पुष्टि की जाती है, महिलाओं पर नियंत्रण, उनकी आवाजाही तथा उनकी विचार प्रक्रिया पर नियंत्रण, तथा उनके शरीर पर नियंत्रण के सम्बन्ध में लिखा गया है। स्त्री जाति के प्रति विद्वेष, जो ग्रंथों एवं धर्मशास्त्रों में भरा पड़ा है, उसके सबसे अधिक जहरीले स्वरुप का आख्यान मनुस्मृति में पाया जाता है।

जार्ज बुल्लेर द्वारा अनुवादित- दी लॉज ऑफ मनु- में एक पूरा का पूरा अध्याय, अध्याय संख्या नौ, जिसमें 330 से अधिक श्लोक हैं, महिलाओं के सम्बन्ध में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त, महिलाओं से सम्बंधित कानून, दूसरों को किस प्रकार उनसे बर्ताव करना चाहिए, विभिन्न उल्लंघनों की एवज में क्या क्या सजाएं दी जानी चाहिए आदि के सम्बन्ध में अन्य अध्यायों में भी चर्चा की गयी है। इस सम्बन्ध में कुछेक उदाहरणों को उदृधृत करना समीचीन होगा, जिससे यह समझा जा सके कि किस प्रकार सम्पूर्ण महिला संवर्ग को सभी अधिकारों से वंचित रखकर अधीनता स्वीकार करने के लिए वाध्य किया गया है।

1 अब मैं एक पति एवं उसकी पत्नी के लिए, वे चाहे एक साथ हों अथवा अलग अलग हों, ऐसे शाश्वत नियम प्रतिपादित करता हूँ, जिनसे वे कर्तव्य मार्ग पर बने रहें।

2 अपने परिवार में पुरुषों को चाहिए कि वे औरत को दिन रात आश्रित बना कर रखें, और अगर वे स्वयं को ऐन्द्रिय भोग में संलिप्त करना चाहें, तो उनको पुरुष के नियंत्रण में रखा जाए।

3 बचपन में (उसका) पिता संरक्षण प्रदान करता है, युवा काल में (उसका) पति संरक्षण प्रदान करता है तथा बुढापे में (उसके) पुत्रगण संरक्षण प्रदान करते हैं; एक औरत कभी भी स्वाधीन रहने के काबिल नहीं होती है।

6 सभी जातियों में इस कार्य को सर्वोच्चता प्रदान की जानी चाहिए, कमजोर पति वर्ग को भी (चाहिए) कि अपनी पत्नियों पर चौकसी रखें।

14 पुरुष देखने में कैसा है, अथवा उसकी उम्र क्या है, इससे औरतों का कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। केवल यह (सोचना) चाहिए कि वह पुरुष है, चाहे पुरुष रूपवान हो अथवा कुरूप हो, उनको स्वीकार होना चाहिए।

15 इस दुनिया में चाहे जितनी सावधानीपूर्वक उन पर चौकसी रखी जाय, मगर फिर भी वे मर्दों के प्रति अपनी आसक्ति, अपने अस्थिर मिजाज तथा अपनी स्वाभाविक वेदिली के कारण अपने पति के प्रति बेवफा हो जाती हैं।

16 ईश्वर द्वारा उनकी सृष्टि के समय जिस तरह की मनोवृत्ति उनमें समाहित की गयी है, उसको ध्यान में रखते हुए (प्रत्येक) पुरुष को पूरी मेहनत से उन पर निगरानी रखनी चाहिए।

18 औरतों के लिए पवित्र ग्रंथों के आधार पर कोई भी (संस्कार सम्बन्धी) अनुष्ठान (निष्पादित) नहीं किया जाता है- यह कानून सम्मत है; वे औरतें भी, (जो) शरीर से निःसहाय तथा (बुद्धि से) निःसहाय हों, वे (स्वयं) झूठ की भांति (अपवित्र होती हैं)। यह भी कानून सम्मत है।

59 (अपने पति से) संतान प्राप्ति में असफल होने की दशा में एक औरत, जिसे अधिकृत किया गया हो, तथा उचित (निर्धारित विधि) द्वारा, किसी देवर के अथवा (पति के) (किसी अन्य) सपिंड के संसर्ग से मनचाही संतान प्राप्त कर सकती है।

78 ऐसी औरत को, जो (पति) के प्रति, जो (किसी बुरी) लत का शिकार हो, पियक्कड़ हो, अथवा बीमार हो, अनादर प्रकट करे तो उसे गहनों एवं साज सामान से वंचित (करके) तीन महीनों के लिए परित्यक्त कर दिया जाना चाहिए।

जाति व्यवस्था तथा इसकी वकालत करने वाले धर्म ग्रंथों के समर्थक लोग यह सिद्ध करने के

लिए ऐसे उदाहरण पेश करते रहते हैं, जो इसके अपवाद रहे होते हैं, या कि जिनमें जातिगत अवरोधों का अतिक्रमण होता है। तमाम ऐसी महिलाओं का सन्दर्भ दिया जाता है जिन्होंने बौद्धिक क्षमता, स्वावलंबन तथा साहस दिखाया हुआ होता है। यह सही है, मगर ये सब व्यवस्था के अपवाद भर थे। बाकी तो तमाम धर्म ग्रंथों में जाति व्यवस्था का कानून गहरे तक जड़ें जमाये बैठा हुआ है, जिसे जब भी लिंग-भेद के खिलाफ कानून बनाने का प्रयास किया जाता है, तब उस पर बर्बर तरीके से हमला करने तथा उसका विरोध करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

विधि निर्माता के रूप में मनु की विशिष्ट हैसियत असल में शुरुआती दिनों में ही स्थापित हो गयी थी, तथा उनकी सत्ता को चुनौती रहित माना गया था। ब्राह्मण विद्वानों का संस्कृत भाषा के ऊपर एकाधिकार होता था, जिसके कारण धर्म ग्रंथों के अनुवाद तथा उनकी व्याख्या पर उनका एकाधिकार होता था। इसी वजह से उन विद्वानों का बहुत महत्त्व होता था, तथा उनकी सत्ता पर कोई आंच नहीं आ सकती थी।

आधुनिक दौर में मनुस्मृति

मनुस्मृति की यह प्रतिष्ठा अगले लगभग पंद्रह सौ वर्षों तक यूं ही बनी रही, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के बड़े हिस्से के प्रशासन पर अपना कब्जा जमा लिया था। कंपनी की ओर से जो लोग इन क्षेत्रों का प्रशासन चला रहे थे, उनके लिए देश में लागू न्याय व्यवस्था को जानना समझना आवश्यक था। इस सम्बन्ध में उन्हें जानकारी तथा सलाह के लिए संस्कृत के ब्राह्मण विद्वानों पर प्रमुखतः आश्रित रहना पड़ता था। उनको बताया गया कि भारत में न्याय व्यवस्था का मूल स्रोत मनुस्मृति था। इस प्रकार, हिन्दुओं के जीवन को अनुशासित करने वाले कानून के आधार, अर्थात मनुस्मृति को अधिकाधिक सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त होती गयी, और तमाम ऐसी प्रथाएं एवं मान्यताएं जो कि विभिन्न समुदायों तथा क्षेत्रों में प्रचलित थीं, अपनी प्रमुखता खोती गयीं।

नतीजतन, लैंगिक न्याय तथा सुधारों की दिशा में जो भी कुछ प्रयास किये जाते थे, भले ही वे अपने आप में कितने ही कमजोर एवं निर्विवादित रहे हों, विरोध का तूफान खड़ा कर देते थे, तथा मनुस्मृति एवं अन्य धर्मशास्त्रों की उक्तियों को समाज सुधारकों को पराजित करने तथा उनकी आवाज दबाने के लिए हथियार की तरह प्रयोग में लाया जाता था। इस मुहिम में अपेक्षा से कहीं अधिक सफलता उनके हाथ लगी, हालांकि कभी-कभी पराजय का सामना भी करना पड़ा।

जब राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध करने तथा ब्रिटिश सरकार को इस बर्बर प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए राजी करने का निश्चय किया, तब उन्होंने स्वयं ही सती प्रथा के पक्ष में रूढ़िवादियों के तर्क का वर्णन किया था, तथा उसका फिर खंडन किया था। उन्होंने अपने विरोधियों के पक्ष को इस प्रकार पेश किया थाः-

"आपने यह एक अनुचित आरोप पेश किया है कि शास्त्रों में सह-दाह संस्कार का निषेध किया हुआ है। अंगिरा तथा अन्य संतों ने इस विषय पर जैसा कहा है, उस पर ध्यान देना चाहिए-वह औरत जो अपने पति की मृत्यु पर उसकी चिता में समाहित हो जाती है, वह अरुंधती की

भांति सीधे स्वर्ग सिधारती है; वह औरत जो अपने पति का अनुसरण करती है, वह अपने तीन परिवारों को उनके पापों से मुक्ति दिला देती है- अपने पिता के वंश को, अपनी मां के वंश को तथा उस परिवार को जिसमें वह व्याह के बाद जाती है- भले ही उसके पति ने किसी ब्राह्मण की हत्या की हो, अथवा भलाई का जवाब बुराई से दिया हो, अथवा एक अन्तरंग मित्र की हत्या की हो- वह औरत उन सभी अपराधों का निवारण करती है। एक नेक औरत के लिए अपने पति की चिता में आरोहण करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होता है। अपने पति की मृत्यु के बाद एक औरत के लिए कोई अन्य कर्तव्य शेष नहीं रहता है- इस बात को अच्छी तरह से समझ लिया जाना चाहिए, आदि, आदि।"

राजा राम मोहन राय तब फिर इन तर्कों का खंडन इस प्रकार करते हैं

"जिन भी सूत्रों का उद्धरण दिया गया है, वे वास्तव में धर्मशास्त्रों में वर्णित किये गए हैं। लेकिन मनु तथा अन्य विद्वानों ने विधवाओं के कर्तव्यों के सम्बन्ध में जो बताया है, उस पर भी ध्यान दें। 'उसको स्वेच्छा से शुद्ध फल-फूल और कंद-मूल खाकर अपने शरीर को कृशकाय करने की इजाजत होनी चाहिए; लेकिन अपने पति की मृत्यु के बाद उसको किसी गैर मर्द का नाम भूल से भी अपनी जिल्ह्या पर नहीं लाने दिया जाना चाहिए। उसको मृत्यु पर्यंत सभी अपकारों को माफ करते रहना चाहिए, कठोर कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, प्रत्येक शारीरिक सुख का परित्याग करना चाहिए तथा नेकनीयती के अतुलनीय मानकों पर खुशी खुशी अमल करना चाहिए, जैसा कि अपने पति के प्रति निष्ठावान औरतें करती हैं"।

सती प्रथा का विरोध करने की मंशा से राय को मनु के द्वारा विधवा औरतों के प्रति बर्ताव की कठोर एवं क्रूर निषेधाज्ञाओं तक का सहारा लेना पड़ा, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि मनु असल में विधवाओं को जीवित रहने देने के पक्ष में थे, हालांकि जीवित रहने की स्थितियां बड़ी भयंकर थीं। असल में वे इन बातों को अपने विरोधियों के श्रीमुख से कहलवाना चाहते थे।

बहरहाल, उपरोक्त से तो यही साबित होता है कि दुर्भाग्य की मारी इन विधवाओं के लिए जीवित रहने की तुलना में मौत को गले लगा लेना अधिक श्रेयष्कर था, क्योंकि शास्त्रों द्वारा निर्धारित आत्म संयमित जीवन जीने में किसी विधवा को भारी परेशानी महसूस हो सकती थी, जो कि बहुत स्पष्ट है। इसलिए, यदि वह सह-दाह संस्कार को नहीं अपनाती तो यह संभव था कि वह ऐसे कार्य कलापों की दोषी बन जाए, जो अपने पिता और मां के, तथा अपने पति के खानदान के लिए अपमानजनक साबित हों। ऐसी स्थिति में अपने पति की म्रत्यु की दशा में उनमें से बहुतों के लिए मृत्यु शैया पर जाने के लिए इच्छुक होना स्वाभाविक ही था। इसके अतिरिक्त जलती अग्नि से बचने की चेष्टा की किसी भी संभावना से निपटने के लिए उनको चिता से बाँध दिया जाता था, ताकि उनका दहन किया जा सके।

विधवा-दहन जैसी स्त्रियों से द्वेष रखने की सबसे खराब प्रथा का विरोध करने के इरादे से राय को स्वयं भी स्त्री-द्वेष का सहारा लेना पड़ा था। जिन्दा जला देने से बचाने के लिए उनको यह दलील देनी पड़ती है कि विधवाओं को नियंत्रित तथा निष्प्राण जीवन जीने दिया जाय।

सभी आततायियों की तरह सती प्रथा के समर्थक लोग भी इस अत्याचार को पीड़ितों के लिए लाभदायक बताते हैं। चिता की लकड़ियों से विधवाओं को बाँध दिए जाने को मोक्ष प्राप्त करने

तथा बदनामी से बचने का उपाय बताया जाता है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब ब्रिटिश सरकार से शिक्षा तक पहुँच के लिए महिला अधिकार तथा बाल विवाह के विरुद्ध कानून बनाने के लिए गुजारिश की जा रही थी, तब तिलक जैसे कद के व्यक्ति को यह कहने में कोई झिझक नहीं महसूस हो रही थी कि "हिन्दू धर्म का अनुशासन इतना कठोर होता है कि बेरहम बर्ताव के बावजूद पत्नियां अपने पतियों के साथ निवाहती रहती है, क्योंकि उनका यह मानना होता है कि यही उनका कर्तव्य होता है"।

बाल विवाह के पक्ष में उनका कहना था कि "यौवनारम्भ की प्राप्ति पर विवाह-संसिद्धि का होना लिखित एवं अलिखित दोनों ही प्रकार से कानून सम्मत होता है... और इसलिए हम नहीं चाहेंगे कि हमारी सामाजिक प्रथाओं को नियंत्रित करने वाले अथवा जीने के तौर तरीकों के साथ सरकार कुछ भी छेड़-छाड़ करे, चाहे भले ही सरकार के ये कारनामे फायदेमंद तथा माकूल हों।"

आगे की प्रगति

इन रुकावटों के बावजूद सामाजिक सुधार तथा लैंगिक न्याय की दिशा में आन्दोलन आगे बढ़ता रहा। इसको मजबूत होते स्वाधीनता आन्दोलन से भारी प्रेरणा प्राप्त हुयी। यही नहीं कि लाखों की संख्या में महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ लाठी, गोली और जेल का सामना करते हुए इसमें भाग लिया था, बल्कि यह भी कि महिलाओं के अधिकारों की मांग को नागरिकों के अधिकारों से सम्बंधित कोई भी आन्दोलन नजर अंदाज नहीं कर सकता था। इस तरह, स्वाधीन भारत में एक संविधान बनाने की आवश्यकता पैदा हो गयी थी।

जिस प्रकार से भारतीय समाज के बड़े हिस्सों पर मनुस्मृति तथा अन्य धर्म ग्रंथों की पकड़ कायम थी, जिनमें जोशीले तथा समाज के प्रभावशाली लोग भी शामिल थे, भारत में संविधान का लागू किया जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह सब डाक्टर बी. आर. अम्बेडकर के असाधारण प्रयासों का ही नतीजा था, जिन्होंने स्वयं पूर्व में अपने सार्वजनिक जीवन में मनुस्मृति का दहन किया था।

कानून की दृष्टि में जाति, वर्ग, लिंग अथवा धर्म के आधार पर किसी भेदभाव के बगैर भारत के सभी नागरिकों के बीच वराबरी का सिद्धांत हमारे संविधान का आधारभूत सिद्धांत है। इसको अपनाए जाने के जरिये असल में ऐसी एक प्रथा से मौलिक रूप से किनारा कर लिया गया था, जो जीवन के हर क्षेत्र में गैर बराबरी को बढ़ावा देती रही है, फिर भी पवित्र मानी जाती रही है, तथा जिसका जमकर बचाव किया जाता रहा है। इस प्रथा के पीछे मान्यता यह रही है कि गैर बराबरी को न तो मिटाया जा सकता है, और न ही उसको मिटाया जाना चाहिए।

संविधान को काफी बहस, वाक्छल, विरोध तथा नाराजगी के बाद वर्ष 1950 में अपना लिया गया। इसको पूरे राजनैतिक स्पेक्ट्रम से समर्थन प्राप्त हुआ, जिन्होंने भी स्वाधीनता आन्दोलन में हिस्सा लिया था- चाहे वे कांग्रेस के लोग रहे हों, अथवा कम्युनिस्ट एवं समाजवादी लोग रहे हों। लेकिन हिन्दू महासभा तथा आर.एस.एस. ने, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का समर्थन किया था, तथा जो राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर ही रहे थे, संविधान का विरोध करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने इस बात के लिए जोर दिया कि भारत में कानूनी ढाँचे का आधार

केवल धर्मशास्त्र तथा मनुस्मृति ही हो सकते थे। आर.एस.एस. प्रमुख गोलवलकर ने 'आर्गेनाइजर' के 3 नवम्बर, 1949 के अंक में अफसोस जताया किः-

लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अनूठे संवैधानिक घटनाक्रम का कोई हवाला नहीं दिया गया है। स्पार्टा के ल्युर्गुस अथवा फारस के सोलोन से बहुत पहले मनु के विधिक नियम लिखे गए थे। आज भी मनुस्मृति में प्रतिपादित सिद्धांतों को दुनिया में सराहा जाता है, तथा उनका सहज रूप से अनुपालन हासिल किया जाता है। लेकिन हमारे यहाँ के संविधान के पंडितों के लिए इस सब के कोई मायने नहीं होते हैं।

स्वाभाविक रूप से गोलवलकर जाति व्यवस्था के अटल समर्थक थे, और उन्होंने अपनी पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' में कहा है- "प्राचीन युग में भी जातियां होती थीं, जो हमारे यशस्वी राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्ष से जारी रहीं हैं..... उन्होंने सामाजिक सामंजस्य के लिए एक बड़े अनुबंध का काम किया..... इन प्रभागों के मध्य एक यथोचित सामंजस्य के अतिरिक्त वर्ण व्यवस्था और कुछ भी नहीं है, तथा इसके माध्यम से व्यक्ति अपनी सर्वोत्तम योग्यता से वंशानुगत कार्यों को संपादित कर समाज सेवा कर सकता है। यही वह तथ्य हैं, जिसके कारण विश्व के अकेले सबसे महान कानून वेत्ता- मनु ने इस व्यवस्था का प्रतिपादन किया, जिसमें दुनिया भर के लोगों को निर्देशित किया गया कि भारत भूमि पर जन्मे ज्येष्ठतम ब्राह्मण के पवित्र चरणों में आकर अपने कर्तव्यों के बारे में शिक्षा ग्रहण करें।" (वी, अवर नेशन हुड डिफाइंड, पृष्ठ संख्या 117)

आर.एस.एस. तथा इसके समर्थक लोग हिन्दू कोड बिल के खिलाफ भी सबसे आगे रहे, जिसके जरिये हिन्दू महिलाओं के उत्तराधिकार, विवाह तथा तलाक से सम्बंधित अधिकारों में व्याप्त कानूनी कमजोरियों को हटाने के प्रयास किये गए थे।

संविधान को लागू करते वक्त मगर आर.एस.एस. के पक्ष में जन समर्थन नहीं था। महात्मा गाँधी की जघन्य एवं दुखद हत्या के सिलसिले में इसकी भागीदारी की विस्तृत निंदा हुयी थी। राष्ट्रीय आन्दोलन के इसके विरोध, संविधान की इसके द्वारा अस्वीकृति, मनुस्मृति तथा जाति व्यवस्था के प्रति इसके खुले समर्थन आदि ने आम जनता के बीच इसके विलगाव को बढ़ा दिया. था। इससे मगर वे हतोत्साहित नहीं हुए, और सामाजिक बराबरी के सिद्धांत के विरोध के अपने प्रतिगामी एजेंडे के प्रति वचनबद्ध बने रहे।

समय के साथ लेकिन स्थिति में बदलाव आया। एक के बाद एक कांग्रेस सरकारों की गरीब विरोधी एवं जन विरोधी नीतियों ने जनता के बीच भारी असंतोष को जन्म दिया, जिसने आर. एस.एस. के राजनैतिक संगठन बी.जे.पी. को अपनी ताकत कई गुना बढाने में मदद दी। आज इसके नियंत्रण में केन्द्रीय सरकार ही नहीं, बल्कि अधिकतर राज्य सरकारें भी काम कर रही हैं।

आर.एस.एस. नियंत्रित बी. जे. पी. ने पिछले छः वर्षों में संवैधानिक प्रावधानों तथा संस्थाओं को कमजोर करने के किसी मौके को नहीं गंवाया है। मनुस्मृति के बहुत से बुनियादी सिद्धांतों को अब छल पूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर गंभीर हमले किये जा रहे हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य, जिस पर

ध्यान दिया जाना आवश्यक है, वह है कि जिस पदानुक्रम आधारित समाज व्यवस्था का गुणगान मनुस्मृति करती है, वह केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक भेदभाव को भी प्रोन्नत करती है। मनुस्मृति में इस बात पर जोर दिया गया है कि जो लोग मेहनत करने तथा उच्च जातियों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हैं- (जो जमींदार होते हैं, और विभिन्न संसाधनों के मालिक होते हैं,) उनको बिना किसी शिकायत के तथा निश्चित रूप से बिना किसी विरोध के अपने कर्तव्यों का इसी प्रकार पालन करते रहना चाहिए। इस प्रकार मनु का विधान आर.एस. एस. बी.जे.पी. के दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता है। ये उद्देश्य वास्तविक रूप से एक ओर स्थायी अन्यायी सामाजिक व्यवस्था को जन्म देते हैं, और साथ ही एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं, जिसमें शोषण तथा गैर बराबरी बड़ी तेजी से बढ़ते हैं।

यह सब इस तथ्य का प्रतिवाद करने के लिए नहीं है कि संविधान के अस्तित्व में आ जाने तथा न्याय के पक्ष में संघर्ष तथा अभियान चलाने के लिए कार्य क्षेत्र की उपलब्धता होने के बावजूद महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता था। उनके खिलाफ हिंसा ने नए तथा क्रूर आयाम ग्रहण कर लिए थे। महिलाओं के एक बड़े बहुमत के लिए लैंगिक न्याय की तलाश मुश्किल ही बनी रही। पूँजीवाद के अंतर्गत एक अन्यायी आर्थिक व्यवस्था के साथ साथ जमीन की मिलकियत तथा खेती के सामंती तौर तरीकों ने शोषण को रोजमर्रा की व्यवस्था बना दिया था, जिसकी सबसे बड़ी शिकार महिलायें होती हैं।

यह हकीकत मगर इस तथ्य को नहीं छिपा सकती कि महिलाओं ने जो भी उपलब्धिया अर्जित की हैं, तथा समानता प्राप्त करने की दिशा में जो भी कदम उठाये हैं, वे संविधान में प्रदत्त वायदों की वजह से संभव हुए हैं। जहां तक उत्तराधिकार में बराबरी, शिक्षा तथा जीविकोपार्जन तक पहुँच, तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कानूनों के क्रियान्वयन का सम्बन्ध है, जिनको महिला आन्दोलन प्राप्त करने में सफल रहा है, वह संविधान के अस्तित्व में होने के कारण ही संभव हो पाया है। इसलिए संविधान की हिफाजत करना तथा उसे मजबूती प्रदान करना आवश्यक है, ताकि जो उपलब्धिया अर्जित की गयीं हैं, उनको बनाए रखा जा सके तथा आगे भी प्रगति संभव हो सके। इस मामले में समझ बहुत साफ होनी चाहिए, तथा इसका व्यापक प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए।

वे लोग जो जन्म आधारित एक गैर बराबर समाज की वापसी के प्रति बेशर्मी के साथ प्रतिबद्ध हैं, यह जानते हैं कि उनकी लक्ष्य प्राप्ति के लिए लैंगिक न्याय का निषेध एक आवश्यक शर्त है। इसलिए वे संविधान के स्थान पर अंततः मनुस्मृति को लागू करने के लिए कृत संकल्प हैं।

एडवा में हम लोगों को संविधान की हिफाजत के संघर्ष में सबसे आगे होना चाहिए। हमें मनुस्मृति को लागू करने के हर परोक्ष एवं अपरोक्ष प्रयास का प्रतिरोध करना होगा। इस लड़ाई में जीत हासिल करने के लिए हमें महिलाओं के व्यापक जनसमूह को लामबंद करना होगा। साथ ही हमें उन सब के साथ भी संयुक्त आन्दोलन तथा अभियान चलाने होंगे जिनको कड़ी मेहनत से हासिल अधिकारों को खो देने का खतरा उठाना पड़ता है।

समाप्त

अनुवाद- अशोक गर्ग

(8)

सोमवार, 17 अगस्त 2026

15अगस्त

15 अगस्त- जश्न नहीं, पंजाब के विनाश और लोकतंत्र के हनन का दिन   

प्रिय मित्रों, परिजनों, और साथियों,
आज 15 अगस्त है। देश के कहने वाले इसे 'स्वतंत्रता दिवस' कहेंगे, पर हम जानते हैं कि यह तारीख़ पंजाबियों के लिए मातम का दिन है। यह वह दिन है जब बाबा नानक की धरती को दो टुकड़ों में बाँट दिया गया, जब करीब एक करोड़ लोग बेघर हुए और 23 से 32 लाख लोग मारे गए या लापता हो गए । यह दिन ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपराधियों और उनके स्थानीय साझीदारों की साजिश को उजागर करने का दिन है। यह दिन भगत सिंह, उधम सिंह, अम्बेडकर के संघर्ष को याद करने और आरएसएस-भाजपा की साजिशों को बेनकाब करने का दिन है।
द बॉर्डर पंजाब नेवर आस्क्ड फॉर (वह सीमा जो पंजाब ने कभी नहीं माँगी)
हर साल अगस्त में 1947 की कहानी भारत और पाकिस्तान के जन्म के रूप में सुनाई जाती है। झंडे फहराए जाते हैं, भाषण दिए जाते हैं, और ब्रिटिश राज की समाप्ति का जश्न मनाया जाता है। लेकिन इस राष्ट्रीय आख्यान के नीचे एक और कहानी है जो पंजाब के गाँवों, कस्बों और नदियों में लिखी गई है। लाखों पंजाबियों के लिए, 1947 मात्र स्वतंत्रता नहीं थी; यह उनकी मातृभूमि का विनाश था। पंजाब ने कभी विभाजन नहीं माँगा था।
सवाल: क्या पंजाब को बाँटा जाना चाहिए था?
1946 तक, पंजाब की राजनीति गहराई से ध्रुवीकृत हो चुकी थी । मुस्लिम लीग ने प्रांतीय विधानसभा में 86 मुस्लिम सीटों में से 79 पर जीत हासिल कर ली थी, जबकि सिख और हिंदू राजनीतिक संगठन मुस्लिम लीग के वर्चस्व से बढ़ती आशंका में थे । **पर इस चुनावी प्रतिस्पर्धा को पंजाब के विभाजन के समर्थन में प्रांत-व्यापी वोट समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। कोई जनमत संग्रह नहीं हुआ था, जिसमें आम पंजाबियों से पूछा गया हो कि क्या उनकी साझा मातृभूमि को विभाजित किया जाना चाहिए **।
इसके विपरीत, दशकों तक पंजाब ने धार्मिक सीमाओं के पार राजनीति की संभावना का प्रदर्शन किया था । यूनियनिस्ट पार्टी, जो मुस्लिम, सिख और हिंदू हितों का प्रतिनिधित्व करती थी, ने औपनिवेशिक काल के अधिकांश समय में प्रांतीय राजनीति पर वर्चस्व कायम रखा । इसकी राजनीतिक पहचान कृषि, प्रांतीय हितों और समुदायों के बीच सहयोग में निहित थी । इसलिए, पंजाब का विभाजन किसी प्राचीन या अपरिहार्य सांप्रदायिक अलगाव की अभिव्यक्ति मात्र नहीं था । यह अखिल भारतीय राजनीतिक संघर्ष की तीव्रता के साथ प्रांतीय राजनीति के पतन से उत्पन्न हुआ ।
इसके बाद आई रेडक्लिफ़ रेखा। सिरिल रेडक्लिफ, एक ब्रिटिश वकील जिसने पहले कभी भारत का दौरा नहीं किया था, को पंजाब और बंगाल की सीमाएँ खींचने के लिए केवल लगभग पाँच सप्ताह दिए गए थे । **यह निर्णय 17 अगस्त 1947 को घोषित किया गया, जो पाकिस्तान की स्वतंत्रता के दो दिन बाद और भारत की स्वतंत्रता के एक दिन बाद आया **। इसका मतलब यह हुआ कि लाखों लोगों को स्वतंत्रता के बाद ही पता चला कि उनके घर किस देश में आ गए हैं । इसके परिणाम विनाशकारी थे ।
पंजाब का विभाजन: सांख्यिकीय पैमाना और मानवीय त्रासदी
पहलू विवरण
विस्थापित लोग लगभग 1 करोड़ लोग पंजाब भर में उखाड़े गए
जानमाल का नुकसान 1941-51 की जनगणना के बीच 23 से 32 लाख लोग मारे गए या लापता हुए
अपहृत महिलाएँ भारत में ~50,000 मुस्लिम महिलाएँ, पाकिस्तान में ~33,000 हिंदू-सिख महिलाएँ
अपहृत महिलाओं की वापसी 1950 के दशक की शुरुआत तक 29,000+ महिलाओं को दोनों देशों ने वापस पाया

आरएसएस और मुस्लिम लीग में संबंध 
यह सवाल इतिहास में दफ़न करने की कोशिशे हो रही है, लेकिन इसकी गूँज आज भी सुनाई देती है। रिपोर्ट्स में खुलासा किया गया है कि आरएसएस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं । आरएसएस की 'हिंदू राष्ट्रवादी' राजनीति और बहुतावाद विरोधी रुख ने लोकतंत्र और स्वतंत्रता को नीचे लाने की प्रक्रिया को तेज़ किया है ।
लोकतंत्र और स्वतंत्रता का हनन: आँकड़े बोलते हैं
अब बात करते हैं आजादी की। 15 अगस्त 1947 को हमें 'आज़ादी' मिली, लेकिन आज हम कितने आज़ाद हैं? स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भारत की स्थिति क्या है? आँकड़े बताते हैं कि जिस 'आजादी' के लिए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और उधम सिंह ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उसे हर दिन मोदी सरकार और उसकी विचारधारा द्वारा छीना जा रहा है।
लोकतंत्र: वी-डेम, फ्रीडम हाउस और ईआईयू के आँकड़े
    • वी-डेम इंस्टिट्यूट (स्वीडन) की रिपोर्ट: इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अब 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' आ चुकी है। यानी, चुनाव तो होते हैं, वोट भी पड़ते हैं, लेकिन चुनाव के अलावा बाकी सारी चीज़ें बहुत कमज़ोर हो गई हैं । रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में ही भारत इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी बन गया था — मोदी के सत्ता में आने के कुछ ही सालों में । भारत का 'लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स' स्कोर 0.44 से गिरकर 0.26 हो गया, और रैंक 53वीं से गिरकर 105वीं पर आ गई। 10 सालों में स्कोर लगभग आधा हो गया है।
    • फ्रीडम हाउस (अमेरिका) की रिपोर्ट: 2014 में भारत का स्कोर 75 था और वह 'फ्री' (पूर्ण स्वतंत्र) देशों की श्रेणी में था। 2021 में डाउनग्रेड होकर 'पार्टली फ्री' (आंशिक रूप से स्वतंत्र) हो गया । 2026 में स्कोर गिरकर 62 पर आ गया — कुल 13 अंकों की गिरावट । आज भारत अंतरराष्ट्रीय मानकों पर पूर्ण स्वतंत्र देश नहीं है, बल्कि आंशिक रूप से स्वतंत्र है।
    • इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) डेमोक्रेसी इंडेक्स: 2014 में भारत का स्कोर 8.0 था और रैंक 27वीं थी। 2026 में यह गिरकर 6.94 पर आ गया। 2014 के बाद यह गिरावट तेज़ी से हुई है।
क्या कहती हैं ये रिपोर्ट्स?
    • मीडिया की स्वतंत्रता में कमी आई है; पत्रकारों पर दबाव बढ़ रहा है ।
    • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं, उसे सीमित किया जा रहा है ।
    • नागरिक समाज और एनजीओ पर लगातार कार्रवाई हो रही है।
    • विपक्षी नेताओं के खिलाफ जाँच एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है।
    • अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों, के खिलाफ भेदभाव और हिंसा बढ़ी है।
    • चुनाव आयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं ।
नकली राष्ट्रवाद और झूठ का मायाजाल
जबकि हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र सिकुड़ रहे हैं, लाल क़िले से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं—'मदर ऑफ डेमोक्रेसी', 'सबका साथ, सबका विकास', 'आज़ादी का अमृत महोत्सव'। यह देश को मूर्ख बनाना है, देश को बेवकूफ बनाना है, देश को गुमराह करना है।
जंतर-मंतर और विपक्ष का दमन
जब छात्र और नागरिक जंतर-मंतर पर अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो उनके साथ बर्बरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है—कील लगी लाठियाँ, पैलेट गन, लड़कियों और बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार । यह 'लोकतंत्र' है? जब विपक्ष के सवालों का जवाब देने की हिम्मत नहीं है, तो यह 'लोकतंत्र' नहीं, तानाशाही है ।
15 अगस्त: जश्न नहीं, मातम और प्रतिरोध का दिन
**15 अगस्त 1947 को पंजाब आज़ाद नहीं हुआ, बल्कि कट गया **। यह तारीख़ पंजाबियों के लिए वह दिन है जब गाँव उजड़ गए, खेत छूट गए, परिवार बिखर गए, और सांझी विरासत को दो धाराओं में बाँट दिया गया । लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, और लगभग 23 से 32 लाख लोग अपनी जान गँवा बैठे । महिलाएँ सबसे अंधकारमय हिंसा की शिकार हुईं—अपहरण, सामूहिक बलात्कार, और जबरन विवाह ।
हम वह दिन कैसे मना सकते हैं जब पंजाब का कलेजा चीर दिया गया? 15 अगस्त हमारे लिए जश्न का दिन नहीं, बल्कि मातम का दिन है, पंजाब के विनाश को याद करने का दिन है, और उस सीमा को रद्द करने की शपथ लेने का दिन है जो हमारी ज़मीन पर ज़बरदस्ती खींची गई थी।
पंजाब के 'बार' की याद
विभाजन से पहले, पश्चिमी पंजाब का 'बार' (नहरी कॉलोनियाँ) पंजाबियों की साझी धरोहर थी । अंग्रेज़ों ने सिंचाई की व्यवस्था बनाई, लेकिन उनका मकसद पंजाब का विकास नहीं, बल्कि अपनी साम्राज्यवादी ज़रूरतें पूरी करना था। पंजाब को ब्रिटिश सेना के लिए अनाज का अड्डा बना दिया गया, और स्थानीय साझीदारों (ज़मींदारों और सरदारों) को फ़ायदा पहुँचाया गया ।
जिन महानायकों को भूला दिया गया
आज जब लाल क़िले पर 'नए भारत' के सपने बेचे जा रहे हैं, तो हमें याद करना चाहिए कि इस देश की असली आज़ादी किसने लड़ी:
    • भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु: इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ बगावत की और फाँसी के फंदे को चूमा। इनकी विचारधारा साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ थी। आज जो लोग 'देशभक्ति' के नाम पर इनका इस्तेमाल करते हैं, वही इनकी क्रांतिकारी सोच के ख़िलाफ़ हैं।
    • उधम सिंह: जिसने 1940 में लंदन में जनरल ओ'डायर (जलियाँवाला बाग़ का जिम्मेदार) को गोली मारी, वह आज भी 'आतंकवादी' कहलाता है। जो जलियाँवाला बाग़ को भूल गया, वह उधम सिंह को कैसे याद रखेगा?
    • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: जिन्होंने भारत को न सिर्फ़ ब्रिटिश राज, बल्कि सामाजिक असमानताओं से भी मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया । आज जो संविधान की बात करता है, वही उसे बदलने की बात करता है।
जश्न नहीं, बल्कि संकल्प
प्रिय मित्रों, आरएसएस-भाजपा की विचारधारा के पोषित लोगों को यह लेख ज़हर लग सकता है, लेकिन हमारे लिए यह सच्चाई है। यह लेख उन सभी को समर्पित है जो मानते हैं कि 15 अगस्त जश्न का दिन नहीं, बल्कि आज़ादी के सच्चे मायनों पर विचार करने का दिन है; जो याद करते हैं कि आज़ादी के इस 'महापर्व' के पीछे कितने लाशों का ढेर है, कितनी बेघर महिलाओं की आह है, कितने बिछड़े परिवारों का दर्द है; और जो मानते हैं कि देश की सच्ची आज़ादी तभी आएगी जब पंजाब की सीमाएँ मिटेंगी और बाबा नानक की धरती पर फिर से मेले लगेंगे।
हम 15 अगस्त 1947 को कभी नहीं भूल सकते, क्योंकि वह दिन पंजाब के लिए क़यामत था। यह दिन जश्न का नहीं, बल्कि मातम और प्रतिरोध का दिन है—साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता, और तानाशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष का दिन।
इंकलाब ज़िंदाबाद!

Dr. Pawan Kumar ‘Aryan’
Adv P&H High Court Chandigarh
15-08-2026

बुधवार, 22 जुलाई 2026

NEET

शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े और NEET व अन्य परीक्षाओं में जवाबदेही की मांग को लेकर, 20 जुलाई को संसद तक मार्च के बारे में JSA का बयान

युवाओं का ऐतिहासिक जमाव! पुलिस की बर्बर कार्रवाई! जारी आंदोलन को समर्थन देने की ज़रूरत!

भारत में वह सभी लोग जो निष्पक्ष और मानवीय शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करते हैं, वह 20 जुलाई 2026 को ज़रूर याद रखेंगे । इस दिन एक ऐसी व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व आन्दोलन किया गया - जहाँ कोई मेडिकल का छात्र आत्महत्या न करे, क्योंकि सरकार परीक्षा का पेपर लीक रोकने में नाकाम रही, और न ही कोई नौ साल की बच्ची क्लासरूम में बुलीइंग (धौंस-धमकी) के कारण अपनी जान दे।

इस दिन हमने न सिर्फ़ दिल्ली-NCR ही नहीं, बल्कि पूरे देश से आए छात्रों और युवाओं की एक ऐतिहासिक रैली देखी। इसमें कुछ NEET उम्मीदवारों के परिवार वाले भी शामिल हुए, जिनके बेटे – बेटियों ने अपनी जान दे दी थी। उनकी साफ़ मांग थी: न सिर्फ़ खराब, बाजारी और भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा ही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था में बदलाव, जो पिछले एक दशक में देश के युवाओं को अच्छी और सस्ती शिक्षा और रोज़गार देने में नाकाम रही है।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और भारत के कई छात्र संगठनों - जिनमें AISA, SFI और AISF शामिल हैं - ने 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने का आह्वान किया था। इसी दिन संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने वाला था। यह आह्वान दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून से चल रहे एक महीने लंबे धरने के दौरान किया गया था। इस धरने में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और छह से ज़्यादा यूनिवर्सिटी छात्रों की 22 दिन की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शामिल थी। कई अन्य शहरों में भी रैलियां और धरने आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।

JSA उन सभी लोगों के उत्साह और हिम्मत को सलाम करता है, जो 20 दिनों से ज़्यादा समय तक भूख हड़ताल पर थे; साथ ही मार्च में शामिल लोगों की हिम्मत और उनके अहिंसक रवैये की भी तारीफ़ करता है। खासकर तब जब उन्हें चुप कराने के लिए क्रूर हिंसा का सहारा लिया जा रहा था। यह बहुत ही उत्साहजनक है, कि मात्र एक दिन के भीतर ये प्रदर्शनकारी फिर उसी जंतर-मंतर पर लौट आए, जहाँ से उन्हें बेरहमी से हटाया गया था। 

JSA ने इन युवाओं के साथ पहले भी एकजुटता दिखाई है, और एक बयान जारी किया है। इस बयान में मेडिकल शिक्षा और NEET प्रक्रिया में मौजूद गंभीर खामियों के बारे में विस्तार से बताया गया है, साथ ही इस व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी और न्यायसंगत बनाने के लिए आवश्यक सुधारों का भी उल्लेख किया गया है। इस विरोध-प्रदर्शन में उठाए गए कई मुद्दे वैसे ही थे, जिन्हें JSA लंबे समय से उठाता रहा है - जैसे कि मेडिकल शिक्षा का निजीकरण, प्रवेश परीक्षाओं के संचालन में गंभीर खामियाँ, तथा स्वास्थ्यकर्मियों और MBBS छात्रों के उत्पीड़न।

JSA के कई सदस्य और उससे जुड़े संगठन 20 जुलाई को संसद तक हुए मार्च में शामिल हुए। अफ़सोस की बात है कि विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर हम सब एक साथ नहीं आ पाए, क्योंकि सरकार ने इंटरनेट और फ़ोन कॉल में रुकावट डालने के लिए सिग्नल जैमर लगा दिए थे । इससे लगभग 2 किलोमीटर के दायरे में बातचीत करना असंभव हो गया था। लोगों की भारी भीड़ और विरोध प्रदर्शन वाली जगह के चारों ओर लगे कई बैरिकेड्स की वजह से भी, वहाँ आने-जाने में काफ़ी दिक्कतें आईं। आस-पास के सभी मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिए जाने के कारण विरोध प्रदर्शन वाली जगह तक पहुँचना भी मुश्किल हो गया था।

इतने दमनकारी कदमों के बावजूद, दसियों हज़ारों की संख्या में जोशीले युवा वहाँ आते रहे। वे ऐसे प्लेकार्ड लिए हुए थे जिन पर रचनात्मक नारे लिखे थे, जो विरोध करने व बेहतर शिक्षा पाने के उनके संवैधानिक अधिकारों को ज़ाहिर करते थे, साथ ही मौजूदा सरकार की नाकामियों को भी उजागर कर रहे थे। संगठनों और सोशल मीडिया की मदद से बड़े पैमाने पर लोगों को लामबंद किया गया था, और संसद की ओर बहुत बड़े मार्च निकाले गए। लेकिन दोपहर में, पुलिस ने जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर शांतिपूर्ण मार्च करने वालों पर बेरहमी से हमला किया। पुलिस की यह हिंसा देर शाम तक चलती रही। कई लोगों पर लाठीचार्ज किया गया, जिनमें ऐसे लोग भी शामिल थे जो पुलिस से भागते समय गिर गए थे। बड़ी संख्या में आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। हमारे सूत्रों ने पुष्टि की है कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को जख्मों के इलाज के लिए इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया, जिनमें से कुछ ICU में हैं। सिर्फ एक अस्पताल - राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ही कम से कम 65 लोगों का गंभीर चोटों के लिए इलाज किया गया, 15 को भर्ती किया गया और कुछ की हालत अभी भी गंभीर है।

एक और बहुत परेशान करने वाली बात यह है कि पुलिस ने कई ऐसे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी मारपीट की, जो घायल प्रदर्शनकारियों का इलाज कर रहे थे। यह जिनेवा कन्वेंशन का खुला उल्लंघन है, जो स्वास्थय कर्मियों के साथ-साथ बीमार और घायल लोगों की सुरक्षा करता है। स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला करके, पुलिस ने घायलों को इमरजेंसी इलाज भी नाकारा।

इस बर्बरता का सामना करने वाले कई कार्यकर्ताओं ने, एक और गंभीर चिंता की बात बतायी । उनके अनुसार,  पीटने वाले कई लोग वर्दी में नहीं थे, और उनके पास पुलिस का कोई बैज भी नहीं था। अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे निहत्थे युवाओं पर सादे कपड़ों में आए इन लोगों ने बेरहमी से हमले किए । इन व्यक्तियों को निश्चित रूप से उच्च स्तर से संरक्षण मिल रहा होगा । इसके अतिरिक्त, पेलेट गन से लोगों के घायल होने, तथा बैरिकेडों में बिजली का प्रवाह छोड़े जाने के कारण प्रदर्शनकारियों को करंट लगने की भी रिपोर्टें सामने आई हैं।

हमें इस बात से बहुत चिंतित हैं, कि सरकार कई महीनों से युवाओं की जायज मांगों पर उनसे किसी भी तरह की बातचीत करने से इनकार कर रही है। बातचीत के लोकतांत्रिक नियमों को मानने और अपनी नाकामियों की ज़िम्मेदारी लेने के बजाय, सरकार ने पूरी तरह से अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया है। पहले सोनम वांगचुक और कई अन्य लोगों को भूख हड़ताल पर बैठने के लिए मजबूर किया, और अब देश की राजधानी की सड़कों पर युवाओं पर सीधे हमले करके अपनी दमनकारी कार्रवाई को और बढ़ा दिया है।

JSA हज़ारों शांतिपूर्ण और निहत्थे छात्रों, युवाओं और कई स्वास्थ्य कर्मियों पर हुई पुलिस की इस बर्बरता की कड़ी से कड़ी निंदा करता है। हम मांग करते हैं कि छात्रों पर हुए इस बर्बर हमले में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की जाए, और निर्देश देने वाले पदों पर बैठे सभी संबंधित अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय की जाए । साथ ही NEET और अन्य परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं और विफलताओं के लिए भी जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।

इस ऐतिहासिक मोड़ पर, हम सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और लोकतांत्रिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे उभरते हुए युवा और सामाजिक आंदोलन को समर्थन दें, इस दिशा में हम मिलकर काम करें। हमें उन दमनकारी व्यवस्थाओं और नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी, जिन्हें भारत के युवा सही तौर पर चुनौती दे रहे हैं । हमें एक वैकल्पिक शासन-व्यवस्था के लिए काम करना होगा, जिसके हम सभी लोग हक़दार हैं, और जिसकी हमें तत्काल जरूरत है।


सोमवार, 6 जुलाई 2026

डॉ मर्कॉला

डॉ. मर्कॉला द्वारा                                             जिन चूहों को 25 प्रतिशत चीनी युक्त आहार दिया गया - जो प्रतिदिन तीन कैन सोडा के बराबर है - उनकी मृत्यु की संभावना बिना चीनी वाले समान आहार पर पाले गए चूहों की तुलना में दोगुनी थी। 1 यह निष्कर्ष यूटा विश्वविद्यालय के 58 सप्ताह के एक नए अध्ययन में सामने आया है, जो एक बार फिर इस बात पर प्रकाश डालता है कि इस मीठे पेय का अत्यधिक सेवन करने के कारण कई अमेरिकियों को समय से पहले ही मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है। यद्यपि चूहों में मोटापे जैसी चयापचय संबंधी बीमारियों के स्पष्ट लक्षण नहीं दिखे, फिर भी वे चीनी से काफी प्रभावित हुए। उदाहरण के लिए, चीनी खाने वाले नर चूहे 26 प्रतिशत कम क्षेत्रीय थे और उन्होंने 25 प्रतिशत कम संतानें पैदा कीं। टाइम पत्रिका में अध्ययन के लेखक जेम्स रफ ने कहा:2 "चूहे कम बच्चे पैदा कर रहे हैं क्योंकि उन्हें प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई हो रही है, वे भोजन खोजने और बच्चों का पालन-पोषण करने में कम प्रभावी हैं। यह उनकी शारीरिक संरचना में कई गड़बड़ियों के कारण है। चूंकि चूहों में विषैले अधिकांश पदार्थ मनुष्यों में भी विषैले होते हैं, इसलिए यह संभव है कि जिन अंतर्निहित शारीरिक समस्याओं के कारण चूहों में मृत्यु दर बढ़ रही है, वे मनुष्यों में भी मौजूद हों।" केवल तीन शताब्दियों में चीनी की खपत में 19 गुना वृद्धि "शुगर लव: ए नॉट सो स्वीट स्टोरी"3 में, लेखक रिच कोहेन ने चीनी के अक्सर खूनी इतिहास और इस मीठे जहर के साथ मनुष्यों के प्रेम संबंध का वर्णन किया है। सबसे उल्लेखनीय आंकड़ों में से एक यह है: 1700 में, एक औसत अंग्रेज एक वर्ष में चार पाउंड चीनी खाता था। यह लगातार बढ़ता गया है और आज एक औसत अमेरिकी के लिए वार्षिक 77 पाउंड चीनी तक पहुंच गया है, जो प्रतिदिन 22 चम्मच से अधिक अतिरिक्त चीनी के बराबर है। और यहीं समस्या निहित है। कम मात्रा में चीनी का सेवन शायद कोई समस्या न हो, लेकिन अधिक मात्रा में चीनी का सेवन निश्चित रूप से समस्या पैदा करता है। लेख के लिए साक्षात्कार देने वाले डॉ. रिचर्ड जॉनसन ने कहा: "ऐसा लगता है कि जब भी मैं किसी बीमारी का अध्ययन करता हूँ और उसके मूल कारण का पता लगाने की कोशिश करता हूँ, तो अंत में मुझे चीनी ही मिलती है। ऐसा क्यों है कि दुनिया भर में एक तिहाई वयस्कों को उच्च रक्तचाप है, जबकि 1900 में केवल 5 प्रतिशत लोगों को ही उच्च रक्तचाप था? 1980 में 153 मिलियन लोगों को मधुमेह था, और अब यह संख्या बढ़कर 347 मिलियन हो गई है? अधिकाधिक अमेरिकी मोटापे का शिकार क्यों हो रहे हैं? हमारा मानना ​​है कि चीनी इन समस्याओं में से एक है, यदि मुख्य कारण नहीं तो।" यह केवल 'खाली कैलोरी' के सेवन का मामला नहीं है, जैसा कि अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन आपको विश्वास दिलाना चाहता है। "इसका कैलोरी से कोई लेना-देना नहीं है," एंडोक्रिनोलॉजिस्ट रॉबर्ट लस्टिग ने कहा। "अधिक मात्रा में सेवन करने पर चीनी अपने आप में एक ज़हर है।"4 चीनी और फ्रक्टोज से मिलने वाली कैलोरी गंभीर बीमारियों का खतरा क्यों बढ़ा सकती है? डॉ. लस्टिग के अनुसार, फ्रक्टोज "आइसोकेलोरिक है लेकिन आइसोमेटाबोलिक नहीं है।" इसका मतलब है कि आप फ्रक्टोज या ग्लूकोज, फ्रक्टोज और प्रोटीन, या फ्रक्टोज और वसा से समान मात्रा में कैलोरी प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन कैलोरी की मात्रा समान होने के बावजूद चयापचय संबंधी प्रभाव पूरी तरह से अलग होगा। ऐसा मुख्य रूप से इसलिए है क्योंकि विभिन्न पोषक तत्व अलग-अलग हार्मोनल प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करते हैं, और ये हार्मोनल प्रतिक्रियाएं, अन्य बातों के अलावा, यह निर्धारित करती हैं कि आपके शरीर में कितनी वसा जमा होती है। एक औसत अमेरिकी द्वारा एक दिन में सेवन की जाने वाली चीनी का आधा हिस्सा फ्रक्टोज होता है, जो जैव रासायनिक गड़बड़ी पैदा करने वाली मात्रा से 300 प्रतिशत अधिक है। और कई अमेरिकी इससे दोगुने से भी अधिक मात्रा का सेवन करते हैं! डॉ. रॉबर्ट लस्टिग और डॉ. रिचर्ड जॉनसन जैसे शोधकर्ताओं के उत्कृष्ट कार्य की बदौलत अब हम जानते हैं कि फ्रक्टोज: ग्लूकोज से अलग तरीके से मेटाबोलाइज़ होता है, और इसका अधिकांश भाग सीधे वसा में परिवर्तित हो जाता है। यह आपके मेटाबॉलिज्म को भ्रमित करके आपके शरीर को वजन बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है, क्योंकि यह आपके शरीर की भूख नियंत्रण प्रणाली को निष्क्रिय कर देता है। फ्रक्टोज इंसुलिन को ठीक से उत्तेजित नहीं करता है, जिसके परिणामस्वरूप घ्रेलिन ("भूख हार्मोन") का दमन नहीं होता है और लेप्टिन ("तृप्ति हार्मोन") का उत्तेजना नहीं होता है, जिससे आप अधिक खाते हैं और इंसुलिन प्रतिरोध विकसित होता है। तेजी से वजन बढ़ना और पेट की चर्बी ("बीयर बेली"), एचडीएल का कम होना, एलडीएल का बढ़ना, ट्राइग्लिसराइड्स का बढ़ना, रक्त शर्करा का बढ़ना और उच्च रक्तचाप होना - यानी, क्लासिक मेटाबॉलिक सिंड्रोम - जैसी समस्याएं पैदा करता है। समय के साथ इंसुलिन प्रतिरोध विकसित होता है, जो न केवल टाइप 2 मधुमेह और हृदय रोग का एक अंतर्निहित कारण है, बल्कि कई कैंसर का भी कारण है। यही कारण है कि यह सामान्य नियम कि आप केवल कैलोरी गिनकर वजन कम कर सकते हैं, काम नहीं करता है। फ्रक्टोज के बाद, अन्य शर्करा और अनाज संभवतः सबसे अधिक मात्रा में सेवन किए जाने वाले खाद्य पदार्थ हैं जो वजन बढ़ाने और दीर्घकालिक बीमारियों को बढ़ावा देते हैं। इसमें वे खाद्य पदार्थ भी शामिल हैं जिन्हें आमतौर पर स्वस्थ माना जाता है, जैसे फलों का रस या अधिक मात्रा में फ्रक्टोज युक्त फल। यह समझना आवश्यक है कि अधिक मात्रा में सेवन करने पर ये चीजें आपके इंसुलिन को भी प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं, जो वसा को नियंत्रित करने वाला एक महत्वपूर्ण अंग है। इसलिए प्रतिदिन अधिक मात्रा में फलों का रस पीना भी वजन बढ़ने का कारण बन सकता है... संक्षेप में, आप अधिक कैलोरी खाने और पर्याप्त व्यायाम न करने से मोटे नहीं होते। आप गलत प्रकार की कैलोरी खाने से मोटे होते हैं। जब तक आप फ्रक्टोज और अनाज खाते रहेंगे, आप अपने शरीर को वसा बनाने और जमा करने के लिए तैयार कर रहे हैं। वसा नियंत्रण: वजन घटाने में आपकी मदद करने वाले पांच बुनियादी सत्य डॉ. जॉनसन ने उस विधि का पता लगाया जिसका उपयोग जानवर भोजन की कमी से पहले वसा बढ़ाने के लिए करते हैं, जो एक शक्तिशाली अनुकूलन लाभ साबित हुआ। उनके शोध से पता चला कि फ्रक्टोज एक प्रमुख एंजाइम, फ्रक्टोकाइनेज को सक्रिय करता है, जो बदले में एक अन्य एंजाइम को सक्रिय करता है जिससे कोशिकाएं वसा जमा करने लगती हैं। जब यह एंजाइम अवरुद्ध हो जाता है, तो कोशिका में वसा जमा नहीं हो पाती। दिलचस्प बात यह है कि यही वह "स्विच" है जिसका उपयोग जानवर पतझड़ में वजन बढ़ाने और सर्दियों में वसा जलाने के लिए करते हैं। फ्रक्टोज वह आहार घटक है जो इस "स्विच" को सक्रिय करता है, जिससे जानवरों और मनुष्यों दोनों में कोशिकाएं वसा जमा करने लगती हैं। उनकी नवीनतम पुस्तक, द फैट स्विच, आहार और मोटापे से संबंधित कई प्रचलित मिथकों का खंडन करती है। डॉ. जॉनसन ने पुस्तक में पांच मूलभूत सत्यों का विस्तार से वर्णन किया है जो वर्तमान धारणाओं को उलट देते हैं: अधिक भोजन और कम व्यायाम ही आपके वजन बढ़ने का एकमात्र कारण नहीं हैं। मेटाबोलिक सिंड्रोम वास्तव में एक स्वस्थ अनुकूलन स्थिति है जिससे जानवर अकाल के समय जीवित रहने के लिए वसा जमा करते हैं। समस्या यह है कि हममें से अधिकांश लोग हमेशा भरपेट खाते हैं और कभी उपवास नहीं करते। हमारे शरीर अभी तक इसके अनुकूल नहीं हो पाए हैं और परिणामस्वरूप, यह लाभकारी परिवर्तन वास्तव में आधुनिक मनुष्य के लिए हानिकारक है। कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों से यूरिक एसिड बढ़ता है और यह मोटापे और इंसुलिन प्रतिरोध में योगदान देता है। फ्रक्टोज युक्त शर्करा कैलोरी से नहीं, बल्कि 'वसा उत्पन्न करने वाले कारक' को सक्रिय करके मोटापा बढ़ाती है। मोटापे के प्रभावी उपचार के लिए अपने वसा उत्पन्न करने वाले कारक को निष्क्रिय करना और कोशिकाओं के माइटोकॉन्ड्रिया के कार्य में सुधार करना आवश्यक है। मैं इस पुस्तक की एक प्रति खरीदने की पुरजोर अनुशंसा करता हूं, जो वजन कम करने के लिए संघर्ष कर रहे लोगों के लिए एक उपयोगी साधन है। आहार में शर्करा, और विशेष रूप से फ्रक्टोज, आपके वसा उत्पन्न करने वाले कारक को सक्रिय करता है, इसलिए यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सभी प्रकार की शर्करा आपके वजन और स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है। क्या किसी भी मात्रा में शर्करा सुरक्षित है? अत्यधिक शर्करा के सेवन को मधुमेह,5 हृदयघात6 और कई अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से स्पष्ट रूप से जोड़ा गया है, इसलिए यह संभावना है कि आप जितनी कम शर्करा का सेवन करेंगे, उतना ही बेहतर होगा, और यह बात फ्रक्टोज के मामले में विशेष रूप से सच है। एक मानक अनुशंसा के रूप में, मैं सलाह देता हूं कि आप प्रतिदिन कुल फ्रक्टोज का सेवन 25 ग्राम से कम रखें। अधिकांश लोगों के लिए, फलों से मिलने वाले फ्रक्टोज की मात्रा को 15 ग्राम या उससे कम तक सीमित रखना समझदारी होगी, क्योंकि पानी के अलावा अन्य पेय पदार्थ पीने और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ खाने से आपको फ्रक्टोज के "छिपे हुए" स्रोत मिलने की पूरी संभावना रहती है। 15 ग्राम फ्रक्टोज कोई बहुत अधिक मात्रा नहीं है - यह दो केले, एक तिहाई कप किशमिश या दो मेडजूल खजूर के बराबर है। याद रखें, सोडा के एक औसत 12 औंस के कैन में 40 ग्राम चीनी होती है, जिसमें से कम से कम आधी फ्रक्टोज होती है, इसलिए केवल एक कैन सोडा ही आपकी दैनिक मात्रा से अधिक हो जाएगा। मुझे पता है कि फलों से मिलने वाले फ्रक्टोज को लेकर विवाद है। मेरा मानना ​​है कि इन फ्रक्टोज प्रतिबंधों का पालन करने से औसत अमेरिकी को लाभ होगा, क्योंकि उनमें से कई गंभीर रूप से अधिक वजन वाले हैं। लेकिन जो लोग स्वस्थ हैं और जिनका वजन सामान्य है, मुझे लगता है कि यदि फ्रक्टोज का सेवन जूस के बजाय साबुत फल से किया जाए तो आप अपने फ्रक्टोज के स्तर को काफी बढ़ा सकते हैं और इससे आपको कोई परेशानी नहीं होगी। यदि आप स्वस्थ हैं और आपका वजन अधिक नहीं है, तो संभवतः आपको फल में मौजूद पोषक तत्वों से स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। डॉ. जॉनसन ने अपनी पुस्तक "द शुगर फिक्स" में विभिन्न खाद्य पदार्थों में फ्रक्टोज की मात्रा दर्शाने वाली विस्तृत सारणियाँ शामिल की हैं - यह जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं होती जब आप यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हों कि विभिन्न खाद्य पदार्थों में फ्रक्टोज की सटीक मात्रा कितनी है। मैं आपको इस उत्कृष्ट पुस्तक की एक प्रति खरीदने के लिए प्रोत्साहित करता हूँ। आप पिछले लेख में सामान्य फलों में फ्रक्टोज की मात्रा की संक्षिप्त सूची पा सकते हैं।

शुक्रवार, 29 मई 2026

काकरोच/ जेन जी आंदोलन की दशा व दिशा*

*काकरोच/ जेन जी आंदोलन की दशा व दिशा*

कृष्ण नैन, महासचिव सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा 9812517501

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अलग-अलग पीढ़ियों में बदलाव का प्रश्न कोई जन्मजात नहीं है, ऐतिहासिक है, उत्पादन करने के बदलते साधनों, उत्पादन को मजदूर -किसान- कर्मचारी, व्यापारी में बांटने (कच्ची- पक्की नौकरी, सुरक्षा) के तरीकों व शिक्षा/ मीडिया से दिमागों पर नियंत्रण व सरकार की नीतियों का अंतर ही जरनैशन गैप हैं।

जब हम "जेनरेशन गैप" की बात करते हैं, तो अक्सर यह मान लिया जाता है कि यह मात्र समय का अंतर है— *अलग-अलग दशकों में पैदा हुए लोगों के सोचने-समझने के ढंग में स्वाभाविक भिन्नता। लेकिन यह समझ अधूरी ही नहीं, भ्रामक भी है।*


असल में पीढ़ियों के बीच का अंतर कभी "प्राकृतिक" नहीं रहा। यह अंतर हमेशा उत्पादन के साधनों में बदलाव, श्रम संगठन(मजदूर -किसान कर्मचारी ,छोटा दुकानदार) के नए रूपों और पूंजी के बढ़ते केंद्रीकरण द्वारा निर्मित किया गया है। जिसे हम "जेन जेड" या "अल्फा" कहते हैं, वह कोई *मनोवैज्ञानिक श्रेणी नहीं—यह एक  बाजार की उपभोक्ता श्रेणी है।*

प्रश्न यह नहीं है कि युवा क्या सोचते हैं। प्रश्न यह है कि उनकी सोच को कौन आकार दे रहा है, क्यों और किसके हित में?

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एक ऐतिहासिक सत्य: हर बड़ी पीढ़ी संक्रमण की पीढ़ी होती है।

बेबी बूमर्स से लेकर जेन जेड तक—हर पीढ़ी को किसी न किसी ऐतिहासिक संक्रमण ने उस रूप में ढाला है:

· बेबी बूमर्स (1946–64, रेडियो) : युद्धोत्तर पुनर्निर्माण, लाइसेंस राज, हरित क्रांति, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार। यह वह पीढ़ी थी जिसने "समता , समानता, बंधुत्व,मानवता के प्रयोग" के अवशेषों पर अपनी नौकरी और घर और समाज बनाए।देश के विकास में बड़ी छ्लांग लगीं।
· जेन एक्स (1965–80) : सरकारी से प्राईवेट, आत्मनिर्भर से कार्पोरेट व विदेशी निर्भरता, देश मानवता की बड़ी पहचान से जाति - धर्म,क्षेत्र,भाषा की छोटी पहचानों में संक्रमणकाल—एक तरफ संयुक्त परिवार और सरकारी नौकरी की पुरानी सुरक्षा, दूसरी तरफ 1991 के उदारीकरण की पहली दस्तक। यह वह पीढ़ी है जिसने निजीकरण का डर और निजीकरण में अवसर दोनों पहली बार देखे।
· मिलेनियल्स (1981–96) : वैश्वीकरण, IT उछाल, कोचिंग संस्कृति शुरू, क्रेडिट कार्ड और ईएमआई का दौर। इस पीढ़ी पहली बार यह समझा दिया कि नौकरी आजीवन (पक्की) , सुरक्षित (भत्ते) व सामाजिक सुरक्षा (पैंशन) नहीं, अनुबंध मात्र है।
· जेन जेड (1997–2012) : स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, रील्स, गिग इकॉनमी, बेरोजगारी और ओवरएजुकेशन का संयुक्त संकट। यह पहली पीढ़ी है जिसको स्थिर रोजगार को विलासिता के रूप में देखने पर दिमाग तैयार कर दिए गये।
· जेन अल्फा (2013–24) : AI, टैबलेट, एल्गोरिदम, कोविड लॉकडाउन—जहाँ स्क्रीन ही संसार है, और "असली दुनिया" एक विदेशी अवधारणा जैसी होती जा रही है। जिसमें सबसे सुरक्षित सामाजिकता - सामुहिकता पर सबसे बड़ा हमला हैं।

ध्यान दें: हर पीढ़ी के ठीक बीच में कोई न कोई आर्थिक रूप/शोषण या श्रम को मजबूर करती तकनीकी छलांग आती है। यह कोई संयोग नहीं है। जेनेरेशन गैप का बंटवारा भी स्वयं उन्हीं शक्तियों द्वारा पैदा किया गया हैं और किया जा रहा है, जिनका वह विश्लेषण करने का दावा करता है।

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*मुख्य प्रश्न: बदलाव किसके लिए और क्यों?*

आज हर जगह यह कहा जाता है कि मजदूर -किसान - कर्मचारी, दुकानदार, युवा बदल गए हैं, दलित अधिक आवाज उठा रहे हैं, महिलाएं अधिक स्वतंत्र हो रही हैं, शिक्षा और तकनीक ने अवसर खोले हैं।

*यह सब सच है—लेकिन आधा सच।*

पूरा सच यह है कि ये सकारात्मक बदलाव दो धार वाली तलवार हैं:

पहली धार — सतह पर दिखने वाले लक्षण/बदलाव

 *दिखने वाला बदलाव* 
युवा व महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, मोबाइल, सोशल मीडिया पर सक्रियता स्वयं सहायता समूह, startup में महिलाएँ, वर्किंग वुमन हॉस्टल
दलित - पिछला वर्ग आरक्षण, सोशल मीडिया पर मुखरता, दलित साहित्य और पॉपुलर कल्चर में प्रवेश दलित आइकॉन, YouTube चैनल, राजनीतिक प्रतिनिधित्व
युवा अंग्रेजी, डिजिटल स्किल्स, स्वतंत्र विचार, शहरी जीवनशैली स्टार्टअप कल्चर, रिमोट वर्क, फ्रीलांसिंग

दूसरी धार — छुपाएं गये आर्थिक वास्तविकता/ असली कारण।

 इन बदलावों के परिणाम तो समझों 

 *अदृश्य वास्तविकता* 
युवा व महिलाएँ :- अधिकतर युवा व महिलाएँ असंगठित क्षेत्र, अल्प-भुगतान, शून्य सामाजिक सुरक्षा वाली कच्ची या प्राईवेट नौकरियों में हैं। घरेलू हिंसा, देखभाल का अवैतनिक श्रम जस का तस। NSSO डेटा: 90% से अधिक महिला श्रमिक असंगठित।सस्ती व ज्यादा शोषण सहने वाली मजदूर हैं, इसलिए पूंजीवाद इनकी आजादी व शिक्षा को इसी मंशा से आश्रय देता है।
मजदूर, किसान, कर्मचारी, दलित - पिछड़ों की दृश्यता/ बोकलता बढ़ी, लेकिन आर्थिक स्वामित्व घटा हैं और तेजी से घट रहा हैं।जेन जी (1997-2012)को जेन एक्स (1965-1980) के अभिभावक अपने स्तर पर लाने को भी तरस रहे है।जमीन, पूंजी, उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण वही पुराने- नये चंद पुंजीपतियों व स्वर्ण जातियों के पास ही है।स्थाई7 रोजगार में भेदभाव बडा़ है ,  इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे: युवाओं व दलितों में दैनिक मजदूरी पर निर्भरता पहले से अधिक हुई हैं 
युवा बेरोजगारी का रिकॉर्ड उच्चतम स्तर। जो नौकरियाँ हैं—वे गिग, कॉन्ट्रैक्ट, शून्य घंटे, कोई पेंशन या सुरक्षा नहीं। CMIE: 20-24 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी 40% से अधिक रिपोर्ट की गई है।

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कॉर्पोरेट मार्केटिंग का असली चेहरा: आप आज़ाद नहीं, आप एक "अंश/टुकड़ा" हैं।जिसका स्वतंत्र रूप से कोई अस्तित्व ही नहीं हैं।

*जेन जेड को लेकर जितना शोर मचाया जा रहा है, उसका 90% मार्केटिंग कंपनियों ने पैदा किया है। क्यों?*

क्योंकि:

1. जेन जेड सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग बन रहा है — लगभग 2 अरब लोग। कंपनियों द्वारा तैयार माल अपनी शर्तों पर खपाने के7 लिए इनके दिमाग को नियंत्रित करके - कार्पोरेट द्वारा अपनी बात इनके मुंह से निकलवाई जा रही है।
2. यह डिजिटल मार्केटिंग का सबसे आसान निशाना है — 24x7 ऑनलाइन, डेटा जनरेट करता रहता है। जिसके बिना कंपनी जिंदा ही नहीं रह सकती।
3. इसकी पहचान व स्टेण्ड डांवाडोल रखी जाती हैं— कोई स्थायी वर्ग चेतना  नहीं, इसलिए ब्रांड और "लाइफस्टाइल" इन्हें आसानी से बेचे जा सकते हैं।
4. यह "बागी/विद्रोही" दिखना चाहता है, लेकिन "बागीपन" भी अब एक बाजार है — “बिना उद्देश्य का बाग़ी” को अब क्रिकेट, कपड़े, गाने, फिल्टर ,सैक्स, हथियार, नशे और हैशटैग के रूप में पैक करके बेचा जाता है।

*असली सवाल: "स्वतंत्रता" किसकी?*

आज युवाओं, दलितों और महिलाओं को जो "स्वतंत्रता" मिल रही है—वह किस प्रकार की है?

स्वतंत्रता  किसे मिल रही है? किस उद्देश्य से?
शिक्षा (कोचिंग, डिग्री, स्किल्स) मध्यम वर्ग के उपभोक्ता बनने व  सस्ता कुशल श्रम तैयार करना
सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति डेटा पैदा करने, एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने के लिए उपभोग पैटर्न बनाना और राजनीतिक चेतना को भंग करना, असल में पूंजीवादी पार्टियों के कुकर्मों की तुलना से यह कहलवाना की सभी पार्टियां एक जैसी हैं, जबकि इसकी आड़ में समाजवादी नीतियों को छुपा लेना होता है।
"फ्रीलांसिंग / रिमोट वर्क" कोई सामाजिक सुरक्षा, कोई यूनियन, 24x7 उपलब्धता श्रम लागत घटाना, पेंशन का बोझ टालना
महिलाओं की "आर्थिक स्वतंत्रता" गिग वर्क, ब्यूटी पार्लर, फास्ट फूड चेन, कॉल सेंटर अल्प-भुगतान वाला लचीला श्रम पूल बनाना
दलितों का "प्रतिनिधित्व" सांस्कृतिक क्षेत्र में (फिल्म, संगीत, डिजिटल मीडिया) जाति के मुद्दे को "पहचान" तक सीमित रखना, आर्थिक पुनर्वितरण से बचना

*ध्यान दें: यहाँ "स्वतंत्रता" का अर्थ है—पहले से अधिक विकल्प, लेकिन सभी विकल्प एक ही अर्थव्यवस्था के भीतर, एक ही शक्ति संरचना के अधीन।*

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दिमागी नियंत्रण का नया रूप: एल्गोरिदमिक चेतना

पुराने जमाने में सत्ता लोगों को सीधे दमन या प्रचार से नियंत्रित करती थी। अब तरीका बदल गया है।

आज दिमागी नियंत्रण के नए साधन हैं:

1. एटेंशन इकोनॉमी (ध्यान की अर्थव्यवस्था)

आपका ध्यान एक कमोडिटी/वस्तु है। हर रील, हर नोटिफिकेशन, हर स्क्रॉल आपका ध्यान बेच रहा है। जिसके पास आपका ध्यान, उसके नियंत्रण में आपकी सोच।हम आजाद महसूस करते हुए,उसकी गुलामी कर रहे होते हैं।

2. एल्गोरिदमिक फिल्टर बबल

आप वही देखते हैं जो आपको व्यस्त रखे, भावुक करे, आउटरेज करे, विभाजित करे। आप सोचते हो कि आप खोज रहे हो—असल में एल्गोरिदम तय कर रहा है कि तुम क्या सोचोगे, कैसे सोचोगे, क्यों सोचोगे।

3. आउटरेज इकोनॉमी (गुस्से का बाजार)

*जो विवादास्पद है, जो गुस्सा दिलाता है, जो बांटता है—वही "वायरल" होता है। नफरत, जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता — ये सब अब कंटेंट मॉड्यूल हैं। कोई उन्हें पैदा कर रहा है क्योंकि उन पर क्लिक आता है, विज्ञापन आता है। हमारे दिमाग़ में घुसकर हमारी जेब काटने का रास्ता हैं*

4. इंफ्लुएंसर संस्कृति

"स्वतंत्र विचारक" के नाम पर कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप वाले लोग हमें तैयार रहे हैं कि क्या पहनना है, क्या खाना है, किससे नफरत करनी है, किस मुद्दे पर कितना गुस्सा दिखाना है।

5. शिक्षा का कॉर्पोरेटीकरण

शिक्षा अब जिज्ञासा और चेतना के लिए नहीं—मात्र स्किल्स और नौकरी की संभावना के लिए है। विश्वविद्यालय अब जॉब-तैयारी के केंद्र बनकर रह गए हैं। इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र—जो चीजें आलोचनात्मक चेतना पैदा करती हैं—उनका महत्व लगातार घट रहा है या कहें खत्म कर दिया गया है।यह काम शिक्षा नीति 2020 से करवाया जा रहा है।

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उत्पादन संबंधों का नया ढाँचा: डिजिटल सामंतवाद?

 संघर्षों व हकों के विश्लेषण में आज समाज बंटना तो चाहिए—जिनके पास फैक्ट्री, जमीन, मशीन, तकनीक (उत्पादन के साधन) हैं, और जिनके पास सिर्फ अपनी मजदूरी (श्रम शक्ति) हैं।यानि मजदूर -किसान कर्मचारी दुकानदार बनाम राजसत्ता, कार्पोरेट, साम्प्रदायिक में। परन्तु बदल रहा है जाति धर्म क्षेत्र भाषा व जेनेरेशन गैप में।

आज उत्पादन के साधन बदल गए हैं:

पुराने साधन नए साधन
जमीन डेटा
फैक्ट्री प्लेटफॉर्म (Amazon, Uber, Zomato, Swiggy)
मशीन एल्गोरिदम
पूंजी (भौतिक) नेटवर्क, ब्रांड, पेटेंट, कॉपीराइट

क्या बदला?

· पहले मालिक मजदूर को सीधे हुक्म देता था।
· अब एल्गोरिदम हुक्म देता है। (डिलीवरी बॉय /ऊबर बाय को ऐप बता रहा है कि कहाँ जाना है, कितनी देर में पहुँचना है, अगर देर हुई तो पेमेंट कटेगी।)

क्या नहीं बदला?

· लाभ कुछ हाथों में केंद्रित रहता है।
· श्रम का अधिकतम दोहन किया जाता है।
· जो उत्पादन करता है, उसका मुआवजा/ मजदूरी /कृषि उपज के दाम, नौकरी उसकी उत्पादन क्षमता से कहीं कम है।
· जो नियंत्रण करता है, वही समाज व जेन जी की दिशा तय करता है।वह नई पीढ़ी को समझदार व पुरानी को मुर्ख बताकर उसे शोषण सहने को तैयार कर लेता है। सामुहिक सौदेबाजी/ युनियन से तोड़कर अलग थलग कर लेता है।

विरोधाभास साफ है:

उत्पादन सामूहिक है (लाखों लोग मिलकर), लेकिन लाभ और नियंत्रण निजी (कुछ कॉर्पोरेशन) है।

यही वह मूल अंतर्विरोध है जो आज के हर संघर्ष की जड़ में है—चाहे वह किसान आंदोलन हो, मजदूर संघर्ष हो, छात्र आंदोलन हो, काकरोच जनता पार्टी के जेन जी हो या दलित-आदिवासी-महिला अधिकारों का संघर्ष।

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क्या यह संघर्ष "समाज के भले का" हो सकता है? होना भी चाहिए?

समाजवादी आधार का अर्थ यह नहीं है कि हम पुराने मॉडल (राज्य स्वामित्व, केन्द्रीय योजना) को दोहराएँ। समाजवादी आधार का अर्थ है:

1. उत्पादन के साधनों पर सामूहिक नियंत्रण

डेटा कोई निजी संपत्ति नहीं है—यह समाज द्वारा उत्पादित है। AI, एल्गोरिदम, प्लेटफॉर्म—इन सब पर लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए।

2. श्रम का मूल्य श्रम की जीने की मूलभूत जरूरतों द्वारा तय हो, बाजार द्वारा नहीं

कच्चे कर्मचारी/शिक्षक, प्राईवेट सैक्टर के ड्राईवर, टीचर, नर्सें, गिग वर्कर, डिलीवरी एजेंट, कॉल सेंटर एजेंट, सफाईकर्मी, मजदूर—इन सबका वेतन और सम्मान उनकी उत्पादन प्रक्रिया में भूमिका (श्रम ही वस्तु में गुण पैदा कर सकता है।जमीन, पूंजी, मशीन या ए आई नहीं)के अनुपात में होना चाहिए, न कि बाजार की "मांग" के अनुसार।

3. सामाजिक सुरक्षा एक अधिकार है, दान नहीं

पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, भोजन, बिजली, परिवहन, रोजगार —ये किसी "योजना" का हिस्सा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज के मूलभूत तत्व होने चाहिए।

4. जाति, लिंग, क्षेत्र, धर्म, भाषा—इन सबका आर्थिक आधार से संबंध समझा जाए

पहचान की राजनीति आवश्यक है—लेकिन अगर यह वर्ग प्रश्न (सभी कमाकर खानें वाले दोस्त है)से कट जाती है, तो यह केवल शोषण के लिए विभाजन और "वोट बैंक" का मुद्दा बनकर रह जाती है।

5. तकनीक का लोकतांत्रीकरण

जेन जी को यह झूठ जंचा दिया गया है कि AI और ऑटोमेशन से रोजगार खत्म होना तय है। जबकि सच यह है कि रोजगार के बिना AI काम किसके लिए करेगा,जब उसकी बनाई वस्तुएं खरीदने की क्रय शक्ति किसी के पास नहीं होंगी तो वह स्वयं मर जाएगा। सवाल यह भी नहीं कि AI व आटोमैशन को रोका जाए। सवाल यह है कि इससे पैदा हुए अधिशेष उत्पादन का लाभ किसे मिलेगा? यदि कुछ कॉर्पोरेट सीईओ को, तो असमानता बढ़ेगी। यदि समाज को (काम घटे, समय बढ़े, जीवन स्तर बेहतर हो), तो यही समाजवादी दिशा है।

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 *कच्ची नौकरी, बेरोजगारों व प्राईवेट कंपनियों के कर्मचारियों, युवाओं, दलितों, महिलाओं को क्या करना चाहिए?*

(क) चेतना का स्तर

1. सवाल करना सीखो—हर चीज पर

*· यह बदलाव मेरे लिए है, या मुझसे कुछ लेने के लिए?*
*· मैं जो सोच रहा हूँ, क्या मैं सच में सोच रहा हूँ—या कोई एल्गोरिदम मुझे ऐसा सोचने के लिए मजबूर कर रहा है?*
*· "स्वतंत्रता" जो मुझे मिल रही है—वह किसकी स्वतंत्रता को सीमित कर रही है?*
*प्राईवेट की मर्जी- मर्जी होती है या मजबूरी*

2. अपना इतिहास पढ़ो

· किसानों , कर्मचारियों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, मजदूरों ने कैसे संघर्ष किए?
· अकेले क्रोध से कुछ नहीं होता—संगठन और चेतना का इतिहास समझो।

3. अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की मूल बातें समझो
तुम्हें प्रोफेसर बनने की जरूरत नहीं। लेकिन यह समझना जरूरी है:

*· पैसा कहाँ से आता है?*
*· किसका श्रम कितना मूल्य पैदा करता है?*
*· टैक्स क्यों लगता है?*
*· सरकारी बजट किसके हित में बनता है,किसे लुटा दिया जाता है?*
*· "विकास" किसका विकास है?*

(ख) संगठन का स्तर

4. अकेले मत रहो—सामूहिकता सीखो
इंस्टाग्राम रील्स अकेलेपन को बढ़ाती हैं। संघर्ष के लिए साथ चाहिए।

5. छोटे समूह बनाओ—बुक क्लब, डिस्कशन ग्रुप, फिल्म स्क्रीनिंग, पॉडकास्ट
चेतना तुरंत नहीं आती। धीरे-धीरे बनती है—पढ़ने, बात करने, बहस करने,अमल करने से।

6. नये - पुराने संघर्षों से जुड़ो—जहाँ हो सके
किसान आंदोलन, मजदूर यूनियन, शिक्षक संघर्ष, कर्मचारी आंदोलन,छात्र आंदोलन—इनसे अलग-थलग मत रहो।अलग का मतलब हररोज तिल तिल कर मरना है, सामुहिक का मतलब एक बार प्राकृतिक मौत मरना है।

7. अपने हकों की आवाज उठाने वाला वैकल्पिक मीडिया बनाओ
मुख्यधारा का गोदी मीडिया कॉर्पोरेट हाथों में है। तुम्हारे पास मोबाइल और इंटरनेट है। तुम खुद मीडिया बन सकते हो—बशर्ते तुम ईमानदार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांगठनिक सुसंगत हो।

(ग) अभ्यास/क्रिया का स्तर

8. अपने श्रम को सम्मान देना सीखो
यदि तुम कच्चे कर्मचारी, स्कीम वर्कर, सफ़ाई कर्मचारी, शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मी,डिलीवरी एजेंट हो, स्वीपर हो, किसान हो, निर्माण मजदूर हो बेशक लो पेड हो, असुरक्षित हो—तो शर्मिंदा मत हो। आप समाज चलाते हो। आपके बिना CEO, इंफ्लुएंसर, पॉलिटिशियन , कार्पोरेट सब बेकार हैं।

9. जहाँ हो, वहाँ संगठित हो

· ऑफिस में हो? सहकर्मियों से बात करो।
· कॉलेज में हो, कोचिंग में हो? छात्र संघ बनाओ (चाहे वह संस्थागत न भी हो)।
· गाँव में हो? किसान समूह, मजदूर समूह, महिला समूह, बेरोजगार समूह बनाओ।

10. सीखना कभी मत रोको
तुम्हारे पास जितने अधिक औजार होंगे (लेखन, फिल्मांकन, कोडिंग, डिजाइन, कानूनी जानकारी, डेटा एनालिसिस), उतने अधिक हथियार होंगे संघर्ष के लिए।

*11. अपनी पहचान को हथियार बनाओ, जेल नहीं*
"मैं बेरोजगार या कच्चा कर्मचारी हूं-- यह मजबूरी नहीं, मजबूती बनाओं"
"मैं दलित हूँ" — यह केवल दर्द नहीं, इतिहास भी है और संघर्ष की जमीन भी।
"मैं महिला हूँ" — यह केवल पीड़ा नहीं, यह शक्ति भी है।
"मैं युवा हूँ" — यह केवल अधीरता नहीं, यह ऊर्जा और बदलाव की क्षमता भी है।

*लेकिन सावधान: अपनी पहचान को किसी कॉर्पोरेट या चुनावी एजेंडे का हिस्सा मत बनने दो। तुम्हारी पहचान का असली उपयोग — उस समाज को बदलना है जिसने तुम्हें हाशिए पर रखा।*

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असली सवाल: क्या काकरोच जनता पार्टी यह "आंदोलन" है या "मार्केटिंग ट्रेंड"?

जेन जेड को लेकर जो उत्साह है—वह कहाँ से आता है?

· क्या यह खुद जेन जेड का आत्म-विश्लेषण है?
· या यह मार्केटिंग रिपोर्ट्स और कंसल्टेंसी फर्मों का निर्माण है?

सच्चाई: **जेन जेड "आंदोलन" कोई आंदोलन नहीं है। यह  शोषणकारी बाजार का ही एक अंश मात्र है जिसे आंदोलन का रूप दे दिया गया है ताकि वह बेचा जा सके। जैसे नेपाल, बंग्लादेश में पार्टी/नेता बदलकर बेचा गया।वहा मजदूर -किसान- शिक्षक/ कर्मचारी को क्या मिला?

असली आंदोलन वह है जो:

· उत्पादन और वितरण के असमान ढाँचे को चुनौती दे
· शोषण के नए रूपों (कच्ची व प्राईवेट नौकरी, गिग वर्क, एल्गोरिदमिक प्रबंधन, डेटा दोहन) का खुलासा करे
· जाति, लिंग, वर्ग के जटिल अंतर्संबंधों को आर्थिक भाषा में समझे, भावनाओं में नहीं।
· "व्यक्तिगत सफलता" के मिथक को तोड़े और "सामूहिक मुक्ति" की जमीन तैयार करे

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निष्कर्ष: दशा और दिशा

दशा (वर्तमान स्थिति)

· युवा, दलित, महिलाएँ — तीनों समूह पहले से अधिक दिख रहे हैं।
· तीनों के पास पहले से अधिक अवसर (शिक्षा, मोबाइल, इंटरनेट, मीडिया उपस्थिति) हैं।
· लेकिन ये अवसर उसी असमान ढाँचे के भीतर हैं—जो इन्हीं समूहों के श्रम का दोहन करता है।
· "दृश्यता" बढ़ी है, लेकिन "शक्ति" नहीं बढ़ी। आवाज बढ़ी है, लेकिन नियंत्रण वहीं के वहीं है।

दिशा (भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा।

यह संघर्ष संभव है क्योंकि:

· प्रचार व व्यवहार का विरोधाभास इतना गहरा है कि वह टिक नहीं सकता।
· उत्पादन शक्तियाँ (AI, ऑटोमेशन) पहले से ही अधिशेष बना रही हैं—दिक्कत बिकने व लाभ के श्रमिकों में वितरण नहीं होने की है।
·कच्चे कर्मचारी , प्राईवेट कर्मी, बेरोजगार युवा पीढ़ी अस्थिरता, बेरोजगारी, मानसिक तनाव से पहले ही त्रस्त है—बस दिशा चाहिए।
· दलित, आदिवासी, महिलाएँ—तीनों के पास शोषण का सदियों पुराना अनुभव और प्रतिरोध का इतिहास है।

 काकरोच का प्रतीक है सबसे जीवट जीव का 

जेन जेड को कोर्ट व राजसत्ता द्वारा "काकरोच जेनरेशन" कहा जाना बेशक निम्न, कमजोर व अपमान करने का प्रतीक हैं—परन्तु काकरोच वह जीव है जो हर संकट में बच निकलता है, जो हर आपदा के बाद भी जीवित रहता है।जिस पर परमाणु रेडियेशन का प्रभाव भी नहीं होता है।जो दो टुकड़े करने पर भी जिंदा रहता है।

लेकिन काकरोच सिर्फ जीवित नहीं रहता—वह अनुकूलित होता है, संघर्ष करता है, फिर से पनपता है।

प्रश्न यह है:

क्या यह पीढ़ी सिर्फ जीवित रहने (survive) के लिए अनुकूलित होगी — या जीने के लायक समाज (a society worth living in) बनाने के लिए संघर्ष करेगी?

*पहला रास्ता — अनुकूलन,* चुप्पी, व्यक्तिगत सफलता की दौड़, एल्गोरिदम के गुलाम बने रहना — आसान है। 
दूसरा रास्ता — संगठन, प्रशिक्षण, संघर्ष, जोखिम — कठिन है।

लेकिन इतिहास साक्षी है:

जो पीढ़ियाँ सिर्फ "बच गईं", वे भूला दी गईं। जिन पीढ़ियों ने बदलाव किया, वे याद की जाती हैं।मौत सभी की निश्चित है। कहानी क्या छोड़कर जानी है,वह हमारे पर निर्भर है।
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मंगलवार, 26 मई 2026

सतीश महम

जनसंहार हथियारों से नहीं, शब्दों से शुरू होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में समाज और सार्वजनिक विमर्श में जिस तरह की भाषा सामान्य होती जा रही है, उससे किसी भी सभ्य इंसान का बेचैन होना स्वाभाविक है।

बार-बार कुछ समुदायों, धर्मों या समूहों के लिए ऐसे शब्द सुनाई देने लगे हैं, जो किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि किसी बीमारी, गंदगी या कीड़े-मकोड़ों के लिए इस्तेमाल होते हैं।

कभी किसी को “परजीवी” कहा जाता है।
कभी “देश पर बोझ, आंदोलनजीवी, टुकड़े टुकड़े गैंग, आरक्षणजीवी, लवजेहाद।“
कभी “गंदगी”।
और कभी सीधे “चूहा”, “कॉकरोच” या “कीड़ा”।

मुझे इतिहास की बहुत विस्तृत जानकारी नहीं है। 

इसलिए शुरुआत में लगा कि यह केवल सोशल मीडिया का ज़हर होगा।

लेकिन फिर मन में एक सवाल उठा,

क्या इतिहास में भी नफ़रत की शुरुआत इसी तरह हुई थी?

मैंने उपलब्ध संसाधनों से जानना और समझना शुरू किया।

जो सामने आया, उसने भीतर तक डरा दिया।

इतिहास बताता है कि बड़े जनसंहार अचानक नहीं होते।
वे पहले भाषा में जन्म लेते हैं।
पहले किसी समुदाय का मज़ाक उड़ाया जाता है।
फिर उसे समाज की समस्या बताया जाता है।
फिर उसकी मानवता पर हमला किया जाता है।
और अंततः उसे इंसान नहीं, बल्कि “खतरा” घोषित कर दिया जाता है।
यहीं से सभ्यता का पतन शुरू होता है।

सबसे भयावह उदाहरण होलोकॉस्ट था।

1930 और 1940 के दशक में और नाज़ी प्रचार मशीन ने जर्मनी की आर्थिक समस्याओं, बेरोज़गारी और राष्ट्रीय अपमान का दोष यहूदियों पर डालना शुरू किया।

नाज़ी अखबार डेर श्टूर्मर लगातार यहूदियों को “परजीवी” और “राष्ट्र की बीमारी” बताता था।

1940 में बनी नाज़ी प्रचार फ़िल्म डेर एवीगे यूदे में यहूदियों की तुलना चूहों से की गई। फ़िल्म में चूहों के झुंड दिखाकर कहा गया कि जैसे चूहे बीमारी फैलाते हैं, वैसे ही यहूदी समाज को “अंदर से नष्ट” कर रहे हैं।

यह केवल अपमान नहीं था।

यह लोगों के दिमाग में यह भावना भरने की प्रक्रिया थी कि सामने वाला इंसान नहीं है।

फिर क्या हुआ?

1935 के नूर्नबर्ग कानूनों के तहत यहूदियों से नागरिक अधिकार छीने गए।

उन्हें सरकारी नौकरियों, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से बाहर किया गया।
फिर उन्हें अलग बस्तियों और घेट्टो में धकेला गया।

और अंततः गैस चैंबरों और यातना शिविरों में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई।

इतिहास का दूसरा भयावह उदाहरण है।

1994 के जनसंहार से पहले उग्र हूतू राष्ट्रवादी रेडियो चैनल लगातार तुत्सी समुदाय को “Inyenzi”, यानी “कॉकरोच”, कहकर पुकारते थे।

रेडियो प्रसारणों में खुलेआम कहा जाता था,
“कॉकरोचों को कुचल दो।”

यह केवल नफ़रत नहीं थी।
यह लोगों की संवेदनाओं को खत्म करने की रणनीति थी।

जब किसी इंसान को बार-बार “कीड़ा” कहा जाए, तब उसकी हत्या भी हत्या नहीं लगती।

और फिर वही हुआ।

करीब 100 दिनों में लगभग 8 लाख तुत्सी और उदार हूतू मारे गए।

पड़ोसियों ने पड़ोसियों को काट डाला।
साधारण नागरिक भी हत्यारे बन गए।

क्योंकि प्रचार ने पहले ही उनके भीतर से इंसानियत खत्म कर दी थी।

में भी यही पैटर्न दिखाई दिया।

1990 के दशक में उग्र सर्ब राष्ट्रवादी प्रचार ने बोस्नियाई मुसलमानों को “खतरा” और “अशुद्ध तत्व” की तरह चित्रित करना शुरू किया।

“जातीय शुद्धता” और “राष्ट्र की रक्षा” के नाम पर लोगों के भीतर डर और घृणा पैदा की गई।

परिणामस्वरूप सामूहिक हत्याएँ, बलात्कार शिविर और जातीय सफाया हुआ।

1995 के में हजारों बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई।

इटली में के फासीवादी शासन ने भी अतिराष्ट्रवाद, नस्लवादी श्रेष्ठता और “राष्ट्र की शुद्धता” की राजनीति को बढ़ावा दिया।

राज्य-प्रचार का उद्देश्य केवल सत्ता बनाए रखना नहीं था, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना था कि कुछ लोग “कमतर” हैं और राष्ट्र के लिए खतरा हैं।

भी इसी मानसिकता का उदाहरण था।

श्वेत वर्चस्ववादी शासन ने अश्वेत लोगों को बराबर इंसान की तरह नहीं देखा।
भेदभाव को कानून बना दिया गया।
स्कूल, अस्पताल, परिवहन और बस्तियाँ — सब कुछ नस्ल के आधार पर अलग कर दिया गया।

जब राज्य यह तय करने लगे कि कौन “उच्च” है और कौन “कमतर”, तब इंसानियत हारने लगती है।

इन सभी घटनाओं में एक बात समान थी
हत्या से पहले अमानवीकरण हुआ था।
पहले भाषा जहरीली हुई।
फिर समाज संवेदनहीन हुआ।
फिर हिंसा सामान्य लगने लगी।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जनसंहार बंदूकों से पहले शब्दों में जन्म लेते हैं।

जब राजनीति इंसानों को “कीड़ा”, “परजीवी”, “गंदगी” या “देश की बीमारी” बताने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज एक खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है।

क्योंकि किसी भी समाज में नफ़रत कभी सीधे हत्या से शुरू नहीं होती।
वह पहले शब्दों से शुरू होती है।
पहले भाषा बदलती है।
फिर संवेदनाएँ मरती हैं।
और अंत में इंसान मरने लगते हैं।

सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि वहाँ मतभेद नहीं होते।

सभ्य समाज की पहचान यह है कि मतभेद के बावजूद वह किसी इंसान की मानवता को खत्म नहीं होने देता।

और जिस दिन समाज लोगों को इंसान नहीं, बल्कि “समस्या” समझने लगता है, उसी दिन इंसानियत मरना शुरू हो जाती है।

सतीश कुमार.....

सोमवार, 18 मई 2026

म्हारा हरियाणा


म्हारा हरियाणा

     हरियाणा म्हं कुछ साल पहलम ताहिं खेतां के डोल्यां पै शीशम खड़ी पा ज्याया करती। इनकी छां भी बढ़िया अर खेती म्हं भी नुकसान ना। हलाई काढ़ कै हाली शीशम की छां म्हं बैठ कै जोटा लाया करता। इसकी लाकड़ी भी काम्मल बताई। शीशम के इतने फायदे अर फेर बी शीशम खत्म होन्ती जावण लागरी? या बात सो सोचण की सै। बेरा ना गामां म्हं इस बात कान्हीं ध्यान गया सै कि नहीं गया सै। उनका ध्यान क्यूकर जावै इसी बातां कान्हीं? गाम आल्यां नै तै ताश खेलण तै फुरसतै कोण्या। कै एक दूसरे की टांग खींचे जावैंगे। ज्यूकर पहलम बैठ कै दुख-सुख की अर ऊंच-नीच की बतला लिया करते वा बात तै ईब रही कोण्या। कौणसी बात गाम के हक म्हं सै अर कुणसी खिलाफ सै इसपै कदे कदाऊ जिकरा हो जान्ता हो तै बेरा कोण्या। गाम के स्कूल म्हं के होरया सै इननै कोए वास्ता नहीं, गाम के अस्पताल म्हं इलाज का के हाल सै इनकी चिंता ना, गाम म्हं पाणी की डिग्गी की सफाई हुई सै कि नहीं इननै कोए लेना देना नहीं। गाम म्हं छोरियां गेल्यां छेड़खानी की वारदात बधण लागरी सैं इनपै इसका कोए खाता नहीं। जड़ बात या सै कि गाम काल उजड़ता आज उजड़ जाओ फेर किसे नै चिंता नहीं दीखती। सांझ नै दो घूंट लाकै इसनै गाल दे उसने गाल दे, घरआली कै ऊपर छोह तार लें, अर फेर खायें बिना पड़कै सो जाणा। दारू की मार तै कोए घर तो बच नहीं रहया माणस बेशक बचरया हो। पहलम हुक्का आदमी ए पीया करते, ईब घणखरी लुगाई भी हुक्टी पीवण लागगी कै बीड़ी फूंकती पा ज्यांगी। कई गामां म्हं तो थोड़ी घणी बीरबानी बी दारू का सेवन करण लागली सैं। खांसी के शिकार लोग लुगाई अस्पतालां म्हं लुटते हांडैं सैं। दमे की बीमारी बधती जा सै। चमड़ी की खारिश रात नै सोवण नहीं देन्ती। चिंता करकै ब्लड प्रेसर बधगे। दिल का धड़का बधग्या। नशाखोरी की साथ-साथ सेक्स अंगां की बीमारी बधती जावैं सैं। जवानां म्हं नुपशंकता बढ़ती जा सै। दूध ढोल म्हं घलग्या। रोजगार खत्म होगे। छोरियां नै पेट म्हं खत्म करण लाग लिये। बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश की लुगाइयां नै पांच-पांच, सात-सात हजार म्हं खरीद कै ल्यावण के मामले बधगे। पहलम तै गाम म्हं एक दलाल हुया करता सरकारी महकम्यां का फेर ईब तै हरेक महकमे का एक एक दलाल होग्या। किसे का राज आल्यो इन दलालां की पांचों आंगली घी म्हं रैहणी ए रैहणी। प्राइवेट पाणी के नलके आगे। पीस्से आल्यां नै सुख होग्या बिना पीस्से आल्यां की मर आग्यी। बुलध टोहें पावैं सैं। गाल भीड़ी होन्ती होन्ती इतनी भीड़ी होगी कि मोटा-सा माणस तो लिकड़े कोनी सकै। पाणी घर-घर म्हं नलक्यां म्हं लियाए फेर इसकी निकासी का कोई इंतजाम नहीं कई घरां म्हं तो भैंस भी नलके के पाणी तै नुहाई जावैं सैं।
     नहर के पाणी के धान्ने अटे पड़े सैं। कई कई साल होगे धाने खरीदें। नहर का पानी किमै तो आवैए कम अर जो आवै भी वो धान्ना अट्या पड़्या, वो खेत म्हं क्यूकर पहोंचै। धान्ना खोदण कूण जावै? बिना बात की बात पै रोज राड़ करैं असली बातां का जिकरा ना, परिवार नाम की चीज नहीं बचरी। बूढ़े बालकां नै देख कै राजी ना अर बालक बुढ़या के मरण की बाट देखैं सैं। सास बहू की कटती करती पावै तै बहू सास नै बुरी बतावै। करियाणे की दुकान एक गाल म्हं दो-दो तीन-तीन खुलगी। इन दुकानां म्हं दारू के पाउच आगे। लोगां का राजनीति पर तै विश्वास उठ लिया फेर माला फेर बी इक्कीश इक्कीश हजार की घालैंगे नेतावां कै। नया पेटेंट के सै इसका किसे नै बेरा पावै कोण्या। यो डब्ल्यू टी ओ के बला सै इसपै होक्के पै कदे चर्चा ना।
     टी.वी. पै नशा हिंसा सैक्स का नंगा नाच क्यों होवै इसपै कोए सवाल ना। खेती की तबाही के कारण सैं इसपै जिकरा ना। ये ब्यूटी कम्पीटीशन एकदम क्यों छागे सारे भारत म्हं? इस म्हं किसकी साजिश सै? कई बात लिखण की ना होती। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो अर बिचार करियो। बिचार करांगे तो राह भी पावैगा। बिचार तै परहेज करना छोड़णा पड़ैगा।
रणबीर