शुक्रवार, 29 मई 2026

काकरोच/ जेन जी आंदोलन की दशा व दिशा*

*काकरोच/ जेन जी आंदोलन की दशा व दिशा*

कृष्ण नैन, महासचिव सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा 9812517501

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अलग-अलग पीढ़ियों में बदलाव का प्रश्न कोई जन्मजात नहीं है, ऐतिहासिक है, उत्पादन करने के बदलते साधनों, उत्पादन को मजदूर -किसान- कर्मचारी, व्यापारी में बांटने (कच्ची- पक्की नौकरी, सुरक्षा) के तरीकों व शिक्षा/ मीडिया से दिमागों पर नियंत्रण व सरकार की नीतियों का अंतर ही जरनैशन गैप हैं।

जब हम "जेनरेशन गैप" की बात करते हैं, तो अक्सर यह मान लिया जाता है कि यह मात्र समय का अंतर है— *अलग-अलग दशकों में पैदा हुए लोगों के सोचने-समझने के ढंग में स्वाभाविक भिन्नता। लेकिन यह समझ अधूरी ही नहीं, भ्रामक भी है।*


असल में पीढ़ियों के बीच का अंतर कभी "प्राकृतिक" नहीं रहा। यह अंतर हमेशा उत्पादन के साधनों में बदलाव, श्रम संगठन(मजदूर -किसान कर्मचारी ,छोटा दुकानदार) के नए रूपों और पूंजी के बढ़ते केंद्रीकरण द्वारा निर्मित किया गया है। जिसे हम "जेन जेड" या "अल्फा" कहते हैं, वह कोई *मनोवैज्ञानिक श्रेणी नहीं—यह एक  बाजार की उपभोक्ता श्रेणी है।*

प्रश्न यह नहीं है कि युवा क्या सोचते हैं। प्रश्न यह है कि उनकी सोच को कौन आकार दे रहा है, क्यों और किसके हित में?

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एक ऐतिहासिक सत्य: हर बड़ी पीढ़ी संक्रमण की पीढ़ी होती है।

बेबी बूमर्स से लेकर जेन जेड तक—हर पीढ़ी को किसी न किसी ऐतिहासिक संक्रमण ने उस रूप में ढाला है:

· बेबी बूमर्स (1946–64, रेडियो) : युद्धोत्तर पुनर्निर्माण, लाइसेंस राज, हरित क्रांति, सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार। यह वह पीढ़ी थी जिसने "समता , समानता, बंधुत्व,मानवता के प्रयोग" के अवशेषों पर अपनी नौकरी और घर और समाज बनाए।देश के विकास में बड़ी छ्लांग लगीं।
· जेन एक्स (1965–80) : सरकारी से प्राईवेट, आत्मनिर्भर से कार्पोरेट व विदेशी निर्भरता, देश मानवता की बड़ी पहचान से जाति - धर्म,क्षेत्र,भाषा की छोटी पहचानों में संक्रमणकाल—एक तरफ संयुक्त परिवार और सरकारी नौकरी की पुरानी सुरक्षा, दूसरी तरफ 1991 के उदारीकरण की पहली दस्तक। यह वह पीढ़ी है जिसने निजीकरण का डर और निजीकरण में अवसर दोनों पहली बार देखे।
· मिलेनियल्स (1981–96) : वैश्वीकरण, IT उछाल, कोचिंग संस्कृति शुरू, क्रेडिट कार्ड और ईएमआई का दौर। इस पीढ़ी पहली बार यह समझा दिया कि नौकरी आजीवन (पक्की) , सुरक्षित (भत्ते) व सामाजिक सुरक्षा (पैंशन) नहीं, अनुबंध मात्र है।
· जेन जेड (1997–2012) : स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, रील्स, गिग इकॉनमी, बेरोजगारी और ओवरएजुकेशन का संयुक्त संकट। यह पहली पीढ़ी है जिसको स्थिर रोजगार को विलासिता के रूप में देखने पर दिमाग तैयार कर दिए गये।
· जेन अल्फा (2013–24) : AI, टैबलेट, एल्गोरिदम, कोविड लॉकडाउन—जहाँ स्क्रीन ही संसार है, और "असली दुनिया" एक विदेशी अवधारणा जैसी होती जा रही है। जिसमें सबसे सुरक्षित सामाजिकता - सामुहिकता पर सबसे बड़ा हमला हैं।

ध्यान दें: हर पीढ़ी के ठीक बीच में कोई न कोई आर्थिक रूप/शोषण या श्रम को मजबूर करती तकनीकी छलांग आती है। यह कोई संयोग नहीं है। जेनेरेशन गैप का बंटवारा भी स्वयं उन्हीं शक्तियों द्वारा पैदा किया गया हैं और किया जा रहा है, जिनका वह विश्लेषण करने का दावा करता है।

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*मुख्य प्रश्न: बदलाव किसके लिए और क्यों?*

आज हर जगह यह कहा जाता है कि मजदूर -किसान - कर्मचारी, दुकानदार, युवा बदल गए हैं, दलित अधिक आवाज उठा रहे हैं, महिलाएं अधिक स्वतंत्र हो रही हैं, शिक्षा और तकनीक ने अवसर खोले हैं।

*यह सब सच है—लेकिन आधा सच।*

पूरा सच यह है कि ये सकारात्मक बदलाव दो धार वाली तलवार हैं:

पहली धार — सतह पर दिखने वाले लक्षण/बदलाव

 *दिखने वाला बदलाव* 
युवा व महिलाएँ शिक्षा, रोजगार, मोबाइल, सोशल मीडिया पर सक्रियता स्वयं सहायता समूह, startup में महिलाएँ, वर्किंग वुमन हॉस्टल
दलित - पिछला वर्ग आरक्षण, सोशल मीडिया पर मुखरता, दलित साहित्य और पॉपुलर कल्चर में प्रवेश दलित आइकॉन, YouTube चैनल, राजनीतिक प्रतिनिधित्व
युवा अंग्रेजी, डिजिटल स्किल्स, स्वतंत्र विचार, शहरी जीवनशैली स्टार्टअप कल्चर, रिमोट वर्क, फ्रीलांसिंग

दूसरी धार — छुपाएं गये आर्थिक वास्तविकता/ असली कारण।

 इन बदलावों के परिणाम तो समझों 

 *अदृश्य वास्तविकता* 
युवा व महिलाएँ :- अधिकतर युवा व महिलाएँ असंगठित क्षेत्र, अल्प-भुगतान, शून्य सामाजिक सुरक्षा वाली कच्ची या प्राईवेट नौकरियों में हैं। घरेलू हिंसा, देखभाल का अवैतनिक श्रम जस का तस। NSSO डेटा: 90% से अधिक महिला श्रमिक असंगठित।सस्ती व ज्यादा शोषण सहने वाली मजदूर हैं, इसलिए पूंजीवाद इनकी आजादी व शिक्षा को इसी मंशा से आश्रय देता है।
मजदूर, किसान, कर्मचारी, दलित - पिछड़ों की दृश्यता/ बोकलता बढ़ी, लेकिन आर्थिक स्वामित्व घटा हैं और तेजी से घट रहा हैं।जेन जी (1997-2012)को जेन एक्स (1965-1980) के अभिभावक अपने स्तर पर लाने को भी तरस रहे है।जमीन, पूंजी, उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण वही पुराने- नये चंद पुंजीपतियों व स्वर्ण जातियों के पास ही है।स्थाई7 रोजगार में भेदभाव बडा़ है ,  इंडियन ह्यूमन डेवलपमेंट सर्वे: युवाओं व दलितों में दैनिक मजदूरी पर निर्भरता पहले से अधिक हुई हैं 
युवा बेरोजगारी का रिकॉर्ड उच्चतम स्तर। जो नौकरियाँ हैं—वे गिग, कॉन्ट्रैक्ट, शून्य घंटे, कोई पेंशन या सुरक्षा नहीं। CMIE: 20-24 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी 40% से अधिक रिपोर्ट की गई है।

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कॉर्पोरेट मार्केटिंग का असली चेहरा: आप आज़ाद नहीं, आप एक "अंश/टुकड़ा" हैं।जिसका स्वतंत्र रूप से कोई अस्तित्व ही नहीं हैं।

*जेन जेड को लेकर जितना शोर मचाया जा रहा है, उसका 90% मार्केटिंग कंपनियों ने पैदा किया है। क्यों?*

क्योंकि:

1. जेन जेड सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग बन रहा है — लगभग 2 अरब लोग। कंपनियों द्वारा तैयार माल अपनी शर्तों पर खपाने के7 लिए इनके दिमाग को नियंत्रित करके - कार्पोरेट द्वारा अपनी बात इनके मुंह से निकलवाई जा रही है।
2. यह डिजिटल मार्केटिंग का सबसे आसान निशाना है — 24x7 ऑनलाइन, डेटा जनरेट करता रहता है। जिसके बिना कंपनी जिंदा ही नहीं रह सकती।
3. इसकी पहचान व स्टेण्ड डांवाडोल रखी जाती हैं— कोई स्थायी वर्ग चेतना  नहीं, इसलिए ब्रांड और "लाइफस्टाइल" इन्हें आसानी से बेचे जा सकते हैं।
4. यह "बागी/विद्रोही" दिखना चाहता है, लेकिन "बागीपन" भी अब एक बाजार है — “बिना उद्देश्य का बाग़ी” को अब क्रिकेट, कपड़े, गाने, फिल्टर ,सैक्स, हथियार, नशे और हैशटैग के रूप में पैक करके बेचा जाता है।

*असली सवाल: "स्वतंत्रता" किसकी?*

आज युवाओं, दलितों और महिलाओं को जो "स्वतंत्रता" मिल रही है—वह किस प्रकार की है?

स्वतंत्रता  किसे मिल रही है? किस उद्देश्य से?
शिक्षा (कोचिंग, डिग्री, स्किल्स) मध्यम वर्ग के उपभोक्ता बनने व  सस्ता कुशल श्रम तैयार करना
सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति डेटा पैदा करने, एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने के लिए उपभोग पैटर्न बनाना और राजनीतिक चेतना को भंग करना, असल में पूंजीवादी पार्टियों के कुकर्मों की तुलना से यह कहलवाना की सभी पार्टियां एक जैसी हैं, जबकि इसकी आड़ में समाजवादी नीतियों को छुपा लेना होता है।
"फ्रीलांसिंग / रिमोट वर्क" कोई सामाजिक सुरक्षा, कोई यूनियन, 24x7 उपलब्धता श्रम लागत घटाना, पेंशन का बोझ टालना
महिलाओं की "आर्थिक स्वतंत्रता" गिग वर्क, ब्यूटी पार्लर, फास्ट फूड चेन, कॉल सेंटर अल्प-भुगतान वाला लचीला श्रम पूल बनाना
दलितों का "प्रतिनिधित्व" सांस्कृतिक क्षेत्र में (फिल्म, संगीत, डिजिटल मीडिया) जाति के मुद्दे को "पहचान" तक सीमित रखना, आर्थिक पुनर्वितरण से बचना

*ध्यान दें: यहाँ "स्वतंत्रता" का अर्थ है—पहले से अधिक विकल्प, लेकिन सभी विकल्प एक ही अर्थव्यवस्था के भीतर, एक ही शक्ति संरचना के अधीन।*

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दिमागी नियंत्रण का नया रूप: एल्गोरिदमिक चेतना

पुराने जमाने में सत्ता लोगों को सीधे दमन या प्रचार से नियंत्रित करती थी। अब तरीका बदल गया है।

आज दिमागी नियंत्रण के नए साधन हैं:

1. एटेंशन इकोनॉमी (ध्यान की अर्थव्यवस्था)

आपका ध्यान एक कमोडिटी/वस्तु है। हर रील, हर नोटिफिकेशन, हर स्क्रॉल आपका ध्यान बेच रहा है। जिसके पास आपका ध्यान, उसके नियंत्रण में आपकी सोच।हम आजाद महसूस करते हुए,उसकी गुलामी कर रहे होते हैं।

2. एल्गोरिदमिक फिल्टर बबल

आप वही देखते हैं जो आपको व्यस्त रखे, भावुक करे, आउटरेज करे, विभाजित करे। आप सोचते हो कि आप खोज रहे हो—असल में एल्गोरिदम तय कर रहा है कि तुम क्या सोचोगे, कैसे सोचोगे, क्यों सोचोगे।

3. आउटरेज इकोनॉमी (गुस्से का बाजार)

*जो विवादास्पद है, जो गुस्सा दिलाता है, जो बांटता है—वही "वायरल" होता है। नफरत, जातिवाद, क्षेत्रवाद, साम्प्रदायिकता — ये सब अब कंटेंट मॉड्यूल हैं। कोई उन्हें पैदा कर रहा है क्योंकि उन पर क्लिक आता है, विज्ञापन आता है। हमारे दिमाग़ में घुसकर हमारी जेब काटने का रास्ता हैं*

4. इंफ्लुएंसर संस्कृति

"स्वतंत्र विचारक" के नाम पर कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप वाले लोग हमें तैयार रहे हैं कि क्या पहनना है, क्या खाना है, किससे नफरत करनी है, किस मुद्दे पर कितना गुस्सा दिखाना है।

5. शिक्षा का कॉर्पोरेटीकरण

शिक्षा अब जिज्ञासा और चेतना के लिए नहीं—मात्र स्किल्स और नौकरी की संभावना के लिए है। विश्वविद्यालय अब जॉब-तैयारी के केंद्र बनकर रह गए हैं। इतिहास, दर्शन, समाजशास्त्र—जो चीजें आलोचनात्मक चेतना पैदा करती हैं—उनका महत्व लगातार घट रहा है या कहें खत्म कर दिया गया है।यह काम शिक्षा नीति 2020 से करवाया जा रहा है।

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उत्पादन संबंधों का नया ढाँचा: डिजिटल सामंतवाद?

 संघर्षों व हकों के विश्लेषण में आज समाज बंटना तो चाहिए—जिनके पास फैक्ट्री, जमीन, मशीन, तकनीक (उत्पादन के साधन) हैं, और जिनके पास सिर्फ अपनी मजदूरी (श्रम शक्ति) हैं।यानि मजदूर -किसान कर्मचारी दुकानदार बनाम राजसत्ता, कार्पोरेट, साम्प्रदायिक में। परन्तु बदल रहा है जाति धर्म क्षेत्र भाषा व जेनेरेशन गैप में।

आज उत्पादन के साधन बदल गए हैं:

पुराने साधन नए साधन
जमीन डेटा
फैक्ट्री प्लेटफॉर्म (Amazon, Uber, Zomato, Swiggy)
मशीन एल्गोरिदम
पूंजी (भौतिक) नेटवर्क, ब्रांड, पेटेंट, कॉपीराइट

क्या बदला?

· पहले मालिक मजदूर को सीधे हुक्म देता था।
· अब एल्गोरिदम हुक्म देता है। (डिलीवरी बॉय /ऊबर बाय को ऐप बता रहा है कि कहाँ जाना है, कितनी देर में पहुँचना है, अगर देर हुई तो पेमेंट कटेगी।)

क्या नहीं बदला?

· लाभ कुछ हाथों में केंद्रित रहता है।
· श्रम का अधिकतम दोहन किया जाता है।
· जो उत्पादन करता है, उसका मुआवजा/ मजदूरी /कृषि उपज के दाम, नौकरी उसकी उत्पादन क्षमता से कहीं कम है।
· जो नियंत्रण करता है, वही समाज व जेन जी की दिशा तय करता है।वह नई पीढ़ी को समझदार व पुरानी को मुर्ख बताकर उसे शोषण सहने को तैयार कर लेता है। सामुहिक सौदेबाजी/ युनियन से तोड़कर अलग थलग कर लेता है।

विरोधाभास साफ है:

उत्पादन सामूहिक है (लाखों लोग मिलकर), लेकिन लाभ और नियंत्रण निजी (कुछ कॉर्पोरेशन) है।

यही वह मूल अंतर्विरोध है जो आज के हर संघर्ष की जड़ में है—चाहे वह किसान आंदोलन हो, मजदूर संघर्ष हो, छात्र आंदोलन हो, काकरोच जनता पार्टी के जेन जी हो या दलित-आदिवासी-महिला अधिकारों का संघर्ष।

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क्या यह संघर्ष "समाज के भले का" हो सकता है? होना भी चाहिए?

समाजवादी आधार का अर्थ यह नहीं है कि हम पुराने मॉडल (राज्य स्वामित्व, केन्द्रीय योजना) को दोहराएँ। समाजवादी आधार का अर्थ है:

1. उत्पादन के साधनों पर सामूहिक नियंत्रण

डेटा कोई निजी संपत्ति नहीं है—यह समाज द्वारा उत्पादित है। AI, एल्गोरिदम, प्लेटफॉर्म—इन सब पर लोकतांत्रिक नियंत्रण होना चाहिए।

2. श्रम का मूल्य श्रम की जीने की मूलभूत जरूरतों द्वारा तय हो, बाजार द्वारा नहीं

कच्चे कर्मचारी/शिक्षक, प्राईवेट सैक्टर के ड्राईवर, टीचर, नर्सें, गिग वर्कर, डिलीवरी एजेंट, कॉल सेंटर एजेंट, सफाईकर्मी, मजदूर—इन सबका वेतन और सम्मान उनकी उत्पादन प्रक्रिया में भूमिका (श्रम ही वस्तु में गुण पैदा कर सकता है।जमीन, पूंजी, मशीन या ए आई नहीं)के अनुपात में होना चाहिए, न कि बाजार की "मांग" के अनुसार।

3. सामाजिक सुरक्षा एक अधिकार है, दान नहीं

पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, भोजन, बिजली, परिवहन, रोजगार —ये किसी "योजना" का हिस्सा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज के मूलभूत तत्व होने चाहिए।

4. जाति, लिंग, क्षेत्र, धर्म, भाषा—इन सबका आर्थिक आधार से संबंध समझा जाए

पहचान की राजनीति आवश्यक है—लेकिन अगर यह वर्ग प्रश्न (सभी कमाकर खानें वाले दोस्त है)से कट जाती है, तो यह केवल शोषण के लिए विभाजन और "वोट बैंक" का मुद्दा बनकर रह जाती है।

5. तकनीक का लोकतांत्रीकरण

जेन जी को यह झूठ जंचा दिया गया है कि AI और ऑटोमेशन से रोजगार खत्म होना तय है। जबकि सच यह है कि रोजगार के बिना AI काम किसके लिए करेगा,जब उसकी बनाई वस्तुएं खरीदने की क्रय शक्ति किसी के पास नहीं होंगी तो वह स्वयं मर जाएगा। सवाल यह भी नहीं कि AI व आटोमैशन को रोका जाए। सवाल यह है कि इससे पैदा हुए अधिशेष उत्पादन का लाभ किसे मिलेगा? यदि कुछ कॉर्पोरेट सीईओ को, तो असमानता बढ़ेगी। यदि समाज को (काम घटे, समय बढ़े, जीवन स्तर बेहतर हो), तो यही समाजवादी दिशा है।

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 *कच्ची नौकरी, बेरोजगारों व प्राईवेट कंपनियों के कर्मचारियों, युवाओं, दलितों, महिलाओं को क्या करना चाहिए?*

(क) चेतना का स्तर

1. सवाल करना सीखो—हर चीज पर

*· यह बदलाव मेरे लिए है, या मुझसे कुछ लेने के लिए?*
*· मैं जो सोच रहा हूँ, क्या मैं सच में सोच रहा हूँ—या कोई एल्गोरिदम मुझे ऐसा सोचने के लिए मजबूर कर रहा है?*
*· "स्वतंत्रता" जो मुझे मिल रही है—वह किसकी स्वतंत्रता को सीमित कर रही है?*
*प्राईवेट की मर्जी- मर्जी होती है या मजबूरी*

2. अपना इतिहास पढ़ो

· किसानों , कर्मचारियों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं, मजदूरों ने कैसे संघर्ष किए?
· अकेले क्रोध से कुछ नहीं होता—संगठन और चेतना का इतिहास समझो।

3. अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र की मूल बातें समझो
तुम्हें प्रोफेसर बनने की जरूरत नहीं। लेकिन यह समझना जरूरी है:

*· पैसा कहाँ से आता है?*
*· किसका श्रम कितना मूल्य पैदा करता है?*
*· टैक्स क्यों लगता है?*
*· सरकारी बजट किसके हित में बनता है,किसे लुटा दिया जाता है?*
*· "विकास" किसका विकास है?*

(ख) संगठन का स्तर

4. अकेले मत रहो—सामूहिकता सीखो
इंस्टाग्राम रील्स अकेलेपन को बढ़ाती हैं। संघर्ष के लिए साथ चाहिए।

5. छोटे समूह बनाओ—बुक क्लब, डिस्कशन ग्रुप, फिल्म स्क्रीनिंग, पॉडकास्ट
चेतना तुरंत नहीं आती। धीरे-धीरे बनती है—पढ़ने, बात करने, बहस करने,अमल करने से।

6. नये - पुराने संघर्षों से जुड़ो—जहाँ हो सके
किसान आंदोलन, मजदूर यूनियन, शिक्षक संघर्ष, कर्मचारी आंदोलन,छात्र आंदोलन—इनसे अलग-थलग मत रहो।अलग का मतलब हररोज तिल तिल कर मरना है, सामुहिक का मतलब एक बार प्राकृतिक मौत मरना है।

7. अपने हकों की आवाज उठाने वाला वैकल्पिक मीडिया बनाओ
मुख्यधारा का गोदी मीडिया कॉर्पोरेट हाथों में है। तुम्हारे पास मोबाइल और इंटरनेट है। तुम खुद मीडिया बन सकते हो—बशर्ते तुम ईमानदार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सांगठनिक सुसंगत हो।

(ग) अभ्यास/क्रिया का स्तर

8. अपने श्रम को सम्मान देना सीखो
यदि तुम कच्चे कर्मचारी, स्कीम वर्कर, सफ़ाई कर्मचारी, शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मी,डिलीवरी एजेंट हो, स्वीपर हो, किसान हो, निर्माण मजदूर हो बेशक लो पेड हो, असुरक्षित हो—तो शर्मिंदा मत हो। आप समाज चलाते हो। आपके बिना CEO, इंफ्लुएंसर, पॉलिटिशियन , कार्पोरेट सब बेकार हैं।

9. जहाँ हो, वहाँ संगठित हो

· ऑफिस में हो? सहकर्मियों से बात करो।
· कॉलेज में हो, कोचिंग में हो? छात्र संघ बनाओ (चाहे वह संस्थागत न भी हो)।
· गाँव में हो? किसान समूह, मजदूर समूह, महिला समूह, बेरोजगार समूह बनाओ।

10. सीखना कभी मत रोको
तुम्हारे पास जितने अधिक औजार होंगे (लेखन, फिल्मांकन, कोडिंग, डिजाइन, कानूनी जानकारी, डेटा एनालिसिस), उतने अधिक हथियार होंगे संघर्ष के लिए।

*11. अपनी पहचान को हथियार बनाओ, जेल नहीं*
"मैं बेरोजगार या कच्चा कर्मचारी हूं-- यह मजबूरी नहीं, मजबूती बनाओं"
"मैं दलित हूँ" — यह केवल दर्द नहीं, इतिहास भी है और संघर्ष की जमीन भी।
"मैं महिला हूँ" — यह केवल पीड़ा नहीं, यह शक्ति भी है।
"मैं युवा हूँ" — यह केवल अधीरता नहीं, यह ऊर्जा और बदलाव की क्षमता भी है।

*लेकिन सावधान: अपनी पहचान को किसी कॉर्पोरेट या चुनावी एजेंडे का हिस्सा मत बनने दो। तुम्हारी पहचान का असली उपयोग — उस समाज को बदलना है जिसने तुम्हें हाशिए पर रखा।*

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असली सवाल: क्या काकरोच जनता पार्टी यह "आंदोलन" है या "मार्केटिंग ट्रेंड"?

जेन जेड को लेकर जो उत्साह है—वह कहाँ से आता है?

· क्या यह खुद जेन जेड का आत्म-विश्लेषण है?
· या यह मार्केटिंग रिपोर्ट्स और कंसल्टेंसी फर्मों का निर्माण है?

सच्चाई: **जेन जेड "आंदोलन" कोई आंदोलन नहीं है। यह  शोषणकारी बाजार का ही एक अंश मात्र है जिसे आंदोलन का रूप दे दिया गया है ताकि वह बेचा जा सके। जैसे नेपाल, बंग्लादेश में पार्टी/नेता बदलकर बेचा गया।वहा मजदूर -किसान- शिक्षक/ कर्मचारी को क्या मिला?

असली आंदोलन वह है जो:

· उत्पादन और वितरण के असमान ढाँचे को चुनौती दे
· शोषण के नए रूपों (कच्ची व प्राईवेट नौकरी, गिग वर्क, एल्गोरिदमिक प्रबंधन, डेटा दोहन) का खुलासा करे
· जाति, लिंग, वर्ग के जटिल अंतर्संबंधों को आर्थिक भाषा में समझे, भावनाओं में नहीं।
· "व्यक्तिगत सफलता" के मिथक को तोड़े और "सामूहिक मुक्ति" की जमीन तैयार करे

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निष्कर्ष: दशा और दिशा

दशा (वर्तमान स्थिति)

· युवा, दलित, महिलाएँ — तीनों समूह पहले से अधिक दिख रहे हैं।
· तीनों के पास पहले से अधिक अवसर (शिक्षा, मोबाइल, इंटरनेट, मीडिया उपस्थिति) हैं।
· लेकिन ये अवसर उसी असमान ढाँचे के भीतर हैं—जो इन्हीं समूहों के श्रम का दोहन करता है।
· "दृश्यता" बढ़ी है, लेकिन "शक्ति" नहीं बढ़ी। आवाज बढ़ी है, लेकिन नियंत्रण वहीं के वहीं है।

दिशा (भविष्य के संघर्ष की रूपरेखा।

यह संघर्ष संभव है क्योंकि:

· प्रचार व व्यवहार का विरोधाभास इतना गहरा है कि वह टिक नहीं सकता।
· उत्पादन शक्तियाँ (AI, ऑटोमेशन) पहले से ही अधिशेष बना रही हैं—दिक्कत बिकने व लाभ के श्रमिकों में वितरण नहीं होने की है।
·कच्चे कर्मचारी , प्राईवेट कर्मी, बेरोजगार युवा पीढ़ी अस्थिरता, बेरोजगारी, मानसिक तनाव से पहले ही त्रस्त है—बस दिशा चाहिए।
· दलित, आदिवासी, महिलाएँ—तीनों के पास शोषण का सदियों पुराना अनुभव और प्रतिरोध का इतिहास है।

 काकरोच का प्रतीक है सबसे जीवट जीव का 

जेन जेड को कोर्ट व राजसत्ता द्वारा "काकरोच जेनरेशन" कहा जाना बेशक निम्न, कमजोर व अपमान करने का प्रतीक हैं—परन्तु काकरोच वह जीव है जो हर संकट में बच निकलता है, जो हर आपदा के बाद भी जीवित रहता है।जिस पर परमाणु रेडियेशन का प्रभाव भी नहीं होता है।जो दो टुकड़े करने पर भी जिंदा रहता है।

लेकिन काकरोच सिर्फ जीवित नहीं रहता—वह अनुकूलित होता है, संघर्ष करता है, फिर से पनपता है।

प्रश्न यह है:

क्या यह पीढ़ी सिर्फ जीवित रहने (survive) के लिए अनुकूलित होगी — या जीने के लायक समाज (a society worth living in) बनाने के लिए संघर्ष करेगी?

*पहला रास्ता — अनुकूलन,* चुप्पी, व्यक्तिगत सफलता की दौड़, एल्गोरिदम के गुलाम बने रहना — आसान है। 
दूसरा रास्ता — संगठन, प्रशिक्षण, संघर्ष, जोखिम — कठिन है।

लेकिन इतिहास साक्षी है:

जो पीढ़ियाँ सिर्फ "बच गईं", वे भूला दी गईं। जिन पीढ़ियों ने बदलाव किया, वे याद की जाती हैं।मौत सभी की निश्चित है। कहानी क्या छोड़कर जानी है,वह हमारे पर निर्भर है।
9812517501

मंगलवार, 26 मई 2026

सतीश महम

जनसंहार हथियारों से नहीं, शब्दों से शुरू होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में समाज और सार्वजनिक विमर्श में जिस तरह की भाषा सामान्य होती जा रही है, उससे किसी भी सभ्य इंसान का बेचैन होना स्वाभाविक है।

बार-बार कुछ समुदायों, धर्मों या समूहों के लिए ऐसे शब्द सुनाई देने लगे हैं, जो किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि किसी बीमारी, गंदगी या कीड़े-मकोड़ों के लिए इस्तेमाल होते हैं।

कभी किसी को “परजीवी” कहा जाता है।
कभी “देश पर बोझ, आंदोलनजीवी, टुकड़े टुकड़े गैंग, आरक्षणजीवी, लवजेहाद।“
कभी “गंदगी”।
और कभी सीधे “चूहा”, “कॉकरोच” या “कीड़ा”।

मुझे इतिहास की बहुत विस्तृत जानकारी नहीं है। 

इसलिए शुरुआत में लगा कि यह केवल सोशल मीडिया का ज़हर होगा।

लेकिन फिर मन में एक सवाल उठा,

क्या इतिहास में भी नफ़रत की शुरुआत इसी तरह हुई थी?

मैंने उपलब्ध संसाधनों से जानना और समझना शुरू किया।

जो सामने आया, उसने भीतर तक डरा दिया।

इतिहास बताता है कि बड़े जनसंहार अचानक नहीं होते।
वे पहले भाषा में जन्म लेते हैं।
पहले किसी समुदाय का मज़ाक उड़ाया जाता है।
फिर उसे समाज की समस्या बताया जाता है।
फिर उसकी मानवता पर हमला किया जाता है।
और अंततः उसे इंसान नहीं, बल्कि “खतरा” घोषित कर दिया जाता है।
यहीं से सभ्यता का पतन शुरू होता है।

सबसे भयावह उदाहरण होलोकॉस्ट था।

1930 और 1940 के दशक में और नाज़ी प्रचार मशीन ने जर्मनी की आर्थिक समस्याओं, बेरोज़गारी और राष्ट्रीय अपमान का दोष यहूदियों पर डालना शुरू किया।

नाज़ी अखबार डेर श्टूर्मर लगातार यहूदियों को “परजीवी” और “राष्ट्र की बीमारी” बताता था।

1940 में बनी नाज़ी प्रचार फ़िल्म डेर एवीगे यूदे में यहूदियों की तुलना चूहों से की गई। फ़िल्म में चूहों के झुंड दिखाकर कहा गया कि जैसे चूहे बीमारी फैलाते हैं, वैसे ही यहूदी समाज को “अंदर से नष्ट” कर रहे हैं।

यह केवल अपमान नहीं था।

यह लोगों के दिमाग में यह भावना भरने की प्रक्रिया थी कि सामने वाला इंसान नहीं है।

फिर क्या हुआ?

1935 के नूर्नबर्ग कानूनों के तहत यहूदियों से नागरिक अधिकार छीने गए।

उन्हें सरकारी नौकरियों, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से बाहर किया गया।
फिर उन्हें अलग बस्तियों और घेट्टो में धकेला गया।

और अंततः गैस चैंबरों और यातना शिविरों में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई।

इतिहास का दूसरा भयावह उदाहरण है।

1994 के जनसंहार से पहले उग्र हूतू राष्ट्रवादी रेडियो चैनल लगातार तुत्सी समुदाय को “Inyenzi”, यानी “कॉकरोच”, कहकर पुकारते थे।

रेडियो प्रसारणों में खुलेआम कहा जाता था,
“कॉकरोचों को कुचल दो।”

यह केवल नफ़रत नहीं थी।
यह लोगों की संवेदनाओं को खत्म करने की रणनीति थी।

जब किसी इंसान को बार-बार “कीड़ा” कहा जाए, तब उसकी हत्या भी हत्या नहीं लगती।

और फिर वही हुआ।

करीब 100 दिनों में लगभग 8 लाख तुत्सी और उदार हूतू मारे गए।

पड़ोसियों ने पड़ोसियों को काट डाला।
साधारण नागरिक भी हत्यारे बन गए।

क्योंकि प्रचार ने पहले ही उनके भीतर से इंसानियत खत्म कर दी थी।

में भी यही पैटर्न दिखाई दिया।

1990 के दशक में उग्र सर्ब राष्ट्रवादी प्रचार ने बोस्नियाई मुसलमानों को “खतरा” और “अशुद्ध तत्व” की तरह चित्रित करना शुरू किया।

“जातीय शुद्धता” और “राष्ट्र की रक्षा” के नाम पर लोगों के भीतर डर और घृणा पैदा की गई।

परिणामस्वरूप सामूहिक हत्याएँ, बलात्कार शिविर और जातीय सफाया हुआ।

1995 के में हजारों बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई।

इटली में के फासीवादी शासन ने भी अतिराष्ट्रवाद, नस्लवादी श्रेष्ठता और “राष्ट्र की शुद्धता” की राजनीति को बढ़ावा दिया।

राज्य-प्रचार का उद्देश्य केवल सत्ता बनाए रखना नहीं था, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना था कि कुछ लोग “कमतर” हैं और राष्ट्र के लिए खतरा हैं।

भी इसी मानसिकता का उदाहरण था।

श्वेत वर्चस्ववादी शासन ने अश्वेत लोगों को बराबर इंसान की तरह नहीं देखा।
भेदभाव को कानून बना दिया गया।
स्कूल, अस्पताल, परिवहन और बस्तियाँ — सब कुछ नस्ल के आधार पर अलग कर दिया गया।

जब राज्य यह तय करने लगे कि कौन “उच्च” है और कौन “कमतर”, तब इंसानियत हारने लगती है।

इन सभी घटनाओं में एक बात समान थी
हत्या से पहले अमानवीकरण हुआ था।
पहले भाषा जहरीली हुई।
फिर समाज संवेदनहीन हुआ।
फिर हिंसा सामान्य लगने लगी।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जनसंहार बंदूकों से पहले शब्दों में जन्म लेते हैं।

जब राजनीति इंसानों को “कीड़ा”, “परजीवी”, “गंदगी” या “देश की बीमारी” बताने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज एक खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है।

क्योंकि किसी भी समाज में नफ़रत कभी सीधे हत्या से शुरू नहीं होती।
वह पहले शब्दों से शुरू होती है।
पहले भाषा बदलती है।
फिर संवेदनाएँ मरती हैं।
और अंत में इंसान मरने लगते हैं।

सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि वहाँ मतभेद नहीं होते।

सभ्य समाज की पहचान यह है कि मतभेद के बावजूद वह किसी इंसान की मानवता को खत्म नहीं होने देता।

और जिस दिन समाज लोगों को इंसान नहीं, बल्कि “समस्या” समझने लगता है, उसी दिन इंसानियत मरना शुरू हो जाती है।

सतीश कुमार.....

सोमवार, 18 मई 2026

म्हारा हरियाणा


म्हारा हरियाणा

     हरियाणा म्हं कुछ साल पहलम ताहिं खेतां के डोल्यां पै शीशम खड़ी पा ज्याया करती। इनकी छां भी बढ़िया अर खेती म्हं भी नुकसान ना। हलाई काढ़ कै हाली शीशम की छां म्हं बैठ कै जोटा लाया करता। इसकी लाकड़ी भी काम्मल बताई। शीशम के इतने फायदे अर फेर बी शीशम खत्म होन्ती जावण लागरी? या बात सो सोचण की सै। बेरा ना गामां म्हं इस बात कान्हीं ध्यान गया सै कि नहीं गया सै। उनका ध्यान क्यूकर जावै इसी बातां कान्हीं? गाम आल्यां नै तै ताश खेलण तै फुरसतै कोण्या। कै एक दूसरे की टांग खींचे जावैंगे। ज्यूकर पहलम बैठ कै दुख-सुख की अर ऊंच-नीच की बतला लिया करते वा बात तै ईब रही कोण्या। कौणसी बात गाम के हक म्हं सै अर कुणसी खिलाफ सै इसपै कदे कदाऊ जिकरा हो जान्ता हो तै बेरा कोण्या। गाम के स्कूल म्हं के होरया सै इननै कोए वास्ता नहीं, गाम के अस्पताल म्हं इलाज का के हाल सै इनकी चिंता ना, गाम म्हं पाणी की डिग्गी की सफाई हुई सै कि नहीं इननै कोए लेना देना नहीं। गाम म्हं छोरियां गेल्यां छेड़खानी की वारदात बधण लागरी सैं इनपै इसका कोए खाता नहीं। जड़ बात या सै कि गाम काल उजड़ता आज उजड़ जाओ फेर किसे नै चिंता नहीं दीखती। सांझ नै दो घूंट लाकै इसनै गाल दे उसने गाल दे, घरआली कै ऊपर छोह तार लें, अर फेर खायें बिना पड़कै सो जाणा। दारू की मार तै कोए घर तो बच नहीं रहया माणस बेशक बचरया हो। पहलम हुक्का आदमी ए पीया करते, ईब घणखरी लुगाई भी हुक्टी पीवण लागगी कै बीड़ी फूंकती पा ज्यांगी। कई गामां म्हं तो थोड़ी घणी बीरबानी बी दारू का सेवन करण लागली सैं। खांसी के शिकार लोग लुगाई अस्पतालां म्हं लुटते हांडैं सैं। दमे की बीमारी बधती जा सै। चमड़ी की खारिश रात नै सोवण नहीं देन्ती। चिंता करकै ब्लड प्रेसर बधगे। दिल का धड़का बधग्या। नशाखोरी की साथ-साथ सेक्स अंगां की बीमारी बधती जावैं सैं। जवानां म्हं नुपशंकता बढ़ती जा सै। दूध ढोल म्हं घलग्या। रोजगार खत्म होगे। छोरियां नै पेट म्हं खत्म करण लाग लिये। बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश की लुगाइयां नै पांच-पांच, सात-सात हजार म्हं खरीद कै ल्यावण के मामले बधगे। पहलम तै गाम म्हं एक दलाल हुया करता सरकारी महकम्यां का फेर ईब तै हरेक महकमे का एक एक दलाल होग्या। किसे का राज आल्यो इन दलालां की पांचों आंगली घी म्हं रैहणी ए रैहणी। प्राइवेट पाणी के नलके आगे। पीस्से आल्यां नै सुख होग्या बिना पीस्से आल्यां की मर आग्यी। बुलध टोहें पावैं सैं। गाल भीड़ी होन्ती होन्ती इतनी भीड़ी होगी कि मोटा-सा माणस तो लिकड़े कोनी सकै। पाणी घर-घर म्हं नलक्यां म्हं लियाए फेर इसकी निकासी का कोई इंतजाम नहीं कई घरां म्हं तो भैंस भी नलके के पाणी तै नुहाई जावैं सैं।
     नहर के पाणी के धान्ने अटे पड़े सैं। कई कई साल होगे धाने खरीदें। नहर का पानी किमै तो आवैए कम अर जो आवै भी वो धान्ना अट्या पड़्या, वो खेत म्हं क्यूकर पहोंचै। धान्ना खोदण कूण जावै? बिना बात की बात पै रोज राड़ करैं असली बातां का जिकरा ना, परिवार नाम की चीज नहीं बचरी। बूढ़े बालकां नै देख कै राजी ना अर बालक बुढ़या के मरण की बाट देखैं सैं। सास बहू की कटती करती पावै तै बहू सास नै बुरी बतावै। करियाणे की दुकान एक गाल म्हं दो-दो तीन-तीन खुलगी। इन दुकानां म्हं दारू के पाउच आगे। लोगां का राजनीति पर तै विश्वास उठ लिया फेर माला फेर बी इक्कीश इक्कीश हजार की घालैंगे नेतावां कै। नया पेटेंट के सै इसका किसे नै बेरा पावै कोण्या। यो डब्ल्यू टी ओ के बला सै इसपै होक्के पै कदे चर्चा ना।
     टी.वी. पै नशा हिंसा सैक्स का नंगा नाच क्यों होवै इसपै कोए सवाल ना। खेती की तबाही के कारण सैं इसपै जिकरा ना। ये ब्यूटी कम्पीटीशन एकदम क्यों छागे सारे भारत म्हं? इस म्हं किसकी साजिश सै? कई बात लिखण की ना होती। थोड़ी लिखी नै ज्यादा समझियो अर बिचार करियो। बिचार करांगे तो राह भी पावैगा। बिचार तै परहेज करना छोड़णा पड़ैगा।
रणबीर

रविवार, 10 मई 2026

डिब्बा बंद समाज

डिब्बा बंद समाज!😘😘😘
दिमाग के कपाट खोलकर पढ़िएगा!
यकीन कीजिए आपको कुछ फायदा ही होगा!
कुछ बच गया हो तो अपनी और से जोड़ दीजिएगा! 🙏🙏🙏

दूसरों की दुखती रगों को छेड़कर कोई समाज आगे
नही बढ़ सकता.👍👍👍
जेएनयू का जहाँ नाम आएगा तो बात सोशल
इंजीनियरिंग की नही होगी. बात नाक्सिलियों
पर आकर रुक जायेगी.
 नाम राहुल गाँधी का आयेगा
तो एक तबका बहस को इटली की तरफ मोड़ देगा.

 और महात्मा गाँधी को काउंटर
करना हो तो ब्रह्मचर्य से लेकर बिरला तक की दंत
कथाओं में बहस उलझ जाएगी. 
नज़र सबकी खामियों
पर है!
किसी की खूबी पर नही.।
इस देश में दलित का मतलब कोटा, ।
मुस्लमान का
मतलब पाकिस्तान, 
ब्राह्मण का मतलब मनु, 
बनिए
का मतलब लाला, 
कश्मीरी यानि अलगाव वादी।
जाट का मतलब जटवाडा।
और नार्थ ईस्ट का मतलब चिंकी है ..।
.....नेपाली
..सबके लिए बहादुर हो गया है
 और बहादुर कहा जाने
वाला ठाकुर ...अगर रसूखदार है तो फ्यूडल हो गया
है. !
और अगर  बोद में है तो सिर्फ ठाकर।
 इसाई कनवर्टेड है और शिया ..संघ के मुखबिर.।
 हर
जात पात की कमियां और खामियां हमारी
जुबान पर है.!
 फर्क इतना है कि कुछ लोग अनायास
सामने बोल देते हैं और बाकी पीठ पर. आप क्या करते
हैं इसकी कमजोरियां भी आपसे छीपाई नही जाती
. और मौके पर आपकी वही कमज़ोर नस दबाई जाती
है. पत्रकार हैं तो दलाल बोल देंगे...पुलिस वाले है तो
ठुल्ला हैं, सरकार में हैं तो करप्ट.
पेंशन भोगी हैं तो परजीवी
कोई आंदोलन करो तो आंदोलन जीवी
 प्रक्टिसिंग डाक्टर
हैं तो लुटेरे है!
और PWD के ठेकेदार हैं तो गुंडे!
अगर
मॉडल या एंकर या होस्टेस या रिसेप्शनिस्ट या
जवान नेताईन या यंग डाईवोरसी हैं फिर तो खैर
नही.
ऐसी सोच हम भले ही सार्वजनिक तौर पर ढक लें पर
भीतर ही भीतर ये सोच हमारे समाज को एक नेगेटिव
सिंड्रोम डिसऑर्डर में ले जा रही है. और 75 साल के
बाद ये डिसऑर्डर घटा नही और बढ़ा है. !
दलितों ने
patholgically सवर्णों को एंटी दलित मान लिया है.
ब्राह्मण अब तक खुद को चाणक्य मान रहे हैं
. ठाकुर
की अपनी बेचैनियाँ हैं.
हिंदू किसी मुसलमान बस्ती
में  अपने आप को सुरक्षित नही पाता और मुसलमान हिन्दू बस्ती में एक संदिग्ध ....😭😭
अब तो बात जातियों तक आ चुकी है!
सिर्फ हिंदू या मुसलमान होना ही पर्याप्त नहीं! 😭😭😭
हर परदेश में पैंतीश बनाम... का  मॉडल  बनता जा रहा है! 
चारा खाने वाली राजनीति भाईचारा खाने तक पहूंच गई है! 
उधर लेफ्ट को राईट (संघ) की नेकर
उतारे बगैर चैन नही है.
मोदी की बीजेपी देश में
कांग्रेस मुक्त भारत चाहती है.
 और बी जे पी का आक्षेप कि कांग्रेस तो सता की भूखी है! 
हालांकि सत्ता सभी को चाहिए! 
जनसेवा तो एक मुखौटा है! 
 दोनों एक दूसरे की दुखती रग
पकड़कर आगे बढ़ रहे.
ये एक नेगेटिव सिंड्रोम है और देश इसमें जी कर फंसकर
आगे नही बढ़ सकता है. कोई क्यूँ नही बताता कि हम
बिखर रहे हैं. हम एक दूसरे से अलग हो रहे हैं. हमारा
समाज डिब्बो में बंद होता जा रहा है!
हिंदुत्व का डब्बा!
इस्लाम का डब्बा!
खालिस्तान का डब्बा!
दलित का डब्बा!
ओबीसी का डब्बा! 
डब्बे ही डब्बे!.
जिन डिब्बों को जुड़कर
रेल बनना चाहिए था वो डिब्बे अलग होकर पटरी से
उतर रहे हैं.
लेफ्ट ..एक्सट्रीम लेफ्ट हो रहा है!. राईट ..एक्सट्रीम
राईट ..!
.और शायद सेंटर.. आउट हो गया है.!
 मित्रों
सोचियेगा...कुछ देर इन बंद डिब्बों के बारे में
...गरेबान में झांकियेगा कहीं आप तो किसी डिब्बे
में सीलबंद नही हैं.!
कुलबीर मलिक!
सुप्रभात मित्रों!! 🙏🙏🙏

1857

‘‘हम हैं इसके मालिक, हिंदुस्तान हमारा’’

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) की 169 वीं वर्षगांठ पर

1857 का विद्रोह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे शानदार व गौरवशाली अध्यायों में शामिल है। वास्तव में 1857 का महाविद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। 

ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ भारत के गर्वीले सामंत, सैनिक, किसान व कामगार पूरी ताकत व जद्दोजहद के साथ लड़े। अंतिम सांस तक लड़े। निश्चित तौर पर यह विद्रोह असफल हुआ लेकिन इसने भारतीय जनमानस के भीतर संघर्ष व कुर्बानी का जो जज्बा पैदा किया और जो साम्राज्यवाद विरोध की चेतना पैदा की वह आने वाली पीढ़ियों को अनुप्राणित करती रही, एक प्रकाश स्तंभ की तरह उनका मार्ग प्रदर्शित करती रही।

1857 का विद्रोह भारत में औपनिवेशिक राज के खिलाफ हुआ सबसे हिंसक व व्यापक संघर्ष था जो करीब दो साल चला। इस विद्रोह की जद में उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों समेत पंजाब, हरियाणा और उत्तर पूर्वी भारत भी शामिल था। 

विद्रोह की शुरुआत सिपाहियों के विद्रोह से हुई। गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस असंतोष के तात्कालिक कारण बने। 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में तैनात ईस्ट इंण्डिया कंपनी की बंगाल आर्मी के हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने बगावत कर दी। उन्होंने अपने अफसरों को मार गिराया तथा अपने 85 साथियों को जेल से आजाद करा लिया, जिन्हें चर्बी लगे कारतूस इस्तेमाल करने का हुक्म न मानने के अपराध में बंदी बना लिया गया था। इसके बाद बंगाल आर्मी के ये जवान दिल्ली कूच कर गये। 11 मई को बागी दिल्ली पहुंच गये और उन्होंने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को अपना प्रधान सेनापति एवं बख्त खान को अपना प्रतिनिधि व प्रवक्ता घोषित किया। 

मेरठ छावनी के विद्रोह ने पूरी बंगाल आर्मी को विद्रोह के लिए उठ खड़े होने की का जज्बा पैदा कर दिया। विद्रोही सैनिकों को आम जनता का सहयोग व समर्थन मिला। साथ ही अंग्रेजों से असंतुष्ट व सत्ताच्युत कई राजा-सामंत व ताल्लुकेदार इस संग्राम में कूद पड़े। 

1857 का विद्रोह कोई यकायक होने वाली घटना नहीं थी। अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश सर्वत्र व्याप्त था। राजे-नवाब अंग्रेजों द्वारा छल-बल द्वारा अपनी सल्तनतें व रियासतें हड़पने के चलते नाखुश थे तो किसान अत्यधिक कर बोझ व कामगार अपना रोजगार छिन जाने से तबाह हाल थे। सैनिक औपनिवेशिक अंग्रेज अफसरों द्वारा जानवरों जैसा बर्ताव झेल रहे थे। जिनके लिए उनके धर्म, संस्कृति व सभ्यता के लिए कोई सम्मान नहीं था। इस तरह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ, एक साझे दुश्मन के खिलाफ ये सब एक हो गये।

इस विद्रोह के दौरान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रकट हुआ आक्रोश अंग्रेजों के भारत में 100 सालों की लूट, छल-बल, अन्याय-उत्पीड़न व बेहद अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ एक सामूहिक विस्फोट था। 

अंग्रेज भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये व्यापार के बहाने आये थे। 1757 में प्लासी तथा 1764 में बक्सर की लड़ाई जीतने के साथ ही भारत पर राज करने का ईस्ट इंडिया कंपनी का मंसूबा प्रकट होता गया। ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपनाकर वह अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाती गयी। एक-एक करके रजवाडे़ व रियासतें छल-बल द्वारा हड़पी जाने लगीं। 

1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की हार ने भारत में किसी मजबूत केन्द्रीय शक्ति का खात्मा कर दिया। इस बीच ब्रिटेन में भी औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी। वह व्यापारिक पूंजीवाद से औद्योगिक पूंजीवाद के युग में प्रवेश कर चुका था और एक औद्योगिक महाशक्ति बन रहा था। पहले हिन्दुस्तानी मंडियों का सस्ता माल हड़पना अंग्रेजों का प्रारंभिक उद्देश्य रहा था परंतु अब हिन्दुस्तानी धंधों-दस्तकारी को तबाह कर अपने उद्योगों का माल हिन्दुस्तानी बाजारों पर थोपना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया था। इसके साथ ही भारी मात्रा में उद्योगों के लिए आदिम या प्रारंभिक पूंजी संचय भी किसानों-जमींदारों पर भारी कर लगाकर वे पूरा कर रहे थे। उद्योगों के लिए कच्चा माल, प्राकृतिक संसाधनों की लूट तो उनका मकसद था ही। 

अंग्रेज धीरे-धीरे भारत में अपने पैर जमाते गये। कलकत्ता, मद्रास और बंबई में कंपनी का शासन कायम होने के बाद मराठा रियासतों, मैसूर (टीपू सुल्तान शासित) हैदराबाद, अवध, फरूखाबाद, तंजौर, भरतपुर व सिंध में उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया। 1839 में रणजीत सिंह के निधन के बाद पंजाब को भी उन्होंने अपने शिकंजे में जकड़ लिया। 

अपने इन जीते गये इलाकों की लूट से अंग्रेजों ने एक विशाल फौज खड़ी कर ली जो उनके लिए भारत ही नहीं अफगानिस्तान, फारस, क्रीमिया, नेपाल व वर्मा में भी लड़ाई लड़ रही थी। इन सेनाओं में प्रमुख थी बंगाल आर्मी, जिसमें एक लाख तीस हजार सैनिक थे। भारत में कुल दो लाख 60 हजार की सशस्त्र सेना में केवल 34 हजार अंग्रेज व 10 हजार अंग्रेज अफसर थे। 

औपनिवेशिक गुलामी को भारतीय जनता ने चुपचाप स्वीकार नहीं किया। इसके खिलाफ जब-तब संघर्ष फूटते रहते थे। जुलाई 1806 की एक रात वेलोर की छावनी के हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने बगावत कर कई अंग्रेज अफसरों को मार डाला। बगावत अंततः कुचल दी गयी। पंजाब में दिसंबर 1845 में अंग्रेजों ने मुदकी व फिरोजशहर की लड़ाईयों में अपने ही नेताओं द्वारा छले जाने के बावजूद जनरल शाम सिंह अटारीवाला के नेतृत्व में आखिरी दम तक अंग्रेजों का प्रतिरोध किया। 1855 में झारखंड के भोगनाडीह में दस हजार संथाल किसानों ने विद्रोह किया। उनके गांव अंग्रेजों द्वारा फूंक डाले गये व सैकड़ों को फांसी पर लटका दिया गया। 

1832 से बहाबी आंदोलन ने जोर पकड़ा। अपने रूप में धार्मिक होने के बावजूद यह अंतर्वस्तु में अंग्रेज साम्राज्यवादियों के खिलाफ एक किसान विद्रोह था। धीरे-धीरे वक्त बढ़ा तो प्रतिरोध भी बढ़ता गया। 

इस तरह आया 1857 का ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’। गुपचुप तरीके से विद्रोह की तैयारियां चल रही थीं। सिपाही के लिए लाल कमल और जनता के लिए रोटी विद्रोह का प्रतीक बन गए। गांव-गांव और शहर-शहर रोटी और कमल का फूल बंट रहे थे। तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह, बख्त खान आदि विद्रोह का संगठन कर रहे थे। विद्रोह की नियत तिथि 31 मई तय हुई। लेकिन घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि विद्रोह की आग पहले ही भड़क उठी।

इस महाविद्रोह की आग पहले पहल पश्चिम बंगाल के दम दम में जनवरी 1857 में फूटी थी फिर मार्च में बैरकपुर में मंगल पाण्डे ने बगावत कर साहसिक कदम उठाया। मई के मध्य में इसकी लपटें लखनऊ जा पहुंचीं और फिर 9 व 10 मई को मेरठ में बड़े पैमाने का विद्रोह भड़क उठा। इसके बाद पूरी बंगाल आर्मी में विद्रोह भड़क उठा। इसी के साथ कई सत्ताच्युत व असंतुष्ट राजा-नवाब व ताल्लुकेदारों ने भी खुली बगावत कर दी। मेरठ, दिल्ली, रूहेलखण्ड, आगरा, बनारस, इलाहाबाद, झांसी और कानपुर विद्रोह का केन्द्र बनकर खड़े हो गये। तात्या टोपे, नाना साहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, बख्त खान, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला आदि इस विद्रोह के महानायकों के रूप में उभरे। 

1857 के अन्य केन्द्रों में सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, शाहजहांपुर, फरूर्खाबाद, फतेहपुर, आजमगढ़, जौनपुर, बनारस, जबलपुर, इंदौर, नीमच, पेशावर, लाहौर, अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, नसीरपुर, एरिनपुर, अहमदाबाद, आरा, नागपुर, मुर्शिदाबाद, बहरामपुरा और कलकत्ता थे। हरियाणा में इसका असर कुछ ज्यादा और पंजाब में थोड़ा कम रहा। छिटपुट असर के इलाके महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात में भी थे।

किसी व्यवस्थित व एकीकृत केन्द्रीय कमान व योजनाबद्धता के अभाव में एक-एक कर विद्रोहियों के इलाके उनके हाथ से जाते रहे। सबसे लंबा और भीषण संघर्ष अवध का रहा जहां अप्रैल 1859 तक संघर्ष चलता रहा। अंग्रेजों के साथ सुविधा यह थी कि वे पुख्ता रणनीति बना रहे थे जबकि बागी स्थानीय स्तर की रणनीति बना रहे थे इसलिए भारी संख्या में होने के बावजूद वे अलग-अलग इलाकों में हरा दिये गये। 

विद्रोही दो दिशाओं पूर्व व उत्तर-पश्चिम में दुश्मन से हार गये हालांकि जंग आसान नहीं रही। दिल्ली का मोर्चा सवा चार महीने से ज्यादा समय तक टिका रहा। आखिरी दौर में बख्त खान के हाथ में कमान थी। ग्वालियर की टुकड़ी ने अंग्रेजों को हरा दिया और कानपुर पर कब्जा कर लिया। झांसी की रानी का मोर्चा एक ऐतिहासिक नजीर बन गया। जगदीशपुर के कुंवर सिंह ने बड़े इलाके में जोरदार संघर्ष की मुहिम चलायी। तात्या टोपे अंग्रेजों से दो साल तक लड़ते रहे। शाहजहांपुर और पटना में भी विद्रोहियों ने कब्जा किया। बागियों ने कहीं भी बिना लड़े मोर्चा नहीं छोड़ा। 

इस संग्राम की अंतिम बड़ी लड़ाई 21 जनवरी 1859 को सीकर राजस्थान के पास लड़ी गयी। कुछ गद्दार राजाओं की वजह से तात्या टोपे, राव साहब और फिरोजशाह के नेतृत्व वाली सेनाओं को हार का मुंह देखना पड़ा। कुछ गद्दारों ने धोखे से तात्या टोपे को 7 अप्रैल 1859 को सोते हुए पकड़वा दिया। तात्या टोपे को सार्वजनिक फांसी दी गयी। चारों तरफ टीलों पर हजारों लोगों ने तात्या टोपे को भावपूर्ण नमन किया। तात्या टोपे ने खुद फांसी का फंदा अपने गले में डाला। क्रांति का यह महानायक जिसकी नेतृत्वकारी एवं रणनीतिक क्षमताओं का लोहा अंग्रेजों ने भी माना था, आने वाली पीढ़ियों के लिए संग्रामी भावना व आत्मउत्सर्ग का प्रतीक बन गया। 

इसी तरह पटना विद्रोह के नायक पीर अली ने फांसी के फंदे को चूमने से पहले पटना के कमिश्नर टेलर को जो बयान दिया वह देशभक्ति का अविस्मरणीय दस्तावेज है। पीर अली ने कहा, ‘‘जान एक प्यारी चीज है मगर कुछ चीजें जान से भी प्यारी हैं। मादरे वतन ऐसी ही चीज है जिसके लिए जान भी कुर्बान की जा सकती है।’’

छिटपुट रूप में विद्रोह अगले एक साल तक जारी रहा और अंततः अंग्रेज इसे दबा पाने में कामयाब रहे। कई देशी राजाओं व जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया। देश के बहुत बड़े इलाके जहां राजे-रजवाड़े व जमींदार अंग्रेजों के साथ थे विद्रोह का मामूली असर भी नहीं हुआ। जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर, अलवर, टोंक, भरतपुर, जम्मू, हिमांचल, गढ़वाल, हैदराबाद, मैसूर, लावणकोर, बड़ौदा, जूनागढ़, रामपुर, ग्वालियर, भोपाल, कोचीन, कपूरथला, पटियाला, ढेंकानाल, सरायकेल्ला, कूचविहार, राजकोट, भावनगर, सांगली, मिराज, कोल्हापुर और सैकड़ों छोटे-बड़े राजे-नवाबों के इलाकों में विद्रोह का असर नहीं हुआ। 

जो सामंत अंग्रेजों के खिलाफ थे- मसलन 1857 से पहले टीपू सुल्तान, वेलुथंपी, रानी चेनम्मा, पोल्यगर विद्रोह में हिस्सा लेने वाले विद्रोही और अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर उनके नामों निशां मिटा दिये गये। लेकिन अंग्रेजों का साथ देने वालों को ईनाम दिए गये और उनके वंशज आज भी मौजूद हैं तथा महाराज-महारानी-राजमाता आदि कहलाते हैं। भारतीय शासक वर्ग का हिस्सा बनकर ये आज भी राज कर रहे हैं। 

1857 में भाग लेने वाले विद्रोही सैनिकों, किसानों व राजे-सामंतों का कठोर दंड दिये गये। हजारों की संख्या में वे फांसी चढ़ाये गये, तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिये गए और हजारों को काले पानी की सजा मिली। 

1857 के विद्रोह के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म कर इसे सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन लाया गया। 

1857 का विद्रोह भले ही कुचल दिया गया हो लेकिन इसने जिस संग्रामी चेतना को विकसित किया वह खत्म नहीं की जा सकी। भारत में राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीय चेतना का विकास इस आंदोलन ने किया। 

कुछ अंग्रेज परस्त व शासक वर्गीय इतिहासकार 1857 के विद्रोह को महज सैनिक बगावत या म्यूटनी कहकर इसका अवमूल्यन करते हैं लेकिन वास्तव में 1857 में विद्रोही सैनिक, सामंत-ताल्लुकेदार, किसान व कामगार एक साथ लड़े थे। 

बागी सैनिक जिन इलाकों से आते थे वहां भारी असंतोष था। बेहिसाब लगान के चलते किसानों व जमींदारों की हालत बुरी थी। जमींदारों व किसानों की मिल्कीयत कभी भी जब्त की जा सकती थी। अवध को 1856 में अंग्रेजों ने अपने में मिला लिया था और वहां की सेना को भी विखंडित कर बंगाल आर्मी में शामिल कर लिया था। अवध के ताल्लुकेदारों व किसानों पर भी वही महलवारी व्यवस्था लागू की गयी जो बाकि जगह कहर बरपा रही थी। विद्रोही बंगाल आर्मी के जवान किसान पृष्ठभूमि के ही थे। 

निस्संदेह मंगल पाण्डे, लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह व बेगम हजरत जैसे इस विद्रोह के महानायक-नायिकाएं हैं और इस महान संग्राम के चमकते शिखर हैं लेकिन 1857 के विद्रोह में कामगार वर्ग की अच्छी-खासी भूमिका थी, जिसे प्रायः नजरअंदाज किया जाता है। विद्रोह के शहरी केन्द्रों में उजड़े हुए बुनकरों, कारीगरों व बेरोजगारों की खासी भूमिका रही। 

अहमद उल्ला शाह उर्फ डंकाशाह व अजीमुल्ला जैसे लोगों का योगदान भुला दिया जाता है। डंकाशाह फकीर थे। उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ जबर्दस्त जनगोलबंदी की। अहमद उल्ला के मुरीद फैजाबाद, अलीगढ़, बरेली, मुरादाबाद, आगरा, आदि मेें भारी तादाद में थे। ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनकी आग उगलती तकरीरों को सुनने के लिए दसियों हजार लोग जुटते थे। अपने मुरीदों का सैन्य संगठन कर उन्होंने फैजाबाद, लखनऊ, बरेली आदि जगह जबर्दस्त लड़ाई लड़ी व शाहजहांपुर को आजाद करा लिया। अंततः युवालां के राजा ने धोखे से वार्ता के बहाने बुलाकर उनकी हत्या की। 

अजीमुल्ला जो कि नाना साहब के सलाहकार थे, ने फरवरी 1857 में दिल्ली से ‘पयामे आजादी’ नामक पत्र निकालकर विद्रोह की मशाल जलायी। उन्होंने प्रसिद्ध गीत-‘‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा, पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा’’ की रचना की जो आने वाली कई पीढ़ियों में देशभक्ति का जज्बा पैदा करता रहा और जो वाकई भारत की संग्रामी जनता की आत्मा की आवाज था। 

1857 के विद्रोह में दलित-शोषित वर्ग की भूमिका को अक्सर भुला दिया जाता है। दलित मातादीन हेला, उसकी पत्नी लाजो, कोरी समुदाय की झलकारी बाई, उसके पति पूरन, अजीजन, अवंती बाई लोधी, ऊदा देवी, बिजली पासी, सिदो कान्हो जैसे कामगार वर्ग के नायकों की वीरगाथा केवल जनश्रुतियों में ही सुरक्षित रह सकी। अंग्रेजों द्वारा 1858 में फांसी दिये जाने से ऐन पहले ली गयी तस्वीर में गंगू मेहतर के चेहरे पर आत्मसम्मानी विद्रोह का जो तेज था वह हर देशवासी के लिए गौरव की बात है। 

1857 का विद्रोह भारत में हिन्दू- मुस्लिम एकता की भी एक मिसाल है। बंगाल आर्मी, जिसके 65 प्रतिशत सैनिक ब्राह्मण व राजपूत थे, का बहादुरशाह जफर को अपनासम्राट व बख्त खान को अपना प्रतिनिधि मानने में कोई गुरेज नहीं था। इस विद्रोह के मुस्लिम नेताओं द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता का जर्बदस्त प्रचार किया गया। विद्रोही नवाबों ने अपने शासन के अंतर्गत गौ हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस विद्रोह के दौरान भारत की गंगा-जमुनी तहजीब ने अपने को मूर्त रूप में प्रकट किया। हिन्दू-मुस्लमान एक ही मकसद- अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ आजादी- के लिए मिलकर लड़े। दोनों का खून एक साथ धरती पर गिरा व जज्ब हुआ। 

हालांकि यह विद्रोह पुरानी जमीन से लड़ा गया था लेकिन इसमें आधुनिक चेतना के बीज भी छुपे थे। विद्रोही सिपाहियों ने जनरल या कर्नल जैसी कोई पदवी धारण नहीं की। सामूहिक तौर पर दरबार लगाकर फैसले लिये जाते थे। बख्त खान के नेतृत्व में जो प्रशासनिक इकाई कायम की गयी थी उसमें सभी फैसले वोट के द्वारा लिये जाते थे। यहां तक की बादशाह का भी वोट होता था। 

प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार यह विद्रोह 19 वीं सदी में दुनिया का सबसे बड़ा विद्रोह था। यहां तक कि लैटिन अमेरिका में महान बोलीवार के नेतृत्व में सशस्त्र क्रांतिकारियों की संख्या कभी कुछ हजार से ज्यादा नहीं पहुंच पायी लेकिन यहां तो केवल बंगाल आर्मी के 1 लाख 24 हजार सिपाही विद्रोह में शामिल थे। विद्रोही जनता की संख्या लाखों में थी। 

1857 विद्रोह के 166 साल बाद इस विद्रोह की स्मृतियां जनमानस में धुंधली पड़ती जा रही हैं। साम्राज्यवादी गुलामी एक बार फिर नये रूप मेें सामने आ रही है। सत्ता में वे लोग काबिज हैं जो भारत की मिली-जुली संस्कृति गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट कर धार्मिक उन्माद की आंधी बहा रहे हैं और एक हिन्दू फासीवादी राज्य कायम करने पर आमादा हैं। जिन लोगों का आजादी के आंदोलन में गद्दारी का कलंकित इतिहास रहा है वे आज फर्जी देशभक्ति और गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों व मजदूर मेहनतकशों पर नृशंस हमले कर रहे हैं। ऐसे में जनता के बीच 1857 की संग्रामी विरासत को ले जाना बहुत महत्वपूर्ण कार्यभार बनता है ताकि 1857 के शहीदों के सपनों को खत्म होने से बचाया जा सके, भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को बचाया जा सके और आज के दौर में देशी-विदेशी पूंजी की गुलामी के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके।

साभार : "परचम" पत्रिका
eparcham.blogspot.com

#1857Revolt
#1857_विद्रोह

किसानों

भाजपा के राज में किसानों की
आत्महत्याओं में 26 की बढ़ोतरी 
हुई है ।  देश का अन्नदाता आत्म 
हत्या कर रहा है । क्यों ?

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

कुलभूषण आर्य

● जूझते जुझारू लोग -156 ●

*अग्रिम मोर्चे के नायक कुलभूषण आर्य*

सन 1986 में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, हरियाणा में नॉन-टीचिंग स्टाफ आंदोलन पर था। अभूतपूर्व सफल हड़ताल के बावजूद तत्कालीन हरियाणा सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन हठधर्मिता पर अड़ा रहा और कर्मचारियों का आंदोलन कुचलने की कोशिश कर रहा था। इसके समर्थन में हरियाणा के सभी विभागों के कर्मचारी एकजुट हुए और कर्मचारी हितों की रक्षा के लिए एक साझा संगठन बनाने की सहमति बनी, जिसका नाम सर्व कर्मचारी संघ रखा गया।
सर्व कर्मचारी संघ की जिला भिवानी इकाई बनाने के लिए कर्मचारियों की मीटिंग में सक्रिय लोग जुटे। सरकार के आचरण और तानाशाही के रवैये को देखते हुए किसी ऐसे आदमी को नेतृत्व देने पर सहमति बनी जो साहसी हो, निडर हो, ट्रेड यूनियन का जानकार हो और समझदार हो। विचार-विमर्श के बाद सभी की सहमति मिल्क प्लांट कर्मचारी यूनियन के नेता श्री कुलभूषण आर्य पर बनी।
कुछ समय पहले मिल्क प्लांट में लंबी हड़ताल का नेतृत्व किया था। इसी आंदोलन के दौरान 15 दिन की भूख हड़ताल भी की। इस तरह विभाग के कर्मचारी आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी श्री कुलभूषण आर्य को मिली। इसके बाद हरियाणा में ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत हुई और सरकार की तानाशाही का मुकाबला करते हुए कर्मचारी आंदोलन मजबूत हुआ।

दिनांक 13.08.1948 को स्वाधीनता प्राप्ति के लगभग एक साल बाद महम चौबीसी जिला रोहतक के गाँव भैणीसुरजन में श्रीमती छोटोदेवी और श्री जगत सिंह आर्य के घर पुत्र ने जन्म लिया। पालने में पुत के पांव पहचान लेने को सार्थक करते हुए उन्हें "कुलभूषण" नाम दिया गया। इनके पिता अपने क्षेत्र के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, समाज सुधारक और आर्य समाज के अगुवा रहे हैं। ये तीन भाई हैं। कुल भूषण ने राजकीय उच्च विद्यालय, महम से दसवीं कक्षा पास करने के बाद जाट कॉलेज रोहतक से ग्रेजुएशन उपाधि प्राप्त की। परिवार और परिवेश के संस्कारों के चलते उनमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का विचार बहुत गहराई तक पैठा हुआ था।

शिक्षा प्राप्ति के बाद वे 1973 में वीटा मिल्क प्लांट भिवानी में दुग्ध सोसायटिज् के सुपरवाइजर नियुक्त हो गए। उन दिनों सहकारी क्षेत्र के इन प्लांटों में नौकरशाही हावी थी जिसके फंड्स का दुरुपयोग भी हो रहा था। कुलभूषण ने अम्बाला के भगवतस्वरूप शर्मा तथा कुछ अन्य सक्रिय साथियों के साथ मिलकर यूनियन का गठन किया। इसके बैनर तले 1980 में आन्दोलन छेड़ा गया। वे उस समय 18 दिन आमरण अनशन डटे रहे और अन्ततः कर्मचारियों की माँगें माने जाने पर आन्दोलन समाप्त हुआ। सर्वकर्मचारी संघ के गठन के बाद भिवानी के पहले जिला अध्यक्ष बने। उनके नेतृत्व में जिला राज्य अग्रणी मोर्चों में शामिल हो गया।

 वे आन्दोलन में कई बार गिरफ्तार हुए, हिरासत में लिए गए तथा पुलिस दमन के शिकार हुए। स्वभाव से ही वे बेबाक ढंग से अपने को झोंक देने वाले थे। उनके धैर्य, शौर्य, संयम और सूझबूझ के चलते भिवानी जिला हर आन्दोलन में चर्चित रहा। पूरे राज्य में वीटा मिल्क प्लांटस् की यूनियन काफी सुदृढ़ हो गई थी और उसने सरकारी कर्मचारियों के समान सुविधाएं हासिल की थी। मैनेजमेंट को यह गवारा नहीं था। इसलिए सन् 1990 भिवानी मिल्क प्लांट को बंद करने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला लिया गया और सभी कर्मचारी  देय लाभों को लेकर नौकरी से बाहर हो गए।

केरल के एर्नाकुलम के बाद हरियाणा में भी पूर्ण साक्षरता की मुहिम चली तो भिवानी में इसका नेतृत्व कुलभूषण आर्य को सौंपा गया। उन्होंने पूर्ण समर्पण भाव से काम शुरू कर दिया। श्रीयुत् आर.के.खुल्लर उन दिनों यहाँ एसडीएम थे। वे स्वयं भिवानी की टीम से गहराई से प्रभावित थे लेकिन जिला प्रशासन के साथ गंभीर मतभेद के चलते जिले के अभियान को बंद करवा दिया गया। आर्य साहब उच्च नैतिक मूल्यों को मानते थे। इसलिए गलत बात के आगे झुकने की बजाए बाहर होने का विकल्प चुना।

इसके बाद वे मजदूरों के संगठन सीटू में काम करने लगे। उन्हें 1996 में जिलाध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने जिले में ग्रामीण चौकीदारों को संगठित करने में महती भूमिका निभाई। वे मनरेगा मजदूरों को संगठित करने में भी जुटे। 

सन् 2005 में अखिल भारतीय किसान सभा के जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई। उस समय मंढियाली में हुए गोलीकांड में किसान मारे गए। किसान सभा ने इसके विरुद्ध आन्दोलन खड़ा किया तो सरकार ने उनको गिरफ्तार करके जेल में बंद कर दिया। वे एक योद्धा थे। जेल या दमन उन्हें चुप नहीं कराया जा सकता था। उन्होंने 2011 से 2013 तक जन संघर्ष समिति, भिवानी के संयोजक का कार्यभार भी संभाला। जब समस्या का हल नहीं होता था तो संघर्ष को तेज करने के लिए आंदोलन किए जाते थे। साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों पर भी बहुत सारे सेमिनार एवं चर्चाएं आयोजित करवाईं। इसी दौरान कई साथियों से मिलकर हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति, पिवानी को फिर से सक्रिय करने की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली।

उनके चरित्र में पारदर्शिता, सादगी और अपने हित से पहले समाज के हित को महत्व देने की विशेषता थी। वे बड़े-बड़े पदों पर रहते हुए भी हमेशा सरल बने रहे और साथ काम करने वालों के लिए प्रेरणा बने रहे। संघर्षों के बीच व्यस्त रहते हुए भी उनके भीतर का साहित्यकार जाग्रत और सक्रिय रहा। उन्होंने जन समस्याओं पर अनेक रागनियां लिखी।

 अच्छे स्वास्थ्य और मजबूत इरादों के धनी इस अग्रिम मोर्चे के सैनिक के कोविड से संक्रमित हो गए और यह महामारी ऐसे जीवट वाली शख्सियत पर भारी पड़ी। सभी कार्यकर्ताओं को भरोसा था कि वह इस महामारी को भी मात दे देंगे, लेकिन 25 मई 2021 को अत्यंत दुखद और अप्रत्याशित खबर आई कि वे हमारे बीच नहीं रहे।

कुलभूषण का विवाह सन् 1969 में सुश्री उर्मिला से हुआ। वे राजकीय सेवा शिक्षक रही और सेवानिवृत्त हो चुकी हैं।अपने जीवन साथी की स्मृति को संजोए भिवानी में रहती हैं। उनकी पाँच सन्तान हैं - चार बेटियां और एक बेटा। सभी बच्चे सुशिक्षित हैं। बेटा विजेन्द्र सिंह आर्मी में कर्नल है और चण्डीगढ़ में तैनात है। बड़ी बेटी विजय भिवानी में संस्कृत शिक्षक हैं; दूसरी सुमन प्राध्यापिका हैं; तीसरी सरिता भी शिक्षक रही, लेकिन अब घर संभाल रही हैं और चौथी, सविता भिवानी में ही एस.एस. मिस्ट्रेस हैं।

गुरुवार, 19 मार्च 2026

हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक दृश्य



हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य
रणबीर सिंह दहिया
                  
       हरियाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश के रूप में जाना जाता है । राज्य के समृद्ध और सुरक्षा के माहौल में यहाँ के किसान और मजदूर , महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों , नए उपकरणों , नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढाया , जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका ।
   राज्य में 7,356 गाँव हैं, जिनमें से 6,222 में ग्राम पंचायतें हैं।
    हरियाणा के शहरीकरण के प्रमुख पहलू उच्च शहरीकरण स्तर:  2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा की शहरी आबादी 34.88% थी, जो राष्ट्रीय औसत 31.16% से अधिक थी। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी आबादी 43.26% है।  तीव्र वृद्धि:  शहरी जनसंख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, 1901 में 5.7 लाख से बढ़कर 2011 में 88.2 लाख हो गई। शहरी जनसंख्या वृद्धि दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
      सर्वाधिक शहरीकृत: फरीदाबाद सबसे अधिक शहरीकृत जिला है, इसकी 79.51% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। गुरुग्राम, पंचकुला और पानीपत भी सबसे अधिक शहरीकृत हैं।  सबसे कम शहरीकृत: मेवात सबसे कम शहरीकृत जिला है।  परिणाम और चुनौतियाँ: बुनियादी ढांचे पर दबाव: तेजी से जनसंख्या वृद्धि आवास, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसे मौजूदा बुनियादी ढांचे पर दबाव डालती है।  पर्यावरणीय प्रभाव: बढ़ती यातायात भीड़ और प्रदूषण महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
     2014-15 में हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 1,47,382 रुपये थी.
2024-25 में अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 3,53,182 रुपये है.
यह अनुमान लगाया गया है कि हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 2014-15 से 2024-25 के बीच औसतन 9.1% की वार्षिक दर से बढ़ी है.
2014-2015 में हरियाणा का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 4,37,145 करोड़ रुपये था, जबकि 2024-25 में अनुमानित GSDP 12,13,951 करोड़ रुपये है. 
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह अनुमानित आंकड़े हैं और वास्तविक आंकड़े भिन्न हो सकते हैं।
       यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है । ऐसा क्यों हुआ ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस कि मांग करता है । हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्ही संपन्न तबकों का गलबा रहा है । यहाँ के काफी लोग फ़ौज में गए और आज भी हैं मगर उनका हरियाणा में क्या योगदान रहा इसपर ज्यादा ध्यान नहीं गया है । उनकी एक भूमिका रही है। 
इसी प्रकार देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया ; इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है । क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों कि संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रूप ले  सकता है ? महिला विरोधी, दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों को यदि हरियाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाये तो हरियाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपना कर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है । क्या पिछले दस पन्दरा सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं ? व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सारी सफलताएँ हांसिल की हैं ।
    समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों ,सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है । इसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुँच सका है ।
        हमारे हरियाणा के गाँव में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति , गाँव की परंपरा , गाँव की इज्जत व शान के नाम पर बहुत छल प्रपंच रचे गए हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय कि बजाय बहुत ही अन्याय पूर्ण व्यवहार किये जाते रहे हैं ।उदाहरण के लिए हरियाणा के गाँव में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब (जोहड़) कि खुदाई का काम होता तो पूरा गाँव मिलकर इसको करता था । रिवाज यह रहा है कि गाँव की हर देहल से एक आदमी तालाब कि खुदाई के लिए जायेगा । पहले हरियाणा के गावों क़ी जीविका पशुओं पर आधारित ज्यादा रही है। गाँव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे । इन पशुओं का जीवन गाँव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था । गाँव क़ी बड़ी आबादी के पास न ज़मीन होती थी न पशु होते थे । अब ऐसे हालत में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं, वह भी अपनी देहल से एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना ज़मीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था । वाह कितनी गौरवशाली और न्यायपूर्ण परंपरा थी हमारी? यह तो महज एक उदाहरण है परंपरा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का ।
             महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रीति रिवाज , हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएँ आज भी मौजूद हैं । इनमें मौजूद दुभांत को देख पाने क़ी दृष्टि अभी विकसित होना बाकी है | लड़का पैदा होने पर लडडू बाँटना मगर लड़की के पैदा होने पर मातम मनाना , लड़की होने पर जच्चा को एक धड़ी घी और लड़का होने पर दो धड़ी घी देना, लड़के क़ी छठ मनाना, लड़के का नाम करण संस्कार करना, शमशान घाट में औरत को जाने क़ी मनाही , घूँघट करना , यहाँ तक कि गाँव कि चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता व अन्याय पर टिके हुए हैं । सामंती पिछड़ेपन व सरमायेदारी बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया । मगर पढ़े लिखे हरियाणवी भी इनका निर्वाह करके बहुत फखर महसूस करते हैं । यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है । हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध , दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद के लाना और उनका यौन शोषण  आदि का चलन बढ़ रहा है । सती, बाल विवाह ,अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आन्दोलन नहीं चला । स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर को- एजुकेसन का विरोध किया गया , स्त्रियों कि सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गयी । उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा जबकि इसमें उसका कानूनी हक़ है । चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है । दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृति चारों तरफ देखी जा सकती है । यहाँ समाज के बड़े हिस्से में अन्धविश्वास , भाग्यवाद , छुआछूत , पुनर्जन्मवाद , मूर्तिपूजा , परलोकवाद , पारिवारिक दुश्मनियां , झूठी आन-बाण के मसले, असमानता , पलायनवाद , जिसकी लाठी उसकी भैंस , मूछों के खामखा के सवाल , परिवारवाद ,परजीविता ,तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है । ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं । हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के  वर्ग के रूप में हुआ ।
             तथाकथित स्वयम्भू पंचायतें नागरिक के अधिकारों का हनन करती रही हैं और महिला विरोधी व दलित विरोधी तुगलकी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती रहती हैं । राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं या चोर दरवाजे से इन पंचातियों की मदद करते रहते हैं । यह अधखबड़ा मध्यम वर्ग भी कमोबेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है । एक दौर में हरयाणा में सर्व खाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत ,संस्कृति ,मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई  और अपना सामाजिक वर्चस्व बरक़रार रखने के लिए जहाँ एक ओर ये जातिवादी पंचायतें घूँघट ,मार पिटाई ,शराब,नशा ,लिंग पार्थक्य ,जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं वहीँ दूसरी ओर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर युवा लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह तरह के फतवे जारी करती रही हैं । जौन्धी और नयाबांस की घटनाएँ तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किये गए तालिबानी फैंसले जीते जागते उदाहरण हैं । युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन-हिंसा और दहेज़ हत्या की शिकार हों रही हैं । ये पंचायतें बड़ी बेशर्मी से बदमाशी करने वालों को बचाने की कोशिश करती हैं । अब गाँव की गाँव, गोत्र की गोत्र और सीम के लगते गाँव के भाईचारे की गुहार लगाते हुए हिन्दू विवाह कानून 1955  में संसोधन की बातें की जा रही हैं , धमकियाँ दी जा रही हैं और जुर्माने किये जा रहे हैं। हरियाणा के रीति रिवाजों की जहाँ एक तरफ दुहाई देकर संशोधन की मांग उठाई जा रही है, वहीँ हरियाणा की ज्यादतर आबादी के रीति रिवाजों की अनदेखी भी की जा रही है ।  
            हरियाणा में  खाते-पीते मध्य वर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबक़ों का इसे समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है, जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां, दलित, अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष से अलग रहें। लेकिन साधारण जनता अगर फ़ासीवादी मुहिम में शरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता , अकेलेपन, हताशा अन्धसंशय, अवरुद्ध चेतना, पूर्वग्रहों, भ्रम द्वारा जनित भावनाओं के कारण शरीक होती है। फ़ासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित और उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुषिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिए कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतंत्र को बरता है, उससे कहीं ज़्यादा फ़ासीवादी परिस्थितियों में रहने का अभ्यास किया है।` 

           गाँव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोतरी हो रही है । समुदाय , जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलों को पीट पीट कर मार डाला जाता है , उनकी हत्या कर दी जाति है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है । एक तरफ तो महिला के साथ वैसे ही इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हों , वहीँ उसे समुदाय की 'इज्जत' मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है । अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है ।
           यहाँ के प्रसिद्ध संगियों हरदेवा , लख्मीचंद ,बाजे भगत , दयाचंद मायना , मेहर सिंह ,मांगेराम ,चंदरबादी, धनपत व खेमचंद  की रचनाएं काफी प्रसिद्ध हुई हैं। रागनी कम्पीटिसनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है । ऑडियो कैसेटों की जगह सीडी लेती गई और अब यु ट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है। स्वस्थ ,जन पक्षीय सामग्री के साथ ही पुनरुत्थानवादी व अंधउपभोग्तवादी मूल्यों की सामग्री भी नजर आती है । हरियाणा के लोकगीतों पर  समीक्षातमक काम कम हुआ है । महिलाओं के दुःख दर्द का चित्रण काफी है । हमारे त्योहारों के अवसर के बेहतर गीतों की बानगी भी मिल जाती है ।
        गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इंसानियत के जज्बे को , हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है । गऊ हत्या या गौ-रक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है । दुलिना हत्या कांड और अलेवा कांड गौ के नाम पर फैलाये जा रहे जहर का ही परिणाम थे। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं । राधास्वामी और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है ।
         सांस्कृतिक स्तर पर हरयाणा के चार पाँच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं । हरेक गाँव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं । एक गांव में कई गांव बस्ते हैं। जातीय भेदभाव एक ढंग से कम हुए हैं मगर अभी भी गहरी जड़ें जमाये हैं । आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं । सभी पहले के सामाजिक व नैतिक बंधन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं ।  मगर जनतांत्रिक मूल्यों के विकास की बजाय बाजारीकरण की संस्कृति के मान मूल्य बढ़ते जा रहे हैं । बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी है । मजदूरी के मौके भी कम से कमतर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीडन भी बढ़ा है । दलितों से भेदभाव बढ़ा है वहीँ उनका असर्सन भी बढ़ा है । कुँए अभी भी कहीं कहीं अलग अलग हैं । परिवार के पितृसतात्मक ढांचे में परतंत्रता बहुत ही तीखी हो रही है । पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं मगर इनकी जगह जनतांत्रिक ढांचों का विकास नहीं हो रहा । तल्लाकों के केसिज की संख्या कचहरियों में बढ़ती जा रही है । इन सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है । मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट की गिरफ्त में है । खेत मजदूरों ,भठ्ठा मजदूरों ,दिहाड़ी मजदूरों व माईग्रेटिड मजदूरों का जीवन संकट गहराया है । लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है ।
                      कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है । तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है । ज़मीन की दो -ढाई एकड़ जोत पर 70 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है | ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। थ्रेशर और हार्वेस्टर कम्बाईन ने मजदूरी के संकट को बढाया है।सामलात जमीनें खत्म सी हों रही हैं । कब्जे कर लिए गए या आपस में जमीन वालों ने बाँट ली । अन्न की फसलों का संकट है । पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है । नए बीज ,नए उपकरण , रासायनिक खाद व कीट नाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलंदाजी ने इस सीमान्त किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है । प्रति एकड़ फसलों की पैदावार घटी है जबकि इनपुट्स की कीमतें बहुत बढ़ी हैं । किसान का कर्ज भी बढ़ा है । स्थाई हालातों से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर तेजी से बढ़ रहा है । अन्याय व अत्याचार बेइन्तहा बढ़ रहे हैं । किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैंठ गयी और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन , ताश खेल कर बिताने की प्रवर्ति बढ़ी है । हाथ से काम करके खाने की प्रवर्ति का पतन हुआ है । साथ ही साथ दारू व सुल्फे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है ।
     पिछले दिनों एक साल तक चले किसान आंदोलन ने एक बार किसानी एकता को मजबूत करने का काम किया है। लेकिन किसानी संकट बढ़ता ही नजर आ रहा है। मध्यम वर्ग के एक हिस्से के बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर सॉफ्ट वेयर आदि के क्षेत्र में काफी सफलताएँ भी हांसिल की हैं । मगर एक बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है । कई जनतांत्रिक संगठन इस बेचैनी को सही दिशा देकर जनता के जनतंत्र की लडाई को आगे बढ़ाने में प्रयास रत दिखाई देते हैं । अब सरकारी समर्थन का ताना बाना टूट गया है और हरियाणा में कृषि का ढांचा बैठता जा रहा है । इस ढांचे को बचाने के नाम पर जो नई कृषि नीति या नितियां परोसी जा रही हैं उसके पूरी तरह लागू होने के बाद आने वाले वक्त में ग्रामीण आमदनी ,रोजगार और खाद्य सुरक्षा की हालत बहुत भयानक रूप धारण करने जा रही है। साथ ही साथ बड़े हिस्से का उत्पीडन भी सीमायें लांघता जा रहा है, साथ ही इनकी दरिद्र्ता बढ़ती जा रही है । नौजवान सल्फास की गोलियां खाकर या फांसी लगाकर आत्म हत्या को मजबूर हैं ।
                 गाँव के स्तर पर एक खास बात और पिछले कुछ सालों में उभरी है , वह यह कि कुछ लोगों के प्रिविलेज बढ़ रहे हैं । इस नव धनाड्य वर्ग का गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर गलबा है । पिछले सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता , सुख भ्रान्ति और नए उभरे सम्पन्न तबकों --परजीवियों ,मुफतखोरों और कमीशन खोरों -- में गुलछर्रे उड़ाने की अय्यास कुसंस्कृति तेजी से उभरी है । नई नई कारें ,कैसिनो ,पोर्नोग्राफी ,नँगी फ़िल्में ,घटिया केसैटें , हरयाणवी पॉप ,साइबर सैक्स ,नशा व फुकरापंथी,  ,कथा वाचकों के प्रवचन ,झूठी हैसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्र्ता को दूर करने के लिए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। जातिवाद व साम्प्रदायिक विद्वेष ,युद्ध का उन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि सम्मलेन बड़े उभार पर हैं । इन नव धनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथा वाचकों को खींच लाई है । विडम्बना है कि तबाह हो रहे तबके भी कुसंस्कृति के इस अंध उपभोगतावाद से छद्म ताकत पा रहे हैं ।
                     दूसर तरफ यदि गौर करेँ तो सेवा क्षेत्र में छंटनी और अशुरक्षा का आम माहौल बनता जा रहा है। इसके बावजूद कि विकास दर ठीक बताई जा रही है , कई हजार कर्मचारियों के सिर पर छंटनी कि तलवार चल चुकी है और बाकी कई हजारों के सिर पर लटक रही है । सैंकड़ों फैक्टरियां बंद हों चुकी हैं । बहुत से कारखाने यहाँ से पलायन कर गए हैं । छोटे छोटे कारोबार चौपट हों रहे हैं । संगठित क्षेत्र सिकुड़ता और पिछड़ता जा रहा है । असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हों रहा है । फरीदाबाद उजड़ने कि राह पर है , सोनीपत सिसक रहा है , पानीपत का हथकरघा उद्योग गहरे संकट में है । यमुना नगर का बर्तन उद्योग चर्चा में नहीं है ,सिरसा ,हांसी व रोहतक की धागा मिलें बंद हों गयी हैं । धारूहेड़ा में भी स्थिलता साफ दिखाई देती है ।
                शिक्षा के क्षेत्र में बाजार व्यवस्था का लालची व दुष्टकारी खेल सबके सामने अब आना शुरू हो गया है । सार्वजनिक क्षेत्र में साठ साल में खड़े किये ढांचों को या तो ध्वस्त किया जा रहा है या फिर कोडियों के दाम बेचा जा रहा है । शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर खिसकती जा रही है । शिक्षा के क्षेत्र में जहां एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किए जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों का खोलना एक अचीवमेंट के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूल की शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा  को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो ,चाहे वह उच्च शिक्षा हो, चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारी करण और पैसे के दम पर डिग्रियों का कारोबार बढ़ा है। दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियाओं की बाढ़ सी ला दी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढाया तो बिल्कुल भी नहीं है घटाया बेशक हो। इंस्टिट्यूट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारत खड़ी करके , मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्यप्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है। विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियां में यूजीसी की गाइडलाइन्स की धज्जियां उड़ाई जाती रही हैं और उड़ाई जा रही हैं  । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह संभव है। 

          स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल हुआ  है । गरीब मरीज के लिए सभी तरफ से दरवाजे बंद होते जा रहे हैं । लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीनें बेचनी पड़ रही हैं । आरोग्य कोष या राष्ट्रिय बीमा योजनाएं ऊँट के मुंह  में जीरे के समान हैं । उसमें भी कई सवाल उठ रहे हैं । स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की दखलअंदाजी बढ़ी है । एंपैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी, डॉक्टरों की कमी, कहीं कुछ और कमियों के चलते घिसट रही हैं। गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एग्जीक्यूशन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं। प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरियाणा में लागू नहीं किया है, इसलिए कई प्राइवेट नर्सिंग होम की लूट दिनोंदिन अमानवीय रूप धारण करती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटल में सीटी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज योजना सैद्धांतिक तौर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी उसकी एग्जीक्यूशन बहुत धीरे चल रही है। इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटियों का प्रावधान नहीं रखा गया है। खून की कमी nfhs 4 के मुकाबले nfhs 5 में   गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है। इसी प्रकार कुपोषण बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज महंगा होता जा रहा है।

               अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाये । यह महानगरों तक नहीं सिमित रहा । अब तो शहर शहर , गली गली में मैकडोनाल्ड हमारे बच्चों को बर्गर ,पिज्जा फ्री के उपहार दे कर खाने की आदत डालेगा , रिझाएगा , फँसाएगा ताकि कल को वह पूरी , परांठा , इडली , डोसा भूल जाये और बर्गर ओइज्ज के बगैर रह ही नहीं पाए । आखिर बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे भारत देश में । पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति , कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो । इसी प्रकार आज बाजार के लिए देश प्रदेश विशेष के हुनर , कारीगरी, व्यवसाय ,शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोल जा रहा है और हमारे मीडिया इस मामले में मल्टीनेसनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं । हरियाणा में अब गुनध्धा हुआ आट्टा , अंकुरित मूंग, चना आदि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगी । कूकीज , चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे । जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे । भारतीय कुटीर ऊद्योग के साथ साथ अन्य कम्पनियाँ भी मल्टीनेसनल के पेट में चली जायेंगी ।
सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है ? यदि नहीं तो इसके ठीक उल्ट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके नयायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है । उस विचार से नजदीक का सम्बन्ध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं । इसके बनाने के सब साधन इसी दुनिया में इसी हरियाणा में मौजूद हैं । जरूरत है उस नजर को विक्सित करने की । आज मानवता के वजूद को खतरा है । यह इस विचारधारा का या उस विचारधारा का मसला नहीं है । यह एक देश का सवाल नहीं है यह एक प्रदेश का सवाल नहीं है यह पूरी दुनिया का सवाल है । जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है । हरियाणा के विकास मॉडल में भी यह साफ़ प्रकट हो रहा है । नव वैश्वीकरण की प्रक्रिया से विनाश ही होगा विकास नहीं । 

मगर अब दुनिया यह सब समझ रही है ।  हरियाणा वासी भी समझ रहे हैं । मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाडी के नीचे नहीं रखेगी । मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असंभव कर देगी । हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं । युवा लड़के लड़कियां, दलित, और महिलाएं इसके अगवा दस्ते होंगे और समाज सुधर का काम अपनी प्रगतिशील दिशा अवश्य पकड़ेगा।
आज के हरयाणा की चुनौतियां
हरयाणा प्रदेश ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2026 तक पहुंचा है । इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं । इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था इसके बनने के वक्त । उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई जिसने सड़कों का जाल बिछाया, बिजली गावों गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखि जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।
नए बीज, नए उपकरण, नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के एक हिस्से में हरित क्रांति ने क्षेत्र की खेती की पैदावार को बढ़ाया । वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती जा रही है । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं । हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ की राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे इंसान का विकास किया है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । इसके व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है ,चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो, चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो । इस अधखबडे व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक है और एक नवजागरण आंदोलन की अपेक्षा है। शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों  का खोलना एक अचीवमैंट के रूप में पेश किया जा रहा है वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है । दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । इंस्टीच्युट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है । विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है और समय इसकी मांग करता है ।
       स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी , डाक्टरों की कमी ,कहीं कुछ और कमियों के चलते ,घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी सर्वे दो के मुकाबले सर्वे तीन में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।
सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । कुछ भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी से हो रहा है । सकारात्मक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे, फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है । असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है, प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है । एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित  तबकों  द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है । दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद में गरीब किसान, मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।
नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी पी में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ? इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी ? नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ? जेंडर फ्रैंडली , ईको फ्रैंडली और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को कहा जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीति के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।इ।
इन चुनौतियों से निपटने निपटने के लिए हरियाणा सरकार से भविष्योन्मुखी नीतियां बनाने और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न योजनाएं लागू करने पर गंभीरता से जोर देने की अपेक्षा है।, सिर्फ आर्थिक सर्वेक्षणों और सरकारी घोषणाओं से काम नहीं चलने वाला। ठोस जमीनी हस्तक्षेप की जरूरत है।
रणबीर सिंह दहिया
रिटायर्ड सीनियर प्रोफेसर , 
सर्जरी विभाग, पीजीआईएमएस रोहतक।






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हरियाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य
रणबीर सिंह दहिया
                  
       हरियाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश के रूप में जाना जाता है । राज्य के समृद्ध और सुरक्षा के माहौल में यहाँ के किसान और मजदूर , महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों , नए उपकरणों , नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढाया , जिसके चलते हरियाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरियाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका ।
   राज्य में 7,356 गाँव हैं, जिनमें से 6,222 में ग्राम पंचायतें हैं।
    हरियाणा के शहरीकरण के प्रमुख पहलू उच्च शहरीकरण स्तर:  2011 की जनगणना के अनुसार, हरियाणा की शहरी आबादी 34.88% थी, जो राष्ट्रीय औसत 31.16% से अधिक थी। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि शहरी आबादी 43.26% है।  तीव्र वृद्धि:  शहरी जनसंख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, 1901 में 5.7 लाख से बढ़कर 2011 में 88.2 लाख हो गई। शहरी जनसंख्या वृद्धि दर भी राष्ट्रीय औसत से अधिक है।
      सर्वाधिक शहरीकृत: फरीदाबाद सबसे अधिक शहरीकृत जिला है, इसकी 79.51% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। गुरुग्राम, पंचकुला और पानीपत भी सबसे अधिक शहरीकृत हैं।  सबसे कम शहरीकृत: मेवात सबसे कम शहरीकृत जिला है।  परिणाम और चुनौतियाँ: बुनियादी ढांचे पर दबाव: तेजी से जनसंख्या वृद्धि आवास, परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा जैसे मौजूदा बुनियादी ढांचे पर दबाव डालती है।  पर्यावरणीय प्रभाव: बढ़ती यातायात भीड़ और प्रदूषण महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं।
     2014-15 में हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 1,47,382 रुपये थी.
2024-25 में अनुमानित प्रति व्यक्ति आय 3,53,182 रुपये है.
यह अनुमान लगाया गया है कि हरियाणा की प्रति व्यक्ति आय 2014-15 से 2024-25 के बीच औसतन 9.1% की वार्षिक दर से बढ़ी है.
2014-2015 में हरियाणा का सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) 4,37,145 करोड़ रुपये था, जबकि 2024-25 में अनुमानित GSDP 12,13,951 करोड़ रुपये है. 
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह अनुमानित आंकड़े हैं और वास्तविक आंकड़े भिन्न हो सकते हैं।
       यह एक सच्चाई है कि हरियाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है । ऐसा क्यों हुआ ? यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस कि मांग करता है । हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्ही संपन्न तबकों का गलबा रहा है । यहाँ के काफी लोग फ़ौज में गए और आज भी हैं मगर उनका हरियाणा में क्या योगदान रहा इसपर ज्यादा ध्यान नहीं गया है । उनकी एक भूमिका रही है। 
इसी प्रकार देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरियाणा में आकर बसे उन्होंने हरियाणा की दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया ; इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है । क्या हरियाणा की संस्कृति महज रोहतक, जींद व सोनीपत जिलों कि संस्कृति है? क्या हरियाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रूप ले  सकता है ? महिला विरोधी, दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों को यदि हरियाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाये तो हरियाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपना कर इसे विश्लेषित करने की आवश्यकता है । क्या पिछले दस पन्दरा सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरियाणा के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं ? व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सारी सफलताएँ हांसिल की हैं ।
    समाज के तौर पर 1857 की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों ,सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है । इसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुँच सका है ।
        हमारे हरियाणा के गाँव में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति , गाँव की परंपरा , गाँव की इज्जत व शान के नाम पर बहुत छल प्रपंच रचे गए हैं और वंचितों, दलितों व महिलाओं के साथ न्याय कि बजाय बहुत ही अन्याय पूर्ण व्यवहार किये जाते रहे हैं ।उदाहरण के लिए हरियाणा के गाँव में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब (जोहड़) कि खुदाई का काम होता तो पूरा गाँव मिलकर इसको करता था । रिवाज यह रहा है कि गाँव की हर देहल से एक आदमी तालाब कि खुदाई के लिए जायेगा । पहले हरियाणा के गावों क़ी जीविका पशुओं पर आधारित ज्यादा रही है। गाँव के कुछ घरों के पास 100 से अधिक पशु होते थे । इन पशुओं का जीवन गाँव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा होता था । गाँव क़ी बड़ी आबादी के पास न ज़मीन होती थी न पशु होते थे । अब ऐसे हालत में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं, वह भी अपनी देहल से एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना ज़मीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था । वाह कितनी गौरवशाली और न्यायपूर्ण परंपरा थी हमारी? यह तो महज एक उदाहरण है परंपरा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का ।
             महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रीति रिवाज , हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएँ आज भी मौजूद हैं । इनमें मौजूद दुभांत को देख पाने क़ी दृष्टि अभी विकसित होना बाकी है | लड़का पैदा होने पर लडडू बाँटना मगर लड़की के पैदा होने पर मातम मनाना , लड़की होने पर जच्चा को एक धड़ी घी और लड़का होने पर दो धड़ी घी देना, लड़के क़ी छठ मनाना, लड़के का नाम करण संस्कार करना, शमशान घाट में औरत को जाने क़ी मनाही , घूँघट करना , यहाँ तक कि गाँव कि चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता व अन्याय पर टिके हुए हैं । सामंती पिछड़ेपन व सरमायेदारी बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया । मगर पढ़े लिखे हरियाणवी भी इनका निर्वाह करके बहुत फखर महसूस करते हैं । यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है । हरियाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध , दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद के लाना और उनका यौन शोषण  आदि का चलन बढ़ रहा है । सती, बाल विवाह ,अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आन्दोलन नहीं चला । स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर को- एजुकेसन का विरोध किया गया , स्त्रियों कि सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरियाणा में अनदेखी की गयी । उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा जबकि इसमें उसका कानूनी हक़ है । चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है । दलाली, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढ़ती प्रवृति चारों तरफ देखी जा सकती है । यहाँ समाज के बड़े हिस्से में अन्धविश्वास , भाग्यवाद , छुआछूत , पुनर्जन्मवाद , मूर्तिपूजा , परलोकवाद , पारिवारिक दुश्मनियां , झूठी आन-बाण के मसले, असमानता , पलायनवाद , जिसकी लाठी उसकी भैंस , मूछों के खामखा के सवाल , परिवारवाद ,परजीविता ,तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है । ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं । हरियाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबड़े मनुष्य के  वर्ग के रूप में हुआ ।
             तथाकथित स्वयम्भू पंचायतें नागरिक के अधिकारों का हनन करती रही हैं और महिला विरोधी व दलित विरोधी तुगलकी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती रहती हैं । राजनीति व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं या चोर दरवाजे से इन पंचातियों की मदद करते रहते हैं । यह अधखबड़ा मध्यम वर्ग भी कमोबेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है । एक दौर में हरयाणा में सर्व खाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत ,संस्कृति ,मर्यादा आदि के नाम पर महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई  और अपना सामाजिक वर्चस्व बरक़रार रखने के लिए जहाँ एक ओर ये जातिवादी पंचायतें घूँघट ,मार पिटाई ,शराब,नशा ,लिंग पार्थक्य ,जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं वहीँ दूसरी ओर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर युवा लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह तरह के फतवे जारी करती रही हैं । जौन्धी और नयाबांस की घटनाएँ तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किये गए तालिबानी फैंसले जीते जागते उदाहरण हैं । युवा लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन-हिंसा और दहेज़ हत्या की शिकार हों रही हैं । ये पंचायतें बड़ी बेशर्मी से बदमाशी करने वालों को बचाने की कोशिश करती हैं । अब गाँव की गाँव, गोत्र की गोत्र और सीम के लगते गाँव के भाईचारे की गुहार लगाते हुए हिन्दू विवाह कानून 1955  में संसोधन की बातें की जा रही हैं , धमकियाँ दी जा रही हैं और जुर्माने किये जा रहे हैं। हरियाणा के रीति रिवाजों की जहाँ एक तरफ दुहाई देकर संशोधन की मांग उठाई जा रही है, वहीँ हरियाणा की ज्यादतर आबादी के रीति रिवाजों की अनदेखी भी की जा रही है ।  
            हरियाणा में  खाते-पीते मध्य वर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबक़ों का इसे समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता है, जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां, दलित, अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्ष से अलग रहें। लेकिन साधारण जनता अगर फ़ासीवादी मुहिम में शरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता , अकेलेपन, हताशा अन्धसंशय, अवरुद्ध चेतना, पूर्वग्रहों, भ्रम द्वारा जनित भावनाओं के कारण शरीक होती है। फ़ासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित और उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुषिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी से पनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिए कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतंत्र को बरता है, उससे कहीं ज़्यादा फ़ासीवादी परिस्थितियों में रहने का अभ्यास किया है।` 

           गाँव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरियाणा में बढ़ोतरी हो रही है । समुदाय , जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलों को पीट पीट कर मार डाला जाता है , उनकी हत्या कर दी जाति है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है । एक तरफ तो महिला के साथ वैसे ही इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हों , वहीँ उसे समुदाय की 'इज्जत' मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है । अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है ।
           यहाँ के प्रसिद्ध संगियों हरदेवा , लख्मीचंद ,बाजे भगत , दयाचंद मायना , मेहर सिंह ,मांगेराम ,चंदरबादी, धनपत व खेमचंद  की रचनाएं काफी प्रसिद्ध हुई हैं। रागनी कम्पीटिसनों का दौर एक तरह से काफी कम हुआ है । ऑडियो कैसेटों की जगह सीडी लेती गई और अब यु ट्यूब और सोशल मीडिया ने ले ली है। स्वस्थ ,जन पक्षीय सामग्री के साथ ही पुनरुत्थानवादी व अंधउपभोग्तवादी मूल्यों की सामग्री भी नजर आती है । हरियाणा के लोकगीतों पर  समीक्षातमक काम कम हुआ है । महिलाओं के दुःख दर्द का चित्रण काफी है । हमारे त्योहारों के अवसर के बेहतर गीतों की बानगी भी मिल जाती है ।
        गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात गोत्र व धर्म के ऊपर लड़वा कर हमारी इंसानियत के जज्बे को , हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है । गऊ हत्या या गौ-रक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है । दुलिना हत्या कांड और अलेवा कांड गौ के नाम पर फैलाये जा रहे जहर का ही परिणाम थे। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं । राधास्वामी और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है ।
         सांस्कृतिक स्तर पर हरयाणा के चार पाँच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं । हरेक गाँव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं । एक गांव में कई गांव बस्ते हैं। जातीय भेदभाव एक ढंग से कम हुए हैं मगर अभी भी गहरी जड़ें जमाये हैं । आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं । सभी पहले के सामाजिक व नैतिक बंधन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं ।  मगर जनतांत्रिक मूल्यों के विकास की बजाय बाजारीकरण की संस्कृति के मान मूल्य बढ़ते जा रहे हैं । बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी है । मजदूरी के मौके भी कम से कमतर होते जा रहे हैं। मजदूरों का जातीय उत्पीडन भी बढ़ा है । दलितों से भेदभाव बढ़ा है वहीँ उनका असर्सन भी बढ़ा है । कुँए अभी भी कहीं कहीं अलग अलग हैं । परिवार के पितृसतात्मक ढांचे में परतंत्रता बहुत ही तीखी हो रही है । पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं मगर इनकी जगह जनतांत्रिक ढांचों का विकास नहीं हो रहा । तल्लाकों के केसिज की संख्या कचहरियों में बढ़ती जा रही है । इन सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है । मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट की गिरफ्त में है । खेत मजदूरों ,भठ्ठा मजदूरों ,दिहाड़ी मजदूरों व माईग्रेटिड मजदूरों का जीवन संकट गहराया है । लोगों का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है ।
                      कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है । तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभर कर आया है । ज़मीन की दो -ढाई एकड़ जोत पर 70 प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है | ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है। थ्रेशर और हार्वेस्टर कम्बाईन ने मजदूरी के संकट को बढाया है।सामलात जमीनें खत्म सी हों रही हैं । कब्जे कर लिए गए या आपस में जमीन वालों ने बाँट ली । अन्न की फसलों का संकट है । पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है । नए बीज ,नए उपकरण , रासायनिक खाद व कीट नाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलंदाजी ने इस सीमान्त किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है । प्रति एकड़ फसलों की पैदावार घटी है जबकि इनपुट्स की कीमतें बहुत बढ़ी हैं । किसान का कर्ज भी बढ़ा है । स्थाई हालातों से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर तेजी से बढ़ रहा है । अन्याय व अत्याचार बेइन्तहा बढ़ रहे हैं । किसान वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैंठ गयी और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन , ताश खेल कर बिताने की प्रवर्ति बढ़ी है । हाथ से काम करके खाने की प्रवर्ति का पतन हुआ है । साथ ही साथ दारू व सुल्फे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है ।
     पिछले दिनों एक साल तक चले किसान आंदोलन ने एक बार किसानी एकता को मजबूत करने का काम किया है। लेकिन किसानी संकट बढ़ता ही नजर आ रहा है। मध्यम वर्ग के एक हिस्से के बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर सॉफ्ट वेयर आदि के क्षेत्र में काफी सफलताएँ भी हांसिल की हैं । मगर एक बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है । कई जनतांत्रिक संगठन इस बेचैनी को सही दिशा देकर जनता के जनतंत्र की लडाई को आगे बढ़ाने में प्रयास रत दिखाई देते हैं । अब सरकारी समर्थन का ताना बाना टूट गया है और हरियाणा में कृषि का ढांचा बैठता जा रहा है । इस ढांचे को बचाने के नाम पर जो नई कृषि नीति या नितियां परोसी जा रही हैं उसके पूरी तरह लागू होने के बाद आने वाले वक्त में ग्रामीण आमदनी ,रोजगार और खाद्य सुरक्षा की हालत बहुत भयानक रूप धारण करने जा रही है। साथ ही साथ बड़े हिस्से का उत्पीडन भी सीमायें लांघता जा रहा है, साथ ही इनकी दरिद्र्ता बढ़ती जा रही है । नौजवान सल्फास की गोलियां खाकर या फांसी लगाकर आत्म हत्या को मजबूर हैं ।
                 गाँव के स्तर पर एक खास बात और पिछले कुछ सालों में उभरी है , वह यह कि कुछ लोगों के प्रिविलेज बढ़ रहे हैं । इस नव धनाड्य वर्ग का गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर गलबा है । पिछले सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता , सुख भ्रान्ति और नए उभरे सम्पन्न तबकों --परजीवियों ,मुफतखोरों और कमीशन खोरों -- में गुलछर्रे उड़ाने की अय्यास कुसंस्कृति तेजी से उभरी है । नई नई कारें ,कैसिनो ,पोर्नोग्राफी ,नँगी फ़िल्में ,घटिया केसैटें , हरयाणवी पॉप ,साइबर सैक्स ,नशा व फुकरापंथी,  ,कथा वाचकों के प्रवचन ,झूठी हैसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्र्ता को दूर करने के लिए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। जातिवाद व साम्प्रदायिक विद्वेष ,युद्ध का उन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि सम्मलेन बड़े उभार पर हैं । इन नव धनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथा वाचकों को खींच लाई है । विडम्बना है कि तबाह हो रहे तबके भी कुसंस्कृति के इस अंध उपभोगतावाद से छद्म ताकत पा रहे हैं ।
                     दूसर तरफ यदि गौर करेँ तो सेवा क्षेत्र में छंटनी और अशुरक्षा का आम माहौल बनता जा रहा है। इसके बावजूद कि विकास दर ठीक बताई जा रही है , कई हजार कर्मचारियों के सिर पर छंटनी कि तलवार चल चुकी है और बाकी कई हजारों के सिर पर लटक रही है । सैंकड़ों फैक्टरियां बंद हों चुकी हैं । बहुत से कारखाने यहाँ से पलायन कर गए हैं । छोटे छोटे कारोबार चौपट हों रहे हैं । संगठित क्षेत्र सिकुड़ता और पिछड़ता जा रहा है । असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हों रहा है । फरीदाबाद उजड़ने कि राह पर है , सोनीपत सिसक रहा है , पानीपत का हथकरघा उद्योग गहरे संकट में है । यमुना नगर का बर्तन उद्योग चर्चा में नहीं है ,सिरसा ,हांसी व रोहतक की धागा मिलें बंद हों गयी हैं । धारूहेड़ा में भी स्थिलता साफ दिखाई देती है ।
                शिक्षा के क्षेत्र में बाजार व्यवस्था का लालची व दुष्टकारी खेल सबके सामने अब आना शुरू हो गया है । सार्वजनिक क्षेत्र में साठ साल में खड़े किये ढांचों को या तो ध्वस्त किया जा रहा है या फिर कोडियों के दाम बेचा जा रहा है । शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर खिसकती जा रही है । शिक्षा के क्षेत्र में जहां एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किए जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों का खोलना एक अचीवमेंट के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकारी स्कूल की शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा  को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो ,चाहे वह उच्च शिक्षा हो, चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारी करण और पैसे के दम पर डिग्रियों का कारोबार बढ़ा है। दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियाओं की बाढ़ सी ला दी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढाया तो बिल्कुल भी नहीं है घटाया बेशक हो। इंस्टिट्यूट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारत खड़ी करके , मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्यप्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है। विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियां में यूजीसी की गाइडलाइन्स की धज्जियां उड़ाई जाती रही हैं और उड़ाई जा रही हैं  । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह संभव है। 

          स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल हुआ  है । गरीब मरीज के लिए सभी तरफ से दरवाजे बंद होते जा रहे हैं । लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीनें बेचनी पड़ रही हैं । आरोग्य कोष या राष्ट्रिय बीमा योजनाएं ऊँट के मुंह  में जीरे के समान हैं । उसमें भी कई सवाल उठ रहे हैं । स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की दखलअंदाजी बढ़ी है । एंपैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकार की स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी, डॉक्टरों की कमी, कहीं कुछ और कमियों के चलते घिसट रही हैं। गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एग्जीक्यूशन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं। प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरियाणा में लागू नहीं किया है, इसलिए कई प्राइवेट नर्सिंग होम की लूट दिनोंदिन अमानवीय रूप धारण करती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटल में सीटी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज योजना सैद्धांतिक तौर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी उसकी एग्जीक्यूशन बहुत धीरे चल रही है। इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटियों का प्रावधान नहीं रखा गया है। खून की कमी nfhs 4 के मुकाबले nfhs 5 में   गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है। इसी प्रकार कुपोषण बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज महंगा होता जा रहा है।

               अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाये । यह महानगरों तक नहीं सिमित रहा । अब तो शहर शहर , गली गली में मैकडोनाल्ड हमारे बच्चों को बर्गर ,पिज्जा फ्री के उपहार दे कर खाने की आदत डालेगा , रिझाएगा , फँसाएगा ताकि कल को वह पूरी , परांठा , इडली , डोसा भूल जाये और बर्गर ओइज्ज के बगैर रह ही नहीं पाए । आखिर बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे भारत देश में । पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति , कारीगरी, हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो । इसी प्रकार आज बाजार के लिए देश प्रदेश विशेष के हुनर , कारीगरी, व्यवसाय ,शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोल जा रहा है और हमारे मीडिया इस मामले में मल्टीनेसनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं । हरियाणा में अब गुनध्धा हुआ आट्टा , अंकुरित मूंग, चना आदि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगी । कूकीज , चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे । जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे । भारतीय कुटीर ऊद्योग के साथ साथ अन्य कम्पनियाँ भी मल्टीनेसनल के पेट में चली जायेंगी ।
सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है ? यदि नहीं तो इसके ठीक उल्ट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके नयायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है । उस विचार से नजदीक का सम्बन्ध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं । इसके बनाने के सब साधन इसी दुनिया में इसी हरियाणा में मौजूद हैं । जरूरत है उस नजर को विक्सित करने की । आज मानवता के वजूद को खतरा है । यह इस विचारधारा का या उस विचारधारा का मसला नहीं है । यह एक देश का सवाल नहीं है यह एक प्रदेश का सवाल नहीं है यह पूरी दुनिया का सवाल है । जिस रास्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रास्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है । हरियाणा के विकास मॉडल में भी यह साफ़ प्रकट हो रहा है । नव वैश्वीकरण की प्रक्रिया से विनाश ही होगा विकास नहीं । 

मगर अब दुनिया यह सब समझ रही है ।  हरियाणा वासी भी समझ रहे हैं । मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाडी के नीचे नहीं रखेगी । मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असंभव कर देगी । हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं । युवा लड़के लड़कियां, दलित, और महिलाएं इसके अगवा दस्ते होंगे और समाज सुधर का काम अपनी प्रगतिशील दिशा अवश्य पकड़ेगा।
आज के हरयाणा की चुनौतियां
हरयाणा प्रदेश ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2026 तक पहुंचा है । इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं । इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था इसके बनने के वक्त । उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई जिसने सड़कों का जाल बिछाया, बिजली गावों गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखि जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।
नए बीज, नए उपकरण, नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के एक हिस्से में हरित क्रांति ने क्षेत्र की खेती की पैदावार को बढ़ाया । वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती जा रही है । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं । हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ की राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे इंसान का विकास किया है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । इसके व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है ,चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो, चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो । इस अधखबडे व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक है और एक नवजागरण आंदोलन की अपेक्षा है। शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों  का खोलना एक अचीवमैंट के रूप में पेश किया जा रहा है वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है, चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विश्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो, हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है । दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । इंस्टीच्युट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है । विश्वविद्यालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है और समय इसकी मांग करता है ।
       स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी , डाक्टरों की कमी ,कहीं कुछ और कमियों के चलते ,घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से इलाज के रास्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती हैं । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी सर्वे दो के मुकाबले सर्वे तीन में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।
सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । कुछ भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी से हो रहा है । सकारात्मक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे, फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है । असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है, प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है । एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित  तबकों  द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है । दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद में गरीब किसान, मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।
नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी पी में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ? इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी ? नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ? जेंडर फ्रैंडली , ईको फ्रैंडली और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को कहा जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीति के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।
इन चुनौतियों से निपटने निपटने के लिए हरियाणा सरकार
  ययणा सरकार भविष्योन्मुखी नीतियां बनाने और सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए विभिन्न योजनाएं लागू करने पर गंभीरता से जोर देने की अपेक्षा है।, सिर्फ आर्थिक सर्वेक्षणों और सरकारी घोषणाओं से काम नहीं चलने वाला। ठोस जमीनी हस्तक्षेप की जरूरत है।
रणबीर सिंह दहिया
रिटायर्ड सीनियर प्रोफेसर , 
सर्जरी विभाग, पीजीआईएमएस रोहतक।