बुधवार, 15 जुलाई 2015

स्वामित्व के साथ बदलता मीडिया का चरित्र--- मुकेश कुमार

स्वामित्व के साथ बदलता मीडिया का चरित्र
मुकेश कुमार
देश में पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्राी पद पर क़ाबिज़ हो चुके हैं। ये कोई मामूली घटना नहीं है और इसे चुनाव में सिर्फ़ एक दल की हार और दूसरे की जीत के रूप में देखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इसने देश को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जो
उसे फासीवाद की ओर भी ढकेल सकता है और पूंजीवाद के नग्नतम रूप से उसका सामना भी करवा सकता है। अति दक्षिणपंथी राजनीति का इतना ताक़तवर होकर उभरना ख़तरनाक संकेत तो देता ही है, मगर ये इस बात का भी सबूत है कि बहुत सारी शक्तियां भी उसके साथ हैं जो उसे मज़बूती प्रदान कर रही हैं। इन शक्तियों में से एक मीडिया है और अब ये कोई छिपी हुई बात नहीं है। मीडिया ने इस आम चुनाव में एक अत्यधिक पक्षपातपूर्ण भूमिका निभाई और बड़ी निर्लज्जता के साथ निभाई। लेकिन मीडिया को अर्थव्यवस्था से अलग इकाई मानकर उसे कोसना तर्कसंगत नहीं है। ये ज़रूरी है कि उन शक्तियों की पहचान की जाये जो पीछे से उसको नियंत्रित-संचालित कर रही हैं, ताकि असली गुनाहगारों की शिनाख़्त की जा सके और उनसे ध्यान न हटे। वास्तव में सन् 2014 के चुनाव मीडिया के लिए कई तरह से महत्वपूर्ण रहे। पहली बार उसका चुनाव पर इतना व्यापक प्रभाव दिखा। ऐसा लगा मानो वही तय कर रहा हो कि किसकी सरकार बनेगी और कौन प्रधानमंत्राी होगा। चुनाव परिणाम साबित करते हैं कि सचमुच में उसकी भूमिका काफ़ी हद तक निर्णायक रही और उसने सबको अपना लोहा मानने के लिए विवश कर दिया। ये मीडिया युग के आने और छा जाने का प्रमाण है। लेकिन इससे भी बड़ी सचाई ये है कि वह अब लोकतंत्रा के चौथे स्तंभ के रूप में, जैसा कि अकसर प्रचारित किया जाता है, जनता की
इच्छाओं-आकांक्षाओं को अभिव्यक्त करने वाला उपकरण ही नहीं रह गया बल्कि जनमत के निर्माण का हथियार बन चुका है। उसने इतनी शक्ति प्राप्त कर ली है कि वह अब भावी प्रधानमंत्राी के निर्माण और स्थापना तक में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने लगा है। लेकिन उसकी ये बढ़ती ताक़त ढेर सारे प्रश्नों और आरोपों से घिरी हुई है। ये सवाल उसके चरित्रा और उद्देश्यों के संबंध में उठे और पूरी शिद्दत के साथ एक नहीं, सब तरफ़ से उठाये गये। इस बात का प्रमाण ये है कि पहले सिर्फ़ कम्युनिस्ट पार्टियां ही मीडिया के पूंजीवादी शक्तियों के हाथों में खेलने और उनके पक्ष में प्रचारक की भूमिका निभाने का आरोप लगाती थीं, जबकि इस बार लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उन्हीं की भाषा में मीडिया पर तीखे हमले किये। नवोदित आम आदमी पार्टी ने सबसे आक्रामक ढंग से मीडिया पर हमले करते हुए कहा कि वह कार्पोरेट जगत की कठपुतली है। मीडिया के पक्षपाती व्यवहार से प्रभावित दूसरे दलों की भी यही शिकायत रही कि वह पैसे की ताक़त के सामने नतमस्तक हो गया
है। जनता दल (यू) का तो यहां तक कहना था कि मीडिया अब पत्राकार नहीं, मालिक चला रहे हैं। और तो और कांग्रेस और बीजेपी ने भी, जो कि इस मीडिया का इस्तेमाल करके लाभ उठाती रही हैं, उस पर पक्षपात के आरोप जड़ दिये। बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्राी पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने तो एक नया जुमला ही उछाल दिया न्यूज़ ट्रेडर का। उन्होंने अपने इंटरव्यू में पत्राकारों को सीधे-सीधे न्यूजट्रेडर यानी ख़बरों का कारोबारी कहा, जिसका एक मतलब तो ये है कि मीडिया बिकाऊ है और उसे ख़रीदा जा सकता है। निश्चय ही इस पदावली को उन्होंने अपने अनुभवों से ही गढ़ा होगा और उसका इस्तेमाल वे पत्राकारों का मुंह बंद करने के लिए कर रहे थे। लेकिन असली बात ये नहीं है बल्कि ये है कि मीडिया की न साख है और न धार, क्योंकि वह न्यूजट्रेडर शब्द के इस्तेमाल पर कोई आपत्ति तक दर्ज नहीं करवा सका। ये उसके घटते आत्मविश्वास और गुलाम तथा आतंकित मानसिकता का भी परिचायक था। सवाल उठता है कि आखि़र ये नौबत क्यों आयी। उसकी हालत सड़क पर पड़े उस कुत्ते की तरह क्यों हो गयी जिसे हर आता-जाता लात मारकर आगे बढ़ जाता है। इसका जवाब जब हम ढूंढ़ने जायेंगे तो पायेंगे कि कहीं न कहीं इसकी तह में मीडिया का बदलता स्वामित्व है। मीडिया को चलानेवाली पूंजी और उस पूंजी को नियंत्रित करने वाले लोग तय कर रहे हैं कि मीडिया की भूमिका क्या होगी। अगर आम चुनाव का ही उदाहरण लें तो सोचना चाहिए कि क्यों मीडिया की मोदी-भक्ति के संदर्भ में बार-बार कार्पोरेट जगत का नाम लिया जा रहा था। क्यों ये कहा जा रहा था कि मीडिया अगर मोदी के अभियान का सक्रिय सहयोगी बन गया था तो इसकी वजह ये थी कि पूरा कार्पोरेट जगत चाहता था कि वे प्रधानमंत्राी बनें। वह कार्पोरेट जगत के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा था, क्योंकि उसकी लगाम उसके हाथों में थी। अगर पिछले छह महीनों के मीडिया कंटेंट का अध्ययन किया जायेगा तो साफ़ हो जायेगा कि वह किस कदर मोदी के पक्ष में झुका हुआ था। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ (सीएमएस) द्वारा जारी किये गये आंकड़े इसकी बानगी पेश करते हैं। सीएमएस ने पांच चैनलों के प्राइम टाइम के कवरेज में विभिन्न नेताओं की हिस्सेदारी के आंकड़े देते हुए बताया कि राहुल गांधी के मुक़ाबले मोदी को पांच गुना अधिक कवरेज मिला जबकि अरविंद केजरीवाल की तुलना में ये अनुपात सात गुना था। हालांकि इन आंकड़ों में कंटेंट का रूप-रंग नज़र नहीं आता। अगर वह देखा जा सकता तो पता चलता कि मोदी का कवरेज किस कदर महिमागान से सराबोर था और उनके प्रतिद्वंद्वियों का दुराग्रहों से भरा हुआ। यही नहीं, इन पांच चैनलों में हिंदी के वे तीन कुख्यात चैनल शामिल ही नहीं थे जिन्होंने निर्लज्जता की तमाम सीमाएं लांघते हुए मोदी के प्रोपेगंडा का काम किया।
चुनाव के दौरान मीडिया में कार्पोरेट जगत के खेल का खुलासा मोदी के प्रधानमंत्राी पद ग्रहण करने के एक पखवाड़े के अंदर ही हो गया जब मुकेश अंबानी द्वारा स्थापित इंडिपेंडेंट मीडिया ट्रस्ट ने नेटवर्क 18 और टीवी 18 समूह का अधिग्रहण कर लिया। ये भारत में मीडिया इतिहास का सबसे बड़ा कार्पोरेट अधिग्रहण था और इसे सबसे बड़ा गेम चेंजर बताया जा रहा है। इस अधिग्रहण के बाद संस्थान से मोदी विरोधी पत्राकारों की विदाई की ख़बरें भी मीडिया जगत में फैल गईं, जो कि मोदी समर्थक उद्योगपति की भावी रणनीति का एक स्वाभाविक क़दम कहा जा सकता है। लेकिन इस मीडिया घराने के चरित्रा पर अंबानी का दबाव पहले से ही दिखने लगा था, क्योंकि 2200 करोड़ रुपए का निवेश करके उन्होंने पहले से पकड़ बना ली थी। लेकिन ये केवल नेटवर्क 18 और टीवी 18 समूह की कहानी ही नहीं है। तमाम बड़े चैनलों में कार्पोरेट हिस्सेदारी है और वह लगातार बढ़ रही है। कई उद्योगपति तो सीधे-सीधे अपने मीडिया संस्थान शुरू कर चुके हैं। नवीन जिंदल का मीडिया वेंचर इसकी ताज़ा मिसाल है। दूसरी ओर ये भी ध्यान में रखना चाहिए कि जिन मीडिया संस्थानों में सीधी कार्पोरेट भागीदारी नहीं है, उनमें से कुछ तो ख़ुद ही कार्पोरेट में तब्दील हो चुके हैं, यानी उनका चरित्रा भी वही हो गया है जो कार्पोरेट भागीदारी वाले संस्थानों का है। स्वामित्व का दूसरा रूप हमें उन मीडिया संस्थानों में देखने को मिलता है जो अपने धंधों पर परदा डालने, उन्हें सुरक्षा कवच प्रदान करने या फिर अपने दूसरे कारोबार को बढ़ावा देने के लिए करते हैं। ये तो सभी को पता है कि मीडिया का कारोबार बेहद जोखिम वाला है और 95 प्रतिशत मीडिया संस्थान घाटे में चल रहे हैं। इस तथ्य को जानते हुए भी अगर लोग मीडिया कारोबार में उतर रहे हैं तो सीधे-सीधे मुनाफ़े के लिए नहीं बल्कि ऊपर बताये गये लाभों के लिए। इसीलिए हम पाते हैं कि ज़्यादातर मीडिया संस्थानों के पीछे चिट फंड कंपनियां या बिल्डर हैं। उन्हें साल में सौ-पचास करोड़ रुपए इस तरह बहाने में भी लाभ ही नज़र आता है। फिर मीडिया संस्थान काले धन को सफेद करने के काम में बरसों से आता रहा है। बहुत से कारोबारी, जिनमें अपराधियों से लेकर साधु-संत और हवाला कारोबारी तक शामिल हैं, इसी तरह इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। मीडिया में स्वामित्व का तीसरा स्वरूप राजनीतिक है, यानी नेता और राजनीतिक दल अघोषित रूप से मीडिया का इस्तेमाल अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए करते हैं। दक्षिणी राज्यों में और ख़ास तौर पर तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में ये खूब देखा जा सकता है। ऐसे मीडिया संस्थान पूरी तरह से एकपक्षीय होते हैं, उनसे निष्पक्ष सामग्री की अपेक्षा करना ही छलावा है। यहां ये स्पष्ट करना शायद ठीक होगा कि ऊपर से अलग दिखने वाले स्वामित्व के बावजूद सबका मूल चरित्र एक ही है और वह है एक वर्ग विशेष के स्वार्थों को पूरा करना। इन सबका संबंध बाज़ार से है और कार्पोरेट के हितों से वे भी संचालित होते हैं। ये बुनियादी रूप से उन आर्थिक नीतियों के पक्षधर होते हैं जो मेहनतकश वर्ग के शोषण पर आधारित हैं। कहने का मतलब ये है कि मीडिया का धंधा बेहद गंदा हो चुका है। उसमें हम तरह-तरह की जो गंदगियां देखते हैं, वे स्वामित्व के उक्त प्रकारों के कारण ही हैं। उसी ने उसका चरित्रा, जो कि मूल रूप से वही था, और भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। पेड न्यूज़ की बात हम पिछले एक दशक से कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में आज का मीडिया पेड मीडिया हो चुका है जिसका घोषित उद्देश्य चाहे जो हो, मगर वास्तव में वह जन विरोधी है। ज़ाहिर है कि वह लोकतंत्रा विरोधी भी हो चुका है। अकसर कहा जाता है कि भले ही विभिन्न मीडिया संस्थान किसी के पक्षधर रहें, मगर उनकी विविधता और आपसी प्रतिस्पर्धा की वजह से सच सामने आ ही जाता है, साथ ही उन पर एक तरह का चेक एवं बैलेंस भी कायम रहता है। मगर वास्तव में ऐसा हो नहीं रहा, क्योंकि तमाम मीडिया संस्थान अब मूल रूप से एक ही तरह के सोच वाले हो गये हैं और उनके उद्देश्य भी एक हैं और वे हैं शासक वर्ग के स्वार्थों की सिद्धि। यही वजह है कि हम हर अख़बार और चैनल को उन आर्थिक नीतियों का प्रचारक पाते हैं जो खुली बाज़ार व्यवस्था की वकालत करते हैं। कोई भी किसानों और मज़दूरों की समस्याओं और उनके हक़ों की बात नहीं करता। ग़रीबी, बेरोज़गारी और आर्थिक विषमता की किसी को परवाह ही नहीं है। मीडिया में दबे-कुचले वर्ग
की आवाज़ सुनाई ही नहीं पड़ती, उनके चेहरे दिखलाई ही नहीं पड़ते। उन्होंने उस शहरी मध्यमवर्ग को अपना टारगेट बना रखा है जो उनका उपभोक्ता भी है और नीति निर्धारण में जिसकी मुखरता निर्णायक भूमिका अदा करती है। मीडिया का हिंदुत्ववादी हो जाना भी इसी का नतीजा है। कार्पोरेट पूंजी के बढ़ते नियंत्राण के प्रभाव हमें आने वाले समय में और भी तरह से दिखेंगे। अधिग्रहण और विलय की जो प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और जिसे कार्पोरेट जगत कंसोलिडेशन का नाम दे रहा है, वह अंतत छोटे मीडिया संस्थानों को निगल जायेगी। कुछ दैत्याकार कार्पोरेशन होंगे जो अपने स्वार्थों के हिसाब से मीडिया का चरित्रा तय करेंगे। अमेरिका और यूरोप में मीडिया उद्योग इस दौर से बहुत पहले गुज़र चुका है और वहां के मीडिया के चरित्रा को देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारत में उसका भविष्य क्या है। अभी तक भारत में विदेशी पूंजी को मीडिया क्षेत्रा में सौ फ़ीसद निवेश की छूट नहीं है। केवल मनोरंजन चैनलों और वितरण में ऐसा हो सकता है। समाचार के क्षेत्रा में केवल छब्बीस प्रतिशत विदेशी निवेश की ही इजाज़त है। लेकिन पूरी आशंका है कि भारत सरकार आने वाले समय में मीडिया को पूरी तरह से विदेशी पूंजी के लिए खोल देगी। इसका स्वाभाविक परिणाम ये होगा कि मीडिया पर
विदेशी नियंत्राण का रास्ता खुल जायेगा। इससे भारत को अपने हिसाब से चलाने के इच्छुक देशों को
एक नया हथियार मिल जायेगा।
        ये बात ध्यान में रखने की है कि मीडिया के बदलते स्वामित्व ने स्वस्थ पत्राकारिता की संभावनाओं को नष्ट कर डाला है। पत्राकारों की स्वायत्तता और स्वतंत्राता लगभग ख़त्म हो चुकी है। अख़बारों और न्यूज़ चैनलों में संपादक नामक संस्था को पूरी तरह से बदल दिया गया है, उन्हें प्रबंधक बना दिया गया है। पत्राकारों के लिए भी अच्छा काम करने की गुंजाइश न के बराबर रह गयी है। अनुबंध पर रखे जाने और आये दिन होने वाली छंटनियों ने उन्हें पूरी तरह से असुरक्षित कर दिया है। उन्हें मज़बूर कर दिया है कि वे स्वामित्व के एजेंडे के लिए ही काम करें। सत्ता प्रतिष्ठान की नीतियों को बेनकाब करने वाली रिपोर्टिंग अब बहुत कम हो गयी है। आर्थिक अपराधों की ओर तो ख़ैर मीडिया देखता ही नहीं है। कुल मिलाकर पूरा वातावरण ऐसा बना दिया गया है जिसमें वही संभव है जो स्वामित्व के हितों को साधता हो।
नया पथ से साभार 

चुनावी जनादेश के सात आयाम अभय कुमार दुबे

चुनावी जनादेश के सात आयाम
अभय कुमार दुबे 
सोलह मई को सोलहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजे घोषित हुए और अट्ठारह मई को हिंदुस्तान टाइम्स समूह के वित्तीय समाचारपत्र ‘मिंट’ के पहले पन्ने पर उसके नियमित स्तम्भकार मानस चक्रवर्ती ने इन परिणामों का अर्थ-ग्रहण करते हुए ‘इलेक्शन रिज़ल्ट: अ वक्ट्री फ़ॉर इंडियन कैपिटलिज़्म’ शीर्षक के तहत टिप्पणी की। मानस ने दावा किया कि कांग्रेस सरकार स्पष्ट वामपंथी रुझान वाली लोकोपकारी नीतियों (जैसे भूमि अधिग्रहण नीति और विभिन्न सबसिडियों) के साथ-साथ आर्थिक ‘सुधारों’ (जैसे ख़ुदरा क्षेत्र को विदेशी निवेश के लिए खोलना) की प्रक्रिया आगे बढ़ाने का रास्ता अपना रही थी। सरकार अपनी इस ‘खंडितमनस्कता’ के कारण न तो अपनी लोकोपकारी योजनाओं के लिए संसाधन जुटा पायी और न ही आर्थिक वृद्धि के लिए ज़रूरी निवेश का इंतजाम कर सकी। नतीजा यह निकला कि आपूर्ति संबंधी गतिरोध नहीं हटाये जा सके और
मुद्रास्फीति तेज़ी से बढ़ती चली गयी। संकट में फंस जाने के कारण सरकार ने उद्योगपतियों और व्यापारियों को अधिक कर देने के लिए मज़बूर किया। इस रवैये के कारण कॉरपोरेट शक्तियां नरेंद्र मोदी के पक्ष में उत्तरोत्तर गोलबंद होती चली गईं। लेकिन, भारतीय जनता पार्टी की निर्णायक जीत केवल पूंजीपति वर्ग की इच्छा से ही संभव नहीं थी। आम मतदाताओं की मर्ज़ी से ही ऐसा परिणाम निकल सकता था। मानस चक्रवर्ती ने अपने इस विश्लेषण से तीन निष्कर्ष निकाले: भारतीय राजनीति वामोन्मुख से दक्षिणोन्मुख हो गयी है, नरेंद्र मोदी की जीत ने पूंजीवाद के लिए भारत को एक सुरक्षित जगह बना दिया है और भारतीय मतदाताओं ने जाति-समुदाय-धर्म के आधार पर वोट न दे कर विकास के नाम पर मुहर लगायी है।
             ध्यान रहे कि हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार का समर्थन करने वाला मीडिया-हाउस नहीं है। इसका मालिकाना बिड़ला घराने के हाथ में है और वह आम तौर पर कांग्रेसी रुझान वाला माना जाता है। लेकिन, इससे पहले कि हम मानस चक्रवर्ती के निष्कर्षों को तथ्यों की कसौटी पर कसें, चुनावी राजनीति के एक अधिक विद्वत्तापूर्ण अर्थ-ग्रहण पर नज़र डाल लेना ठीक रहेगा। परिणाम आने से ठीक पहले विकासशील समाज अध्ययन पीठ के विद्वान आदित्य निगम ने
मीडिया पर विशेष सामग्री ‘प्रतिमान 03’ में प्रकाशित अपने लेख में लंबे समय तक चलने वाली चुनाव मुहिम के भीतर काम कर रहे विचार-तंत्रों की चर्चा करते हुए कहा था: दीन-दुनिया से बेख़बर अपनी रोज़ाना जिंदगी जी रहे लोग जनता नहीं होते। तब, उस स्थिति में, मुमकिन है, वे किसी अन्य सामाजिक पहचान के ज़रिये अपना परिचय देते हों, मगर एक व्यापक सियासी पहचान तभी बनती है जब उसका आह्वान होता है। यह आह्वान, बकौल लुई अलथुसे, न नेता करता है, न उसके मुरीद बल्कि विचार-तंत्रा करता है। यह विचार-तंत्रा राष्ट्रवाद का हो सकता है, समाजवाद या फ़ासीवाद का भी हो सकता है। इस अर्थ में अगर नरेंद्र मोदी के हालिया उभार को एक मिसाल के तौर पर देखें तो शायद बात बेहतर समझ आये। मोदी का अचानक ख़ुद की पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की इच्छाओं के बावजूद तेज़ी से उभर कर सामने आना न तो मोदी के अपने किये के हवाले से समझा जा सकता है और न ही किसी अमूर्त जनता की मांग के हवाले से। ख़ुद मोदी, उनकी क़तारें और उनकी जनता दरअसल एक ही विचार-तंत्रा की डोर में बंधे हैं जिसका नाम हिंदुत्व है और जिसकी नींव पिछली सदी के शुरुआती दशकों में डाली गयी थी। मगर फ़क़त उस जनता के आधार पर मोदी का राष्ट्रीय फलक पर असर डालना सम्भव न होता। उसके लिए ज़रूरत थी एक अन्य जनता की जिसके लिए एक अन्य विचार-तंत्र-विकासवाद को हरकत में लाया गया। मोदी विकास-पुरुष के रूप में खड़े किये गये। यह खड़ा किया जाना भी न तो मोदी का ख़ुद का किया-धरा है, न उनकी पार्टी का, बल्कि उस नवउदारतावादी जमात का है जिसे सरमायेदार
घरानों का समर्थन हासिल है। मगर इसी बीच आम आदमी के पदार्पण ने अन्य आह्वान पैदा किया जिसके
जवाब में चायवाला, सेवक या चौकीदार जैसे शब्द उछाले गये। अब दो अलग क़िस्म के आह्वानों का नतीजा
दो अलग लामबंदियों में देखा जा सकता है जिनमें वर्चस्व की लड़ाई का चलना लाजमी है।
           आम आदमी पार्टी के उभार को समझने के लिए हमें एक और बात ध्यान में रखनी होगी। यह एक बिलकुल नया हस्तक्षेप था/है, जिसका विचार-तंत्रा के स्तर पर कोई साफ़ पिछला इतिहास, कम से कम पहली नज़र में तो दिखाई नहीं पड़ता। मगर ऐसा भी नहीं है कि यह आंदोलन बिलकुल ही स्वयम्भू था। ग़ौर करें तो
ख़ुद हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में ऐसी राजनीति-विमुख धाराएं रही हैं जो विचार के स्तर पर हमेशा
धड़कती रही हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर का ख़याल तो अनायास आता ही है, मगर यहां सबसे मज़बूत हाज़िरी
तो गांधी की है जो राजनीति में रह कर भी हमेशा उससे अपनी दूरी बनाये रखते थे। इसी तरह मानवेंद्र
नाथ राय का रैडिकल डेमोक्रैसी का तसव्वुर या 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण का दल-विहीन जनतंत्रा
का विचार इस बात की ओर इशारा करते हैं कि हमारे मुल्क में राजनीति की आलोचना के कई महत्त्वपूर्ण
उपादान मौजूद हैं। मगर शायद इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि पिछले समय में जिस तरह राजनीति
का दिवाला निकला है और सिरे से तमाम पार्टियां जनता की लूट में शरीक दिखाई दी हैं, उसने एक नये
क़िस्म के विमर्श की ज़मीन तैयार की जिसकी एक बानगी ‘रंग दे बसंती’ जैसी फ़िल्म में देखने को मिलती
है। याद रहे कि इसी जमाने में जेसिका लाल की एक सांसद-पुत्रा द्वारा हत्या के बाद उसका रिहा हो जाना
एक नायाब आंदोलन को जन्म दे चुका था जिसमें राजनीति से कोसों दूर रहने वाले नौजवान बड़ी तादाद
में हरकत में आये थे। एक तीसरी और बहुत महत्त्वपूर्ण धारा उस सियासत की है जो सूचना के अधिकार
को लेकर चल रहे आंदोलन से निकलती है जिसके ज़रिये इसी दरमियान कई छोटे-बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश
हुआ। आहिस्ता-आहिस्ता इन घोटालों का दलीय राजनीति से गहरा रिश्ता लोगों के सामने आने लगा। कहा
जा सकता है कि इस तरह, नये आंदोलनों की ऊर्जा और पुरानी दलेतर राजनीति का ख़याल अरविंद
केजरीवाल जैसी शख़्सियत के रूप में एक जगह इकट्ठा होने लगा। यह एक नया आह्वान था जिसमें एक
अलग क़िस्म का विचार-तंत्रा वजूद में आ रहा था। यह एक जवाबदेह और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन की मांग
के इर्द-गिर्द उभरता प्रत्यक्ष जनतंत्रा का दावा करता विचार-तंत्रा था। मगर इसकी शक़्ल-सूरत साफ़ नहीं थी।
मगर यही इसकी सबसे बड़ी ताक़त थी। एक बार फिर लक्लाऊ की शब्दावली में कहें तो यह एक रिक्त
प्रतीक (एम्प्टी सिग्निफ़ायर) था जिसमें लोग अपने हिसाब से अर्थ भर लेते हैं। भ्रष्टाचार इस क़लाम का
मूल पद है जिसका सीधा रिश्ता सूचना-अधिकार के आंदोलन से है मगर जिसके सम्भावित अर्थ हैं। जिस
तरह से अपने पहले चरण में यानी अन्ना आंदोलन के चरण में इस आंदोलन ने तकरीबन समाज के हर
तबक़े से समर्थन हासिल किया, उससे भी इस बात की पुष्टि होती है कि एक रिक्त प्रतीक के रूप में
उसका चरित्रा ही उसके व्यापक जनसमर्थन के लिए ज़िम्मेदार था।
             मानस चक्रवर्ती के साथ-साथ आदित्य निगम के इस लंबे उद्धरण का तात्पर्य यह दिखाना है कि चुनाव नतीजों की पत्राकारीय समीक्षा और समाज-वैज्ञानिक विश्लेषण के बीच क्या-क्या समानताएं और क्या-क्या भिन्नताएं हैं। कॉरपोरेट शक्तियों की कारस्तानी और विकास का आग्रह दोनों जगह समान है, पर मानस
जिसे मतदाताओं की तरफ़ से किया जाने वाला विकास का आग्रह कहते हैं, वह आदित्य के लिहाज से पहले से मौजूद एक ऐसा विचार-तंत्रा है जिसे नियोजित ढंग से कॉरपोरेट शक्तियों द्वारा सक्रिय किया गया। दूसरे, मानस के विश्लेषण में मोदी को जिताने वाले विचार-तंत्रा और ताक़तों की तरफ़ तो इशारा मिलता है, पर उसके मुक़ाबले खड़े विचार-तंत्र के रूप में वे केवल कांग्रेस और उसकी ‘खंडित मानसिकता ’ ही पेश करते हैं जो उनके लिहाज से अपनी आर्थिक विफलता के कारण पराजित होने के लिए अभिशप्त थी। जबकि आदित्य कांग्रेस की नुमाइंदगी वाले इस विचार-तंत्रा को मोदी के मुक़ाबले में देखते ही नहीं। मोदी के विपक्ष में वे उस विचार-तंत्रा को रखते हैं जिसकी नुमाइंदगी आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल कर रहे थे और जिसके मर्म में था लोकतंत्र के मौजूदा ढांचे की आलोचना करने वाला भ्रष्टाचार नामक रिक्त प्रतीक जिसे जनता ने अपने समर्थन से भर दिया था।
 तथ्यात्मक कसौटी: जनादेश के पांच आयाम
आइये, देखें कि ये समीक्षाएं तथ्यों की कसौटी पर कितनी खरी उतरती हैं। अध्ययन पीठ द्वारा किये गये चुनाव उपरांत सर्वेक्षण के आंकड़ों के आधार पर भाजपा को मिले जनादेश से संबंधित पांच महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर रोशनी पड़ती है। पहला आयाम इस जनादेश के एक अनुमानित क़िस्म के सामाजिक चरित्र पर रोशनी डालता है। इसके मुताबिक़ जनादेश का पचास प्रतिशत से अधिक हिस्सा समाज में ऊंची जाति के समुदायों (ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, कायस्थ और भूमिहार) के मतों से मिल कर बनता हुआ दिखायी देता है। उत्तर भारत में तो इस बार समाज के इन मज़बूत समुदायों ने अभूतपूर्व रूप से अस्सी से नब्बे फ़ीसद ध्रुवीकरण प्रदर्शित किया जो इन समुदायों के इतिहास में अभूतपूर्व है। जनादेश का तक़रीबन तीस फ़ीसद हिस्सा पिछड़े समुदायों के वोटों से निर्मित हुआ लगता है। भाजपा का समर्थन करने वाले इन पिछड़े समुदायों में उत्तर भारत की विशाल यादव जाति ग़ैर-हाजिर है। बाकी पंद्रह-सोलह फ़ीसद जनादेश की रचना में दलित समुदायों का योगदान प्रतीत होता है। भाजपा का समर्थन करने वाले दलितों में जाटव समुदाय (जो उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा दलित समुदाय है) की संख्या नाममात्रा की ही है। बचे हुए चार-पांच प्रतिशत में अल्पसंख्यक समुदाय और अन्य फुटकर वोट आते हैं। यानी पिछड़े और दलित मोटे तौर पर ग़ैर-यादव और ग़ैर-जाटव हैं। गुजरात में भाजपा को लगभग 18 फ़ीसद अल्पसंख्यक वोट मिलते हुए दिखायी देते हैं, पर बाकी देश में चुनाव जीतने वाली पार्टी मुसलमानों के मतों के संदर्भ में कोई विशेष प्रगति करती हुई नहीं दिखती।
                चुनाव नतीजों का दूसरा पहलू यह है कि भाजपा महज 31.1 फ़ीसद और उसके नेतृत्व वाला राष्ट्रीय
जनतांत्रिक गठजोड़ (राजग) केवल 38.7 प्रतिशत वोटों के साथ 331 सीटें जीतने में कामयाब हो गया, जबकि बाकी बचे 61.3 प्रतिशत वोटों के बदले संसद में केवल 214 प्रतिनिधि ही पहुंच पाये। लेकिन इससे पहले कि वोटों के ये आंकड़े हमें भाजपा की जीत के सीमित चरित्रा को रेखांकित करने की तरफ़ ले जायें, हमें यह देखना भी नहीं भूलना चाहिए कि इस पार्टी ने लोकसभा की सभी सीटों पर चुनाव नहीं लड़ा था। वह जितनी सीटों पर लड़ी, अगर उन्हीं का हिसाब लगाया जाये तो भाजपा के वोट चालीस फ़ीसद के पार चले जाते हैं। अर्थात भाजपा की जीत औसतन आज़ादी के बाद हुई कांग्रेस की जीतों के बराबर ही बैठती है। भाजपा के पक्ष में जनादेश का चरित्रा तय करने वाला तीसरा तथ्य यह है: गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गोवा, बिहार, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली में भाजपा 256 सीटों पर लड़ी जिसमें उसे असाधारण रूप से 241 सीटंे मिल गयीं। यानी राजनीतिक रूप से यह जनादेश मुख्यतः उत्तर भारत, मध्य भारत और पश्चिम भारत के प्रभुत्व वाला जनादेश है। इसमें दक्षिण, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत की उपस्थिति बहुत कम है। 
                         चौथी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा का समर्थन करने वाले मतदाताओं में स्त्रिायों की संख्या पुरुषों के मुक़ाबले कम है। औरतें अभी भी कांग्रेस को ज़्यादा पसंद करती हैं। पांचवीं अहम बात यह है कि मतदाता जैसे-जैसे ऊंची शिक्षा की तरफ़ बढ़ते जाते हैं, वैसे-वैसे वे कांग्रेस के पाले से निकल कर भाजपा के पाले में आ जाते हैं।
दो विश्लेषणात्मक आयाम: 
जाति राजनीति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
अध्ययन पीठ के चुनाव-पश्चात सर्वेक्षण के परे जा कर तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाये तो एक मानीख़ेज़ पहलू और सामने आता है। हालांकि यह पहलू बहुत व्यापक है, पर सुविधा के लिए हम यहां केवल दलित राजनीतिक हितों की नुमाइंदगी करने वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के चुनाव परिणामों पर चर्चा कर लेते हैं। अभी सात साल पहले उत्तर प्रदेश में एक तरह की सामाजिक-राजनीतिक क्रांति का श्रेय लूटने वाली यह पार्टी पूरे देश में 4.2 प्रतिशत वोट हासिल करने के बावजूद एक भी निर्वाचन क्षेत्रा में चुनाव नहीं जीत सकी। इसके विपरीत तृणमूल कांग्रेस को केवल 4.8, अन्ना द्रविड़ मुनेत्रा कषगम (अन्नाद्रमुक) को 3.3 और बीजू जनता दल (बीजद) को केवल 1.7 फ़ीसदी वोट मिले, लेकिन इन पार्टियों ने क्रमशः 34, 37 और 20 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल कर ली। इस विसंगति की एक मोटी-मोटी सफ़ाई इस आधार पर दी जा सकती है कि तृणमूल, अन्नाद्रमुक और बीजद का समर्थन आधार क्षेत्रा-विशेष में केंद्रित है, जबकि बसपा का आधार पूरे देश में बिखरा हुआ है। लेकिन, अगर यह दलील पूरे देश के मामले में ठीक है तो उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ठीक क्यों नहीं है? जिस तरह तृणमूल, अन्नाद्रमुक और बीजद का आधार क्रमशः पश्चिम बंग, तमिलनाडु और ओडीशा में केंद्रित है, उसी तरह बसपा का आधार उप्र में केंद्रित माना जाता है जहां उसे बीस फ़ीसद वोट मिले। लेकिन इतने वोट उसका खाता खुलवाने के लिए काफ़ी साबित नहीं हुए। प्रश्न यह है कि बसपा को उत्तर प्रदेश में समाज के दलितों के अलावा अन्य तबक़ों, समुदायों और जातियों ने वोट क्यों नहीं दिये? ऐसी बात नहीं कि समाज के ये हिस्से बसपा को स्थायी रूप से नापसंद करते हों। इन वोटों के समर्थन से ही 2007 में बसपा ने उत्तर प्रदेश में केवल
अपने दम पर बहुमत जीता था। बसपा जैसी ही स्थिति उत्तर भारत की कुछ अन्य समुदाय आधारित पार्टियों की हुई। उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल-एकीकृत भी इसी गति को प्राप्त हुए। बिहार में लंबे अरसे से विपक्ष की राजनीति कर रही एक अन्य समुदाय आधारित पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के वोटों में कुछ प्रगति तो हुई, पर वह नरेंद्र मोदी की बढ़त रोकने में नाकाम रहा। दरअसल, इन सभी उत्तर भारतीय दलों को अपनी सामुदायिक पूंजी के अलावा कहीं और से बड़ा समर्थन नहीं मिला। जबकि दक्षिण भारत और पूर्वी भारत के क्षेत्राीय दल समर्थन-आधार के लिहाज से इतने संकीर्ण और एकांगी साबित नहीं हुए। उत्तर के प्रांतीय दलों और दक्षिण व पूर्व के क्षेत्राीय दलों के बीच की यह तुलना जनादेश के चरित्र में एक छठा आयाम जोड़ती है। यह आयाम मुख्यतः विश्लेषणात्मक है और बताता है कि किसी एक राज्य में सीमित समर्थन-आधार वाले दलों को एक पलड़े में तौल कर क्षेत्राीय करार देना एक त्राुटिपूर्ण विश्लेषणात्मक परिप्रेक्ष्य को जन्म दे सकता है। उत्तर भारत की प्रांतीय पार्टियां असल में किसी तरह की क्षेत्रीय -सांस्कृतिक-भाषाई विशिष्टता की वाहक नहीं हैं। वे महज़ एक समुदाय की पार्टियां बन कर रह गयी हैं। उनके बारे में एक सरलीकृत समझ यह है कि वे पिछड़े या दलित समुदाय की पार्टियां हैं, लेकिन वास्तव में वे पूरे दलित और पूरे पिछड़ों की नुमाइंदगी भी नहीं कर पाती हैं। दरअसल, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल मुख्यतः यादव-पार्टियां हैं और बसपा जाटव-पार्टी है। इन तीनों का राजनीतिक आचरण दलित और पिछड़े समुदायों के अन्य छोटे हिस्सों की स्थायी निष्ठाएं अपनी ओर खींचने के बजाय उन्हें दूर धकेलने वाला है। इसीलिए भाजपा ग़ैर-यादवों और ग़ैर-पिछड़ों के लिए आकर्षक बन गयी है। पंद्रह-बीस साल में अथवा यदाकदा एक मौका ऐसा आता है जब इन पार्टियों को स्थानीय कारणों से दूसरे समुदाय तत्कालीन सरकार के खि़लाफ़ गहरी नाराज़गी के कारण अपना नकारात्मक समर्थन दे देते हैं। लेकिन इनके पास एक मंच पर खड़े हो कर पूरे प्रदेश को संबोधित करने वाली कोई आवाज़ नहीं होती। इसके उलट  क्षेत्रीय -सांस्कृतिक-भाषाई विशिष्टता किसी पार्टी को जातीय अस्मिता की राजनीति करने की तरफ़ ले जाती है जिसके बल पर क्षेत्राीय दल तथाकथित राष्ट्रीय लहरों के थपेड़े खा कर भी अपने पैरों
पर खड़े रह पाते हैं। 
नरेंद्र मोदी को मिले जनादेश से जुड़ा हुआ सबसे पेचीदा सवाल यह है कि क्या यह एक सांप्रदायिक जनादेश है? चुनाव मुहिम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उत्साहपूर्ण भागीदारी, मोदी का अतीत यानी 2002 में गुजरात का अल्पसंख्यक विरोधी नरसंहार, उत्तर प्रदेश में अमित शाह द्वारा दिया गया ‘बदला लेने का समय’ वाला कुख्यात भाषण और भाजपा के वोटों में अल्पसंख्यकों की बहुत कम हिस्सेदारी का स्थापित तथ्य हमारे सामने एक प्रलोभन परोसता है कि हम इस जनादेश को सांप्रदायिक क़रार दे दें। यह प्रलोभन उस समय और भी आकर्षक हो जाता है जब भाजपा का वोट-समीकरण ‘हिंदू वोट’ की तरह दिखता है। उत्तर प्रदेश में इस पार्टी को मिली अभूतपूर्व 71 सीटों की अंतर्कथा टटोलने पर यह भी दिखता है कि प्रांत के कई इलाक़ों में वोटों की प्रतिक्रियात्मक सांप्रदायिक गोलबंदी हुई थी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन प्रेक्षणों के आधार पर भाजपा के पक्ष में जुटा ‘हिंदू वोट’ सांप्रदायिक करार दिया जा सकता है? यह एक तथ्य है कि समीक्षित चुनाव से पहले इस देश में या उत्तर भारत में न तो रामजन्मभूमि आंदोलन जैसी कोई मुहिम चल रही थी, और न ही हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा किसी तरह की व्यापक सांप्रदायिक गोलबंदी की रणनीति के आधार पर राजनीति की जा रही थी। उत्तर प्रदेश का सांप्रदायिक माहौल ज़रूर ख़राब था, लेकिन अगर सिर्फ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुज़फ़्फ़रनगर की मुसलमान विरोधी हिंसा  पर ही नज़र डालें तो स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा विरोधी पार्टियां सांप्रदायिक सद्भाव के रक्षक की भूमिका निभाने के बजाय सांप्रदायिकताओं का खेल करने में लगी हुई थीं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की घटनाओं में अपने हाथ की तीखी सार्वजनिक आलोचना होते देख कर और इस डर से कि लंबे अरसे से समर्थन दे रहे मुसलमान मतदाता कहीं नाराज़ न हो जायें, समाजवादी पार्टी चुनाव से ठीक पहले बड़े पैमाने पर उस मुहिम पर निकल पड़ी जिसे भाजपा ‘तुष्टीकरण’ की संज्ञा देती है। उसके मंत्रिमंडल में और राज्य-मंत्रियों के दर्जे वाली लंबी-चौड़ी सूची में मुसलमान नामों की संख्या असाधारण रूप से बढ़ती चली गयी। यह प्रक्रिया यहीं नहीं रुकी, बल्कि सेकुलर चरित्रा वाली लोकोपकारी योजनाओं (जैसे, बेटियों को दिया जाने वाला शिक्षा-धन वग़ैरह) की भी सरकार ने ‘कम्युनल टारगेटिंग’ की। इसका समाजवादी पार्टी के स्थायी यादव समर्थन आधार ने भी बुरा माना।
             विडंबनापूर्ण नतीजा यह निकला कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ हिंसा न रोक पाने वाली सरकार की छवि ‘मियां भाइयों की तरफ़दारी करने वाली सरकार’ जैसी बन गयी और इसकी प्रतिक्रिया में विभिन्न जातिगत समुदाय ख़ुद को ‘हिंदू श्रेणी’ में देखने लगे। इस परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा तैयार बैठी थी। सेकुलरवादी राजनीति को दो तरह की सांप्रदायिकताओं (बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक) की प्रतियोगिता में बदल देने का खेल कांग्रेस ने इस बार भी खेला। उत्तर प्रदेश और बिहार में तो वह प्रभावहीन थी, पर बाकी देश में उसकी चुनावी रणनीति यही थी। दिल्ली में सोनिया गांधी शाही इमाम से मिल कर ‘सेकुलर वोटों को एकजुट’ करने की अपील करने में लगी हुई थीं। इसका व्यावहारिक मतलब किसी से छिपा नहीं था कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी को हराने के नाम पर मुसलमान वोटों को अपने ध्रुव पर बटोरना चाहती है। यह बहुसंख्यक सांप्रदायिकता के बरक्स अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को प्रोत्साहित करने का खुला नमूना था। लगभग इसी तरह की राजनीति असम में भी कांग्रेस द्वारा की जा रही थी। इस आत्मघाती चुनावी रणनीति का लाभ भी भाजपा को मिला और जो कांग्रेस असम में पिछला परिणाम दोहराने के मंसूबे बांध रही थी, वह भाजपा की जबरदस्त प्रतिक्रियात्मक जीत से हतप्रभ रह गयी।
निष्कर्ष :
इस विश्लेषण से अभी तक हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि भाजपा को प्राप्त होने वाला जनादेश कमोबेश ऊंची जातियों के असाधारण समर्थन से मिल कर बना है। लेकिन इसमें ग़ैर-यादव और ग़ैर-जाटव पिछड़े और दलित मतदाताओं ने भी अपनी भागीदारी की है। अल्पसंख्यकों की आवाज़ इस जनादेश में न के बराबर ही शामिल है। जेंडर के कोण से देखने पर इस जनादेश के साथ स्त्रिायों की सहमति पुरुषों के मुक़ाबले कम है, लेकिन दूसरी तरफ़ एक महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्राीय तथ्य यह है कि शिक्षा के तिरछे ऊर्ध्वगामी धरातल पर चढ़ते हुए भारतीय मतदाता उत्तरोत्तर भाजपा की तरफ़ झुकते जा रहे हैं। इसके साथ ही हमें यह भी पता चलता है कि यह जनादेश मुख्यतः उत्तरी, मध्य और पश्चिमी भारत का है और इसमें पूर्वी व दक्षिणी भारत की भागीदारी बहुत कम है। जनादेश के दो अन्य पहलू भी हैं। पहला, नरेंद्र मोदी की बढ़त को रोकने में उत्तर भारत की वे पार्टियां नाकाम रही हैं जो ख़ुद को दलित और पिछड़े हितों की प्रतिनिधि के तौर पर पेश करती हैं। दरअसल, इन पार्टियों के नीचे से उनकी लोकप्रियता  के खिसकने के संकेत भी हवाओं में हैं। यह तथ्य हमें विवश करता है कि हम अपना राजनीतिक परिप्रेक्ष्य दुरुस्त करें और इन पार्टियों को दक्षिण और पूर्व के उन क्षेत्राीय दलों के साथ रख कर न देखें जिनकी राजनीति एक समुदाय-केंद्रित न हो कर कहीं व्यापक सांस्कृतिक और जातीय विशिष्टता की राजनीति है। दूसरा, भाजपा को मिला जनादेश अपने सांप्रदायिक पहलुओं के बावजूद उस तरह से सांप्रदायिक नहीें है जिस तरह से नब्बे के दशक में उसे मिला जनादेश सांप्रदायिक था। भाजपा को ग़ैर-भाजपा दलों की
सिद्धांतहीनता और मौक़ापरस्ती का लाभ मिला है। ये दल सच्चा सेकुलर रवैया त्याग कर सांप्रदायिकताओं के खेल को ही सेकुलर राजनीति का पर्याय बनाने पर तुले थे जिसका भीषण नुकसान उन्हें उठाना पड़ा। अब सवाल यह है कि आखि़र जिन लोगों ने नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट दिये, उन्होंने क्या सोच कर यह फ़ैसला किया होगा? मानस चक्रवर्ती कहते हैं कि उन्होंने विकास के नाम पर वोट दिये हैं। चक्रवर्ती वोटरों की विकास की इच्छा और कॉरपोरेट ताक़तों के समर्थन को आपस में नहीं जोड़ते। पर, आदित्य निगम कहते हैं कि यह विकास की इच्छा कॉरपोरेट ताक़तों द्वारा गढ़ा गया और हरकत में लाया गया एक विचार-तंत्रा है जिसे लोगों को थमाया गया। दोनों प्रेक्षण अलग-अलग हैं, पर यह तो मानना ही होगा कि चाहे लोगों ने विकास की इच्छा अपने-आप व्यक्त की हो या उन्हें यह विचार-तंत्रा थमाया गया हो, दोनों ही सूरतों में वोटरों के मन में विकास की इच्छा अदम्य है। जाहिर है कि यह विकास वह नहीं है जो कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन वाली सरकार उन्हें थमा रही थी। लोग महंगाई, भ्रष्टाचार, निर्णयहीनता और बेरोज़गारी से मुक्त प्रगति के आकांक्षी हैं जिसका पर्याय खोखला ग्रोथ रेट नहीं हो सकता, और न ही इन चारों समस्याओं से छुटकारा पाने का ताल्लुक कॉरपोरेटपरस्ती से है। इस जनादेश ने गेंद पूरी तरह से भाजपा, नरेंद्र मोदी, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ और कॉरपोरेट ताक़तों के पाले में डाल दी है। खेल अब उन्हें खेलना है, और जनता (चाहे उसने मोदी के पक्ष में वोट
दिया हो या विपक्ष में) उन लाभों की प्रतीक्षा करेगी जो वायदों की शक्ल में किये गये हैं। अच्छे दिन अगर छह से आठ महीने के भीतर आते हुए नहीं दिखे, भाजपा को उससे भी ज़्यादा भारी क़ीमत चुकानी होगी जो कांग्रेस ने चुकाई है।