मंगलवार, 16 जून 2015

ताक-झांक : बाबा रामदेव की डायरी में

ताक-झांक : बाबा रामदेव की 

डायरी में

वैशाख शुक्ल-1, विक्रम संवत 2072
हरिद्वारआज राहुल गांधी ने संसद में मोदी सरकार को ललकारते हुए कहा कि वह सूट-बूट की सरकार है. बात मेरी समझ में नहीं आई. राहुल ने ऐसा क्यों कहा! जबकि मोदी जी का सूट तो कब का नीलाम हो चुका है. वह भी करोड़ों में. सोचता हूं मैं भी अपना सूट नीलाम करवा दूं. निश्चित ही मोदी जी के सूट से ज्यादा धनराशि प्राप्त होगी. इसके दो कारण है. पहला, मेरे कई धनवान चेले हैं. दूसरा, मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे रामलीला मैदान में पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस  से जान बचाई थी. आज भी लोग उस सूट को लेकर चुटकुले बनाते हैं और मेरा परिहास करते हैं. जबकि आपद धर्म में तो सब उचित होता है. आखिर अर्जुन ने भी अज्ञातवास में बृह्नलला का रूप धरा था. इससे क्या अर्जुन की शूरवीरता कम हो गई! आपद धर्म में जान बचाने के लिए उस समय जिस वीरांगना बहन का सूट मैंने लिया था, उसने मुझसे कभी उसे वापस नहीं मांगा. जब मैं खुद ही उसे वापस करने गया तो वह बोली कि रख लो बाबा, आप को ज्यादा सूट करता है.
मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस से जान बचाई थी

वैशाख शुक्ल-2, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा दिया मैंने. अरे यार! मेरी हैसियत मोदी जी के बराबर की है और हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर जी मुझे मंत्री का दर्जा दे रहे हैं. एक बार अपने बयान में मैंने खुद कहा था कि मैं चाहूं तो इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता हूं. ऐसे ही भारत सरकार पद्म भूषण देने का मन बना रही थी. इसकी औपचारिक घोषणा होने से पहले ही मैंने इसे लेने से मना कर दिया. कैबिनेट मंत्री पद छोड़कर मैंने एक बार फिर इतिहास रच दिया. लगातार दो त्याग किए मैंने. सोनिया जी का त्याग मेरे सामने कुछ भी नहीं.
वैशाख शुक्ल-4, विक्रम संवत 2072
हरिद्वार
कल कांग्रेस के प्रवक्ता मनु सिंघवी ने कहा कि मैंने योग को राजनीति से जोड़कर राजयोग शुरू कर दिया जिसमें योग पीछे और बाबा की राजनीति आगे है. मिथ्या आरोप है उनका. मैंने योग को राजनीति से नहीं जोड़ा है अपितु राजनीति में योग को जोड़ दिया है. राजनीति में योग करते-करते मैंने जाना कि वस्तुतः राजनीति भी योग का ही तो खेल है. योग अर्थात जोड़ अर्थात जोड़ना. राजनीति का मर्ज ही जोड़ों का दर्द है. नेता अपने लिए तो जोड़ता जाता है और समाज में दर्द बांटता जाता है. अपने तनिक से जोड़ के लिए वह किसी को भी दर्द बांट सकता है. बाबा सब जानता है. बाबा के अधिकांश शिष्य राजनीतिज्ञ ही तो हैं. वो भी कुशल. मैं योग कराते-कराते राज करने लगा तो कुछ छद्म राष्ट्रवादियों, मनु सिंघवी जैसे लोगों को सहन नहीं हो रहा है. देश में कितने योग गुरू हैं. कोई मेरी तरह से वीआईपी नहीं बन पाया. क्यों! क्योंकि उन्होंने योग में कुछ जोड़ा नहीं. यदि मैं योग में राजनीति को न जोड़ता तो मेरे विरोधी कब का मेरा आश्रम बंद करवा चुके होते. आज यदि योग और बाबा रामदेव एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं तो उसका कारण राजयोग ही है.
राहुल गांधी चिंतन करने विदेश चले जाते हैं. जबकि यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है और उसके चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है.
वैशाख शुक्ल-5, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
इस समय अपने  को कर्ण जैसा ही उपेक्षित महसूस कर रहा हूं. नरेंदर मोदी की ओर से लगातार उपेक्षा मिल रही है. जबकि उनकी जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था मैंने. उनकी सरकार बनने के पश्चात ही मैं हरिद्वार लौटा था. अपने योग शिविर को चुनाव प्रचार कार्यालय में बदल दिया था. परंतु मोदी जी…. अरे काहे का जी… यहां कौन-सा सबके सामने भाषण दे रहा हूं. चुनाव जीतने के बाद एक बार भी पतंजलि योगपीठ नहीं आए. हमारी तरफ पीठ करके बैठ गए. कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने वाला मैं ही था. मोदी के पक्ष में हवा बनाने के लिए मैं आचार्य बालकृष्ण के साथ आमरण अनशन पर बैठा. नौ दिन में ही मेरी हवा टाइट हो गई थी. यहां तक कि अस्पताल पहुंच गया. तब श्रीश्री रविशंकर जी के हाथों जूस पी कर अपना अनशन तोड़ा. उस समय वह जूस नहीं समुद्र मंथन से निकला हुआ साक्षात अमृत लगा था मुझे. तब लोगों ने कैसे-कैसे सवाल किए थे. बाबा आप योगी होकर अस्पताल पहुंच गए जबकि बालकृष्ण का बाल भी बांका न हुआ था. कितनी भद्द पिटी थी मेरी. जिस मोदी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था उसी ने मुझे से दांव खेल दिया. सोचता हूं किसी दिन आश्रम में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और संजय जोशी को बुला कर अपनी व्यथा सुनाऊं!
वैशाख शुक्ल-6, विक्रम संवत 2072
करनाल
योग और आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए मुझे भी भारत रत्न मिलना चाहिए. मेरा काम सुश्रुत,धनवंतरी से बढ़कर है. मैंने योग को दर्शनीय बनाया है. भारत रत्न की लालसा मेरे मन में तब से और ज्यादा बलवती हो गई, जब से इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा को पदम भूषण मिला. वह भी शिक्षा और साहित्य में उनके योगदान के लिए. उन्होंने कितनी किताबें लिखी हैं,  बाबा को पता ही नहीं. जबकि बाबा सब जानता है. आश्रम में ही रहने वाले मेरे एक प्रिय शिष्य ने आज मुझसे कहा कि रजत शर्मा वाली अपनी जिज्ञासा आप गूगलबाबा को बताइए न. यह सुनकर मेरे कान खडे़ हो गए. मैंने सबसे पहले उससे सवाल किया, ‘तेरा गूगल बाबा योग तो नहीं सिखाता है न!’ वह हंसा. परंतु उसका चमत्कारी गूगल बाबा भी रजत शर्मा के द्वारा शिक्षा और साहित्य में किए गए योगदान को खोजने में असफल हो गया. इससे एक बात सिद्ध होती है कि मेरे पास  ‘दिव्य फार्मेसी’ है तो वर्तमान सरकार के पास ‘दिव्य दृष्टि’ है.
यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
वैशाख शुक्ल-7, विक्रम संवत 2072
करनाल
आज मेरे एक शिष्य ने पूछा, ‘बाबा आप प्रवचन देते हैं कि भाषण. पता नहीं चलता.’ आज सुबह से बैठा मैं इसी बात को सोच रहा हूं. शिष्य की बात पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा कर रहा हूं. मध्यरात्रि हो चुकी है परंतु अभी तक सफलता नहीं मिली.
वैशाख शुक्ल-8, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
शेर की तरह दहाड़ने वाले  गिरिराज सिंह आज मीनाकुमारी की तरह रोते हुए आए. आते ही बोले, ‘बाबा जुबान पर काबू रखने के लिए कोई आसन बताइए.’ मैंने उनको झट से सिंहासन करवा दिया. इसे करने के बाद गिरिराज बाबू बोले कि क्या बाबा इसमें भी तो मेरी जुबान बाहर ही निकली रही. यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं रही कि यह आसन करते समय जुबान मुंह के बाहर निकालनी पड़ती है. अंत में अपना पिंड छुड़ाने के लिए मैंने उन्हें नभो मुद्रा जिसमें जुबान तालू में लगानी होती है और मांडुकी मुद्रा जिसमे जुबान को मसूढ़ों के ऊपर घुमाया जाता है, करवाया. इसको करने के बाद वह खुशी-खुशी वहां से चले गए. अबोध! अब यह बाबा उन्हें क्या बताता! यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-9, विक्रम संवत 2072
कुरुक्षेत्र
कुछ लोगों को शंका है कि योग से ज्यादा फायदा नहीं होता हैा.योग से बहुत फायदा होता हैं. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता! आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-11, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल गत माह की बेलैंस सीट देखी तब से  योग करने का मन नहीं कर रहा है. पिछने महीने पतंजलि उत्पाद केंद्र की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई. देखकर मन खिन्न है. आज पूरा दिन इसी सोच-विचार में व्यतीत करूंगा कि अब कौन-सा नया उत्पाद लॉन्च किया जाए. ‘दिव्य पुत्रजीवक बीज’ का अप्रत्याशित परिणाम मिला. उसका विपणन जोरों पर है. जिन्होंने इसका उपयोग किया उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता. हमने मुख्य समाचारपत्रों में प्रथम पृष्ठ पर पूरे-पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया था इसका. यद्यपि मीडिया ने इसके नाम को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. इन मूर्खों को पता नहीं कि अनजाने में वे मेरे उत्पाद का विज्ञापन ही कर रहे थे. प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है. आयुर्वेद के नाम रोज नई-नई ऐरी-गैरी कंपनियां पैदा हो रही हैं. आसन क्रिया से अधिक उत्पादों को बेचने में कसरत है. तनाव बहुत बढ़ गया है. शाम के पांच बज रहे हैं. अभी-अभी भ्रामरी और सुप्त भद्रासन  किया है ताकि तनाव कम हो और मन शांत रहे.
वैशाख शुक्ल-12, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
विपश्यना! पाली भाषा का शब्द. जिसका मतलब होता है जो जैसा है, वैसा देखना. इसी के लिए राहुल गांधी विदेश गए थे.  अच्छा है. जिस वय में बालक बिपाशा के लिए ध्यानमग्न होते हैं वे विपश्यना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. होना भी चाहिए क्योंकि पार्टी की दशा चिंतनीय है. पंरतु ऐसा करना उनके पार्टी के हित में हो सकता है, राष्ट्रहित में नहीं. उन्होंने हमारी परंपरा का पालन नहीं किया. हमारे यहां हिमालय में जाकर चिंतन-मनन करने की परंपरा रही है. देखो तो राहुल की वजह से विपश्यना का कितना प्रचार हो गया. अगर वह प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, कपालभाति करते तो कितना अच्छा होता! सबकुछ भूलभाल के मेरे योग शिविर में ही आ सकते थे. वह तो अच्छा है कि यहां सबकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि विदेश जाकर विपश्यना करें. वरना तो मेरा योग का धंधा मंदा हो जाता. वैसे जब मैं राहुल को शहजादा कहता हूं तो क्या गलत कहता हूं. राहुल गांधी चिंतन करने के लिए विदेश जाते हैं और यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आम आदमी के चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है अब देखना है कि राहुल गांधी के चिंतन से क्या निकलता है!
- अनूप मणि त्रिपाठी
लोकसंघर्ष पत्रिका  में शीघ्र  प्रकाशित

गौहत्या पर प्रतिबंध: वैज्ञानिक पशुपालन या सांस्कृतिक राष्ट्रवादी

गौहत्या पर प्रतिबंध: वैज्ञानिक पशुपालन या सांस्कृतिक राष्ट्रवादी

हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गौरक्षा के लिए चलाए जा रहे अभियान का उद्देश्य राजनैतिक है। ये संगठन उच्च जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं और उस पदक्रम आधारित व सामंती संस्कृति.जो ऊँची जातियों को विशेषाधिकार देती है.को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देना चाहते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा ने सन् 1995 में 'महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम 1976' में संशोधन किया था। इस संशोधन अधिनियम को 20 साल बाद, सन् 2015 में, राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस संशोधन अधिनियम का उद्देश्य गौवंश की रक्षा नहीं बल्कि अतिवादी व अराजक हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को, हाशिए पर पड़े समुदायों,विशेषकर मुसलमानों, को भयाक्रांत करने का अवसर उपलब्ध करवाना है। 
सन् 1976 के पशु संरक्षण अधिनियम, जिसे सन् 1988 में संशोधित किया गया था, में केवल गाय ;व उसके नर व मादा बछड़ों का वध प्रतिबंधित किया गया था और कानून का उल्लंघन करने वालों को छः माह तक के कारावास से दंडित किए जाने का प्रावधान था। यदि अदालत चाहे तो अपराधी पर रूपये 1000 तक का जुर्माना भी लगा सकती थी। 
सन् 2015 का अधिनियम,एक प्रजातांत्रिक, संवैधानिक राज्य को एकाधिकारवादी, सांस्कृतिक राज्य में परिवर्तित करता है.एक ऐसे राज्य में जो अतिशय शक्तिसंपन्न है और जिसके तंत्र को नागरिकों के रसोईघरों, रेफ्रिजिरेटरों और खाने की थाली में झांकने का अधिकार है। अधिनियम में गाय के अलावा बैलों और सांडों का वध भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिस तथ्य पर अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया है वह यह है कि यह अधिनियम यूएपीए ;गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम या टाडा ;आंतकवादी व विध्वंसकारी गतिविधियां निवारण अधिनियम या पोटा ;आतंकवादी गतिविधियां निवारण अधिनियम जितना ही भयावह है। इस अधिनियम के लागू होने से उन अतिवादी व मुख्यधारा के हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को प्रोत्साहन मिलेगा जो कई तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में संलग्न हैं। ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं ऐसे ट्रक व अन्य वाहनों को रोकना जिनमें मवेशी ढोए जा रहे हों व मवेशियों का मालिक, विक्रेता या क्रेता या वाहन का मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो। ये समूह, जिनमें अक्सर चार से छः संडमुसंड व्यक्ति होते हैं,ड्रायवर से कागजात मांगते हैंए उन कागजातों को फाड़कर फेंक देते हैं और मवेशी लूट लेते हैं। अगर ड्रायवर मुसलमान हो तो उसकी पिटाई लगाते हैं, पुलिस को बुला लेते हैं और झूठा प्रकरण दर्ज करवाकर वाहन को जब्त करवा देते है। उसके बाद वे मीडिया को बुलाकर यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान, गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे और उन्होंने उन्हें रोका।
राज्य और पवित्र गाय
सरकार का कहना है कि 2015 का अधिनियम,संविधान के चौथे भाग के अनुच्छेद 48 के अनुरूप है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों से संबंधित है। ये नीति निदेशक तत्व अदालतों के जरिए लागू नहीं करवाए जा सकते। अनुच्छेद 48 कहता है,'राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण व सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।' राज्य सरकार ने बंबई हाईकोर्ट को बताया कि यह अधिनियम इसलिए लागू किया गया है ताकि गौवंश की रक्षा हो सके। सरकार का यह भी कहना था कि गाय के दूध, गोबर और मूत्र का इस्तेमाल कीटनाशक और अन्य औषधीय उत्पादों में किया जाता है। राज्य सरकार के इस दावे की किसी वैज्ञानिक शोध से पुष्टि नहीं हुई है और ना ही सरकार,अदालत के समक्ष ऐसे किसी भी शोध का हवाला दे सकी। जहां तक बैल के भारवाही पशु के रूप में इस्तेमाल का सवाल है, इस आधार पर तो फिर भैंसों, ऊँटों और घोड़ों के वध को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सरकार ने प्राचीन वैदिक ग्रंथों का हवाला देकर भी अपने नये कानून को उचित ठहराया। यहां तक कि 'नेशनल कमीशन ऑन केटल' की रपट में भी वैदिक ग्रंथों और 'स्मृतियों' के आधार पर यह 'साबित' किया गया है कि गाय एक उपयोगी पशु है! सच यह है कि ऊँची जातियों की धार्मिक परंपराओं का सहारा लिए बिना, गौवध पर प्रतिबंध को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। 
अगर सन् 2015 के अधिनियम का उद्देश्य महाराष्ट्र के पशुधन का उसके दूध, गोबर और मूत्र के उत्पादों की खातिर संरक्षण करना और भारवाही पशु के रूप में बैल की उपयोगिता की दृष्टि से उसे वध से बचाना है तो फिर अधिनियम की धारा 5डी के अंतर्गत, किसी व्यक्ति के पास अन्य राज्यों से आयात किए गए गौमांस का पाया जाना अपराध घोषित क्यों किया गया है। निश्चित तौर पर अगर महाराष्ट्र के बाहर से गौमांस आयात किया जाता है तो उससे राज्य के पशुधन में कमी नहीं आएगी और ना ही राज्य में उपलब्ध गायों के दूध,गोबर या मूत्र की मात्रा घटेगी! दूसरी ओरए गौवंश के राज्य से बाहर निर्यात ;सिवा वध के लिए करने की अनुमति क्यों दी गई है ? गौवंश को चाहे वध के लिए निर्यात किया जाए या किसी अन्य उद्देश्य के लिएए महाराष्ट्र तो अपना पशुधन खोएगा ही और साथ ही दूध, गोबर और मूत्र भी खोएगा। 
दरअसल, इस अधिनियम का उद्देश्य ना तो गौवंश का संरक्षण है और ना ही उसके दूध, गोबर व मूत्र का उपलब्धता सुनिश्चित करना। इस अधिनियम का असली उद्देश्य है पुलिस और कार्यपालिका को दमन करने का एक और हथियार उपलब्ध करवाना। इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर नजर डालिये। धारा 5ए, 5बी और 5सी में गौवंश का वध के लिए परिवहन, गौवंश का वध के लिए खरीदना.बेचना और गाय या बैल का मांस किसी व्यक्ति के पास पाया जाना अपराध घोषित किया गया है। यह अधिनियम किसी भी पुलिस अधिकारी,जो कि उपनिरीक्षक से निचले दर्जे का नहीं होगा, या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे वाहन, जिसका इस्तेमाल गौवंश को ढोने के लिए किया जा रहा हो या किये जाने का अंदेशा हो, को रोक सकता है और उसमें प्रवेश कर उसकी तलाशी ले सकता है। अधिनियम इस तरह की तलाशी लेने के लिए किसी भी परिसर के द्वार या ताले को तोड़ने का अधिकार भी पुलिस को देता है। स्पष्ट है कि अभी जो गौरक्षक दल गैरकानूनी ढंग से काम कर रहे हैं उन्हें यह अधिनियम कानूनी अधिकार दे देगा। कोई भी पुलिस अधिकारी उन्हें अधिकृत कर सकेगा कि वे किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ले सकते हैं। पुलिस अधिकारियों को ऐसी गायों, बछड़ों व बैलों को जब्त करने का अधिकार होगा जिन्हें वध के इरादे से बेचाए खरीदा या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा रहा हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'इरादे' का आरोप किसी पर भी बहुत आसानी से जड़ा जा सकता है और उस व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि उसका 'इरादा' यह नहीं था। 
इस अधिनियम के उल्लंघन के लिए निर्धारित सजा 10 गुना कर दी गई है। इस अधिनियम के तहत दोषी पाये जाने वाले को पांच साल तक का कारावास हो सकता है और उस पर दस हजार रूपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कारावास की न्यूनतम अवधि छः माह और जुर्माने की न्यूनतम राशि रूपये 1000 होगी। इस प्रकार,संशोधन के पहले जो अधिकतम सजा दी जा सकती थी, उसे अब न्यूनतम बना दिया गया है। अगर आपके पास से कम मात्रा में कोई नशीली दवा ;नार्कोटिक ड्रग जब्त होती है तो संभावना यह है कि आपको अदालत किसी पुनर्वास केंद्र में भेजे जाने का आदेश देगी। परंतु यदि आपके पास से गौवंश का मांस जब्त होता है तो आप एक साल तक के लिए जेल भेजे जा सकते हैं। शायद सरकार की दृष्टि में किसी व्यक्ति के पास से गौमांस मिलना, उसके पास से ड्रग्स मिलने से ज्यादा गंभीर अपराध है। हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को हिंदुओं के ड्रग्स के आदी हो जाने से ज्यादा चिंता इस बात की है कि कहीं उनके पास गौमांस न हो।   
अधिनियम का सबसे कठोर और भयावह प्रावधान यह है कि गौवंश का वध, परिवहन,राज्य से बाहर निर्यात खरीदी या बिक्री या गाय या बैल का मांस पाया जाना अधिनियम का उल्लंघन नहीं है, यह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर होगी। भारतीय विधिशास्त्र में आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता। इस सिद्धांत के कुछ ही अपवाद हैं। इनमें शामिल हैं अपवादात्मक परिस्थितियों में अत्यंत गंभीर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए विशेष कानून उदाहरणार्थ गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम ;यूएपीए या आतंकवाद.निरोधक कानून। हत्या या राष्ट्रद्रोह के मामलों में भी आरोपी को निर्दोष माना जाता है और उसे दोषी सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है। सवाल यह है कि किसी गरीब व्यक्ति को यदि इस अधिनियम के तहत आरोपी बना दिया गया तो वह स्वयं को कैसे निर्दोष साबित करेगा ? राज्य या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति आप के घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस सकता है, आपके रसोईघर और थाली में क्या है, यह देख सकता है, आपके फ्रिज में झांक सकता है और 'अवैध' मांस जब्त कर सकता है और आपको सींखचों के पीछे डाल सकता है। अब यह आपकी जिम्मेदारी होगी कि आप जेल में रहते हुए अपने आपको निर्दोष साबित करें। 
इस अधिनियम के लागू होते ही हिंदू धर्म के स्वनियुक्त रक्षक अतिसक्रिय हो उठे। वैसे भी वे न तो संविधान का सम्मान करते हैं और ना ही कानून के राज में उनकी आस्था है। उत्तरी महाराष्ट्र का मालेगांव,मुस्लिम.बहुत नगर है। वहां पर कुछ लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ इस अधिनियम के तहत् रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस ने कार्यवाही की और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। मालेगांव पुलिस ने तबस्सुम बरनगरवाला को बताया, 'प्रतिबंध लगते ही हिंदू समूह हमारे पीछे पड़ गये कि हम मुस्लिम घरों की जांच करें। लोग आपसी दुश्मनी के कारण झूठी शिकायतें लिखवा रहे हैं। कोई भी हिंदू आकर हमसे कह सकता है कि फलां मुसलमान के घर में जो गायें हैं उनका वह वध करने का 'इरादा' रखता है। ऐसे स्थिति में हम क्या करें?'मालेगांव पुलिस ने नगर के सभी ऐसे मुसलमानों, जिनके घर गायें पली हैं, को निर्देष दिया कि वे अपने जानवरों का पंजीयन करायें और गायों के मालिक की सभी गायों के साथ फोटो भी पुलिस को उपलब्ध करवायें। मालेगांव पुलिस ने एक नया रजिस्टर बनाया जिसका नाम रखा गया 'गाय, बैल,बछड़ा रजिस्टर'। मालेगांव की पुलिस अब उन मुसलमानों को ढूँढ रही है जिनके पास गायें हैं और इस बात का हिसाब रख रही है कि किस मुसलमान के पास कितनी गायें और कितने बछड़े हैं। मवेशियों के व्यवसाय और उनके परिवहन पर भी पुलिस नजर रख रही है। जिन हिंदुओं के पास गायें हैं उनसे अपने पशुओं का पंजीकरण करवाने के लिए नहीं कहा गया है क्योंकि पुलिस यह मानकर चल रही है कि केवल मुसलमान ही गौवध करते हैं हिंदू नहीं। 
महाराष्ट्र में पुलिसकर्मियों की पहले से ही बहुत कमी है। पुलिस को दलित.विरोधी हिंसा, आतंकवाद, ड्रग्स के बढ़ते व्यवसाय, भू.माफियाए महिलाओं के साथ बलात्कार व अन्य सैक्स अपराध, घरेलू हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा व अन्य संगठित अपराधों से निपटने के अलावा अब गायों और बछड़ों का हिसाब.किताब भी रखना पड़ेगा। 
इस अधिनियम का सबसे बड़ा शिकार बना है हमारा विधिशास्त्र। यह अधिनियम,पुलिस और स्वनियुक्त हिंदू रक्षकों को ऐसे अधिकारों से लैस करता है, जिनका इस्तेमाल वे मुसलमानों और दलितों का दमन करने और उन्हें परेशान करने के लिए कर सकते हैं। दलित, प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत से तो वंचित होंगे ही उनकी जीविका भी प्रभावित होगी क्योंकि उनमें से कई चमड़े का सामान बनाने के व्यवसाय में रत हैं। 
धर्मनिरपेक्ष आंदोलन और मानवाधिकार संगठनों ने इस अधिनियम का इस आधार पर विरोध किया है कि यह अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों,के अधिकारों पर अतिक्रमण है। सच यह है कि यह इससे भी ज्यादा है। हिंदुत्व की विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों की सरकार अब हमें यह बताना चाहती है कि हम क्या खाएं और क्या नहीं? अब आगे क्या? शायद अब सरकार हमें यह बताएगी कि अब हम कौनसे कपड़े पहने,कौनसी फिल्म देंखे या किस संगीत की महफिल में जाएं। सरकार अब शायद यह भी तय करना चाहेगी कि हम अपनी आजीविका के लिए क्या काम करें और शहर के किस इलाके में रहें। मुसलमानों को पहले शिकार इसलिए बनाया जा रहा है ताकि इस कानून का विरोध केवल मुसलमानों की ओर से होए पूरे समाज की ओर से नहीं। परंतु सच यह है कि इस तरह के कानून हर उस व्यक्ति के लिए खतरे की घंटी हैं जो प्रजातंत्र में विश्वास रखता है। ऐसे हर व्यक्ति को इस कानून और इस तरह के अन्य कदमों का खुलकर विरोध करना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

मंगलवार, 26 मई 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

नरेन्द्र मोदी ने 25 मई 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में एक साल पूरा कर लिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इस एक साल में मोदी की क्या उपलब्धियां रहीं,यह उतना ही विवादास्पद है जितना कि मोदी का व्यक्तित्व। जहां प्रधानमंत्री के समर्थक और अनुयायी यह अतिश्योक्तिपूर्ण दावा कर रहे हैं कि मोदी ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं वहीं उनके विरोधी, उन वायदों की सूची गिनवा रहे हैं जो पूरे नहीं हुए। उनके कार्यकाल का निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। हम यहां उन कुछ प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जो मोदी के कार्यकाल में उभरीं और उस दिशा पर विचार करेंगे, जिस ओर उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश को ले जा रही है।
आम चुनाव के समय नारा दिया गया था 'अब की बार, मोदी सरकार' और यह सचमुच मोदी की ही सरकार है। यह न तो एनडीए की सरकार है और ना ही भाजपा की। अखबारों के अनुसार, एनडीए के गठबंधन साथियों ने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की है। महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और अकाली दल, भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों के विरोधी हैं। शिवसेना ने भाजपा की तुलना अफजल खान की सेना के महाराष्ट्र पर आक्रमण से की। पिछली यूपीए सरकार के विपरीत, प्रधानमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि वे एक कड़े प्रशासक हैं और सभी निर्णय वे स्वयं लेते हैं। प्रजातंत्र में सबको साथ लेकर चलना होता है,सभी के हितों का ख्याल रखना होता है। कुछ महीनों पहले, अखबारों में एक फोटो छपी थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी एक ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए थे और बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों की कुर्सियां नीचे थीं। संदेश स्पष्ट था। प्रधानमंत्री ने किस हद तक अपने मंत्रियों पर शिकंजा कस रखा है यह इस बात से जाहिर है कि मंत्रियों को अपने निजी सचिवों की नियुक्तियों के लिए भी प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। कारण यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि मंत्रिगण अपने रिश्तेदारों या परिचितों को अपना निजी सचिव बनाएं। परंतु क्या इसके लिए एक सामान्य निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता ?क्या प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे उनके निर्देशों का पालन करेंगे? यह भी साफ नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों के प्रस्तावित निजी सचिवों के संबंध में क्या जांच.पड़ताल की।
केंद्रीयकरण
मोदी सरकार में सभी शक्तियां, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीकृत कर दी गई हैं। सभी मंत्रालयों के सचिवों की पीएमओ तक सीधी पहुंच है और पीएमओ किसी भी मंत्रालय से कोई भी फाईल बुलवा सकता है। इससे निश्चित तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है परंतु हर तेज निर्णय हमेशा सबसे अच्छा निर्णय नहीं होता। प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राफेल कंपनी से लड़ाकू हवाई जहाज खरीदने का सौदा, बिना रक्षामंत्री की मौजूदगी या सहमति के किया। प्रधानमंत्री इस एक वर्ष में दुनिया के बहुत से देशों में गए। इनमें भूटान, श्रीलंका, नेपाल, इंग्लैण्ड,जर्मनी, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, चीन और मंगोलिया शामिल हैं। विदेश मंत्री, ईराक में फंसे 39 भारतीयों को निकालने और अन्य इसी तरह के कामों में व्यस्त रहीं। यहां तक कि नेपाल में भूकंप के बाद भारत सरकार ने जो राहत पहुंचाई उसका श्रेय भी केवल मोदी को दिया गया। जिन भी देशों में मोदी गए, वहां उन्होंने अप्रवासी भारतीयों की सभाओं को संबोधित किया और स्वदेश की राजनीति के संबंध में टिप्पणियां कीं।
किसी एक व्यक्ति में सारी शक्तियां केंद्रित कर देने से उन लोगों को लाभ होता है जो उस व्यक्ति के करीबी हैं या जिनकी उस तक पहुंच है। वह व्यक्ति जितना अधिक शक्तिशाली होता है उसे उतने ही ज्यादा विवेकाधिकार प्राप्त होते हैं और वह जो नीतियां बनाता हैए उनसे उन लोगों को लाभ होता है जो उसके नजदीक हैं। प्रधानमंत्री की छवि कुबेरपतियों के मित्र की है। उनके 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' व 'मेक इन इंडिया' अभियानों से भी यही ध्वनित होता है। इन अभियानों के अंतर्गत उद्योगों की नियमन प्रणाली को लचीला बनाया जा रहा है, उन्हें विभिन्न अनुमतियां प्रदान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, कारपोरेट टैक्सों की दरें घटाई गई हैं, पर्यावरण संबंधी बंधन ढीले किए गए हैं और उद्योगपतियों को कर्मचारियों को जब चाहे रखने और जब चाहे हटाने की स्वतंत्रता दे दी गई है। इस सब से श्रमिकों की ट्रेड यूनियनें कमजोर हुई हैं व श्रमिक वर्ग की आमदनी घटी है। राज्य, भूमि अधिग्रहण करने में उद्योगपतियों की मदद कर रहा है और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। मुंबई.दिल्ली औद्योगिक गलियारा और मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इनकी तुलना पूर्व यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं से कीजिए.यद्यपि वह भी उद्योगपतियों की मित्र थी.जिसने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा व सूचना के अधिकार जैसी योजनाओं व कार्यक्रमों पर कम से कम कुछ धन तो खर्च किया।
एससी, एसटी व नीति आयोग 
अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के लिए केंद्रीय बजट 2015.16 में पिछले बजट की तुलना में प्रावधान क्रमश: रूपये 43,208 करोड़ से घटाकर रूपये 30,851 करोड़ और रूपये 26,715 करोड़ से घटाकर रूपये 19,980 करोड़ कर दिए गए। इन समुदायों के आबादी में अनुपात की दृष्टि से जितना धन इन योजनाओं के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, बजट प्रावधान उससे काफी कम हैं।
अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हेपतुल्लाह को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि पारसी समुदाय की प्रजनन दर कैसे बढ़ाई जाए।
मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना कर दी। मोदी सरकार का तर्क था कि योजना आयोग की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका गठन उस दौर में किया गया था जब सरकार का अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। परंतु इस संदर्भ में यह याद रखे जाने की जरूरत है कि शनैः शनैः योजना आयोग अधिक समावेशी नीतियां अपना रहा था और उसी ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में बजट प्रावधान करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार 'अल्पसंख्यक' शब्द का इस्तेमाल किया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि समाज के हाशिये पर पड़े तबकों को मुख्यधारा के समकक्ष लाए जाने की जरूरत है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक न्याय व सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए सभी के विकास की बात कही गई थी। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए जाने का सिलसिला दसवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ। इस योजना का फोकस महिलाओं व अल्पसंख्यकों सहित सभी वंचित व कमजोर वर्गों के सामाजिक.आर्थिक विकास पर था। ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना में अधिक समावेशी विकास की बात कही गई थी और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाने पर जोर दिया गया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए और अधिक आर्थिक प्रावधान किए गए थे।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग स्थापित करने के निर्णय को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। नीति आयोग का वंचित समूहों के विकास से कोई लेनादेना नहीं है। वह तो एक प्रकार का 'थिंक टैंक'है, जिसका जोर बाजार और औद्योगिक गलियारों के विकास और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने पर है।
शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता
प्रधानमंत्री मोदी के बाद उनके मंत्रिमंडल के जिस मंत्री की मीडिया में सबसे अधिक चर्चा रही वे थीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। और वे लगभग हमेशा गलत कारणों से चर्चा में रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्री का कई शैक्षणिक संस्थानों से कई मौकों पर टकराव हुआ और उन्होंने अनेक विवादास्पद निर्णय लिए। इनमें शामिल हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के चार.वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को समाप्त करनाए अमर्त्य सेन द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का दूसरी बार कुलाधिपति बनने से इंकारए परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक अनिल काकोडकर व आरण्केण् शैवगांवकर का आईआईटी मुंबई के शासी निकाय से इस्तीफा,केंद्रीय विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के अधबीचए जर्मन की जगह संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना आदि। शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्ता को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए गए। हरियाणा में स्कूलों में गीता पढ़ाई जा रही है और राजस्थान के स्कूलों में सूर्यनमस्कार अनिवार्य बना दिया गया है।
आरएसएस नेता सुरेश सोनी व कृष्णगोपाल दत्तात्रेय और भाजपा के जेपी नड्डा व रामलाल ने मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर यह मांग की कि स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में 'सुधार' किए जाएं। इस मुद्दे पर कई बैठकें हुईं। 30 अक्टूबर 2014 को इस मुद्दे पर छठवीं बैठक आयोजित की गई। दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को गुजरात  सरकार ने स्कूली विद्यार्थियों के अतिरिक्त अध्ययन के लिए निर्धारित किया है। ये किताबें इतिहास को हिंदू राष्ट्रवादी चश्मे से देखती हैं और इनमें अप्रमाणित तथ्यों के आधार पर प्राचीन भारत का महिमामंडन किया गया है ताकि लोगों में श्रेष्ठता और गर्व का झूठा भाव जगाया जा सके। इतिहास को पौराणिक रंग दे दिया गया है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक उपलब्ध थी और इसका प्रमाण यह है कि भगवान गणेश का सिर हाथी का और शरीर मनुष्य का है। हम सब यह सोचकर चकित थे कि हाथी का कई क्विंटल वजनी सिर यदि किसी तरह मानव शरीर पर लगा भी दिया जाए तो वह मनुश्य उसका वजन कैसे सहन कर सकेगा। इसी तरह के वक्तव्य कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी दिए जिनमें से कुछ ने कहा कि भारत में हजारों साल पहले परमाणु मिसाइलें थीं। विद्यार्थियों के सामने फंतासी और पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में परोसनाए उनके दिमाग को कुंद करना है। एक अच्छे विद्यार्थी का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वह किसी भी बात को आंख मूंचकर नहीं मानता और हर विश्वास व तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसता है।  
हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना
देश में हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है। यह, हिन्दू धार्मिक चेतना से एकदम अलग है। हिन्दू धार्मिक चेतना का प्रकटीकरण कई स्वरूपों में हो सकता है जिनमें पवित्रता.अपवित्रता की अवधारणाए जो यह निर्धारित करती है कि कौन किसके साथ रोटी.बेटी का संबंध रख सकता है और कौन ऊँचा है और कौन नीचा से लेकर मीरा, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम, रविदास आदि के प्रेमए सद्भाव, समानता, सत्य व अहिंसा पर आधारित समावेशी शिक्षाओं तक शामिल हैं। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना एक प्रकार की राजनैतिक चेतना है जो जाति.आधारित ऊँचनीच को कायम रखते हुए हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से एक करना चाहती है और जो 'दूसरे'को न केवल परिभाषित करती है वरन् यह भी सिखाती है कि उस 'दूसरे' से हिन्दुओं को अनवरत युद्धरत रहना है। हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना,एकाधिकारवादी राज्य को आसानी से स्वीकार कर लेगी बशर्ते वह उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के विशेषाधिकारों को कायम रखे और 'दूसरे' समुदाय का हिंसा से दमन करे और यहां तक कि उसे देश से भगा दे।
ध्रुवीकरण करने के उद्धेश्य से शुरू किया गया साम्प्रदायिक विमर्श दिन.प्रतिदिन और दुस्साहसी होता जा रहा है। कुछ राज्यों में गोड़से के मंदिर बन गए हैं और उसे हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। दिसम्बर 2014 से लेकर अब तक दिल्ली,पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले की कम से कम 11 घटनाएं हुई हैं।  शासक दल के सांसद और यहां तक कि मंत्री ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं जिनके लिए उनपर दूसरे समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए के तहत कार्यवाही की जा सकती है। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची व अन्यों ने अलग.अलग समय पर कहा कि जो लोग राम में विश्वास नहीं करते वे हरामजादे हैंए मदरसे आतंकवाद के अड्डे हैं,मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए और जो लोग मोदी को वोट नहीं देते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। परंतु न तो इन भड़काऊ वक्तव्य देने वालों और ना ही चर्चों पर हमले करने वालों पर कोई कार्यवाही की गई।
घर वापसी अभियान जोरशोर से जारी है और आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में गैर.हिन्दुओं को जबरदस्ती हिन्दू बनाए जाने को औचित्यपूर्ण बताते हुए अत्यंत गिरी हुई भाषा का उपयोग किया। उन्होंने यह मांग की कि 'हमारा माल वापिस कर दो' मानो मुसलमान कोई संपत्ति हों। भागवत के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाए गृह मंत्री ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी तरह, कई संगठनों ने यह बीड़ा उठा लिया है कि वे हिन्दू लड़कियों की शादी गैर.हिन्दुओं से नहीं होने देंगे भले ही लड़के और लड़की को इसमें कोई आपत्ति न हो।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन केवल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने से संतुष्ट नहीं हैं। वे राज्य की शक्ति का प्रयोग उनके खिलाफ करना चाहते हैं। गुजरात विधानसभा ने हाल में एक अत्यंत भयावह तथाकथित आतंकवाद.निरोधक विधेयक पारित किया है और सरकार के कहने पर राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र सरकार के बीस साल पुराने गौवध निषेध अधिनियम को अपनी स्वीकृति दे दी है। इन सभी कानूनों का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों का दमन है।
-इरफान इंजीनियर

PAHLA SAAL--1

शुक्रवार, 29 मई 2015

मोदी सरकार का पहला साल नफरत फैलाने के नाम

नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आते ही मानों आरएसएस के सभी संगी.साथियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का लाईसेंस मिल गया है। जहर उगलने के इस अभियान का उद्देश्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बनाये रखना है। एमआईएम के अकबरुद्दीन ओवेसी का घृणा फैलाने वाला भाषण निश्चित तौर पर घिनौना था और इस साल जनवरी में उनकी गिरफ्तारी के बाद अगर उन्हें 40 दिन जेल में बिताने पड़े तो यह बिलकुल ठीक हुआ। उनपर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। परन्तु प्रवीण तोगडि़या, सुब्रमण्यम स्वामी, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, संजय राउत आदि का क्याए जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से निहायत बेहूदा, कुत्सित और गैर.जिम्मेदाराना टिप्पणियां की हैं। क्या ओवेसी की तरह उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए था ?
हिन्दुओं के स्व.घोषित दक्षिणपंथी रक्षक आरएसएस से जुड़े संगठनों के अलावा, अन्य कई व्यक्ति भी समाज को बांटने वाली बातें कह रहे हैं और सांप्रदायिक तनाव को हवा दे रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ गयी है क्योंकि वे जानते हैं कि अब सैयां कोतवाल बन गए हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का अभियान और तेज कर दिया है।
सर्वविदित है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के पहले से हीए भाजपा के साथियों.सहयोगियों ने लव जिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को उछाल कर माहौल गर्म करना शुरु कर दिया था और यह अभियान चुनाव में मोदी की जीत के बाद भी अनवरत चलता रहा। मोदी के सत्ता सम्हालने के कुछ ही समय बाद, पुणे में मोहसिन शेख नामक एक मुस्लिम आईटी कर्मचारी की हिन्दू जागरण सेना के गुंडों ने सड़क पर पीट.पीट कर हत्या कर दी थी। यह घटना बाल ठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किये जाने के बाद हुई। दिल्ली व हरियाणा के अलावा, मुंबई के पास पनवेल और आगरा में चर्चों पर हमले हुए।
साक्षी महाराज ने न केवल यह कहा कि गोडसे देशभक्त था वरन् उन्होंने हिंदू महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की सलाह भी दे डाली क्योंकि उनके अनुसार,मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा होने वाली है। साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को आठ बच्चे पैदा करने की सलाह दी। उन्होंने यह आह्वान भी किया कि आमिर खान, शाहरूख खान और सलमान खान जैसे मुसलमान फिल्मी सितारों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। घृणा फैलाने वाले भाषण देने में प्रवीण तोगडि़या सबसे आगे हैं। उन पर इस सिलसिले में सबसे अधिक संख्या में प्रकरण दर्ज हैं। भाजपा सासंद योगी आदित्यनाथ भी रूक.रूक कर जहर उगलते रहते हैं। उनका कहना है कि अगर लवजिहाद के अंतर्गत एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनाया जाता है तो उसके बदले सौ मुसलमान लड़कियों को हिंदू बनाया जाना चाहिए। लवजिहाद के मुद्दे पर दुष्प्रचार जारी है और कई छोटे.बड़े नेता इसका इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए करते आ रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि मस्जिदों में सुअर पाले जाने चाहिए और यह भी कि मुसलमानों को हिंदू तीर्थस्थलों में प्रवेश नहीं मिलना चाहिए।
मोदी सरकार के दो मंत्रियों साध्वी निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह ने गैर.हिंदूओं और यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी की त्वचा के रंग के संबंध में अत्यंत अपमानजनक और निंदनीय बातें कहीं। निरंजन ज्योति ने कहा कि सभी गैर.हिंदू हरामजादे हैं। गिरिराज सिंह ने चुनाव के पहले कहा था कि जो लोग मोदी को वोट नहीं देना चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए परंतु इसके बाद भी उन्हें मंत्री बनाया गया। उन्होंने सोनिया गांधी के बारे में भी नस्लीय टिप्पणियां कीं। साक्षी महाराज भी गोडसे को देशभक्त मानते हैं और उनकी पार्टी के एक अन्य नेता केरल के गोपालकृष्णन का कहना है कि गोडसे को गांधी को निशाना बनाने की बजाए नेहरू को मारना था। यह बात उन्होंने आरएसएस के मुखपत्र 'केसरी' में अपने एक लेख में कही। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि ईश्वर केवल मंदिरों में रहता है, मस्जिदों और चर्चों में नहीं। इस वक्तव्य के निहितार्थ कितने खतरनाक हैं,यह कहने की आवश्यकता नहीं है। ये सारी टिप्पणियां केवल कुछ उदाहरण हैं उन भड़काऊ बातों कीए उन अनावश्यक टिप्पणियों की जो मोदी सरकार के पहले वर्ष में जिम्मेदार पदों पर बैठे भाजपा और संघ के नेताओं ने कीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में डर और असुरक्षा का भाव बढ़ा। भाजपा के गठबंधन साथी शिवसेना के सांसद संजय राऊत ने तो मुसलमानों से मत देने का अधिकार ही छीन लेने की मांग की।
यह साफ है कि घृणा फैलाने वाले भाषण और वक्तव्य, विभाजनकारी राजनीति का कारण और प्रभाव दोनों हैं। वे समाज में व्याप्त गलत धारणाओं की अभिव्यक्ति हैं। उन बातों को खुल्लम.खुल्ला और भद्दे ढंग से कहा जा रहा है जिन्हें सांप्रदायिक पार्टियां हमेशा से दबेछुपे शब्दों में कहती आई हैं। ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें अचानक हवा में से पैदा हुई हैं। उनकी जमीनए राजनैतिक दलों के एक हिस्से द्वारा लंबे समय से तैयार की जा रही थी।
भारत के मामले में घृणा फैलाने वाले भाषण व टिप्पणियां, धर्म व भाषा के नाम पर की जाने वाली राजनीति का अंग रही हैं। इनका इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए भी किया जाता है और वोट पाने के लिए समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिए भी। हम सबको याद है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान, साध्वी रितंभरा अचानक उभर आई थीं। वे अपने प्रवचनों में अल्पसंख्यकों के संबंध में घोर अपमानजनक और भड़काऊ बातें करती थीं।
इसी तरह की बातें विहिप के कई साधु, सांप्रदायिक गैंग के छोटे.बड़े सदस्य, कुछ मुस्लिम फिरकापरस्त और तोगडि़या जैसे लोग भी करते रहे हैं। कई लोग ऐसी ही या इससे मिलती.जुलती बातों को मीठी चाशनी में लपेटकर परोसते रहे हैं। अपने राजनैतिक कैरियर के शुरूआती दिनों में मोदी भी बांटने वाली बातें किया करते थे परंतु समय के साथ उनकी रणनीति बदलती गई। वे अत्यंत चतुर राजनीतिज्ञ हैं और उन्हें अच्छी तरह से पता है कि उन्हें कब, क्या कहना चाहिए। गुजरात में दंगों के बाद मुसलमानों के लिए जो शरणार्थी शिविर लगाए गए थे उन्हें मोदी ने बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां बताया था। स्पष्टतः, वे इस गलत धारणा को हवा देने की कोशिश कर रहे थे कि मुस्लिम दंपत्तियों के हिंदुओं की तुलना में अधिक बच्चे होते हैं।
मुंबई में सन् 1992.93 के दंगों के दौरान, बाल ठाकरे भी अत्यंत भडकाऊ बातें किया करते थे और अपने शिवसैनिकों को मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा करने के लिए उकसाते थे। वे भी इसलिए बच निकले क्योंकि वे अपनी जहरीली टिप्पणियों को बड़ी धूर्तता से प्रस्तुत करते थे और इसलिए भी क्योंकि हमारे देश के कानून इस तरह के हैं कि घृणा फैलाने वाली बातें कहने वाला यह तर्क देकर बच निकलता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति का मूलाधिकार है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि हमें किसी समुदाय की निंदा करने और किसी राजनैतिक दल की निंदा करने में अंतर करना चाहिए। राजनैतिक दलों की आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए परंतु किसी समुदाय विशेष का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दूसरे, कोई राजनैतिक संगठनए किसी धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधि या रक्षक होने का दावा नहीं कर सकता।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद है कि 'दूसरे' से घृणा करना सिखाने वाली विचारधारा और भाषण हमारी राजनीति का अंग बन गए हैं और किसी विशेष धार्मिक समुदाय को राष्ट्र.राज्य का पर्यायवाची बताना आम हो गया है। इस तरह की पहचान.आधारित राजनीति वो लोग करते हैं जो समाज का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाना चाहते हैं।
भारत में नफरत फैलाने वाले भाषणों का सिलसिला एक ओर मुस्लिम लीग तो दूसरी और हिंदू महासभा और आरएसएस ने शुरू किया था। ये संगठन यह मानते थे कि राष्ट्र किसी एक धार्मिक समुदाय का है। धार्मिक राष्ट्रवाद एक संकीर्ण विचारधारा है और 'दूसरों'  को राष्ट्र से बाहर धकेलना चाहती है। ये विश्वास, धीरे.धीरे दूसरे के प्रति घृणा में बदल जाते हैं। इसी घृणा के कारण स्वतंत्रता के पहले और पिछले दो दशकों में देश में भयावह दंगे हुए हैं।
भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं द्वारा भड़काऊ बातें कहने पर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ताओं की एक ही प्रतिक्रिया होती है और वह यह कि ये संबंधित व्यक्तियों के 'व्यक्तिगत' विचार हैं। भाजपा के पास अपने बचाव का एक दूसरा रास्ता यह है कि वह दावा करती है कि विहिपए वनवासी कल्याण आश्रम व बजरंग दल जैसे संगठन स्वायत्त और स्वाधीन हैं और उन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। सच यह है कि ये सभी संगठन आरएसएस द्वारा नियंत्रित संघ परिवार का भाग हैं और ये सभी भाजपा के साथ मिलकर संघ के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को साकार करने में जुटे हुए हैं। इन सब की कथनी और करनी का एक ही उद्देश्य है। कई लोग यह कहते हैं कि ये संगठन अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि आरएसएस ने इन सब संगठनों को अलग.अलग जिम्मेदारियां दे रखी हैं जिन्हें वे पूरी प्रतिबद्धता से निभाते हैं। मोदी सरकार के आने के बाद से इन संगठनों की आक्रामकता में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।
-राम पुनियानी

अप्रत्याशित फैसला

रविवार, 14 जून 2015

अप्रत्याशित फैसला

कचेहरी धमाकों के आरोपी हकीम तारिक कासमी को 24 अप्रैल 2015 को पुलिस द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों में विद्वान जज एसपी अरविंद ने दोषी पाते हुए छः बार उम्र कैद बा मशक्कत, और 50000-50000 रूपया का तीन जुर्माना की सजा सुनाई। ऐसा बहुत कम ही होता है जब पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को अदालत ने अक्षरशः स्वीकार कर लिया हो। देश के इस बहुचर्चित मुकदमे में, तारिक कासमी और स्व० खालिद मुजाहिद की बेगुनाही साबित करने वाली जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट की मौजूदगी में अभियोजन की इतनी बड़ी कामयाबी किसी चमत्कार से कम नहीं है। आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों के बाद यह पहला अवसर था जब तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी (गिरफ्तारी जाहिर किए जाने से दस दिन पहले किए गए अपहरण) के खिलाफ आन्दोलन चला, एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई, सी.जी.एम. कोर्ट आजमगढ़ में मुकदमा कायम हुआ, धरने और जन सभाएँ हुईं, अखबारों में गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले दर्जनों खबरें भी छपीं, प्रदेश सरकार ने निमेष आयोग का गठन किया उसकी रिपोर्ट में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को
अवैध मानते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। प्रदेश सरकार ने जन दबाव में इस रिपोर्ट को स्वीकार भी किया और सदन के पटल पर भी रखा लेकिन कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई। शायद यह आतंकवाद से सम्बंधित पहला मुकदमा था जिसमें प्रत्यक्षदर्शियों ने निमेष आयोग के समक्ष और अदालत में अपनी गवाहियाँ दर्ज करवाईं। अदालत को बताया कि उन्होंने हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद को क्रमशः रानी की सराय, आजमगढ़ और मडि़याहू, जौनपुर से 12 दिसम्बर और 16 दिसम्बर 2007 को एस.टी.एफ. के जवानों द्वारा अगवा करते हुए देखा था। दोनों 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार नहीं हुए थे जैसा कि एस.टी.एफ. दावा कर रही है बल्कि उस दिन गिरफ्तारी दिखाई गई थी। क्या निमेष आयोग की रिपोर्ट को मुँह चिढ़ाता बाराबंकी सेशन कोर्ट का यह फैसला उन सवालों का जवाब देता है जो जस्टिस निमेष ने अपनी रिपोर्ट में उठाए थे। यहाँ यह गौर तलब है कि निमेष आयोग के समक्ष प्रस्तुत क्षेत्राधिकारी राजेश पाण्डेय ने अपने शपथपत्र में कहा है “एस.टी.एफ. कार्यालय में एस.टी.एफ. टीम से विचार विमर्ष कर रहा था कि तभी समय करीब 2ः30 बजे द्वारा मुखबिर एस.टी.एफ. टीम के पुलिस उपाधीक्षक एस आनंद, निरीक्षक अविनाश मिश्रा, उपनिरीक्षक विनय कुमार सिंह, उप निरीक्षक धनन्जय सिंह व उप निरीक्षक ओ.पी. पाण्डेय को सूचना मिली कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास समय करीब प्रातः 6ः00 बजे आने वाले हैं, जिनके सम्बंध आतंकवादी संगठन से हैं। इनके पास घातक शस्त्र व विस्फोटक पदार्थ भी हैं जो किसी संगीन घटना को अंजाम देने की नीयत से लेकर आ रहे हैं”। (रिपोर्ट-एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-105) इस हलफनामे से स्वतः स्पष्ट होता है कि 22 दिसम्बर को तारिक और खालिद की कथित गिरफ्तारी से पहले इन दोनों के किसी आतंकवादी घटना में शामिल होने के बारे में एस.टी.एफ. को जानकारी नहीं थी। एस.टी.एफ. के अनुसार गिरफ्तारी के बाद उनके पास से हथियार और विस्फोटक बरामद हुए और पूछताछ में यह पता चला कि उनके सम्बंध आतंवादी संगठन हूजी से हैं और वह कचेहरी सीरियल धमाकों में शामिल थे। इस तरह अगर 22 दिसमबर 2007 को इन दोनों की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तारी
संदिग्ध साबित हो जाती है या यह साबित हो जाता है कि एस.टी.एफ. के जवानों ने उन्हें पहले ही अगवा कर लिया था और अपनी गैरकानूनी हिरासत में  यातना का शिकार बनाया था जैसा कि अभियुक्तों का दावा है। ऐसे में हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी से लेकर कचेहरी धमाकों में उनकी संलिप्तता का आरोप खुद ही खारिज हो जाता है और निमेष आयोग की रिपोर्ट में इस गिरफ्तारी को पूरी तरह संदेहास्पद मानते हुए यह संस्तुति कि “अतः उपरोक्त घटना क्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर विधि विरुद्ध कार्य करने वाले
अधिकारी, कर्मचारीगण को चिह्नित कर उनके विरुद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की जाती है”। (रिपोर्ट- एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-235)
    जस्टिस निमेष ने आजमगढ़, जौनपुर और बाराबंकी में घटना स्थलों का दौरा किया। स्थानीय लोगों से बात चीत की। अभियोजन पक्ष के 46 और बचाव पक्ष के 25 साक्षीगणों से शपथपत्र लिए इसके अलावा 45 अन्य गवाहों का आयोग की तरफ से परीक्षण किया गया। तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद के मोबाइल की लोकेशन उनके बयान और बचाव पक्ष के साक्षीगण द्वारा दिए गए हलफनामे की पुष्टि करती है। मिसाल के तौर पर हकीम तारिक ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसे शंकरपुर चेक पोस्ट रानी की सराय जनपद आजमगढ़ के पास से बुधवार के दिन दोपहर में सफेद टाटा सूमो सवार एस.टी.एफ. के अहलकारों ने जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया और लेकर बनारस की तरफ चले गए। उसके बाद शाम को वहाँ से लखनऊ लाए, लखनऊ में रख कर प्रताडि़त किया और 22 दिसम्बर की सुबह बाराबंकी रेलवे स्टेशन लाकर वहाँ से गिरफ्तारी दिखाई। प्रत्यक्षदर्शियों ने भी निमेष कमीशन और बाराबंकी अदालत के सामने अपनी गवाही में इसकी पुष्टि की है। इसके अलावा हकीम तारिक के मोबाइल का लोकेशन भी 12 दिसम्बर को दिन में 12ः23 बजे रानी की सराय यू०पी० (ईस्ट) की है। इस तरह मोबाइल का लोकेशन, अभियुक्त तारिक कासमी का बयान, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अखबारों में छपी खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि तारिक कासमी 12 दिसम्बर 2007 को रानी की सराय चेकपोस्ट पर थे और वहीं से उसे अगवा किया गया था। उसके बाद तारिक कासमी का कहना है कि उसी दिन शाम को उसे बनारस से लखनऊ ले जाया गया था। उसके मोबाइल का लोकेशन भी उसके बाद 13 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक का लखनऊ बताता है। तारिक कासमी के परिजनों ने भी रानी की सराय थाने में जो रिपोर्ट लिखवाई थी उसमें साफ कहा गया था कि तारिक का मोबाइल कभी आफ हो जाता है कभी आन। इसलिए उसको सर्वेलांस पर लगा कर पता किया जाए कि तारिक कहाँ है और उसे किन लोगों ने अगवा किया है? लेकिन पुलिस ने यह तकलीफ कभी नहीं उठाई। पुलिस का यह रवैया कोई पहेली नहीं बल्कि साफ संकेत था कि कुछ गलत हो रहा है और चूँकि उसमें बड़े अधिकारियों की भूमिका है इसलिए वह कुछ भी करने में असमर्थ हैं। बहुत कम मामलों में खासकर आतंकवाद से जुड़ी हुई किसी घटना में सिलसिलेवार चार-चार साक्ष्य (अभियुक्त एवं प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मोबाइल लोकेशन और अखबारों में छपी खबरें) एक दूसरे की पुष्टि करते हुए पाए जाएँ। इसके अलावा रानी की सराय थाने में लिखवाई गई रिपोर्ट और सी.जे.एम. की अदालत में किया गया मुकदमा भी इन साक्ष्यों पर अपनी मुहर लगाता है। लेकिन अदालत ने इतने मजबूत साक्ष्यों को नजरअंदाज करके हकीम तारिक को छः बार उम्रकैद और 50000-50000 रूपये के तीन जुर्माने की सजा सुनाई।
    वास्ताविकता यह है कि जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद से ही उत्तर प्रदेश के पुलिस मुहकमें में हड़कम्प मचा हुआ था। जिस प्रकार से इस केस में अभियुक्तों को गैरकानूनी हिरासत में रख कर प्रताडि़त करने और झूठा मुकदमा बनाने का आरोप प्रदेश के बड़े पुलिस
अधिकारियों पर लगा था और आयोग की रिपोर्ट में उन्हें चिह्नित कर विधि अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की गई थी इससे उन
अधिकारियों के पसीने छूट गए थे। खालिद मुजाहिद की फैजाबाद से पेशी के बाद लखनऊ वापस जाते हुए बाराबंकी में अचानक होने वाली मौत के बाद भी उन्हीं अधिकारियों पर हत्या का आरोप लगाते हुए रिहाई मंच ने लखनऊ में विधान सभा के सामने अनिश्चित कालीन धरना दिया था जो 121 दिनों तक चला था। धरने के माध्यम से भी इन
अधिकारियों की गिरफ्तारी की माँग लगातार की जाती रही थी और यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अपनी जान बचाने के लिए निमेष आयोग के अनुसार “विधि विरुद्ध कार्य करने वाले (पुलिस) अधिकारी, कर्मचारीगण” कोई खतरनाक खेल भी खेल सकते हैं या अपने पद और अपने राजनैतिक सम्पर्कों का दुरुपयोग कर सकते हैं। खालिद मुजाहिद की मौत-हत्या को भी इसी नजरिए से देखा गया था और बाराबंकी अदालत के इस फैसले के बाद अखबारों में छपने वाली प्रतिक्रिया में भी इसका अक्स साफ तौर पर देखा जा सकता है। किसी ने इसे राजनैतिक फैसला कहा है तो किसी ने दबाव में दिया गया फैसला। रिहाई मंच ने सीधे तौर पर यह आरोप लगाया कि “इस फैसले ने साफ कर दिया है कि जिस तरीके से सरकार ने बाराबंकी में झूठी बरामदगी दिखाने वाले एसटीएफ के अधिकारियों के अलावा पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह पूर्व ए.डी.जी. बृजलाल समेत 42 पुलिस आई.बी.
अधिकारियों को बचाने के लिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन नहीं लिया अब उसी काम को अदालत द्वारा करवाया जा रहा है”। (जाँच कमीशनों का सियासी खेल हुकूमत को बंद कर देना चाहिए रिहाई मंच, इनकलाब उर्दू, 27 अप्रैल, 2015, पेज-7) जजमेन्ट के पेज नं0-56 व 57 पर माननीय न्यायाधीश ने विवेचनाधिकारी पर अपनी टिप्पणी भी की है जो इस प्रकार है- ‘‘बचाव पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने अपने विस्तृत तर्कों में विवेचक पी0डब्लू0-8 के सम्बन्ध में यह आरोप लगाया कि विवेचक के द्वारा विवेचना के दौरान सत्यता जानने हेतु उन समाचार पत्रों या पत्रों की जो प्रति अभियुक्त के व्यपहरण के सम्बन्ध में उसे दी गई को विवेचना में सम्मिलित कर कोई जांच नहीं की गई, पर आरोप लगाते हुए कहा कि विवेचन ने निष्पक्ष विवेचना नहीं की बल्कि अभियुक्त के विरुद्ध फर्जी साक्ष्य गठित कर उसे दोषी साबित करने का प्रयास करता रहा। ऐसे विवेचक के द्वारा दिया गया निष्कर्ष साक्ष्य से ग्राह्य नहीं है। जहाँ तक इस सम्बन्ध में मेरी राय है, विवेचक पी0डब्लू0-8 की जिरह की स्वीकृति से जाहिर है कि बचाव पक्ष ने विवेचना के दौरान उसे अभियुक्त के गुम होने या उसे अपहृत कर ले जाने के सम्बन्ध में विवेचक को समाचार-पत्रों की जो कटिंग या उच्चाधिकारियों को प्रेषित पत्रों की जो प्रतियाँ दी गईं, उन्हें विवेचक ने विवेचना में सम्मिलित न करके विवेचना की लापरवाही अवश्य नजर आ रही है।’’
    राजनैतिक कलाबाजियाँ, अदालती दाँव-पेच, पुलिस के हथकंडे, साम्प्रदायिकता, कारपोरेट जगत के कुचक्र और एक आम नागरिक की सीमाएँ यह सब अपनी जगह, बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने अपनी आँखों से अपहरण की इस घटना को देखा, पूरे एक सप्ताह तक अखबारों में खबरें पढ़ते रहे, धरनों और प्रदर्शनों में भाग लिया या उसके साक्षी रहे, जिनकी आवाज मीडिया या सरकारी हल्कों तक नहीं पहुँच पाती है, वह इस फैसले के बारे क्या सोच रहे होंगे? वह सीधा साधा नागरिक जो अदालतों को इंसाफ का मंदिर समझता है और जिसने 22 दिसम्बर 2007 को हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले बहुत कुछ देखा, सुना और जाना था उसके मन में इस मंदिर के प्रति अब क्या तस्वीर होगी? माननीय उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर विगत में कई सख्त टिप्पणियाँ की हैं। लेकिन इस मामले का अलग महत्व है। यह मामला गाँव के किसी झगड़े की तरह नहीं है। आजमगढ़ और जौनपुर में कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें गिरफ्तारी दिखाए जाने के दिन से पहले ही इस बड़े खेल के बारे में जानकारी न हो चुकी रही हो। इस मामले की गूँज विभिन्न माध्यमों से प्रदेश और देश के जागरूक और सामाजिक सरोकार रखने वालों तक भी पहले ही पहुँच चुकी थी। ऐसे में इस फैसले से उन्हें जो आघात पहुँचा होगा उसकी भारपाई कैसे हो पाएगी। इस फैसले को एक व्यक्ति या एक परिवार किस्मत का सितम मान कर सह लेगा लेकिन न्यापालिका पर आस्था को जो चोट पहुँची है उसके जख्म लम्बे समय तक हरे रहेंगे।            
 -मसीहुद्दीन संजरी 
मो0-08090696449

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल


   
लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। 'आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं', उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं ? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है ?
मोदी,आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं,जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है। उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं। लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय.समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार.विनिमय करते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को 'हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला' कहा जाता था। उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के क्रिया.प्रतिक्रिया, के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था। दंगों के बाद पीडि़तों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' बताया था।
दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की। दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई। अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए। अहमदाबाद का मुस्लिम.बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है। जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला। उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वालेए सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। धीरे.धीरे मोदी ने अपनी भाषा और अपने शब्दों को 'स्वीकार्य' स्वरुप देना शुरू किया। वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे 'मोदित्व' कहा जाने लगा। 
सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे। उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे 'पिंक रेवोल्यूशन' बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकारए बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है। यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को . जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे . अपना बोरिया.बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था। भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये। सन्  2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था। उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का 'बदला' लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
आरएसएस ने पिछले ;2014 चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें। सत्ता में आने के बादए परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी। आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग.अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई। चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे। दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे। उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई।
हाल ;जून 2015 में दिल्ली के पास अटाली में व्यापक हिंसा हुई जहां एक अधबनी मस्जिद को गिरा दिया गया और सैकड़ों मुसलमानों को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी। इस तरह की घटनाएं देश में जगह.जगह हो रही हैं और इनसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मजबूत हो रहा है। गैर.हिन्दुओं पर'हरामजादे' का लेबिल चस्पा करने वाली मंत्री महोदया अपने पद पर बनीं हुई हैं और निहायत घटिया नस्लीय टिप्पणी करने वाले भी सत्ता के गलियारों में काबिज हैं। हिन्दुत्व के प्रतीक सावरकर और गोड़से का महिमामंडन किया जा रहा है और बहुवाद के पैरोकार नेहरू की या तो निंदा की जा रही है या उनके महत्व को कम करके बताया जा रहा है। गांधीजी को 'सफाईकर्मी' बना दिया गया है और हिन्दू.मुस्लिम एकता के उनके मूल संदेश को दरकिनार कर दिया गया है। केन्द्र सरकार के संस्थानों में ऐसे लोगों को चुन.चुनकर पदस्थ किया जा रहा है जो पौराणिकता और इतिहास में कोई भेद नहीं करते और जातिप्रथा को उचित ठहराते हैं। इनमें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के नए अध्यक्ष प्रोफेसर सुदर्शन राव शामिल हैं। आरएसएस से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाएं सरकार को यह बता रही हैं कि शिक्षा नीति क्या होनी चाहिए और स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देने की कोशिश हो रही है।
मुस्लिम समुदाय की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं? उन्हें प्रधानमंत्री से असल में क्या कहना चाहिए? उन्हें सबसे पहले ऐसी नीतियों की जरूरत है जिससे उनमें सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो। पिछले तीन दशकों में हुई व्यापक और क्रूर हिंसा ने इस समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है। हिंसा के अलावा, मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया गया और सामूहिक सामाजिक सोच को इस तरह से तोड़ा.मरोड़ा गया जिससे विघटनकारी विचारधारा को बढ़ावा मिले और मुसलमानों पर निशाना साधा जा सके। और यह सब करने के बादए पीडि़त समुदाय को ही हिंसा का जनक और कारण बताया जाता रहा है! अल्पसंख्यकों के खिलाफ तरह.तरह के दुष्प्रचार हुए और इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हुआ। जब तक मुसलमानों के खिलाफ समाज में व्याप्त गलत धारणाएं दूर नहीं की जाएंगी तब तक साम्प्रदायिक हिंसा पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।
इस तरहए पूरी व्यवस्था का ढांचागत हिन्दुत्वीकरण किया जा रहा है और बहुवाद, जो कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केन्द्रीय तत्व था, की कीमत पर सावरकर.गोलवलकर की विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है।
मुसलमानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है आर्थिक दृष्टि से उनका हाशिए पर पटक दिया जाना। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि एक मुस्लिम युवक जीशान अली खान को खुल्लमखुल्ला यह कह दिया गया कि उसके धर्म के कारण उसे नौकरी नहीं दी जा सकती और एक मुस्लिम लड़की मिशाब कादरी को उसका घर खाली करने के लिए कहा गया क्योकि वह एक धर्म विशेष में आस्था रखती थी। 'सबका साथ सबका विकास' केवल नारा रह गया है और जैसा कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह ने किसी और संदर्भ में कहा था, वह केवल एक जुमला था। किसी भी विविधतापूर्ण समाज में वंचित समुदायों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठानाए समाज और राज्य की जिम्मेदारी है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भिजवाई गई धनराशि को लौटा दिया था। सच्चर समिति की सिफारिशों की तो अब कोई चर्चा ही नहीं करता। जाहिर है कि 'सबका विकास' इस सरकार के लक्ष्यों में कतई शामिल नहीं है।
मुसलमानों का एक तबका यह तर्क दे रहा है कि मोदी का 'हृदय परिवर्तन' हो गया है और अब वे अपनी पार्टी के सांप्रदायिक तत्वों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आरएसएस की बात सुनना उनने कम कर दिया है। यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जा रहा है और इसे फैलाने वालों में ज़फर सरेसवाला और एसएम मुश्रिफ जैसे लोग शामिल हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब संघ परिवार का कोई न कोई नेता राममंदिर के निर्माण की मांग या धार्मिक अल्पसंख्यकों का अपमान न करे। और यह सब बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। घरवापसी और लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता की आग को सुलगाए रखने की कोशिश हो रही है। जो लोग'हृदय परिवर्तन' की बात कर रहे हैं वे यह नहीं जानते कि आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक, विचारधारा की दृष्टि से कितने कट्टर होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कहा था कि वे आरएसएस के स्वयंसेवक पहले हैं और प्रधानमंत्री बाद में।
कुछ आरएसएस समर्थक मुस्लिम नेता, मोदी के साथ जाना चाहते हैं और मोदी ने उन्हें वायदा किया है कि वे उनके लिए आधी रात को भी उपलब्ध रहेंगे। इन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एहसान जाफरी के साथ क्या हुआ था। वे मोदी से सहायता की भीख मांगते रहे परंतु मोदी शायद बहरे हो गए थे। जाफरी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी जहां थे, जाफरी उससे थोड़ी ही दूरी पर थे और उस समय आधी रात नहीं हुई थी।
समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी यह चाहिए कि वह जागे, आत्मचिंतन करे और बहुवाद व प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करे। मुस्लिम समुदाय को प्रजातांत्रिक ढंग से आंदोलन चलाने होंगे ताकि समुदाय के सदस्यों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। मूलाधिकारों के उल्लंघन का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। इस मामले में वे अंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं जिन्होंने प्रजातांत्रिक रास्ते पर चलकर दलितों की बेहतरी के लिए काम किया। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वो गांधी और मौलाना आजाद की राह पर चले, जो विविधता का अपनी दिल की गहराई से सम्मान करते थे न कि केवल दिखावे के लिए। मुसलमानों के लिए बिछाए जा रहे जाल में उन्हें नहीं फंसना चाहिए। खोखले शब्दों की जगह उन्हें संबंधित व्यक्तियों के कार्यों और उसकी विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए।
-राम पुनियानी