रविवार, 8 नवंबर 2015

DENGU FEVER

डेंगू की महामारी और सार्वजनिक स्वास्थ्य रक्षा व्यवस्था का अंत
अमित सेनगुप्त
एक से ज्यादा निजी अस्पतालों की उदासीनता के शिकार, सात वर्षीय बच्चे अविनाश के डेंगू के बुखार से दम तोडऩे के बाद, उसके माता-पिता के आत्महत्या कर लेने तक के बहुत ही दु:खद घटनाक्रम ने, दिल्ली में स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं की दयनीय अवस्था की पोल खोल दी है। इस पूरे घटनाक्रम पर हुए हंगामे के बाद जरूर दिल्ली सरकार ने इस समय दिल्ली में चल रही डेंगू की महामारी पर अंकुश लगाने के लिए कई कदमों की घोषणा की है। डेंगू की महामारी के दुष्प्रभाव सामने आते देखकर, बहुत से लोगों का मन यह कहने को जरूर करता होगा कि यह तो होना ही था। वास्तव में हर तीन से पांच साल में राजधानी में डेंगू बुखार का प्रकोप फूटता है। हर बार इसके चलते दिल्ली निवासियों के बीच बड़े पैमाने पर दहशत फैलती है। हर बार शहर की स्वास्थ्य सेवाएं इस संकट के सामने पूरी तरह से नाकाफी साबित होती हैं। और हर बार ही प्रशासन महामारी के असर को कम करने के लिए देरी से, ऊपर-ऊपर से कुछ कदम उठाती है।
 
देश की स्वास्थ्य व्यवस्था खुद बीमार है
 
          दिल्ली में समय-समय पर डेंगू की महामारी का फूटना, उस और बड़ी बीमारी का लक्ष्य है, जिसकी गिरफ्त में देश की स्वास्थ्य व्यवस्था है। ऐसा हर्गिज नहीं है कि हमारे देश के दूसरे इलाकों के मामले में दिल्ली पर महामारियों का ज्यादा हमला होता हो। बात सिर्फ इतनी है कि जब भी स्वास्थ्य संबंधी कोई गंभीर चुनौती सामने आती है, दिल्ली में स्वास्थ्य व्यवस्था के बैठ जाने पर मीडिया का और राजनीतिज्ञों का भी कहीं ज्यादा ध्यान जाता है। बेशक, दिल्ली में इस समय चल रही डेंगू की महामारी की गंभीरता को किसी भी तरह से कम कर के नहीं आंका जा सकता है, फिर भी यह याद दिलाना जरूरी है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के सामने स्वास्थ्य व्यवस्था की भारी विफलता, हमारे देश में अपवाद न होकर एक नियम ही है। सचाई यह है कि हमारे देश में फ्लू, चिकुनगुनिया, एन्सिफेलाइटिस, मलेरिया तथा दूसरे अनेक संक्रमणों जो हजारों मौतें होती हैं, उनमें से अधिकांश मौतें नहीं होतीं, अगर चुनौतियों के प्रति संवेदी तथा साधनों से सुसज्जित सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था काम कर रही होती। हमारे देश में टीबी जैसी बीमारियां साल-दर-साल चलती आ रही हैं और एक तरह से लोगों की जिंदगी का एक सामान्य हिस्सा ही बन गयी हैं।
          दिल्ली में हम जो देखते हैं, वास्तव में लघु रूप में पूरे देश की ही तस्वीर है। यह तस्वीर, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की लापरवाहीभरी उदासीनता के चलते स्वास्थ्य व्यवस्था के पूरी तरह से बैठ ही जाने की है। यह स्थिति दशकों से चली आ रही सरकारी उपेक्षा तथा उदासीनता से पैदा की है और तेजी से फैलते निजी स्वास्थ्य रक्षा क्षेत्र के लुटेरे तथा अनैतिक आचरण ने उसे और घातक बना दिया है।
 
डेंगू के लक्षण और उपचार
 
          डेंगू अपने आप में प्राणों के लिए खतरा पैदा करने वाला रोग तो बहुत ही दुर्लभ रूप से ही होता है और सामान्य स्थितियों में इसकी वजह से ऐसी दहशत नहीं फैलनी चाहिए, जैसी इस समय फैली हुई है। लेकिन, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के पहलू से, दिल्ली की और वास्तव में देश भर की ही स्थितियों को सामान्य तो शायद ही कहा जा सकता है। लेकिन, हम इस पर जरा बाद में चर्चा करेंगे। जहां तक डेंगू का सवाल है, यह वाइरस का संक्रमण है, जो एंडीज मच्छर के काटने से फैलता है। यह मच्छर साफ पानी में पनपता है और मलेरिया फैलाने वाले एनोफिलीज मच्छर के विपरीत, ऐंडीज मच्छर दिन में ही लोगों को काटता है। याद रहे कि मलेरिया फैलाने वाला एनोफिलीज मच्छर रुके हुए गंदले पानी में पनपता है और शाम के समय काटता है। डेंगू के लक्षण हैं--बुखार, सिरदर्द और अक्सर तेज बदन दर्द। डेंगू के बहुत से मरीजों में अपेक्षाकृत हल्के लक्षण ही सामने आते हैं और वास्तव में इसके संक्रमण की चपेट में आने वालों में से 80 फीसद के मामले में या तो डेंगू के कोई लक्षण दिखाई ही नहीं देते हैं और दिखाई भी देते हैं तो मामूली बुखार तक मामला सीमित रहता है। यहां तक कि जिन लोगों में इसके बहुत प्रबल लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे तेज बुखार तथा तेज बदन दर्द (डेंगू को शुरू में ‘हाड़ तोड़ बुखार’ के नाम से जाना जाता था क्योंकि कुछ मामलों में इससे बहुत भारी बदन दर्द होता था), उनमें से भी अधिकांश 7 से 10 दिन में पूरी तरह से स्वस्थ हो जाते हैं। डेंगू पीडि़तों के बदन पर लाल निशान प्रकट हो सकता है, जो सामान्यत: बुखार शुरू होने के 3-4 दिन बाद प्रकट होता है। बुखार, रुक-रुक के आता है यानी 3 से 5 दिन बाद बुखार उतर जाता है और उसके बाद दो-तीन दिन के लिए फिर चढ़ जाता है।
          डेंगू का कोई विशेष उपचार नहीं है क्योंकि ऐसी कोई खास दवा बनी ही नहीं है, जिसका डेंगू पैदा करने वाले वाइरस पर सीधे असर हो। बुखार और दर्द जैसे लक्षणों का उपचार, पैरासिटामॉल से किया जाता है। एस्पिरीन या अन्य दर्दनाशकर जैसे ब्रूफेन आदि डेंगू के रोगियों को नहीं दिए जाते हैं क्योंकि गंभीर रूप से संक्रमण के शिकार रोगियों में से कुछ के मामले में, इन दवाओं से रक्तस्राव की समस्या और बढ़ सकती है।
          डेंगू के रोगियों के एक छोटे से हिस्से में गंभीर जटिलताएं भी पैदा हो सकती हैं। ऐसे रोगियों के मामले में ‘डेंगू का रक्तस्रावी बुखार’ हो सकता है। डेंगू के बुखार के इस रूप में शरीर की रक्तस्राव रोकने वाली प्राकृतिक प्रणालियां अपना काम करना बंद कर देती हैं। ऐसे मरीजों के मामले में गंभीर आंतरिक रक्तस्राव हो सकता है और शरीर की रक्त प्रवाह प्रणाली ही बैठ सकती है। इससे चिकित्सकीय इमर्जेंसी की स्थिति पैदा हो जाती है, जिसे ‘‘शॉक’’ कहते हैं। अंतरिक रक्तस्राव के शुरूआती लक्षणों के रूप में रोगी की ऊपरी त्वचा के अंदर और म्यूकस मेंब्रेन में, जैसे मुंह के अंदर, खून के छोटे-छोटे धब्बे दीख सकते हैं।
          गंभीर रक्तस्राव के लक्षणों का पता, रोगी के रक्त के प्लेटलेट्स की गणना से लग सकता है। शरीर में आंतरिक रक्तस्राव को रोकने के लिए, प्लेटलेट्स की संख्या का खास स्तर तक रहना जरूरी होता है। एक सामान्य व्यक्ति के खून में 1 से 1.5 लाख प्रति घन मिलीमीटर तक प्लेटलेट होते हैं। कुछ डेंगू रोगियों के मामले में यह संख्या घटकर 50 हजार से भी नीचे चली जाती है। आमतौर पर यह संख्या घटकर 10,000 से नीचे चले जाने की सूरत में आंतरिक रक्तस्राव होने लगता है। ऐसे रोगियों को अस्पताल में भर्ती कर, प्लेटलेट चढ़ाए जाने की जरूरत होती है। वैसे तो टाइफाइड बुखार जैसे कुछ अन्य संक्रमणों के मामले में भी प्लेटलेट का स्तर घट सकता है, लेकिन डेंगू के बुखार के मामले में ही ऐसा ज्यादा होता है। फिर भी प्लेटलेट के स्तर को डेंगू के टैस्ट की तरह प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यह टैस्ट महंगा है और ज्यादा उन्नत प्रयोगशालाओं में ही इसकी सुविधा होती है। इसके अलावा, खासतौर पर जब डेंगू की बीमारी अपने आरंभिक चरण मेें हो, इस टैस्ट के जरिए निर्णायक रूप से इसका फैसला नहीं किया जा सकता है कि टैस्ट कराने वाले को डेंगू का संक्रमण नहीं हुआ है। डेंगू के वाइरस की तीन-चार किस्में आम तौर पर देखने को मिलती हैं, जिनमें से टाइप-2 और टाइप-4 को ज्यादा नुकसानदेह माना जाता है।
 
डेंगू और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था
 
          डेंगू के लक्षणों का हमने पीछे जो विवरण दिया है, उससे डेंगू की महामारी के लिए आवश्यक सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर से जरूरी प्रत्युत्तर भी परिभाषित हो जाते हैं। जैसाकि हम पहले ही कह आए हैं डेंगू के संक्रमण के ज्यादातर रोगियों के मामले में, पैरासिटामॉल के अलावा किसी खास उपचार की जरूरत ही नहीं होती है और घर पर ही उनकी देखभाल की जा सकती है। समस्या यह है कि इसका अनुमान लगाने का कोई शर्तिया उपाय नहीं है कि कहीं संबंधित रोगी में, अंतरिक रक्तस्राव तथा रक्त-प्रवाह प्रणाली के बैठने जैसे गंभीर लक्षण तो प्रकट नहीं होने जा रहे हैं। चूंकि डेंगू की शर्तिया पहचान मुश्किल है और डेंगू जैसे लक्षण चिकुनगुनिया, मलेरिया आदि दूसरे कई रोगों के मामले में भी दिखाई देते हैं, जब डेंगू की महामारी फैली हुई हो, यह जरूरी हो जाता है कि ऐसे सभी बीमारों को जिन्हें बुखार हो, संभावित रूप से डेंगू का मरीज मानकर उनके मामले में सावधानी से निगरानी की जानी चाहिए। अगर डेंगू रोग के लक्षण खास गंभीर नहीं हैं, डेंगू के टैस्ट करने से कोई खास फायदा नहीं होगा क्योंकि रोग के शुरूआती तौर पर रोगियों के मामले में भी टैस्ट का नतीजा नकारात्मक आ सकता है। दूसरी ओर रोग के  अन्य उग्र लक्षणों के साथ, प्लेटलेट काउंट टैस्ट को, जो सरल है तथा बहुत ज्यादा महंगा भी नहीं है, बीमारी के गंभीर रूप की पहचान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह, यह पूरी तरह से संभव है कि डेंगू के रोगियों को घर पर रखकर ही उनकी तबीयत पर नजर रखी जाए, बुखार तथा बदन दर्द के लिए पेरासिटामॉल देकर उनका उपचार किया जाए और उसी स्थिति में भर्ती कराया जाए जब रोग के गंभीर लक्षण दिखाई दें और/ या प्लेटलेट का स्तर तेजी से गिर रहा हो।
          डेंगू की महामारी का ऐसा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रत्युत्तर, अनेक ऐसी व्यवस्थाओं की मांग करता है, जिनमें से कोई भी किसी समुदाय में बाकायदा महामारी के फूट पडऩे के बाद स्थापित नहीं की जा सकती है। इस तरह के प्रत्यत्तर के लिए सबसे पहले तो एक उम्दा, भरोसेमंद तथा सस्ती प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा की ही जरूरत होगी। इसका अर्थ है चिकित्सकीय देख-रेख की ऐसी व्यवस्था, जो कार्यस्थलों में तथा रिहाइश की जगहों पर लोगों को आसानी से उपलब्ध हो। ऐसी व्यवस्था का आधार होगी एक प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, जो आबादी के बीच अच्छी तरह से फैली हुई डिस्पेंसरियों व बुनियादी लैबोरेटरी सुविधाओं से संपन्न स्वास्थ्य केंद्रों के ताने-बाने पर टिकी होगी। दूर-दूर तक भी ऐसी व्यवस्था से मेल खाती हुई कोई व्यवस्था न तो दिल्ली में है और न ही देश के दूसरे किसी भी हिस्से में है। यहां तक निजी क्षेत्र में भी सामान्य चिकित्सक करीब-करीब खत्म ही होते जा रहे हैं और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में बड़ी तेजी से उनकी जगह कार्पोरेट अस्पताल तथा उनके फ्रेंचाइजी लेते जा रहे हैं। जहां तक कार्पोरेट अस्पताल शृंखलाओं का सवाल है, उनकी मरीजों को बिना भर्ती किए इलाज मुहैया कराने में कोई रुचि नहीं होती है क्योंकि उनके असली मुनाफे तो अस्पताल के बैड की तगड़ी फीस, महंगी तथा अक्सर अनावश्यक जांचों और तरह-तरह के विशेषज्ञों की हर रोज की फीस से आते हैं। इन शृंखलाओं की अस्पताल से बाहर के रोगियों के उपचार की सुविधाएं भी इसी हिसाब से काम करती हैं कि रोगी को फंसाया जाए और उसे अस्पताल में भर्ती करना चाहे जरूरी हो या नहीं हो, अस्पताल में भर्ती किया जाए।
          इस तरह, हमारा सामना ऐसी स्थिति से है जहां यह सुनिश्चित करने का कोई विश्वसनीय तरीका ही नहीं है कि बुखार के पीडि़तों की हालत पर भरोसेमंद तरीके से नजर रखी जाएगी। इन स्थितियों में मरीजों के लिए इसके सिवा और कोई उपाय ही नहीं रह जाता है कि इस डर से उनका बुखार कहीं जानलेवा न हो जाए, अस्पताल में भर्ती हो जाएं। 1 करोड़ 70 लाख की आबादी वाले दिल्ली शहर में, डेेंगू के कुछ हजार पहचानशुदा मामले कभी भी दहशत का कारण नहीं बने होते, बशर्ते चिकित्सा सेवाएं ही पूरी तरह से बैठ नहीं गयी होतीं। और चिकित्सा सेवाएं कोई इसलिए नहीं बैठ गयी हैं कि डेंगू की महामारी फूट पड़ी है बल्कि चिकित्सा सेवाएं तो पहले से ही बैठी हुई थीं और जब भी कोई मामूली सी भी स्वास्थ्य संबंधी चुनौती सामने आती है, मिसाल के तौर पर अब से कुछ ही महीने पहले फ्लू की महामारी फूटी थी और अब डेंगू की महामारी फूटी है, चिकित्सा सेवाओं के इस तरह बैठ चुके होने की सचाई बलपूर्वक सामने आ जाती है। आज स्थिति यह है कि दिल्ली के सार्वजनिक तथा निजी, सभी अस्पताल, डेंगू के ऐसे मरीजों से ठसाठस भर गए हैं, जो अस्पताल में भर्ती ही नहीं हुए होते, बशर्ते बुनियादी स्वास्थ्य रक्षा सुविधाएं उपलब्ध होतीं और उनकी पहुंच में होतीं।
          यह भी याद रखना चाहिए कि दिल्ली में डेंगू फूटने का अनुमान लगाने के लिए, किसी बहुत भारी विशेषज्ञता की भी जरूरत नहीं थी। जैसाकि हमने पहले ही कहा, दिल्ली में डेंगू की तीव्रता में हर तीन से पांच साल में एक बार तेजी आती है और पिछली बार ऐसी बड़ी तेजी, पांच साल पहले आयी थी। इसके बावजूद, इस बार जब यह महामारी फूटी, दिल्ली की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था इसके लिए जरा सी भी तैयार नहीं थी। काफी समय बर्बाद हो जाने के बाद, अब कहीं जाकर इसकी पहचान की कोशिशें हो रही हैं कि इस बार इस रोग के फैलने के पीछे वाइरस की कौन सी किस्म है और कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि इस बार, कहीं ज्यादा नुकसानदेह टाइप-2 तथा टाइप-4 का विस्फोट हुआ है।
 
अविनाश को बचाया जा सकता था
 
          सात वर्षीय अविनाश के मां-बाप ने दिल्ली के कुछ सबसे चमक-दमक वाले ओैर महंगे अस्पतालों में अपने बच्चे को भर्ती कराने की हताश कोशिशों में अपनी जिंदगी के कुछ सबसे मुश्किल घंटे गुजारे थे। अगर एक के बाद एक अस्पताल ने बैड खाली न होने के नाम पर उसे भर्र्ती करने से मना नहीं कर दिया होता, तो अविनाश जिंदा होता और शायद बिस्तर पर बैठा खाना मांग रहा होता। इन अस्पतालों में से किसी ने भी इसकी जांच-पडताल करने के जरूरत ही नहीं समझे कि उसके रोग लक्षण कितने गंभीर हो चुके थे। वास्तव में अविनाश के मां-बाप तो दिल्ली के उन अपेक्षाकृत खुशनसीब लोगों में आते थे, जो कुछ मुश्किलें उठाकर ही सही, इस तरह के पांच सितारा अस्पतालों में वसूल की जाने वाली फीस दे सकते हैं, हालांकि अविनाश के मामले में इन अस्पतालों ने इसका मौका ही नहीं दिया। सचाई यह है कि हर रोज दिल्ली में कितने ही अस्पतालों से, तकलीफ  से हांफते हुए मरीजों को सिर्फ इसलिए लौटा दिया जाता है कि वे अस्पतालों की फीस नहीं भर सकते हैं। निजी अस्पतालों में, आर्थिक रूप से कमजोर तबके के लोगों को सुरक्षित बैड, जान-बूझकर खाली रखे जाते हैं। आज देश में जिस तरह की अमानवीय स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली का निर्माण किय जा रहा है, वह मुनाफे से चलती है न कि इंसानी जिंदगियां बचाने में अपनी कामयाबी से।
          यह विडंबनापूर्ण है कि अविनाश के मां-बाप दिल्ली के दो सबसे बड़े सरकारी अस्पतालों--सफदरजंग तथा ए आइ आइ एम एस--से चंद किलोमीटर की ही दूरी पर रहते थे। लेकिन, उनके ख्याल में भी नहीं आया कि अपने बच्चे को इनमें से किसी अस्पताल में ले जाते। लेकिन, इसके लिए अविनाश के मां-बाप को दोष नहीं दिया जा सकता है। वे तो उसी धारणा से संचालित थे, जो एक के बाद एक आयी सरकारों द्वारा बराबर फैलायी तथा पनपायी जाती रही है। हर रोज हमें तरह-तरह से यही सिखाया जाता है कि सार्वजनिक सेवा का मतलब ही है, घटिया सेवा। इतना ही नहीं, हर गुजरने वाले दिन के साथ सार्वजनिक सेवाओं को संसाधनों से ज्यादा से ज्यादा वंचित किया जाए जा रहा है और ऐसी स्थितियां पैदा की जा रही हैं कि उन पर से जनता का भरोसा पूरी तरह से ही उठ जाए। याद रहे कि अविनाश की मौत के चंद रोज बाद, छ: वर्षीय अमन की मौत से पहले, उसके माता-पिता ने पांच-पांच निजी अस्पतालों के अलावा सरकारी अस्पताल सफदरजंग का भी दरवाजा खटखटाया बताते हैं, लेकिन उनके बच्चे का इलाज नहीं हुआ और अंतत उसने भी अविनाश की तरह दम तोड़ दिया।
          अगर एक संवेनशील सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था मौजूद होती तो हम इसकी कल्पना कर सकते हैं कि दोनों बच्चों को नजदीकी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधा में जाया गया होता, वहां उनकी दशा पर नजर रखी गयी होती और अगर जरूरत पड़ती तो उन्हें तमाम जरूरी सुविधाओं से संपन्न सार्वजनिक अस्पताल में उपचार मिला होता। अंत में एक हंसता-खिलखिलाता बच्चा, अपने मां-बाप के हाथ थामे अस्पताल से घर लौटता। ज्यादातर सभ्य समाजों में यह दृश्य आम है। लेकिन, भारत में तो हमें ज्यादातर कुछ और ही तस्वीर देखने को मिलती है। यह तस्वीर है ऐसी निष्ठïुर व्यवस्था की, जिसकी मुनाफे की हवस और जनता के कल्याण की निर्मम उदासीनता, पूरे के पूरे परिवारों के लिए जानलेवा साबित होती है।
 
एक लापरवाह और अमानवीय व्यवस्था
 
          कहते हैं जब रोम जल रहा था, नीरो बांसुरी बजा रहा था। आज भी ऐसे बेमौके की बांसुरी बजाने वालों की भरमार है, जो सार्वजनिक स्वावस्थ्य व्यवस्था की विफलता पर खुश होते हैं और उस दिन के इंतजार में हैं जब आखिरकार इसके दम ही तोड़ देेने का एलान कर दिया जाएगा। इसीलिए तो, स्वास्थ्य मंत्रालय की इसका हल्का सा इशारा करने की कोशिश पर भी, कि राष्टï्रीय स्वास्थ्य नीति के मसौदे में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता मिलनी जाहिए, नीति आयोग द्वारा बुरी तरह से झिडक़ दिया जाता है। स्वास्थ्य मंत्रालय को भेजी अपनी चि_ïी में (जिसके कुछ अंश अब से एक-दो हफ्ते पहले प्रैस के हाथ लग गए थे) नीति आयोग ने लिखा था: ‘यह भले ही किसी को नैतिक रूप से गर्हित ही क्यों न लगे, दो-तल्ला स्वास्थ्य रक्षा की इस व्यवस्था को--एक उनके लिए जिनके पास साधन हैं तथा जिनकी आवाज सुनी जाती है और दूसरी उनके लिए जो बेआवाज तथा निरुपाय हैं, अल्पावधि में तथा यहां तक कि मध्यम अवधि में भी बने रहना होगा क्योंकि मरीजों के बोझ के बड़े हिस्से को निजी से हटाकर सार्वजनिक क्षेत्र पर डालना साज-सामान के लिहाज से नामुमकिन होगा।’’ नीति आयोग ने इसके अलावा स्वास्थ्य पर सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी की सिफारिश करने की नीति की भी यह कहते हुए आलोचना की है कि, ‘‘हमें इसका आकलन करना पड़ेगा कि कहीं निवेश में भारी बढ़ोतरी करना, बढ़ोतरी के घटते लाभ के नियम का शिकार तो नहीं हो जाएगा और इससे राज्य स्वास्थ्य प्रणालियों की बढ़ोतरी खपाने की सामथ्र्य के लिए जो चुनौती पैदा होगी, वह अलग।
          जब इस तरह के बांसुरी बजाने वाले नीति गढऩे का जिम्मा संभाले हुए हैं, अगर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की हालत खस्ता है तो इसमें अचरज की क्या बात है? बेशक, एकाध महीने में दिल्ली की कड़ाके की सर्दी, डेंगू की महामारी पर खुद ही रोक लगा देगी। लेकिन, मौजूूदा शासक वर्ग में ममता का लेशमात्र भी न होना, देश भर में हजारों बच्चों के लाचार माता-पिता को तो फिर भी सालता ही रहेगा। अविनाश के साथ जो हुआ, पूंजीवाद की संवेदनहीन तथा अमानवीय प्रकृति की ही याद दिलाता है।    
 
 

किसानों को खेती से खदेडऩे का खेल

एक साल बुरा हाल - भाजपा सरकार का खतरनाक एजेंडा सामने आया किसानों को खेती से खदेडऩे का खेल

एक साल बुरा हाल - भाजपा सरकार का खतरनाक एजेंडा सामने आया
किसानों को खेती से खदेडऩे का खेल
- वीजू कृष्णन
भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इसका वादा किया गया था और खुद नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि भाजपा की सरकार किसानों के ‘अच्छे दिन’ लाएगी और किसानों की आत्महत्याएं खत्म कराएगी। वादा किया गया था कि भाजपा की सरकार खेती के लिए तथा ग्रामीण विकास के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाएगी, किसानों के लिए उत्पादन लागत के ऊपर से 50 फीसद दिलाकर खेती की लाभकरता बढ़ाने के लिए कदम उठाएगी, खेती की लागत सामग्री व ऋण सस्ते मुहैया कराएगी, खेती में आधुनिकतम प्रौद्योगिकियां तथा ज्यादा पैदावार देने वाले बीज लाएगी, मनरेगा को खेती से जोड़ेगी, अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से फसल के नुकसान की भरपाई करने के लिए फसल बीमा लागू करेगी, ग्रामीण ऋण सुविधाओं का विस्तार करेगी, किसानों को विश्व बाजार में कीमतों में बहुत भारी-उतार चढ़ावोंं से बचाने के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष कायम करेगी, आदि आदि।
वादे और कठोर सचाई
          भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में यह वादा भी किया गया था कि ‘‘भाजपा, राष्टï्रीय भूमि उपयोग नीति अपनाएगी, जो अनुपजाऊ जमीन के वैज्ञानिक अधिग्रहण तथा उसके विकास को देखेगी, किसानों के हितों की रक्षा करेगी और खाद्य उत्पादन के लक्ष्यों को तथा देश के आर्थिक लक्ष्यों को ध्यान में रखेगी।’’ 60 वर्ष से अधिक आयु के किसानों के लिए कल्याणकारी कदमों का और छोटे व सीमांत किसानों व खेत मजदूरों के लिए कल्यणकारी कदमों का भी भरोसा दिलाया गया था। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में और नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों में शब्दश: भारतीय किसानों की ‘‘मन की बात’’ को सूचीबद्घ ही किया जा रहा था। किसान इससे ज्यादा और मांग भी क्या सकते थे?
          मोदी के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार के राज में खेती का संकट और बढ़ गया है। खेती की वृद्घि दर में भारी गिरावट हुई है और यह दर 2014 के 3.7 फीसद से घटकर, सिर्फ 1.1 फीसद पर आ गयी है। 2014 के दिसंबर में, जब मोदी सरकार के छ: महीने ही हुए थे, मध्यावधि आकलन में किसानों की आत्महत्याओं में 26 फीसद बढ़ोतरी हुई थी। भाजपा शासित महाराष्टï्र में यह बढ़ोतरी 40 फीसद थी। 2014 के अगस्त से 2015 के बीच किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा तेजी से बढक़र 1,373 पर पहुुंच गया। बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टिï से देश भर में करीब 2 करोड़ हैक्टेयर में खड़ी फसलों का भारी नुकसान होने और सरकार के इस संकट के प्रति उदासीन बने रहने के चलते, किसानों की आत्महत्याओं में और तेजी आयी है। हरियाणा, पंजाब, गुजरात, प0 बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी अभूतपूर्व पैमाने पर किसान आत्महत्याएं हुई हैं। हरियाणा में ही 2015 के अप्रैल के बाद से 60 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। बजाए इसके कि इन मुसीबत के मारे किसानों के परिवारों की तकलीफों को दूर किया जाता, उन्हें असरदार तरीके से मुआवजा दिया जाता और किसानों के बीच भरोसा पैदा करने के लिए फौरन कदम उठाए जाते, हरियाणा की भाजपायी सरकार के कृषि मंत्री ने घोर असहिष्णुतापूर्ण टिप्पणी करते हुए, हताशा में आत्महत्या करने वाले किसानों को ‘‘कायर’’ और ‘‘अपराधी’’ ही करार दे दिया। महाराष्टï्र में भी भाजपा के मंत्रियों ने ऐसी ही असंवेदनशील टिप्पणियां की थीं। केंद्रीय कृषि मंंत्री ने संसद में यह दावा किया किया था कि हरियाणा में एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है। भाजपा की सरकार की तरह की आपराधिक नकार की मुद्रा ही अपनाए हुए है और न सचाई को स्वीकार कर रही है और न इस सिलसिले में कुछ भी कर रही है।
 
किस का साथ किस का विकास
          अपने चुनाव प्रचार अभियान के भाषणों में मोदी का सबसे ज्यादा जोर इस पर था कि उत्पादन लागत के ऊपर से कम से कम 50 फीसद अतिरिक्त दिलाने के जरिए, किसानों के लिए लाभकरता बढ़ाायी जाएगी। मोदी सरकार ने सबसे बड़ा धोखा इसी मामले में किया है। भाजपा की सरकार ने गेहूं तथा धान के दाम में सिर्फ 50 रु0 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है और ज्यादातर दूसरी पैदावारों के मामले में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई बढ़ोतरी ही नहीं की है। 20 फरवरी 2015 को इस भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहा था कि किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसद अतिरिक्त देना संभव ही नहीं है। इसके ऊपर से लागत सामग्री के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं और भाजपा की सरकार ने उनके दाम पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ किया ही नहीं है।
          इस तरह खेती की पैदावार के दाम तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य अलाभकर ही बने हुए हैं और उनसे खेती की लागत तक पूरी नहीं होती है। इसके ऊपर से सरकारी खरीद की व्यवस्था को तेजी से ध्वस्त किया जा रहा है और निजी खिलाडिय़ों को मुसीबत के मारे किसानों का शोषण करने का मौका  दिया जा रहा है। कटे पर नमक छिडक़ने वाली बात यह कि भाजपा की केंद्र सरकार ने यह फरमान भी जारी कर दिया है कि कोई भी राज्य गेहूं या धान के लिए तय किए गए समर्थन मूल्य पर कोई बोनस नहीं दे सकता है और जो भी राज्य ऐसा बोनस देगा, वहां से भारतीय खाद्य निगम खरीदी नहीं करेगा। यह फरमान इस बहाने से किया गया है कि इस तरह का बोनस ‘‘बाजार को बिगाड़ता’’ है।
          मोदी सरकार ने किसानों से खाद्यान्न की सरकारी खरीद करने वाली एजेंसी, भारतीय खाद्य निगम को ध्वस्त करने और 2013 के खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत मिलने वाली खाद्य सुरक्षा को कमजोर करने के कदम भी तेज कर दिए हैं। हालांकि, विश्व व्यापार संगठन में यह सरकार इसका दिखावा कर रही थी कि देश के किसानों के हितों तथा खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, वास्तव में यह सरकार खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम तथा सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रमों को कमजोर करने के जरिए, ठीक वहीं सब कर रही है, जिसकी मांग अमरीका तथा योरपीय यूनियन और विश्व व्यापार संगठन द्वारा की जा रही थी। किसी भी तरह का सार्थक मूल्य स्थिरीकरण कोष कायम करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। साफ है कि यह सरकार किसानों की कीमत पर बड़े कृषि उद्यमियों और व्यापारियों के ही हितों की रक्षा करना चाहती है।
निवेश में कटौतियां
          खेती में और ग्रामीण विकास में सार्वजनिक निवेश में भारी कटौती की गयी है। कृषि ऋणों तक किसानों के बड़े हिस्से की पहुंच ही नहीं है और लुटेरे सूदखोर महाजन किसानों को बेरोक-टोक लूट रहे हैं। संस्थागत ऋणों का बड़ा हिस्सा कृषि कारोबारियों और ‘‘शहरी काश्तकारों’’ ने ही हथिया लिया है। राष्टï्रीय नमूना सर्वेक्षण का एक ताजा सर्वे (70 वां चक्र, जनवरी-दिसंबर 2013), ‘भारत में खेतिहर परिवारों की स्थिति का सर्वे’ बताता है कि भारत में 60 फीसद से ज्यादा ग्रामीण परिवार कर्ज के बोझ के नीचे दबे हुए हैं और आंध्र प्रदेश में ऐसे परिवारों का हिस्सा 92.9 फीसद है। फिर भी भाजपा की सरकार ने ग्रामीण परिवारों को कर्ज के बोझ से राहत दिलाने के लिए, संस्थागत ऋणों तक उनकी पहुंच बढ़ाने के लिए या सस्ते ऋण मुहैया कराने के लिए कुछ भी नहीं किया है। 2014-15 के बजट में कृषि तथा सहायक गतिविधियों के लिए 11,531 करोड़ रु0 का आवंटन रखा गया था, जिसमें बहुत मामूली बढ़ोतरी कर, 2015-16 के बजट में इसे सिर्फ 11,657 करोड़ रु0 किया गया है। जाहिर है कि वास्तविक मूल्य के हिसाब से इसमें कोई बढ़ोतरी ही नहीं हुई है।
          मनरेगा में भारी कटौती की गयी है और उसके लिए फंड ही नही मिल रहे हैं। भाजपा की सरकार इसे मौजूदा 6,576 ब्लाक से घटाकर,  2500 ब्लाकों तक सीमित कर देना चाहती है। याद रहे कि 2014-15 में केंद्र और राज्यों की सरकारों ने मिलकर यह अनुमान लगाया था कि मनरेगा के तहत 227 करोड़ कार्यदिवस के रोजगार की मांग आयेगी और इस मांग को पूरा करने के लिए उसी वित्त वर्ष में 61,000 करोड़ रु0 के आवंटन की जरूरत होगी। लेकिन, भाजपा की सरकार ने 2014=15 के बजट में इसके लिए सिर्फ 34,000 करोड़ रु0 का आवंटन किया और इस तरह अनुमानित राशि का 45 फीसद पहले ही काट लिया। 2015-15 के बजट में मनरेगा के लिए सिर्फ 34,699 करोड़ रु0 का आवंटन किया गया है। यह वास्तविक जरूरत से बहुत ही कम है।
          इसी तरह छोटे तथा मंझले किसानों और खेत मजदूरों के लिए कुछ भी नहीं किया गया है, जो घटती आय और बढ़ती कीमतों की दुहरी चक्की में पिस रहे हैं। देश में 600 जिले हैं और इसे देखते हुए सिंचाई तथा ऑर्गनिक खेती के  लिए कुल 5,600 करोड़ रु0 का आवंटन, इन दोनों योजनाओं के लिए हर जिले के लिए औसतन 9 करोड़ रु0 का आवंटन बैठता है। इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इतने मामूली खर्च से न तो सिंचाई में कोई बढ़ोतरी हो सकती है और न ऑर्गनिक खेती को कोई बढ़ावा मिल सकता है।
धोखा ही धोखा
          अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से फसलों के नुकसान की भरपाई करने के लिए चौतरफा कृषि बीमा योजना के वादे को भुला ही दिया गया है। हाल में आयी बेमौसमी बारिश तथा ओलावृष्टिï से हुई फसलों की भारी तबाही के बाद, भाजपा की सरकार ने पूरी तरह फसल तबाह होने का रकबा घटाकर वास्तविकता से करीब आधा कर दिया और इस तरह, करोड़ों किसानों को मुआवजे के दायरे से बाहर ही कर दिया। इसके बाद उसने करीब 12,000 रु0 प्रति एकड़ के मुआवजे का एलान किया और दावा किया कि यह अब तक का सबसे ज्यादा मुआवजा है। इस सिलसिले में यह उल्लेखनीय है कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में, जहां इस आपदा के बाद हताशा में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, ज्यादातर मामलों में किसानों को कोई मुआवजा ही नहीं मिला था। यह भी गौरतलब है कि हरियाणा में कुछ हिस्सों में तो खेती के लिए जमीन का किराया ही करीब 45,000 रु0 प्रति एकड़ बैठता है। पैदावार की बाकी जो लागत आती है, ऊपर से आती है। ऐसे में 12,000 रु0 प्रति एकड़ का मुआवजा मिलने के बाद भी, किसान के सिर पर तो कर्ज का भारी बोझ रहेगा ही। इसके ऊपर से देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को मुआवजे के तौर पर 5 रु0, 63 रु0, 200 रु0 आदि के भी चैक दिए गए हैं। किसानों के सभी तबकों की आय में गिरावट का नतीजा यह हुआ है कि उन्हें अपनी परिसंपत्तियां बेचनी पड़ रही हैं और जहां ऐसा नहीं है वहां भी वे नयी प्रौद्योगिकी में, ट्रैक्टर आदि में और सिंचाई के बुनियादी ढांचे में निवेश नहीं कर पा रहे हैं।
          उधर भूमि अधिग्रहण कानून के मामले में भाजपा पूरी तरह से पल्टी मार गयी है। इस कानून पर अपने पहले के रुख से पलटते हुए भाजपा ने 2014 के दिसंबर में अध्यादेश के जरिए उक्त कानून में संशोधन थोप दिए। इन संशोधनों से कार्पोरेट मुनाफाखोरी के लिए और अचल संपत्ति के सट्टïाबाजार के लिए, किसानों की जमीनें लेना आसान हो जाएगा। वास्तव में इस सरकार ने 1894 के गुलामी के जमाने के भूमि अधिग्रहण कानून के सबसे दमनकारी प्रावधानों को ही वापस ला दिया है और अधिग्रहण के लिए उन पर स्वामित्व अधिकार रखने वाले किसानों और संबंधित भूमि पर निर्भर अन्य लोगों की सहमति हासिल करने की शर्त को हटा दिया है। इसके साथ ही इस तरह के अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव के अध्ययन की व्यवस्था को भी पूरी तरह से हटा दिया गया है।
          संशोधन कर जोड़ी गयी नयी धारा-10 (ए) के तहत, अनेक प्रकार की परियोजनाओं को उक्त शर्तों के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इनमें विशेष श्रेणी में रखे गए पांच आइटमों में औद्योगिक कॉरीडोर तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के अंतर्गत आने वाली ढांचागत परियोजनाओं को भी रखा गया है। चूंकि ज्यादातर अधिग्रहण इन्हीं दो श्रेणियों में होता है, यह संशोधन 2013 में संसद द्वारा पारित कानून में रखी गयी न्यूनतम बचाव व्यवस्थाओं को भी पूरी तरह से नकारने का ही काम करेगा। इतना ही नहीं औद्योगिक कॉरीडोर की परिभाषा का विस्तार कर उसमें अधिसूचित सडक़ या रेल मार्ग के दोनों ओर की एक-एक किलोमीटर तक की जमीन ऐसे औद्योगिक कॉरीडोर के लिए जाने का प्रावधान शामिल कर लिया गया है। एक गणना के अनुसार, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर के मामले में, जो देश के छ: राज्यों से होकर गुजरता है, कुल मिलाकर करीब 7 लाख वर्ग किलोमीटर यानी देश की खेती की कुल जमीन के 17.5 फीसद का, जबरिया अधिग्रहण किया जा रहा होगा।
          इस तरह की व्यवस्था में खाद्य सुरक्षा की रखवाली का भी कोई प्रबंध नहीं होगा क्योंकि बिना किसी रोक-टोक के उपजाऊ बहुफसली जमीनों का और असिंचित उत्पादक जमीनों का अधिग्रहण किया जा सकेगा। इसके साथ ही, भूमि के मालिकों तथा भूमि पर निर्भर दूसरे लोगों के पुनर्वास तथा पुनर्वसन की थोड़ी-बहुत भी व्यवस्था की सारी संभावनाओं को पूरी तरह से छोड़ दिया गया है। राष्टï्रीय और राज्य, दोनों ही स्तरों पर भूमि उपयोग नीति तय करने का कोई प्रस्ताव ही नहीं है। जमीन गंवाने वाले हरेक परिवार में से एक व्यक्ति को रोजगार दिलाने का सरकार के वादे का एक ही अर्थ है कि पूरे के  पूरे परिवार को उसके आय के मुख्य स्रोत से अलग करने के बाद, नाम के वास्ते परिवार में से एक व्यक्ति को रोजगार दे दिया जाएगा। इस मामले में भूमि पर निर्भर अन्य तबकों के लिए भी कोई प्रावधान ही नहीं है।
          साफ है कि इस एक साल में मोदी सरकार ने अपना हरेक  वादा तोड़ा है। मोदी के नेतृत्ववाली सरकार किसानों को कंगाल बनाने तथा बेदखल करने की और इस तरह उन्हें खेती छोडऩे पर मजबूर करने की सोची-समझी नीति पर चल रही है। इसी के हिस्से के तौर पर यह सरकार खेती के लिए सरकारी मदद से हाथ खींच रही है और आक्रामक तरीके से व्यापार उदारीकरण की नीति और अनेकानेक नवउदारवादी नीतियों पर चल रही है। अडानी, अंबानी आदि आदि के अच्छे दिन लाने के लिए, किसानों तथा खेत मजदूरों के हितों की बलि चढ़ायी जा रही है।                                                0