शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े और NEET व अन्य परीक्षाओं में जवाबदेही की मांग को लेकर, 20 जुलाई को संसद तक मार्च के बारे में JSA का बयान
युवाओं का ऐतिहासिक जमाव! पुलिस की बर्बर कार्रवाई! जारी आंदोलन को समर्थन देने की ज़रूरत!
भारत में वह सभी लोग जो निष्पक्ष और मानवीय शिक्षा व्यवस्था के लिए संघर्ष करते हैं, वह 20 जुलाई 2026 को ज़रूर याद रखेंगे । इस दिन एक ऐसी व्यवस्था के लिए अभूतपूर्व आन्दोलन किया गया - जहाँ कोई मेडिकल का छात्र आत्महत्या न करे, क्योंकि सरकार परीक्षा का पेपर लीक रोकने में नाकाम रही, और न ही कोई नौ साल की बच्ची क्लासरूम में बुलीइंग (धौंस-धमकी) के कारण अपनी जान दे।
इस दिन हमने न सिर्फ़ दिल्ली-NCR ही नहीं, बल्कि पूरे देश से आए छात्रों और युवाओं की एक ऐतिहासिक रैली देखी। इसमें कुछ NEET उम्मीदवारों के परिवार वाले भी शामिल हुए, जिनके बेटे – बेटियों ने अपनी जान दे दी थी। उनकी साफ़ मांग थी: न सिर्फ़ खराब, बाजारी और भ्रष्ट शिक्षा व्यवस्था के लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा ही नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था में बदलाव, जो पिछले एक दशक में देश के युवाओं को अच्छी और सस्ती शिक्षा और रोज़गार देने में नाकाम रही है।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और भारत के कई छात्र संगठनों - जिनमें AISA, SFI और AISF शामिल हैं - ने 20 जुलाई को संसद तक मार्च करने का आह्वान किया था। इसी दिन संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने वाला था। यह आह्वान दिल्ली के जंतर-मंतर पर 6 जून से चल रहे एक महीने लंबे धरने के दौरान किया गया था। इस धरने में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और छह से ज़्यादा यूनिवर्सिटी छात्रों की 22 दिन की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल भी शामिल थी। कई अन्य शहरों में भी रैलियां और धरने आयोजित किए गए, जिनमें बड़ी संख्या में युवा शामिल हुए।
JSA उन सभी लोगों के उत्साह और हिम्मत को सलाम करता है, जो 20 दिनों से ज़्यादा समय तक भूख हड़ताल पर थे; साथ ही मार्च में शामिल लोगों की हिम्मत और उनके अहिंसक रवैये की भी तारीफ़ करता है। खासकर तब जब उन्हें चुप कराने के लिए क्रूर हिंसा का सहारा लिया जा रहा था। यह बहुत ही उत्साहजनक है, कि मात्र एक दिन के भीतर ये प्रदर्शनकारी फिर उसी जंतर-मंतर पर लौट आए, जहाँ से उन्हें बेरहमी से हटाया गया था।
JSA ने इन युवाओं के साथ पहले भी एकजुटता दिखाई है, और एक बयान जारी किया है। इस बयान में मेडिकल शिक्षा और NEET प्रक्रिया में मौजूद गंभीर खामियों के बारे में विस्तार से बताया गया है, साथ ही इस व्यवस्था को अधिक उत्तरदायी और न्यायसंगत बनाने के लिए आवश्यक सुधारों का भी उल्लेख किया गया है। इस विरोध-प्रदर्शन में उठाए गए कई मुद्दे वैसे ही थे, जिन्हें JSA लंबे समय से उठाता रहा है - जैसे कि मेडिकल शिक्षा का निजीकरण, प्रवेश परीक्षाओं के संचालन में गंभीर खामियाँ, तथा स्वास्थ्यकर्मियों और MBBS छात्रों के उत्पीड़न।
JSA के कई सदस्य और उससे जुड़े संगठन 20 जुलाई को संसद तक हुए मार्च में शामिल हुए। अफ़सोस की बात है कि विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर हम सब एक साथ नहीं आ पाए, क्योंकि सरकार ने इंटरनेट और फ़ोन कॉल में रुकावट डालने के लिए सिग्नल जैमर लगा दिए थे । इससे लगभग 2 किलोमीटर के दायरे में बातचीत करना असंभव हो गया था। लोगों की भारी भीड़ और विरोध प्रदर्शन वाली जगह के चारों ओर लगे कई बैरिकेड्स की वजह से भी, वहाँ आने-जाने में काफ़ी दिक्कतें आईं। आस-पास के सभी मेट्रो स्टेशनों को बंद कर दिए जाने के कारण विरोध प्रदर्शन वाली जगह तक पहुँचना भी मुश्किल हो गया था।
इतने दमनकारी कदमों के बावजूद, दसियों हज़ारों की संख्या में जोशीले युवा वहाँ आते रहे। वे ऐसे प्लेकार्ड लिए हुए थे जिन पर रचनात्मक नारे लिखे थे, जो विरोध करने व बेहतर शिक्षा पाने के उनके संवैधानिक अधिकारों को ज़ाहिर करते थे, साथ ही मौजूदा सरकार की नाकामियों को भी उजागर कर रहे थे। संगठनों और सोशल मीडिया की मदद से बड़े पैमाने पर लोगों को लामबंद किया गया था, और संसद की ओर बहुत बड़े मार्च निकाले गए। लेकिन दोपहर में, पुलिस ने जंतर-मंतर समेत कई जगहों पर शांतिपूर्ण मार्च करने वालों पर बेरहमी से हमला किया। पुलिस की यह हिंसा देर शाम तक चलती रही। कई लोगों पर लाठीचार्ज किया गया, जिनमें ऐसे लोग भी शामिल थे जो पुलिस से भागते समय गिर गए थे। बड़ी संख्या में आंसू गैस के गोले भी छोड़े गए। हमारे सूत्रों ने पुष्टि की है कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को जख्मों के इलाज के लिए इमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया गया, जिनमें से कुछ ICU में हैं। सिर्फ एक अस्पताल - राम मनोहर लोहिया अस्पताल में ही कम से कम 65 लोगों का गंभीर चोटों के लिए इलाज किया गया, 15 को भर्ती किया गया और कुछ की हालत अभी भी गंभीर है।
एक और बहुत परेशान करने वाली बात यह है कि पुलिस ने कई ऐसे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ भी मारपीट की, जो घायल प्रदर्शनकारियों का इलाज कर रहे थे। यह जिनेवा कन्वेंशन का खुला उल्लंघन है, जो स्वास्थय कर्मियों के साथ-साथ बीमार और घायल लोगों की सुरक्षा करता है। स्वास्थ्य कर्मियों पर हमला करके, पुलिस ने घायलों को इमरजेंसी इलाज भी नाकारा।
इस बर्बरता का सामना करने वाले कई कार्यकर्ताओं ने, एक और गंभीर चिंता की बात बतायी । उनके अनुसार, पीटने वाले कई लोग वर्दी में नहीं थे, और उनके पास पुलिस का कोई बैज भी नहीं था। अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे निहत्थे युवाओं पर सादे कपड़ों में आए इन लोगों ने बेरहमी से हमले किए । इन व्यक्तियों को निश्चित रूप से उच्च स्तर से संरक्षण मिल रहा होगा । इसके अतिरिक्त, पेलेट गन से लोगों के घायल होने, तथा बैरिकेडों में बिजली का प्रवाह छोड़े जाने के कारण प्रदर्शनकारियों को करंट लगने की भी रिपोर्टें सामने आई हैं।
हमें इस बात से बहुत चिंतित हैं, कि सरकार कई महीनों से युवाओं की जायज मांगों पर उनसे किसी भी तरह की बातचीत करने से इनकार कर रही है। बातचीत के लोकतांत्रिक नियमों को मानने और अपनी नाकामियों की ज़िम्मेदारी लेने के बजाय, सरकार ने पूरी तरह से अलोकतांत्रिक रवैया अपनाया है। पहले सोनम वांगचुक और कई अन्य लोगों को भूख हड़ताल पर बैठने के लिए मजबूर किया, और अब देश की राजधानी की सड़कों पर युवाओं पर सीधे हमले करके अपनी दमनकारी कार्रवाई को और बढ़ा दिया है।
JSA हज़ारों शांतिपूर्ण और निहत्थे छात्रों, युवाओं और कई स्वास्थ्य कर्मियों पर हुई पुलिस की इस बर्बरता की कड़ी से कड़ी निंदा करता है। हम मांग करते हैं कि छात्रों पर हुए इस बर्बर हमले में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ तुरंत कार्रवाई की जाए, और निर्देश देने वाले पदों पर बैठे सभी संबंधित अधिकारियों की ज़िम्मेदारी तय की जाए । साथ ही NEET और अन्य परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं और विफलताओं के लिए भी जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
इस ऐतिहासिक मोड़ पर, हम सभी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और लोकतांत्रिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे उभरते हुए युवा और सामाजिक आंदोलन को समर्थन दें, इस दिशा में हम मिलकर काम करें। हमें उन दमनकारी व्यवस्थाओं और नीतियों के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठानी होगी, जिन्हें भारत के युवा सही तौर पर चुनौती दे रहे हैं । हमें एक वैकल्पिक शासन-व्यवस्था के लिए काम करना होगा, जिसके हम सभी लोग हक़दार हैं, और जिसकी हमें तत्काल जरूरत है।
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