15 अगस्त- जश्न नहीं, पंजाब के विनाश और लोकतंत्र के हनन का दिन
प्रिय मित्रों, परिजनों, और साथियों,
आज 15 अगस्त है। देश के कहने वाले इसे 'स्वतंत्रता दिवस' कहेंगे, पर हम जानते हैं कि यह तारीख़ पंजाबियों के लिए मातम का दिन है। यह वह दिन है जब बाबा नानक की धरती को दो टुकड़ों में बाँट दिया गया, जब करीब एक करोड़ लोग बेघर हुए और 23 से 32 लाख लोग मारे गए या लापता हो गए । यह दिन ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपराधियों और उनके स्थानीय साझीदारों की साजिश को उजागर करने का दिन है। यह दिन भगत सिंह, उधम सिंह, अम्बेडकर के संघर्ष को याद करने और आरएसएस-भाजपा की साजिशों को बेनकाब करने का दिन है।
द बॉर्डर पंजाब नेवर आस्क्ड फॉर (वह सीमा जो पंजाब ने कभी नहीं माँगी)
हर साल अगस्त में 1947 की कहानी भारत और पाकिस्तान के जन्म के रूप में सुनाई जाती है। झंडे फहराए जाते हैं, भाषण दिए जाते हैं, और ब्रिटिश राज की समाप्ति का जश्न मनाया जाता है। लेकिन इस राष्ट्रीय आख्यान के नीचे एक और कहानी है जो पंजाब के गाँवों, कस्बों और नदियों में लिखी गई है। लाखों पंजाबियों के लिए, 1947 मात्र स्वतंत्रता नहीं थी; यह उनकी मातृभूमि का विनाश था। पंजाब ने कभी विभाजन नहीं माँगा था।
सवाल: क्या पंजाब को बाँटा जाना चाहिए था?
1946 तक, पंजाब की राजनीति गहराई से ध्रुवीकृत हो चुकी थी । मुस्लिम लीग ने प्रांतीय विधानसभा में 86 मुस्लिम सीटों में से 79 पर जीत हासिल कर ली थी, जबकि सिख और हिंदू राजनीतिक संगठन मुस्लिम लीग के वर्चस्व से बढ़ती आशंका में थे । **पर इस चुनावी प्रतिस्पर्धा को पंजाब के विभाजन के समर्थन में प्रांत-व्यापी वोट समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। कोई जनमत संग्रह नहीं हुआ था, जिसमें आम पंजाबियों से पूछा गया हो कि क्या उनकी साझा मातृभूमि को विभाजित किया जाना चाहिए **।
इसके विपरीत, दशकों तक पंजाब ने धार्मिक सीमाओं के पार राजनीति की संभावना का प्रदर्शन किया था । यूनियनिस्ट पार्टी, जो मुस्लिम, सिख और हिंदू हितों का प्रतिनिधित्व करती थी, ने औपनिवेशिक काल के अधिकांश समय में प्रांतीय राजनीति पर वर्चस्व कायम रखा । इसकी राजनीतिक पहचान कृषि, प्रांतीय हितों और समुदायों के बीच सहयोग में निहित थी । इसलिए, पंजाब का विभाजन किसी प्राचीन या अपरिहार्य सांप्रदायिक अलगाव की अभिव्यक्ति मात्र नहीं था । यह अखिल भारतीय राजनीतिक संघर्ष की तीव्रता के साथ प्रांतीय राजनीति के पतन से उत्पन्न हुआ ।
इसके बाद आई रेडक्लिफ़ रेखा। सिरिल रेडक्लिफ, एक ब्रिटिश वकील जिसने पहले कभी भारत का दौरा नहीं किया था, को पंजाब और बंगाल की सीमाएँ खींचने के लिए केवल लगभग पाँच सप्ताह दिए गए थे । **यह निर्णय 17 अगस्त 1947 को घोषित किया गया, जो पाकिस्तान की स्वतंत्रता के दो दिन बाद और भारत की स्वतंत्रता के एक दिन बाद आया **। इसका मतलब यह हुआ कि लाखों लोगों को स्वतंत्रता के बाद ही पता चला कि उनके घर किस देश में आ गए हैं । इसके परिणाम विनाशकारी थे ।
पंजाब का विभाजन: सांख्यिकीय पैमाना और मानवीय त्रासदी
पहलू विवरण
विस्थापित लोग लगभग 1 करोड़ लोग पंजाब भर में उखाड़े गए
जानमाल का नुकसान 1941-51 की जनगणना के बीच 23 से 32 लाख लोग मारे गए या लापता हुए
अपहृत महिलाएँ भारत में ~50,000 मुस्लिम महिलाएँ, पाकिस्तान में ~33,000 हिंदू-सिख महिलाएँ
अपहृत महिलाओं की वापसी 1950 के दशक की शुरुआत तक 29,000+ महिलाओं को दोनों देशों ने वापस पाया
आरएसएस और मुस्लिम लीग में संबंध
यह सवाल इतिहास में दफ़न करने की कोशिशे हो रही है, लेकिन इसकी गूँज आज भी सुनाई देती है। रिपोर्ट्स में खुलासा किया गया है कि आरएसएस और मुस्लिम लीग के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं । आरएसएस की 'हिंदू राष्ट्रवादी' राजनीति और बहुतावाद विरोधी रुख ने लोकतंत्र और स्वतंत्रता को नीचे लाने की प्रक्रिया को तेज़ किया है ।
लोकतंत्र और स्वतंत्रता का हनन: आँकड़े बोलते हैं
अब बात करते हैं आजादी की। 15 अगस्त 1947 को हमें 'आज़ादी' मिली, लेकिन आज हम कितने आज़ाद हैं? स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर भारत की स्थिति क्या है? आँकड़े बताते हैं कि जिस 'आजादी' के लिए भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु और उधम सिंह ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए, उसे हर दिन मोदी सरकार और उसकी विचारधारा द्वारा छीना जा रहा है।
लोकतंत्र: वी-डेम, फ्रीडम हाउस और ईआईयू के आँकड़े
• वी-डेम इंस्टिट्यूट (स्वीडन) की रिपोर्ट: इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अब 'इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी' आ चुकी है। यानी, चुनाव तो होते हैं, वोट भी पड़ते हैं, लेकिन चुनाव के अलावा बाकी सारी चीज़ें बहुत कमज़ोर हो गई हैं । रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में ही भारत इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी बन गया था — मोदी के सत्ता में आने के कुछ ही सालों में । भारत का 'लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स' स्कोर 0.44 से गिरकर 0.26 हो गया, और रैंक 53वीं से गिरकर 105वीं पर आ गई। 10 सालों में स्कोर लगभग आधा हो गया है।
• फ्रीडम हाउस (अमेरिका) की रिपोर्ट: 2014 में भारत का स्कोर 75 था और वह 'फ्री' (पूर्ण स्वतंत्र) देशों की श्रेणी में था। 2021 में डाउनग्रेड होकर 'पार्टली फ्री' (आंशिक रूप से स्वतंत्र) हो गया । 2026 में स्कोर गिरकर 62 पर आ गया — कुल 13 अंकों की गिरावट । आज भारत अंतरराष्ट्रीय मानकों पर पूर्ण स्वतंत्र देश नहीं है, बल्कि आंशिक रूप से स्वतंत्र है।
• इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) डेमोक्रेसी इंडेक्स: 2014 में भारत का स्कोर 8.0 था और रैंक 27वीं थी। 2026 में यह गिरकर 6.94 पर आ गया। 2014 के बाद यह गिरावट तेज़ी से हुई है।
क्या कहती हैं ये रिपोर्ट्स?
• मीडिया की स्वतंत्रता में कमी आई है; पत्रकारों पर दबाव बढ़ रहा है ।
• अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं, उसे सीमित किया जा रहा है ।
• नागरिक समाज और एनजीओ पर लगातार कार्रवाई हो रही है।
• विपक्षी नेताओं के खिलाफ जाँच एजेंसियों का इस्तेमाल हो रहा है।
• अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों, के खिलाफ भेदभाव और हिंसा बढ़ी है।
• चुनाव आयोग और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं ।
नकली राष्ट्रवाद और झूठ का मायाजाल
जबकि हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र सिकुड़ रहे हैं, लाल क़िले से बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं—'मदर ऑफ डेमोक्रेसी', 'सबका साथ, सबका विकास', 'आज़ादी का अमृत महोत्सव'। यह देश को मूर्ख बनाना है, देश को बेवकूफ बनाना है, देश को गुमराह करना है।
जंतर-मंतर और विपक्ष का दमन
जब छात्र और नागरिक जंतर-मंतर पर अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो उनके साथ बर्बरता पूर्वक व्यवहार किया जाता है—कील लगी लाठियाँ, पैलेट गन, लड़कियों और बच्चियों के साथ यौन दुर्व्यवहार । यह 'लोकतंत्र' है? जब विपक्ष के सवालों का जवाब देने की हिम्मत नहीं है, तो यह 'लोकतंत्र' नहीं, तानाशाही है ।
15 अगस्त: जश्न नहीं, मातम और प्रतिरोध का दिन
**15 अगस्त 1947 को पंजाब आज़ाद नहीं हुआ, बल्कि कट गया **। यह तारीख़ पंजाबियों के लिए वह दिन है जब गाँव उजड़ गए, खेत छूट गए, परिवार बिखर गए, और सांझी विरासत को दो धाराओं में बाँट दिया गया । लाखों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, और लगभग 23 से 32 लाख लोग अपनी जान गँवा बैठे । महिलाएँ सबसे अंधकारमय हिंसा की शिकार हुईं—अपहरण, सामूहिक बलात्कार, और जबरन विवाह ।
हम वह दिन कैसे मना सकते हैं जब पंजाब का कलेजा चीर दिया गया? 15 अगस्त हमारे लिए जश्न का दिन नहीं, बल्कि मातम का दिन है, पंजाब के विनाश को याद करने का दिन है, और उस सीमा को रद्द करने की शपथ लेने का दिन है जो हमारी ज़मीन पर ज़बरदस्ती खींची गई थी।
पंजाब के 'बार' की याद
विभाजन से पहले, पश्चिमी पंजाब का 'बार' (नहरी कॉलोनियाँ) पंजाबियों की साझी धरोहर थी । अंग्रेज़ों ने सिंचाई की व्यवस्था बनाई, लेकिन उनका मकसद पंजाब का विकास नहीं, बल्कि अपनी साम्राज्यवादी ज़रूरतें पूरी करना था। पंजाब को ब्रिटिश सेना के लिए अनाज का अड्डा बना दिया गया, और स्थानीय साझीदारों (ज़मींदारों और सरदारों) को फ़ायदा पहुँचाया गया ।
जिन महानायकों को भूला दिया गया
आज जब लाल क़िले पर 'नए भारत' के सपने बेचे जा रहे हैं, तो हमें याद करना चाहिए कि इस देश की असली आज़ादी किसने लड़ी:
• भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु: इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ़ बगावत की और फाँसी के फंदे को चूमा। इनकी विचारधारा साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता और सामाजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ थी। आज जो लोग 'देशभक्ति' के नाम पर इनका इस्तेमाल करते हैं, वही इनकी क्रांतिकारी सोच के ख़िलाफ़ हैं।
• उधम सिंह: जिसने 1940 में लंदन में जनरल ओ'डायर (जलियाँवाला बाग़ का जिम्मेदार) को गोली मारी, वह आज भी 'आतंकवादी' कहलाता है। जो जलियाँवाला बाग़ को भूल गया, वह उधम सिंह को कैसे याद रखेगा?
• डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: जिन्होंने भारत को न सिर्फ़ ब्रिटिश राज, बल्कि सामाजिक असमानताओं से भी मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया । आज जो संविधान की बात करता है, वही उसे बदलने की बात करता है।
जश्न नहीं, बल्कि संकल्प
प्रिय मित्रों, आरएसएस-भाजपा की विचारधारा के पोषित लोगों को यह लेख ज़हर लग सकता है, लेकिन हमारे लिए यह सच्चाई है। यह लेख उन सभी को समर्पित है जो मानते हैं कि 15 अगस्त जश्न का दिन नहीं, बल्कि आज़ादी के सच्चे मायनों पर विचार करने का दिन है; जो याद करते हैं कि आज़ादी के इस 'महापर्व' के पीछे कितने लाशों का ढेर है, कितनी बेघर महिलाओं की आह है, कितने बिछड़े परिवारों का दर्द है; और जो मानते हैं कि देश की सच्ची आज़ादी तभी आएगी जब पंजाब की सीमाएँ मिटेंगी और बाबा नानक की धरती पर फिर से मेले लगेंगे।
हम 15 अगस्त 1947 को कभी नहीं भूल सकते, क्योंकि वह दिन पंजाब के लिए क़यामत था। यह दिन जश्न का नहीं, बल्कि मातम और प्रतिरोध का दिन है—साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता, और तानाशाही के ख़िलाफ़ संघर्ष का दिन।
इंकलाब ज़िंदाबाद!
Dr. Pawan Kumar ‘Aryan’
Adv P&H High Court Chandigarh
15-08-2026
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