मंगलवार, 18 अगस्त 2026

मनुवाद बेनकाब

मनुवाद बेनकाब
सुभाषनी अली सहगल
अखिल भारतीय जनवादी समिति 
उत्तर प्रदेश राज्य कमेटी
प्राचीन भारतीय ग्रंथों, धर्म-शास्त्रों तथा मनुस्मृति द्वारा गैर-बराबरी का महिमा मंडन ही नहीं किया गया है, बल्कि उसको भारतीय समाज का आधार स्तम्भ बताकर बढ़ावा भी दिया गया है। इसलिए, संविधान निर्माण एवं अन्य बहुत से कानूनी सुधार तथा प्रगति के बावजूद जिस गैर बराबरी के विचार को बढ़ावा दिया गया था, वह भारत के जन मानस में बहुत गहरे तक अपनी जड़ें जमाये हुए है। यही कारण है कि आज भी भारतीय समाज स्तरीकृत तथा श्रेणीवद्ध अ-समानता पर आधारित समाज बना हुआ है।

नीचे उद्धृत मजमून, जो जी. वुलेर अनुवादित "दी लॉज ऑफ मनु" के पृष्ठ संख्या 3 से लिया गया है, इस प्रकार बयान करता हैः- "ब्राह्मणों के लिए उसने पढ़ने और अध्ययन (वेदों का) करने, स्वयं और अन्य लोगों के उपकार के लिए बलिदान करने, (भिक्षा) लेने और देने के कार्य नियत किये। क्षत्रिय को उसने लोगों की सुरक्षा करने, उपहार प्रदान करने, बलि देने, (वेदों का) अध्ययन करने तथा शारीरिक सुखों से विमुख रहने का आदेश दिया। वैश्य को मवेशियों की देखभाल करने, उपहार प्रदान करने, बलि देने, (वेदों का) अध्ययन करने, व्यापार करने, धन उधार देने, तथा जमीन जोतने का आदेश दिया। एकमात्र कार्य जो प्रभु ने शूद्र के लिए नियत किया है, वह है भक्ति भाव से इन तीनों (अन्य) जातियों की सेवा करना"।

इनके अतिरिक्त, दलितों, आदिवासियों तथा म्लेच्छों को, जो समाज के सबसे निचले पायदान पर अवस्थित थे, उनको अवर्ण अर्थात जाति विहीन और अछूत मानकर जाति व्यवस्था की सीमा से बाहर रखा गया।

प्राचीन काल से ही लेकिन बराबरी एवं मानव अधिकारों के इस निषेध के खिलाफ प्रतिरोध की प्रक्रिया भी जारी रही है। पहले जैन धर्म तथा बाद में बौद्ध धर्म ने इस प्रतिरोध की अगुवाई की। बड़ी संख्या में लोग उनके अनुयायी बने, तथा चन्द्रगुप्त मौर्य, अजातशत्रु एवं सम्राट अशोक उन शक्तिशाली राजाओं की श्रेणी में शुमार होते हैं, जिन्होंने जैन एवं वौद्ध धर्मों को अंगीकार किया। खासकर बौद्ध धर्म तो भारत के विभिन्न हिस्सों में बारहवीं शताब्दी तक प्रभावशाली बना रहा।

अपनी सत्ता को चुनौती प्रदान करने वाले इन कारकों तथा अन्य का सामना करने के लिए ब्राह्मण वाद की ताकतों ने हर प्रकार के हथकंडे अपनाए। ब्राह्मणों की अन्तर्निहित श्रेष्ठता के 'सत्य' को जिस प्रकार उनके द्वारा गढ़े गए ग्रंथों एवं शास्त्रों के माध्यम से लगातार बल प्रदान किया जाता रहा, उसको इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।

मनुस्मृति-उसकी रचना की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ एवं उसका महत्व

मनुस्मृति महज पूर्ववर्ती ग्रंथों एवं धर्मशास्त्रों में से इकठ्ठा किये गए सूत्रों का संग्रह ही नहीं है, बल्कि इसमें तमाम मौलिक विचारों का समावेष भी किया गया है। इसी वजह से इसकी श्रेष्ठता तथा प्रभुत्व स्थापित हुए हैं। इसलिए, इसके महत्व को पहचानने के लिए इसकी रचना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है।

पैट्रिक ओलिवेल्ले नामक विद्वान के अनुसार, जिनको बड़े ही विद्वतापूर्ण तथा गवेषणा पूर्ण

अनुवाद का श्रेय दिया जाता है, मनुस्मृति की रचना ईसा युग की शुरुआत के ठीक पहले अथवा बाद के वर्षों में कभी हुयी थी। मनुस्मृति को और अधिक वैधता प्रदान करने के वास्ते वहुदा कालातीत, युगों पुराना एवं लगभग अ-लौकिक ग्रन्थ का दर्जा दिया जाता है। लेकिन हकीकत ये है कि यह अपने दौर का ही एक प्रतिफल है, और ब्राह्मणवाद की विचारधारा की प्रभुता के सामने उपस्थित चुनौतियों के खिलाफ सोचा समझा प्रत्युत्तर है।

ओलिवेल्ले की एक महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि मनुस्मृति की रचना की पृष्ठभूमि में अशोक द्वारा लाये गए राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक सुधार हो सकते हैं। अशोक ने पुरोहित वर्ग को उसके विशेषाधिकारों से पदच्युत कर दिया था, और राजसत्ता के साथ उसके विशेष रिश्तों को समाप्त कर दिया था। अशोक ने न केवल बौद्ध धर्म को अपना लिया था, बल्कि उसके सिद्धांतों का अपने साम्राज्य तथा साम्राज्य से परे प्रचार प्रसार किया था। उसने फिजूल एवं क्रूर पशु बलि तथा यज्ञों पर रोक लगा दी थी, जो ब्राह्मणवाद के प्रभुत्व के अत्यंत अंग महत्वपूर्ण अंग होते थे। साथ ही उसने अपने तमाम शिलालेखों में जाति प्रथा के उल्लेख की चाहे तो उपेक्षा की, अथवा उससे जानबूझकर परहेज किया।

नन्द एवं मौर्य राजाओं का शूद्र वर्ग से आने ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया। इस प्रकार से क्षत्रियों के राजसी विशेषाधिकारों को हथिया लेने एवं ब्राह्मणवाद की विचारधारा तथा प्रभुता का दमन करने को मनुस्मृति तथा अनेकानेक धर्मशास्त्रों में सामाजिक अनर्थ, सामाजिक दुराचरण, और वास्तव में तो कलियुग के आने की संज्ञा दी गयी है।

ओलिवेल्ले बताते हैं कि मनुस्मृति को पढ़ते वक्त कोई भी व्यक्ति, ब्राह्मणवादी विशेषाधिकारों का उसमें जिस शिद्दत से बचाव किया गया है, उसको देख और समझ सकने में चूक नहीं कर सकता है। जिस विचारधारा ने मनु को प्रेरित किया, उससे इस ग्रन्थ की योजना जाहिर हो जाती है। इस ग्रन्थ में 1,034 श्लोक, जो पूरे ग्रन्थ का 38.6 प्रतिशत हिस्सा होते हैं, पुरोहित वर्ग के बारे में और 971 श्लोक, (36 प्रतिशत) राजा से सम्बंधित मामलों की चर्चा करते हैं।

मनुस्मृति का उद्देश्य न तो आज न्याय दिलाना है, और न ही कभी रहा है। इसका उद्देश्य तो जन्म के आधार पर सबसे खराब गैर बराबरी का औचित्य साबित करना रहा है, जिसके चंगुल से कभी कोई निकल नहीं सकता है। वर्ण-व्यवस्था के संरक्षण के लिए यह आवश्यक है कि अंतरजातीय भोज तथा अंतरजातीय विवाह प्रथा का निषेध रहे। प्रतिलोम विवाह को, अर्थात महिलाओं की स्वयं की जाति से नीचे की जाति के पुरुष के साथ शादी को एक अभिशाप माना गया है। तमाम धर्मशास्त्रों में, जहां जाति प्रथा की पुष्टि की जाती है, महिलाओं पर नियंत्रण, उनकी आवाजाही तथा उनकी विचार प्रक्रिया पर नियंत्रण, तथा उनके शरीर पर नियंत्रण के सम्बन्ध में लिखा गया है। स्त्री जाति के प्रति विद्वेष, जो ग्रंथों एवं धर्मशास्त्रों में भरा पड़ा है, उसके सबसे अधिक जहरीले स्वरुप का आख्यान मनुस्मृति में पाया जाता है।

जार्ज बुल्लेर द्वारा अनुवादित- दी लॉज ऑफ मनु- में एक पूरा का पूरा अध्याय, अध्याय संख्या नौ, जिसमें 330 से अधिक श्लोक हैं, महिलाओं के सम्बन्ध में लिखा गया है। इसके अतिरिक्त, महिलाओं से सम्बंधित कानून, दूसरों को किस प्रकार उनसे बर्ताव करना चाहिए, विभिन्न उल्लंघनों की एवज में क्या क्या सजाएं दी जानी चाहिए आदि के सम्बन्ध में अन्य अध्यायों में भी चर्चा की गयी है। इस सम्बन्ध में कुछेक उदाहरणों को उदृधृत करना समीचीन होगा, जिससे यह समझा जा सके कि किस प्रकार सम्पूर्ण महिला संवर्ग को सभी अधिकारों से वंचित रखकर अधीनता स्वीकार करने के लिए वाध्य किया गया है।

1 अब मैं एक पति एवं उसकी पत्नी के लिए, वे चाहे एक साथ हों अथवा अलग अलग हों, ऐसे शाश्वत नियम प्रतिपादित करता हूँ, जिनसे वे कर्तव्य मार्ग पर बने रहें।

2 अपने परिवार में पुरुषों को चाहिए कि वे औरत को दिन रात आश्रित बना कर रखें, और अगर वे स्वयं को ऐन्द्रिय भोग में संलिप्त करना चाहें, तो उनको पुरुष के नियंत्रण में रखा जाए।

3 बचपन में (उसका) पिता संरक्षण प्रदान करता है, युवा काल में (उसका) पति संरक्षण प्रदान करता है तथा बुढापे में (उसके) पुत्रगण संरक्षण प्रदान करते हैं; एक औरत कभी भी स्वाधीन रहने के काबिल नहीं होती है।

6 सभी जातियों में इस कार्य को सर्वोच्चता प्रदान की जानी चाहिए, कमजोर पति वर्ग को भी (चाहिए) कि अपनी पत्नियों पर चौकसी रखें।

14 पुरुष देखने में कैसा है, अथवा उसकी उम्र क्या है, इससे औरतों का कोई सरोकार नहीं होना चाहिए। केवल यह (सोचना) चाहिए कि वह पुरुष है, चाहे पुरुष रूपवान हो अथवा कुरूप हो, उनको स्वीकार होना चाहिए।

15 इस दुनिया में चाहे जितनी सावधानीपूर्वक उन पर चौकसी रखी जाय, मगर फिर भी वे मर्दों के प्रति अपनी आसक्ति, अपने अस्थिर मिजाज तथा अपनी स्वाभाविक वेदिली के कारण अपने पति के प्रति बेवफा हो जाती हैं।

16 ईश्वर द्वारा उनकी सृष्टि के समय जिस तरह की मनोवृत्ति उनमें समाहित की गयी है, उसको ध्यान में रखते हुए (प्रत्येक) पुरुष को पूरी मेहनत से उन पर निगरानी रखनी चाहिए।

18 औरतों के लिए पवित्र ग्रंथों के आधार पर कोई भी (संस्कार सम्बन्धी) अनुष्ठान (निष्पादित) नहीं किया जाता है- यह कानून सम्मत है; वे औरतें भी, (जो) शरीर से निःसहाय तथा (बुद्धि से) निःसहाय हों, वे (स्वयं) झूठ की भांति (अपवित्र होती हैं)। यह भी कानून सम्मत है।

59 (अपने पति से) संतान प्राप्ति में असफल होने की दशा में एक औरत, जिसे अधिकृत किया गया हो, तथा उचित (निर्धारित विधि) द्वारा, किसी देवर के अथवा (पति के) (किसी अन्य) सपिंड के संसर्ग से मनचाही संतान प्राप्त कर सकती है।

78 ऐसी औरत को, जो (पति) के प्रति, जो (किसी बुरी) लत का शिकार हो, पियक्कड़ हो, अथवा बीमार हो, अनादर प्रकट करे तो उसे गहनों एवं साज सामान से वंचित (करके) तीन महीनों के लिए परित्यक्त कर दिया जाना चाहिए।

जाति व्यवस्था तथा इसकी वकालत करने वाले धर्म ग्रंथों के समर्थक लोग यह सिद्ध करने के

लिए ऐसे उदाहरण पेश करते रहते हैं, जो इसके अपवाद रहे होते हैं, या कि जिनमें जातिगत अवरोधों का अतिक्रमण होता है। तमाम ऐसी महिलाओं का सन्दर्भ दिया जाता है जिन्होंने बौद्धिक क्षमता, स्वावलंबन तथा साहस दिखाया हुआ होता है। यह सही है, मगर ये सब व्यवस्था के अपवाद भर थे। बाकी तो तमाम धर्म ग्रंथों में जाति व्यवस्था का कानून गहरे तक जड़ें जमाये बैठा हुआ है, जिसे जब भी लिंग-भेद के खिलाफ कानून बनाने का प्रयास किया जाता है, तब उस पर बर्बर तरीके से हमला करने तथा उसका विरोध करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

विधि निर्माता के रूप में मनु की विशिष्ट हैसियत असल में शुरुआती दिनों में ही स्थापित हो गयी थी, तथा उनकी सत्ता को चुनौती रहित माना गया था। ब्राह्मण विद्वानों का संस्कृत भाषा के ऊपर एकाधिकार होता था, जिसके कारण धर्म ग्रंथों के अनुवाद तथा उनकी व्याख्या पर उनका एकाधिकार होता था। इसी वजह से उन विद्वानों का बहुत महत्त्व होता था, तथा उनकी सत्ता पर कोई आंच नहीं आ सकती थी।

आधुनिक दौर में मनुस्मृति

मनुस्मृति की यह प्रतिष्ठा अगले लगभग पंद्रह सौ वर्षों तक यूं ही बनी रही, जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत के बड़े हिस्से के प्रशासन पर अपना कब्जा जमा लिया था। कंपनी की ओर से जो लोग इन क्षेत्रों का प्रशासन चला रहे थे, उनके लिए देश में लागू न्याय व्यवस्था को जानना समझना आवश्यक था। इस सम्बन्ध में उन्हें जानकारी तथा सलाह के लिए संस्कृत के ब्राह्मण विद्वानों पर प्रमुखतः आश्रित रहना पड़ता था। उनको बताया गया कि भारत में न्याय व्यवस्था का मूल स्रोत मनुस्मृति था। इस प्रकार, हिन्दुओं के जीवन को अनुशासित करने वाले कानून के आधार, अर्थात मनुस्मृति को अधिकाधिक सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त होती गयी, और तमाम ऐसी प्रथाएं एवं मान्यताएं जो कि विभिन्न समुदायों तथा क्षेत्रों में प्रचलित थीं, अपनी प्रमुखता खोती गयीं।

नतीजतन, लैंगिक न्याय तथा सुधारों की दिशा में जो भी कुछ प्रयास किये जाते थे, भले ही वे अपने आप में कितने ही कमजोर एवं निर्विवादित रहे हों, विरोध का तूफान खड़ा कर देते थे, तथा मनुस्मृति एवं अन्य धर्मशास्त्रों की उक्तियों को समाज सुधारकों को पराजित करने तथा उनकी आवाज दबाने के लिए हथियार की तरह प्रयोग में लाया जाता था। इस मुहिम में अपेक्षा से कहीं अधिक सफलता उनके हाथ लगी, हालांकि कभी-कभी पराजय का सामना भी करना पड़ा।

जब राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध करने तथा ब्रिटिश सरकार को इस बर्बर प्रथा को प्रतिबंधित करने के लिए राजी करने का निश्चय किया, तब उन्होंने स्वयं ही सती प्रथा के पक्ष में रूढ़िवादियों के तर्क का वर्णन किया था, तथा उसका फिर खंडन किया था। उन्होंने अपने विरोधियों के पक्ष को इस प्रकार पेश किया थाः-

"आपने यह एक अनुचित आरोप पेश किया है कि शास्त्रों में सह-दाह संस्कार का निषेध किया हुआ है। अंगिरा तथा अन्य संतों ने इस विषय पर जैसा कहा है, उस पर ध्यान देना चाहिए-वह औरत जो अपने पति की मृत्यु पर उसकी चिता में समाहित हो जाती है, वह अरुंधती की

भांति सीधे स्वर्ग सिधारती है; वह औरत जो अपने पति का अनुसरण करती है, वह अपने तीन परिवारों को उनके पापों से मुक्ति दिला देती है- अपने पिता के वंश को, अपनी मां के वंश को तथा उस परिवार को जिसमें वह व्याह के बाद जाती है- भले ही उसके पति ने किसी ब्राह्मण की हत्या की हो, अथवा भलाई का जवाब बुराई से दिया हो, अथवा एक अन्तरंग मित्र की हत्या की हो- वह औरत उन सभी अपराधों का निवारण करती है। एक नेक औरत के लिए अपने पति की चिता में आरोहण करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होता है। अपने पति की मृत्यु के बाद एक औरत के लिए कोई अन्य कर्तव्य शेष नहीं रहता है- इस बात को अच्छी तरह से समझ लिया जाना चाहिए, आदि, आदि।"

राजा राम मोहन राय तब फिर इन तर्कों का खंडन इस प्रकार करते हैं

"जिन भी सूत्रों का उद्धरण दिया गया है, वे वास्तव में धर्मशास्त्रों में वर्णित किये गए हैं। लेकिन मनु तथा अन्य विद्वानों ने विधवाओं के कर्तव्यों के सम्बन्ध में जो बताया है, उस पर भी ध्यान दें। 'उसको स्वेच्छा से शुद्ध फल-फूल और कंद-मूल खाकर अपने शरीर को कृशकाय करने की इजाजत होनी चाहिए; लेकिन अपने पति की मृत्यु के बाद उसको किसी गैर मर्द का नाम भूल से भी अपनी जिल्ह्या पर नहीं लाने दिया जाना चाहिए। उसको मृत्यु पर्यंत सभी अपकारों को माफ करते रहना चाहिए, कठोर कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, प्रत्येक शारीरिक सुख का परित्याग करना चाहिए तथा नेकनीयती के अतुलनीय मानकों पर खुशी खुशी अमल करना चाहिए, जैसा कि अपने पति के प्रति निष्ठावान औरतें करती हैं"।

सती प्रथा का विरोध करने की मंशा से राय को मनु के द्वारा विधवा औरतों के प्रति बर्ताव की कठोर एवं क्रूर निषेधाज्ञाओं तक का सहारा लेना पड़ा, ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि मनु असल में विधवाओं को जीवित रहने देने के पक्ष में थे, हालांकि जीवित रहने की स्थितियां बड़ी भयंकर थीं। असल में वे इन बातों को अपने विरोधियों के श्रीमुख से कहलवाना चाहते थे।

बहरहाल, उपरोक्त से तो यही साबित होता है कि दुर्भाग्य की मारी इन विधवाओं के लिए जीवित रहने की तुलना में मौत को गले लगा लेना अधिक श्रेयष्कर था, क्योंकि शास्त्रों द्वारा निर्धारित आत्म संयमित जीवन जीने में किसी विधवा को भारी परेशानी महसूस हो सकती थी, जो कि बहुत स्पष्ट है। इसलिए, यदि वह सह-दाह संस्कार को नहीं अपनाती तो यह संभव था कि वह ऐसे कार्य कलापों की दोषी बन जाए, जो अपने पिता और मां के, तथा अपने पति के खानदान के लिए अपमानजनक साबित हों। ऐसी स्थिति में अपने पति की म्रत्यु की दशा में उनमें से बहुतों के लिए मृत्यु शैया पर जाने के लिए इच्छुक होना स्वाभाविक ही था। इसके अतिरिक्त जलती अग्नि से बचने की चेष्टा की किसी भी संभावना से निपटने के लिए उनको चिता से बाँध दिया जाता था, ताकि उनका दहन किया जा सके।

विधवा-दहन जैसी स्त्रियों से द्वेष रखने की सबसे खराब प्रथा का विरोध करने के इरादे से राय को स्वयं भी स्त्री-द्वेष का सहारा लेना पड़ा था। जिन्दा जला देने से बचाने के लिए उनको यह दलील देनी पड़ती है कि विधवाओं को नियंत्रित तथा निष्प्राण जीवन जीने दिया जाय।

सभी आततायियों की तरह सती प्रथा के समर्थक लोग भी इस अत्याचार को पीड़ितों के लिए लाभदायक बताते हैं। चिता की लकड़ियों से विधवाओं को बाँध दिए जाने को मोक्ष प्राप्त करने

तथा बदनामी से बचने का उपाय बताया जाता है।

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब ब्रिटिश सरकार से शिक्षा तक पहुँच के लिए महिला अधिकार तथा बाल विवाह के विरुद्ध कानून बनाने के लिए गुजारिश की जा रही थी, तब तिलक जैसे कद के व्यक्ति को यह कहने में कोई झिझक नहीं महसूस हो रही थी कि "हिन्दू धर्म का अनुशासन इतना कठोर होता है कि बेरहम बर्ताव के बावजूद पत्नियां अपने पतियों के साथ निवाहती रहती है, क्योंकि उनका यह मानना होता है कि यही उनका कर्तव्य होता है"।

बाल विवाह के पक्ष में उनका कहना था कि "यौवनारम्भ की प्राप्ति पर विवाह-संसिद्धि का होना लिखित एवं अलिखित दोनों ही प्रकार से कानून सम्मत होता है... और इसलिए हम नहीं चाहेंगे कि हमारी सामाजिक प्रथाओं को नियंत्रित करने वाले अथवा जीने के तौर तरीकों के साथ सरकार कुछ भी छेड़-छाड़ करे, चाहे भले ही सरकार के ये कारनामे फायदेमंद तथा माकूल हों।"

आगे की प्रगति

इन रुकावटों के बावजूद सामाजिक सुधार तथा लैंगिक न्याय की दिशा में आन्दोलन आगे बढ़ता रहा। इसको मजबूत होते स्वाधीनता आन्दोलन से भारी प्रेरणा प्राप्त हुयी। यही नहीं कि लाखों की संख्या में महिलाओं ने बड़े उत्साह के साथ लाठी, गोली और जेल का सामना करते हुए इसमें भाग लिया था, बल्कि यह भी कि महिलाओं के अधिकारों की मांग को नागरिकों के अधिकारों से सम्बंधित कोई भी आन्दोलन नजर अंदाज नहीं कर सकता था। इस तरह, स्वाधीन भारत में एक संविधान बनाने की आवश्यकता पैदा हो गयी थी।

जिस प्रकार से भारतीय समाज के बड़े हिस्सों पर मनुस्मृति तथा अन्य धर्म ग्रंथों की पकड़ कायम थी, जिनमें जोशीले तथा समाज के प्रभावशाली लोग भी शामिल थे, भारत में संविधान का लागू किया जाना किसी चमत्कार से कम नहीं है। यह सब डाक्टर बी. आर. अम्बेडकर के असाधारण प्रयासों का ही नतीजा था, जिन्होंने स्वयं पूर्व में अपने सार्वजनिक जीवन में मनुस्मृति का दहन किया था।

कानून की दृष्टि में जाति, वर्ग, लिंग अथवा धर्म के आधार पर किसी भेदभाव के बगैर भारत के सभी नागरिकों के बीच वराबरी का सिद्धांत हमारे संविधान का आधारभूत सिद्धांत है। इसको अपनाए जाने के जरिये असल में ऐसी एक प्रथा से मौलिक रूप से किनारा कर लिया गया था, जो जीवन के हर क्षेत्र में गैर बराबरी को बढ़ावा देती रही है, फिर भी पवित्र मानी जाती रही है, तथा जिसका जमकर बचाव किया जाता रहा है। इस प्रथा के पीछे मान्यता यह रही है कि गैर बराबरी को न तो मिटाया जा सकता है, और न ही उसको मिटाया जाना चाहिए।

संविधान को काफी बहस, वाक्छल, विरोध तथा नाराजगी के बाद वर्ष 1950 में अपना लिया गया। इसको पूरे राजनैतिक स्पेक्ट्रम से समर्थन प्राप्त हुआ, जिन्होंने भी स्वाधीनता आन्दोलन में हिस्सा लिया था- चाहे वे कांग्रेस के लोग रहे हों, अथवा कम्युनिस्ट एवं समाजवादी लोग रहे हों। लेकिन हिन्दू महासभा तथा आर.एस.एस. ने, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद का समर्थन किया था, तथा जो राष्ट्रीय आन्दोलन से दूर ही रहे थे, संविधान का विरोध करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। उन्होंने इस बात के लिए जोर दिया कि भारत में कानूनी ढाँचे का आधार

केवल धर्मशास्त्र तथा मनुस्मृति ही हो सकते थे। आर.एस.एस. प्रमुख गोलवलकर ने 'आर्गेनाइजर' के 3 नवम्बर, 1949 के अंक में अफसोस जताया किः-

लेकिन हमारे संविधान में प्राचीन भारत के अनूठे संवैधानिक घटनाक्रम का कोई हवाला नहीं दिया गया है। स्पार्टा के ल्युर्गुस अथवा फारस के सोलोन से बहुत पहले मनु के विधिक नियम लिखे गए थे। आज भी मनुस्मृति में प्रतिपादित सिद्धांतों को दुनिया में सराहा जाता है, तथा उनका सहज रूप से अनुपालन हासिल किया जाता है। लेकिन हमारे यहाँ के संविधान के पंडितों के लिए इस सब के कोई मायने नहीं होते हैं।

स्वाभाविक रूप से गोलवलकर जाति व्यवस्था के अटल समर्थक थे, और उन्होंने अपनी पुस्तक 'बंच ऑफ थॉट्स' में कहा है- "प्राचीन युग में भी जातियां होती थीं, जो हमारे यशस्वी राष्ट्रीय जीवन में हजारों वर्ष से जारी रहीं हैं..... उन्होंने सामाजिक सामंजस्य के लिए एक बड़े अनुबंध का काम किया..... इन प्रभागों के मध्य एक यथोचित सामंजस्य के अतिरिक्त वर्ण व्यवस्था और कुछ भी नहीं है, तथा इसके माध्यम से व्यक्ति अपनी सर्वोत्तम योग्यता से वंशानुगत कार्यों को संपादित कर समाज सेवा कर सकता है। यही वह तथ्य हैं, जिसके कारण विश्व के अकेले सबसे महान कानून वेत्ता- मनु ने इस व्यवस्था का प्रतिपादन किया, जिसमें दुनिया भर के लोगों को निर्देशित किया गया कि भारत भूमि पर जन्मे ज्येष्ठतम ब्राह्मण के पवित्र चरणों में आकर अपने कर्तव्यों के बारे में शिक्षा ग्रहण करें।" (वी, अवर नेशन हुड डिफाइंड, पृष्ठ संख्या 117)

आर.एस.एस. तथा इसके समर्थक लोग हिन्दू कोड बिल के खिलाफ भी सबसे आगे रहे, जिसके जरिये हिन्दू महिलाओं के उत्तराधिकार, विवाह तथा तलाक से सम्बंधित अधिकारों में व्याप्त कानूनी कमजोरियों को हटाने के प्रयास किये गए थे।

संविधान को लागू करते वक्त मगर आर.एस.एस. के पक्ष में जन समर्थन नहीं था। महात्मा गाँधी की जघन्य एवं दुखद हत्या के सिलसिले में इसकी भागीदारी की विस्तृत निंदा हुयी थी। राष्ट्रीय आन्दोलन के इसके विरोध, संविधान की इसके द्वारा अस्वीकृति, मनुस्मृति तथा जाति व्यवस्था के प्रति इसके खुले समर्थन आदि ने आम जनता के बीच इसके विलगाव को बढ़ा दिया. था। इससे मगर वे हतोत्साहित नहीं हुए, और सामाजिक बराबरी के सिद्धांत के विरोध के अपने प्रतिगामी एजेंडे के प्रति वचनबद्ध बने रहे।

समय के साथ लेकिन स्थिति में बदलाव आया। एक के बाद एक कांग्रेस सरकारों की गरीब विरोधी एवं जन विरोधी नीतियों ने जनता के बीच भारी असंतोष को जन्म दिया, जिसने आर. एस.एस. के राजनैतिक संगठन बी.जे.पी. को अपनी ताकत कई गुना बढाने में मदद दी। आज इसके नियंत्रण में केन्द्रीय सरकार ही नहीं, बल्कि अधिकतर राज्य सरकारें भी काम कर रही हैं।

आर.एस.एस. नियंत्रित बी. जे. पी. ने पिछले छः वर्षों में संवैधानिक प्रावधानों तथा संस्थाओं को कमजोर करने के किसी मौके को नहीं गंवाया है। मनुस्मृति के बहुत से बुनियादी सिद्धांतों को अब छल पूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है। महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, तथा अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर गंभीर हमले किये जा रहे हैं। एक महत्वपूर्ण तथ्य, जिस पर

ध्यान दिया जाना आवश्यक है, वह है कि जिस पदानुक्रम आधारित समाज व्यवस्था का गुणगान मनुस्मृति करती है, वह केवल सामाजिक ही नहीं बल्कि आर्थिक भेदभाव को भी प्रोन्नत करती है। मनुस्मृति में इस बात पर जोर दिया गया है कि जो लोग मेहनत करने तथा उच्च जातियों की सेवा करने के लिए पैदा हुए हैं- (जो जमींदार होते हैं, और विभिन्न संसाधनों के मालिक होते हैं,) उनको बिना किसी शिकायत के तथा निश्चित रूप से बिना किसी विरोध के अपने कर्तव्यों का इसी प्रकार पालन करते रहना चाहिए। इस प्रकार मनु का विधान आर.एस. एस. बी.जे.पी. के दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करता है। ये उद्देश्य वास्तविक रूप से एक ओर स्थायी अन्यायी सामाजिक व्यवस्था को जन्म देते हैं, और साथ ही एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करते हैं, जिसमें शोषण तथा गैर बराबरी बड़ी तेजी से बढ़ते हैं।

यह सब इस तथ्य का प्रतिवाद करने के लिए नहीं है कि संविधान के अस्तित्व में आ जाने तथा न्याय के पक्ष में संघर्ष तथा अभियान चलाने के लिए कार्य क्षेत्र की उपलब्धता होने के बावजूद महिलाओं को तमाम क्षेत्रों में भारी भेदभाव का सामना करना पड़ता था। उनके खिलाफ हिंसा ने नए तथा क्रूर आयाम ग्रहण कर लिए थे। महिलाओं के एक बड़े बहुमत के लिए लैंगिक न्याय की तलाश मुश्किल ही बनी रही। पूँजीवाद के अंतर्गत एक अन्यायी आर्थिक व्यवस्था के साथ साथ जमीन की मिलकियत तथा खेती के सामंती तौर तरीकों ने शोषण को रोजमर्रा की व्यवस्था बना दिया था, जिसकी सबसे बड़ी शिकार महिलायें होती हैं।

यह हकीकत मगर इस तथ्य को नहीं छिपा सकती कि महिलाओं ने जो भी उपलब्धिया अर्जित की हैं, तथा समानता प्राप्त करने की दिशा में जो भी कदम उठाये हैं, वे संविधान में प्रदत्त वायदों की वजह से संभव हुए हैं। जहां तक उत्तराधिकार में बराबरी, शिक्षा तथा जीविकोपार्जन तक पहुँच, तथा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले कानूनों के क्रियान्वयन का सम्बन्ध है, जिनको महिला आन्दोलन प्राप्त करने में सफल रहा है, वह संविधान के अस्तित्व में होने के कारण ही संभव हो पाया है। इसलिए संविधान की हिफाजत करना तथा उसे मजबूती प्रदान करना आवश्यक है, ताकि जो उपलब्धिया अर्जित की गयीं हैं, उनको बनाए रखा जा सके तथा आगे भी प्रगति संभव हो सके। इस मामले में समझ बहुत साफ होनी चाहिए, तथा इसका व्यापक प्रचार प्रसार किया जाना चाहिए।

वे लोग जो जन्म आधारित एक गैर बराबर समाज की वापसी के प्रति बेशर्मी के साथ प्रतिबद्ध हैं, यह जानते हैं कि उनकी लक्ष्य प्राप्ति के लिए लैंगिक न्याय का निषेध एक आवश्यक शर्त है। इसलिए वे संविधान के स्थान पर अंततः मनुस्मृति को लागू करने के लिए कृत संकल्प हैं।

एडवा में हम लोगों को संविधान की हिफाजत के संघर्ष में सबसे आगे होना चाहिए। हमें मनुस्मृति को लागू करने के हर परोक्ष एवं अपरोक्ष प्रयास का प्रतिरोध करना होगा। इस लड़ाई में जीत हासिल करने के लिए हमें महिलाओं के व्यापक जनसमूह को लामबंद करना होगा। साथ ही हमें उन सब के साथ भी संयुक्त आन्दोलन तथा अभियान चलाने होंगे जिनको कड़ी मेहनत से हासिल अधिकारों को खो देने का खतरा उठाना पड़ता है।

समाप्त

अनुवाद- अशोक गर्ग

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