रविवार, 28 जून 2015

अमरीका, लोकतंत्र, आतंकवाद व धार्मिक अतिवाद

लोकसंघर्ष !


Posted: 27 Jun 2015 07:41 PM PDT


    बहुत से पाठकों को यह शीर्षक ही बड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह इस निबन्ध की एक पड़ताल का विश्लेषण करने का प्रयास है। जो अमरीका के आतंकवाद, लोकतंत्र व धार्मिक अतिवाद के गठजोड़ पर आधारित है। वर्षों के बड़े प्रोपेगंडा के कारण बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि अमरीका संसार में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी व प्रोत्साहक है और संसार में हर दशा में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चाहता है धार्मिक अतिवाद व आतंकवाद के विरोध में लड़ी जा रही लड़ाई का पड़ताल करें और यह भी देखने का प्रयास करें कि भारत में उसकी क्या भूमिका रही है।
    वर्षों की अंदेखी, उदासीनता व हाशिए पर रहने के बाद दक्षिण एशिया का क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी के साथ उभरा है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल व मालदीप आते हैं। तेल के बड़े भण्डारों व सामरिक महत्व के कारण खाड़ी के देश अधिक महत्वपूर्ण माने जाते रहे। तत्पश्चात अमरीका, योरोपीय यूनियन, चीन व जापान जैसे महत्वपूर्ण देशों ने दक्षिण एशिया की ओर देखना शुरू किया और 9/11 की घटना के बाद तो अमरीका का ध्यान पूरे तौर पर इस ओर हुआ। ‘‘आतंकवाद’’ से अमरीका ने सहयोगी देशों की सहायता से इस पूरे क्षेत्र को शक्ति संरचना कर अपने काबू में करना शुरू किया और पाकिस्तान व अफगानिस्तान में यह काफी हद तक सफल भी रहा। साथ ही उसने भारत के अपने रिश्तों को भी मजबूत करने का पूरा प्रयास किया जिससे कि चीन के प्रभाव को भी रोका जा सके।
    चोम्सकी, जो वर्तमान संसार में सबसे सम्मानित बुद्धिजीवी माने जाते हैं, 2013 के अपने लेख में कहते हैं कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आतंकी शक्ति का संचालन कर रहा है। चोम्सकी अमरीकी नागरिक हैं तथा प्रख्यात एम0आई0टी0 मेसोच्यूसेट इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में वर्षों से प्रोफेसर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीकी व्यवस्था हमेशा कुछ विरोधी व भिन्न मतावलंबितयों को भी बरदाश्त करती रही है जिससे कि संसार को दिखाया जा सके कि अमरीका में असहमति को कितना सम्मान दिया जाता है। इससे मुझे अपने अमरीकी प्रवास में 2006-07 की एक घटना याद आती है हाऊज (अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यालय/ आवास) के सामने टेंट लगाये थे या प्लेकार्ड लिए बैठे थे। सबसे अगली कतार में एक अमरीकी महिला एक बड़ा सा पोस्टर लिए बैठी जिस को उस समय मेकअप में दिखाया था और बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नीचे लिखा था ‘‘विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी’’। अमरीकी स्वार्थो पर हमला नहीं करती। चोक्सी व हरमेन का यह भी मानना है कि तीसरी दुनिया में जो भी क्षेत्र अमरीका के प्रभाव में हैं वहाँ वहाँ आतंक का जमावड़ा है। इन विद्वानों ने दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि किस प्रकार लातेनी अमरीका के गरीब देशों में कठपुतली शासक अमरीका के समर्थन से आतंक के द्वारा अवामी इच्छाओं का दमन करते रहे हैं। वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आज भूमंडलीय स्तर पर जितना भी आतंकवाद है। अमरीकी विदेशी नीति का परिणाम है। मेकार्ड व स्टाई बर जैसे विशेषज्ञों का यह मानना है कि 9/11 घटना से पहले भी व बाद में भी अमरीका अल कायदा को धन व हथियारों से सीरिया, लीबिया, बोसनिया, चेचेनिया, इरान जैसे अनेकों देशों में अपनी कार्यवाही के लिए सहायता देता रहा हैं ध्यान देने की बात यह है कि ये सभी देश अमरीका के समर्थक नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि विश्व में 74 प्रतिशत देशों में जहाँ आतंकी तरीकों को प्रशासनिक सहमति हासिल है, अमरीका की कठपुतली सरकारें हैं। क्या यह मजाक नहीं लगता कि जो महाशक्ति दुनिया में सुबह से शाम तक शांति की बात करती हो, गले-गले तक आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
    अमरीका के द्वारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के दावों की कलई कई बार खुल चुकी है। एक बार फिर इस की पड़ताल कर ली जाये। यदि हम दुनिया का नक्शा उठा कर देखें तो पाते हैं कि लातीनी अमरीका के देशों से लेकर,
मध्यपूर्व, दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिणी एशिया के देशों तक अमरीका की सहायता से लोकतंात्रिक सरकारों का तख्ता पलट कर तानाशाही सत्ता को कभी सफलता पूर्वक और कभी असफल प्रयासों का सहारा लिया गया है। यहाँ पर कुछ विशिष्ट उदाहरणों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया जा रहा है।
    अमरीका का हमेशा कहना रहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकारों को कभी नहीं हटाने का प्रयास करेगा चाहे वह कोई वामपंथी सरकार क्यों न हो। 1970 में दक्षिणी अमरीका के देश चिली में डाॅ. एलेन्डे की वामपंथी सरकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण में होने वाले चुनाव के द्वारा बनाई गई लेकिन उस को बहुत दिन चलने नहीं दिया गया और सी आईए के द्वारा उस का तख्ता पलट कर फौजी शासन स्थापित कर दिया गया जिस ने इस के विरोध में होने वाले जन आन्दोलन को कुचल दिया। ऐसा ही कुछ निकारागुआ में भी किया गया। 1984 में पारदर्शी चुनाव के द्वारा वहाँ पर एक प्रगतिशील वामपंथ की ओर झुकाव वाली सरकार का गठन किया गया लेकिन अमरीका को निकारागुआ की क्यूबा व सोवियत यूनियन से दोस्ती अच्छी नहीं लगी। अमरीका को इस बात का डर भी खाये जा रहा था कि कहीं निकारागुआ का उदाहरण दूसरे शोषित लातीनी अमरीका के देशों को वामपंथ की ओर न मोड़ दे। अमरीका ने निकारागुआ के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि उसे अपना ध्यान व संसाधन अपनी सुरक्षा में लगाना पड़ गया और इस प्रकार आर्थिक संकटों से जूझती हुई सरकार को गिरा दिया गया। क्यूबा पर तो लगातार अमरीकी प्रयास जारी रहा। फोडेल कास्त्रो को मारने का कई बार प्रयास भी किया गया। लेकिन क्यूबा की वामपंथी सरकार को गिराया नहीं जा सका।
    यह सूची इतनी लम्बी है कि दर्जनों पन्ने सियाह हो जाएँगे इस लिए निम्न संक्षिप्त सारणी के द्वारा यह बात आगे बढ़ाई जा रही है  जिस से पाठकों को यह अन्दाजा भली भाँति हो जाएगा कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाहों को किस प्रकार मजबूत किया गया और उनकी सत्ता को कैसे जायज़ ठहराया गया
1    लातीनी अमरीका:
    पिनोशेट (चिली), नोरेगा (पनामा),
    डुवेलियर (हैती), बेनजे़र (बोलेविया)
2    ऐशिया:
    ओमान, कतर, बहरैन के शेख
    सऊदी अरब के बादशाह
    सुहारतों (इण्डोनेशिया)
    जि़याउलहक़ व मुशर्रफ़ (पाकिस्तान)
    बादशाह रज़ाशाह पहेलवीं (ईरान)
3    अफ्रीका:
    बादशाह हसन (मोराक्को)
    गफ्फार नुमैरी (सुडान)
    होसनी मुबारक (मिश्र)
    द0 अफ्रीका के नस्लवादी शासक
4    योरोप:
    फ्रानको (स्पेन)
    सालाज़ार (पुर्तगाल)     

    तुर्की व यूनान की फ़ौजी सत्ता इन तथा इन जैसे अनेक दूसरे उदाहरणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अमरीकी लोकतंत्र का मुखौटा कितना महीन है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के इस के दावे कितने खोखले हैं वरना फौजी शासकों, बादशाहों तथा नस्लवादी शासकों को सभी प्रकार के समर्थन देकर उन की सत्ता को बचाना क्या अर्थ रख सकता है। जाहिर है अपने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक हितों के सामने लोकतंत्र की कोई कीमत नहीं है। सऊदी अरब व ईरान के निर्मम व जालिम बादशाहों को वर्षों तक अमरीका ने बचाया क्योंकि वे उस की कठपुतली थे। ईरान के अवाम ने बादशाह के विरोध में बगावत किया, कुरबानी दी और उसे खदेड़ दिया। यह अलग बात है कि ईरान में चुनाव वो करवाती है लेकिन लोकतंत्र पर लगाम है। सऊदी अरब में बादशाहत अब भी बनी हुई है, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है तथा धार्मिक कट्टरता ने अवाम, विशेष कर अल्पसंख्यकों को पैरों के नीचे दबा रखा है लेकिन अमरीका के आर्थिक व सामरिक हित सर्वाेपरि हैं।
    अजीब विडंबना है कि संसार भर में आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अमरीका का हाथ देखा जा सकता है और इस्लाम के नाम पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में तो सीधे अमरीका की भूमिका देखी जा सकती है। चूँकि अमरीका के आर्थिक व सामरिक हितों को सब से अधिक खतरा इस्लामी चरमपंथियों से था इस लिए उस ने विश्व मीडिया शक्ति को इस्लामी आतंकवाद का डर दिखाने को लगा दिया। बहुतों को इस बात पर विश्वास भी हो गया कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व शांति के लिए सब से बड़ा खतरा है। जब हकीकत यह है कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व आतंकवाद का केवल एक छोटा सा अंशमात्र है। अमरीका के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर चाल्र्स कुर्ज़मैन ने अपने अध्ययन ष्ज्ीम उपेेपदह डंतजलते रू ॅील जीमतम ंतम ेव मिू उनेसपउ ज्मततवतपेजेघ्ष् के द्वारा यह स्थापित किया है कि मुस्लिम आतंकवाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया। उन्होंने यह सवाल भी किया कि हमने इस बात पर क्यों विश्वास किया कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है और हम इतना क्यों डरे हुए थे। पिछले पाँच वर्षों की घटनाओं ने प्रोफेसर कुर्जमैन की बात को सही साबित कर दिया। आज पूरे योरोप व अमरीका में प्ेसंउवचीवइपं अर्थात इस्लाम का डर जीवन की एक हकीकत बन चुका है और समाज के दिन प्रतिदिन जीवन में देखा जा सकता है।
    तथाकथित मुस्लिम या इस्लामी आतंकवाद की ताकत व फैलाव चाहे जितना हो लेकिन आज यह स्थापित हो चुका है कि इसके पीछे काफी हद तक इस्लाम की वह चरमपंथी व्याख्या है जो साम्राजी के नाम से जानी जाती है और जिसका प्रमुख स्रोत सऊदी अरब है जो साम्राजी विचारधारा को ही सच्चा इस्लाम मान कर उसके प्रचार व प्रसार पर अरबों डालर खर्च करता रहा है। अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर नाइजीरिया के अलशबाब व बोकोहरम व इराक-सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आई0एस0) तक सभी विचारधारा से प्रोत्साहित होते हैं। योरोप व अमरीका सहित समूचे विश्व में सऊदी पेट्रोडालर की सहायता से मस्जिदों व मदरसों पर कब्जा किया जा रहा है और वहीं से साम्राजी विचारधारा को ही सही इस्लाम के रूप में प्रसारित व प्रचारित किया जा रहा है। कैसा मज़ाक है, कि वह अमरीका जो सुबह से शाम तक इस्लामी आतंकवाद की रट लगाए रहता है, मुस्लिम संसार में अपने को ही गले से लगाये हुए हैं। बादशाहत, धार्मिक अतिवाद व पूँजीवाद के इस अजीबों गरीब मिश्रण को अमरीका ही
साध सकता है। संतोष की बात यह है कि अपने सभी प्रयासों के बावजूद समूचे विश्व की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा ही इस विचारधारा के प्रभाव में है लेकिन जिस तेजी के साथ यह फैल रहा है शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता हैं।
        यह हम कैसे भूल जाएँ कि अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरोध में अमरीका ने ही तालीबान को प्रोत्साहन व समर्थन दिया था और पाकिस्तान के फौजी शासकों के द्वारा उन के मदरसों को बढ़ावा मिला था। भारत में हिन्दुत्व व चरमपंथी हिन्दु शक्तियों के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका को देखा जा सकता है। भारत के मजदूर-किसान-दलित-आदिवासी की एकता आदि को तोड़ने के लिए जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उस के अनुषंगी संगठन लगे हुए हैं उसे कोई भी देख सकता है। स्वदेशी व भारतीयता का गला फाड़ फाड़ कर नारा लगाने वालों की जब केन्द्र में सत्ता स्थापित हुई तो कारपोरेट सेक्टर के हित ही देशहित हो गये और सांप्रदायिक तनाव के धुएँ में असली मुद्दों को छुपाने का प्रयास हो रहा है। पूँजीवादी फासीवाद हमारे देश में दस्तक दे रहा है। हमें इतिहास से सबक लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद लोकतांत्रिक चुनावों के कंधों पर चढ़ कर ही आता रहा है। हिटलर व मुसोलनी इस के उदाहरण हैं। लोकतंत्रीकरण व लोकतंात्रिक मुकाबला कर सकती है। एक व्यक्ति ही सब कुछ कर देगा, यह सोच ही  फासीवाद व तानाशाही की ओर उठा पहला कदम है जिसके लिए हमें सचेत रहना है।        
-प्रो0 नदीम हसनैन
        मोबाइल: 09721533337

शनिवार, 27 जून 2015

महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी वारदात

Posted: 26 Jun 2015 06:40 AM PDT
वरिष्ट पत्रकार सुभाश गताडे से आतंकवाद के मुद्दे पर की गई बातचीत के अंश
                                                                                                    -राजीव यादव 
 देश में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत कहाँ से मानते हैं?

    अगर आजाद भारत की बात करें तो मेरी समझ से महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी घटना है, और वहीं से कमसे कम भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद की शुरूआत मानी जा सकती है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की अवाम के संघर्ष के नेता गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति की निरन्तर मुखालिफत की एवं समावेशी राजनीति की हिमायत की, उनकी हत्या में नाथूराम गोड्से ने भले ही गोली चलाई हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके लिए लम्बी साजिश रची गई थी, जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ था। गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर भुला दी जाती है कि उन्हें मारने के लिए इसके पहले इन्हीं संगठनों की तरफ से कई कोशिशें हुई थीं, और इस आखरी कोशिश में वे कामयाब हुए।
     यह जो आतंकवाद है यह कितना देशी है और कितना वैश्विक है?
    मेरे खयाल से यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक नहीं है। आतंकवाद के देशी रूप भी
हो सकते हैं और उसके वैश्विक रूप भी हो सकते हैं, मूल बात यह समझने की है कि आप उसे किस तरह परिभाषित करते हैं। यूँ तो आतंकवाद को कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है, राज्यसत्ता द्वारा निरपराधों पर किए जाने वाले जुल्म-अत्याचार को भी इसमें जोड़ा जाता है, मगर इसकी अधिक सर्वमान्य परिभाषा है जब राजनैतिक मकसद से कोई समूह, कोई गैर राज्यकारक अर्थात नानस्टेट एक्टर हिंसा या हिंसा के तथ्य fact of violence का इस्तेमाल करे और निरपराधों को निशाना बनाए। इसके तहत फिर हम साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे हिन्दुत्ववादी गिरोहों की हिंसक कार्रवाइयों को भी समेट सकते हैं या किसी जिहादी संगठन द्वारा निरपराधों को निशाना बना कर की गई कार्रवाई को भी देख सकते हैं या किसी जियनवादी गिरोह द्वारा फिलिस्तीनी बस्ती में मचाए कत्लेआम को भी देख सकते हैं या किसी ब्रेविक द्वारा अंजाम दिए गए मासूमों के कत्लेआम को भी समेट सकते हैं।
    मोदी के आने के बाद आतंकवाद की राजनीति और संस्थाबद्ध होगी या रुकेगी। रुक जाने का सन्दर्भ यह है कि क्या वह दूसरी राजनीति करेंगे?
    मोदी जो हिन्दुत्व की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने हैं, उनके सत्तारोहण को हम बहुंसंख्यकवाद की राजनीति की जीत के तौर पर देख सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि आजादी के बाद पहली दफा हिन्दुत्व की ताकतों को अपने बलबूते सत्ता सँभालने का मौका मिला है, जिसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। आजादी के बाद यह पहली दफा हुआ है कि संसद में अल्पसंख्यक समुदायांे का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है, यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के सांसदों में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से एक भी  प्रतिनिधि नहीं है। अब इस समूची परिस्थिति में जाहिर है कि ऐसी ताकतें-जो हिन्दुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखती थीं, उस विचार से प्रेरित थी, मगर साथ ही साथ आतंकी घटनाओं में मुब्तिला थीं-उनकी रणनीति में फर्क अवश्य आएगा। एक तो वह कोशिश करेंगी कि उनके जो तमाम कार्यकर्ता जेल में बन्द हैं, उन्हें रिहा करवाया जाए, उनके खिलाफ जारी केस को कमजोर किया जाए और फिर उन्हें नए अधिक वैध एवं स्वीकार्य रूपों में पेश किया जाए। दूसरी यह भी सम्भावना है कि चूंकि राज्यसत्ता में उनके विचारों के हिमायती बैठे हों, वह और अधिक आक्रामक हों, आतंकी घटनाओं को खुद अंजाम दें मगर उसका दोषारोपण अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक निर्भीकता से करें। आप चाहें नांदेड़ में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई आतंकी घटना (अप्रैल 2006) को देखें या मालेगांव की घटना (सितम्बर 2006 और सितम्बर 2008) को देखें हम बार-बार यही पाते हैं कि उनकी लगातार कोशिश रहती आई है कि खुद घटना को अंजाम दो, मगर उसे इस ढंग से डिजाइन करो कि अल्पसंख्यक पकड़ में आएँ। दूसरी तरफ इस्लामिक ताकतों का वह हिस्सा-जो आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहा है-वह नई बदली हुई परिस्थितियों में नए ध्रुवीकरण को अंजाम देने या मजबूती दिलाने के लिए कुछ आततायी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकता है। हाल के समय में इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो सरगर्मी बढ़ी है या अल कायदा की तरफ से भारत में अपना पैर जमाने की जो कोशिशें की जा रही
हैं, वह भी असर डालेंगी। कुल मिला कर आनेवाला समय ऐसे सभी लोगों, समूहों के लिए चुनौती भरा होगा जो हर किस्म के आतंकवाद-फिर चाहे राज्य आतंकवाद हो या गैर राज्यकारकों द्वारा अंजाम दिया जा रहा आतंकवाद हो (जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा विशिष्ट धर्म से अपने आप को प्रेरित कहते हुए हिंसा को अंजाम देना होता है)-की मुखालिफत करते हैं और एक आपसी सद्भावपूर्ण समाज की रचना चाहते हैं।
    क्या कानूनों के सेलेक्टिव प्रयोग से इससे शिकार लोगों में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो रही है?
    1950 में जब संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को संविधान सौंपा तो यह संकल्प लिया गया था कि जाति, वर्ग, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि आधारों पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून के सामने सभी समान होंगे। आजादी के साठ साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद हम इन संकल्पों एवं वास्तविकता के बीच गहरे अन्तराल से रूबरू हैं, जब हम पाते हैं कि दमित, शोषित, उत्पीडि़त समुदायों एवं लोगों पर महज इसी वजह से कहर बरपा हो रहा है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की बहाली के लिए प्रयासरत है और ऐसे लोग, तबके जो सत्ता एवं सम्पत्ति के इदारों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, उनके प्रति राज्यसत्ता का रुख नरम है। जाहिर है कि इस दोहरे व्यवहार से जनता के व्यापक हिस्से में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है।
    आतंकवाद की राजनीति के आर्थिक आधार क्या हैं? क्या यह वैश्विक आर्थिक मंदी से जुड़ा हुआ है?
    आतंकवाद को महज आर्थिक मंदी से जोड़ना नाकाफी होगा, वह इस वजह से भी इन दिनों बलवती जान पड़ता है क्योंकि परिवर्तनकामी ताकतें एवं आन्दोलन कमजोर पड़ रहे है। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ के बिखराव की शुरूआत एवं अन्ततः उसके विघटन ने समाजवाद के विचार एवं प्रयोग को जो जबरदस्त क्षति पहुँचाई है और पूँजीवाद की अंतिम जीत को प्रचारित किया है, उसने भी दुनिया में तरह-तरह के नस्लवादी आन्दोलनों, आतंकी समूहों के फलने फूलने का रास्ता सुगम किया है। जरूरत इस बात की दिखती है कि जनता के हालात में आमूलचूल बदलाव चाहने वाली ताकतें नए सिरेसे संगठित हों, एक समतामूलक राजनीति को मजबूती प्रदान करें तो हम साथ ही साथ इन दिनों सर उठाए आतंकवाद को हाशिए पर जाता देख सकते हैं।
      सजा होने की सम्भावना आतंकवादी घटनाओं में बहुत कम है ऐसा लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीरे चलाई जा रही है ताकि आरोपियों को अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। इस पर आप क्या सोचते हैं?
    अगर राज्यसत्ता इच्छाशक्ति का परिचय दे तो आतंकवादी घटनाओं में भी मुकदमे तेजी से चलाए जा सकते हैं और दोषियों को दंडित किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे मसलों पर राज्यसत्ता में बैठे लोग-या तो अपने एकांगी विचारों के चलते या ढुलमुल रवैयों के परिणाम स्वरूप सख्त रुख अपनाने से बचते हैं, जिसके चलते ऐसे मुकदमे सालों साल चलते हैं। अगर यौन अत्याचार के मसले को लेकर स्पीडी ट्रायल की बात की जा सकती है तो आतंकी घटनाआंे के मामले में भी हमें इसी किस्म की माँग करनी चाहिए, ताकि असली दोषी को सजा हो और मूलतः निरपराध जेल की यातना से बचें। आप अक्षरधाम आतंकी हमले को देखें जिसे लेकर बारह साल तक कइयों को जेल में सड़ना पड़ा और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सभी बेदाग बरी हुए। अदालत का कहना था कि इन लोगों पर ‘आतंकवाद की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय बिना दिमाग के लिया गया था। ध्यान रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्राी उन दिनों गुजरात में गृह मंत्रालय का कार्यभार सँभाल रहे थे। अब अगर स्पीडी ट्रायल होता तो उनकी बेगुनाही जल्दी सामने आती और उन्हें तथा उनके परिवारजनों को इतना अधिक समय दुख में नहीं गुजारना पड़ता।
    खुफिया एजेंसियों की निष्पक्षता के बारे में बार-बार सवाल उठता रहा है, देश में आई.बी. और रॉ में अल्पसंख्यकों को जाने से रोका जा रहा है इसको कैसे देखा जाए। क्या इनको सही प्रतिनिधित्व मिल जाने से समस्याएँ हल हो जाएगी?
    देश की खुफिया एजेंसियों के कामों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करना हो, उसमें अल्पसंख्यक समुदायों के आगमन को रोकने के मसले को सम्बोधित करना हो तो यह बहुत जरूरी है कि उसके कामों में पारदर्शिता लाई जाए और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। कुछ समय पहले पश्चिमी एशियाई मामलों के जानकार एवं वर्तमान उपराष्ट्रपति डाॅ. हामिद अन्सारी ने रिसर्च एण्ड एनलिसिस विंग अर्थात ‘रॉ’ द्वारा आयोजित आर एन कॉव स्मृति व्याख्यान में इसी मसले को उठाया था। डाॅ. अन्सारी का
कहना था कि गुप्तचर एजंेसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवम् जवाबदेही की आवश्यकता है। उनके मुताबिक यह जनतांत्रिक समाजांे का तकाजा होता है कि बेहतर शासन के लिए वह ऐसी प्रक्रियाओं को संस्थागत करें जिसके अन्तर्गत गुप्तचर एजेंसियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ‘‘राज्य के गुप्तचर और सुरक्षा ढाँचे’’ को लेकर अब तक सिर्फ कार्यपालिका और राजनैतिक देखरेख होती रही है, जिसमें इसके दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। इनमें जवाबदेही के अभाव की चर्चा के सन्दर्भ में उन्होंने कारगिल प्रसंग का जिक्र किया जिसमें गुप्तचर एजेंसियों की बड़ी नाकामी सामने आई थी। ध्यान रहे कि आधिकारिक तौर पर कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण की खबर पहली दफा गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से नहीं बल्कि उस इलाके मंे अपने मवेशी चराने के लिए ले जाने वाले गड़रियों से हुई थी। देश की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद किसी भी गुप्तचर  अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया था और विभिन्न एजेंसियों ने एक दूसरे पर दोषारोपण करके मामले की इतिश्री कर दी थी।
    हिंदुत्व से उपजे आतंकवाद की सच्चाई क्या है?
    जैसा कि मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ कि आजाद भारत की पहली आतंकी कार्रवाई को हिन्दुत्ववादी आतंकी गोड्से एवं उसके गिरोह ने अंजाम दिया था यह धारा भले ही मद्धिम हुई हो, लेकिन दबी नहीं है। इस तथ्य से भी बहुत कम लोग वाकि़फ है कि बँटवारे के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो कार्यकर्ता बम बनाते वक्त कराँची के अपने मकान में मारे गए थे और ट्यूशन पढ़ाने के लिए लिए गए उपरोक्त मकान में विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में बने जीवनलाल कपूर कमीशन ने गांधी हत्या की साजिश के लिए प्रत्यक्ष सावरकर को जिम्मेदार ठहराया था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने आप को ‘चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहलाने वाले’ हिन्दुत्ववादी संगठन भी वक्त पड़ने पर आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि इसे नए सिरेसे उभारा जा रहा है और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व समानार्थी नहीं है (अधिक स्पष्टीकरण के लिए सावरकर की बहुचर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ को देखा जा सकता है), जिस तरह इस्लाम और राजनैतिक इस्लाम को समानार्थी नहीं कहा जा सकता, वही हाल हिन्दुइज्म अर्थात हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व का है। यह फर्क स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जबभी हिन्दु आतंकवादी गिरफ्तार होते हैं या उसकी चर्चा होती है, संघ परिवारी संगठनों की तरफ से हल्ला किया जाता है कि आप धर्मविशेष को बदनाम कर रहे हैं। यह सर्वथा गलत है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की तमाम घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हंै कि हिन्दुत्व आतंकवाद एक परिघटना है, जो भारत के सेक्युलर एवं जनतांत्रिक स्वरूप के लिए जबरदस्त खतरा बन कर उपस्थित है। जाहिर है कि जो बात अक्सर प्रचारित की जाती है कि हिन्दू आतंकी नहीं हो सकता, यह बात तथ्यों से परे है। जिस तरह हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, वही हाल आतंकवाद से प्रभावित होने को लेकर भी देख सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि देश का कानून सभी के लिए समान हो, किसी आतंकी को इसलिए नहीं बक्शा जाए कि वह विशिष्ट समुदाय से है, किसी आतंकी गिरोह के सरगनाओं, मास्टरमाइंडों को इसलिए न बचाया जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अपराध सिर्फ अपराध होता है, उसके किसी खास समुदाय द्वारा अंजाम देने से उसकी तीव्रता कम नहीं होती है।
 मो0-09452800752
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शनिवार, 20 जून 2015

आतंक के खिलाफ वो 121 दिन

लोकसंघर्ष !


Posted: 19 Jun 2015 05:47 AM PDT
 ‘मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए धरना’ लिखा हुआ रिहाई मंच के काले रंग के बैनर, जिस पर दाढ़ी-टोपी वाले एक शख्स की फोटो लगी थी को हर उस शख्स ने देखा होगा, जो 22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने स्थित
धरना स्थल से गुजरा होगा। यूपी ही नहीं देश के इतिहास में आतंकवाद के नाम पर मारे गए किसी बेगुनाह के न्याय के लिए 121 दिन तक चलने वाला यह सबसे बड़ा अनिश्चित कालीन धरना था।
    18 मई 2013 को शाम में यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए
सिलसिलेवार धमाकों के आरोपी मौलाना खालिद मुजाहिद की फैजाबाद में पेशी के बाद लखनऊ जेल लाते वक्त हत्या कर दी गई है। पूरे प्रदेश में धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। क्योंकि खालिद मुजाहिद वह शख्स थे, जिनकी गिरफ्तारी को आर.डी. निमेष जाँच आयोग ने संदिग्ध माना है और उनको आतंकवाद के आरोप में फर्जी फँसाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक की माँग की है। निमेष आयोग आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी को जाँचने वाला पहला आयोग था, जिसकी रिपोर्ट सरकार ने दबा रखी थी, जिसको रिहाई मंच ने अंदरखाने से प्राप्तकर जनहित में सार्वजनिक कर दिया था। यूपी की इंसाफ पसन्द अवाम के लिए गहरा झटका था कि जिस बेगुनाह को न्याय
दिलाने के लिए उन्होंने 2007-2008 में आजमगढ़-जौनपुर जैसे दूर दराज के जनपदों से लेकर राजधानी लखनऊ तक में विरोध प्रदर्शनों के बल पर तत्कालीन मायावती सरकार को आरडी निमेष जाँच आयोग गठन करने पर मजबूर किया, उसके कहने के बाद कि खालिद निर्दोष है यूपी सरकार ने उसे बरी नहीं किया। जिससे हौसला पाए पुलिस व आई.बी. अधिकारियों ने खालिद की हत्या करवा दी। 19 मई 2013 को जिस खालिद मुजाहिद को आतंकवादी कहा गया था, के जनाजे में 60-70 हजार के हुजूम के नारों ने तय कर दिया कि आखिर आतंकी कौन है?  यूपी सरकार ने इस आपाधापी में मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की सी.बी.आई. जाँच कराने की बात कह आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। पर सरकार और उसका तंत्र यह नहीं भाँप पाया कि इंसाफ पसन्द अवाम ने अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर लिया है और इसी संकल्प के साथ शुरू हुआ खालिद के इंसाफ के लिए रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना।
    121 दिन यानी 4 महीना 1 दिन तक चलने वाले धरने के पहले दिन 22 मई को जब उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और लू भरी आधियाँ चल रही थी उस वक्त किसी के
लिए यह भाँपना मुश्किल था कि यह धरना कितने दिनों चलेगा। पर आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाए गए लोगों के परिजनों, उनके गाँवों, कस्बों, यूपी के विभिन्न शहरों व देश के विभिन्न प्रदेशों के लोगों के इंसाफ लेने के जज्बे ने इसे मजबूती दी। शुरुआती दो महीने तक 24-24 व उसके बाद 48-48
घंटों की भूख हड़ताल का दौर शुरू हुआ। जिसमें परिजन, मानवाधिकार व राजनैतिक संगठनों के नेता, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मियों व आम अवाम ने भूख हड़ताल की लंबी श्रृंखला बना डाली। खालिद सिर्फ एक पीडि़त का नाम नहीं था, बल्कि गिरफ्तारी के बाद से वह विरोध प्रदर्शनों की आवाज बन गया था। वह आवाज, जिससे आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से मुस्लिम युवाओं को उठाने वाली एटीएस, एसटीएफ ही नहीं, खुफिया एजेंसियाँ भी भय खाती थीं। 12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर 2007 को मडि़याहूं, जौनपुर से खालिद मुजाहिद को यूपी एसटीएफ ने अगवा करके 22 दिसंबर 2007 को फर्जी तरीके से बाराबंकी से विस्फोटकों के साथ गिरफ्तारी का दावा किया था। लेकिन यह दावा शुरू से ही कटघरे में आ गया क्योंकि इन दोनों को अगवा किए जाते वक्त कई लोगों ने देखा था। लिहाजा उनकी फर्जी गिरफ्तारी के साथ ही आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के आंदोलन के प्रतीक भी तारिक-खालिद बन गए। यूपी की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद बार एसोसिएशनों ने फतवा जारी कर दिया कि आतंक के आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ा जाएगा और न ही लड़ने दिया जाएगा। ऐसे में लखनऊ के
अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब सबसे पहले सामने आए तो वहीं बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन और फैजाबाद में एडवोकेट जमाल ने आतंक के आरोपियों के मुकदमे की वकालत की। सितंबर 2008 में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद जो सिलसिला आजमगढ़ समेत देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तारियों का शुरू हआ उसके साथ ही पूरे देश में एक सिलसिलेवार आवाज बेगुनाहों की रिहाई के लिए भी उठने लगी। उसी सिलसिले से पैदा हुए आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के लिए रिहाई मंच ने एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तय की। जिसे हम इसके शुरुआती बयानों में देख सकते हैं कि अब किसी कतील सिद्दीकी को पुणे की यर्वदा जेल में हत्या, किसी इशरत की फर्जी मुठभेड़ में हत्या या फिर ऐसे तमाम बेगुनाहों की हत्याओं का जो सिलसिला खालिद तक पहुँचा, न सिर्फ उसे हम रोकेंगे बल्कि एक कड़ा संदेश आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने वालों को देंगे कि जेलें बेगुनाहों के लिए नहीं, गुनहगारों के लिए हैं।
    इन स्थितियों को भाँपकर 4 जून 2013 को यूपी सरकार के कैबिनेट ने आरडी
निमेष कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार लिया। आंदोलन के वेग को इससे समझा जा सकता है कि चाहें यूपी की बहुचर्चित हाशिमपुरा, मलियाना सांप्रदायिक ंिहंसा हो या फिर मुरादाबाद, कानपुर, बिजनौर दंगों की जाँच कमीशन की रिपोर्टें कई दशकों से सरकारी तहखानों में धूल फाँक रही हैं वहीं निमेष आयोग की रिपोर्ट को एक साल के भीतर स्वीकारा गया, जिसमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। बहरहाल, रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सपा सरकार ने सोचा कि यह धरना खत्म हो जाएगा। सरकार ने उन मुस्लिम उलेमाओं को फिर से सक्रिय किया जिन्होंने
इसके पहले खालिद के घर जाकर सरकार की तरफ से दिए गए 6 लाख रुपए लेने का
दबाव बनाया, जिसे खालिद के परिजनों ने नकार दिया था। वहीं खालिद के इंसाफ की लड़ाई अब सिर्फ यूपी विधानसभा ही नहीं, बल्कि दो-दो बार जेएनयू छात्रसंघ व अन्य छात्र संगठनों, युवा संगठनों व अन्य प्रदर्शन कारियों द्वारा दिल्ली में यूपी भवन को घेरने तक पहुँच गया था, ने पूरे देश में चल रहे विभिन्न आंदालनों को भी आकर्षित किया। जिन्होंने एक स्वर में रिहाई मंच की आवाज में आवाज मिलाई और सपा सरकार पर सवाल उठाया कि जब आर.डी. निमेष रिपोर्ट को  सरकार ने स्वीकार कर लिया है, यानी उसे सही मान लिया है तो फिर दोषी पुलिस अधिकारियों जिन्होंने अपने को बचाने के लिए खालिद मुजाहिद की हत्या करवा दी, को सरकार गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है।
    मौलाना खालिद की हत्या पर दर्ज एफ.आई.आर. बहुत अहम था। जिसमें हत्या के आरोपियों के बतौर पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल, मनोज कुमार झा समेत पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ ही आईबी अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ। क्योंकि खालिद को फंसाने का पूरा झूठा षड्यंत्र आई.बी. ने रचा था। इसलिए प्रदर्शनकारियों के निशाने पर खुफिया एजेंसियाँ प्रमुखता से थीं। रिहाई मंच के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता व जीत इसी बात की है कि इसने आई.बी. समेत खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की आपराधिक व देशद्रोही भूमिका को बहस के केन्द्र में लाया है। इसे धरने के दौरान तख्तियों पर लिखे उन वाक्यों से समझ सकते हैं कि ‘निमेष आयोग से खतरा, आखिर किसको’। प्रदर्शनकारियों के हाथों में आरोपी पुलिस वालों के नाम लिखी वो तख्तियाँ हर वक्त नजर आती थीं, जिन पर उनके गिरफ्तारी की माँग दर्ज थी। जिससे बौखलाए पूर्व डी.जी.पी. के समर्थक व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने रिहाई मंच के धरने की मांगों के खिलाफ भी कई बार जी.पी.ओ. लखनऊ पर धरने दिए। अखिलेश सरकार ने यह आश्वासन दिया कि मानसून सत्र में निमेश कमीशन पर कार्रवाई रिपोर्ट लाई जाएगी। पर लगातार सरकार के झूठे वादे जो बेगुनाहों की मौत की वजह तक बन गए, पर अब किसी प्रकार का भरोसा नहीं रह गया था। क्योंकि सपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि
आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को वह रिहा करेगी, पर सत्ता में आने के बाद वह वादे से मुकर गई। ऐसे में रिहाई मंच ने तय किया कि जब तक सरकार कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाती धरना चलता रहेगा। 20 जून को धरने के तीस दिन होने पर यह धरना राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में इस मुद्दे पर होने वाले सबसे बड़े धरने के रूप में आया। धरने का विश्लेषण करते हुए कई समाचार पत्रों ने इसके तीस दिन होने पर परिशिष्ट भी निकाला। धरने में देश के विभिन्न हिस्सों से शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने
इसे और सशक्त प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित किया। दिशा छात्र संगठन का सांस्कृतिक दस्ता हो या फिर जेएनयू के आरडीएफ द्वारा ‘बाटला हाउस’ नाटक का मंचन, ऐसे कई मौके आए जब लखनऊ शहर व बाहर की एक बड़ी बौद्धिक जमात समर्थन में आई। जेएनयू स्टूडेंट यूनियन समेत देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न छात्र, राजनैतिक मानवाधिकार संगठन भी समर्थन में लखनऊ पहुँचे। चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्देशक अनुशा रिजवी, साहित्यकार नूर जहीर समेत विभिन्न शख्सियतें भी समर्थन में धरने में शामिल हुईं। मानसून आ गया था, पर धरने ने यूपी की सियासत का ताप गर्म कर दिया था। धरने के 50वें दिन इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ समेत गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले जन संधर्श मंच और प्रख्यात लोकतांत्रिक अधिकारवादी टेªड यूनियन नेता मुकुल सिन्हा के सहयोगी अधिवक्ता शमशाद पठान गुजरात से तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या और हस्तक्षेप के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय भी शामिल हुए। धरने के समर्थन में माकपा सांसद मोहम्मद सलीम, माकपा नेता व पूर्व सांसद सुभाषिनी अली, पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव, अनहद की शबनम हाशमी भी आईं। उधर सरकार मानसून सत्र बुलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वह अपने वादे से पीछे हटने की फिराक में थी। 15 जुलाई को धरने के समर्थन में 55वें दिन पहुँचकर सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारे देश में आईबी, सेक्योरिटी एजेंसी, एटीएस के लोग बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं। वे आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। हमारे पास इस बात के उदाहरण हैं। इस खतरनाक माहौल में यह जरूरी है कि इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। उनकी देख-रेख के लिए संसदीय कमेटियाँ बनाई जाएँ। उन्हें गृह मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लगातार धरने का बढ़ता समर्थन, वह भी रमजान के महीने में, जब मुस्लिम समुदाय धार्मिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है, सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा था। क्योंकि सरकारी तंत्र यही प्रचार कर रहा था कि धरना मुसलमान चला रहे हैं पर वास्तविकता बिल्कुल इसके उलट थी। जो रमजान के महीने ने प्रमाणित कर दिया। रमजान के महीने में जब सामूहिक दुआ का आयोजन धरने के 60 वें दिन होने वाला था, उसके ठीक दो दिनों पहले सरकार द्वारा रिहाई मंच के मंच को उखाड़ने की बौखलाहट ने साफ कर दिया कि सरकार नीतिगत स्तर पर बढ़ती गोलबंदी से भयभीत
थी। लेकिन सरकार के इस लोकतंत्रविरोधी रवैये ने लोगों के हौसले को और बढ़ा दिया और जैसे ही यह खबर फैली आंदोलन के समर्थक भारी संख्या में धरना स्थल पर पहुँच गए और भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच ही सभा आयोजित हुई। वहीं धरने के दौरान दो बार सामूहिक इफ्तार का भी आयोजन हुआ जहाँ आंदोलन के समर्थक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुँचे। जिन्होंने खुद अपने हाथों से धरनास्थल पर फैली गंदगी जिसे पुलिस के दबाव में नगर निगम के सफाईकर्मियों ने साफ करने से मना कर दिया था, को खुद अपने हाथों में झाड़ू लेकर साफ किया और नमाज पढ़ सकने लायक बनाया। सबसे अहम कि गंदगी साफ करने वालों में शहर के तमाम हकपसंद उलेमा और बुजुर्गवार लोग शामिल थे। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकारी इफ्तार के आयोजन के जरिए इस मसले पर मुसलमानों को गुमराह करने की ‘इफ्तार पाॅलिटिक्स’ विफल हो गई क्योंकि आम अवाम ने रिहाई मंच के इफ्तार को सरकारपरस्त मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं
के इफ्तार के समानांतर हकपसंद लोगों का इफ्तार माना। 22 जुलाई को सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या धरने के समर्थन में पहुँचे और आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन टेकन रिपोर्ट यूपी सरकार से लाने को कहते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं जहाँ बेगुनाह जेलों में और गुनहगारों का सरकार संरक्षण कर रही है। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त का दिन इस धरने का एक खास दिन रहा। जब
रिहाई मंच ने तिरंगा फहराया और वहीं पर ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं’ विषय पर जनसुनवाई किया। जिसमें आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के परिजनों खास कर अक्षरधाम हमले के आरोप में फांसी की सजा पाए बरेली के चाँद खान की नग्मा और उनके बच्चे, संकटमोचन कांड के आरोपी वलीउल्लाह के ससुर के अलावा कोसी कलाँ, मथुरा, अस्थान, प्रतापगढ़, फैजाबाद, परसपुर,
गांेडा के साम्प्रदायिक हिंसा से पीडि़त लोग भी शामिल हुए। धरने के 100वें दिन यूपी
विधानसभा पर रिहाई मंच ने हजारों लोगों का एक बड़ा विधान सभा चेतावनी मार्च निकालकर संदेश दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे जाएगी तो अवाम सड़कों पर आ जाएगी। इस मार्च में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गताडे, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान आदि शामिल हुए। जहाँ सरकार मानूसन सत्र से भाग रही थी वहीं प्रदेश में मानसून सत्र बुलाकर निमेश कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट लाने की माँग को लेकर पत्र लिखने का अभियान शुरू हुआ। अन्ततः मानसून सत्र बुलाने की अंतिम समय सीमा जब खत्म होने लगी तो हार मानकर सरकार को 16 सितंबर को सत्र बुलाना पड़ा। 15 सितंबर की शाम रिहाई मंच के तत्वावधान में हजारों सामाजिक, राजनैतिक व मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यूपी विधानसभा पर मशाल मार्च निकालकर सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने वादे कोे अमल में लाए। 16 सितंबर को सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जिसने साफ कर दिया कि पुलिस और आईबी एक पाॅलिसी के तहत मुस्लिमों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाती है। अब यह बात जुबानी नहीं रही, बल्कि निमेष कमीशन इसका एक प्रमाणित दस्तावेज, जनता के बीच आ गया था। सपा सरकार अपने वादे से फिर पीछे हट गई। उसने उन दोषी पुलिस व आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई जिन्होंने अपने पास मौजूद खतरनाक विस्फोटकों को तारिक-खालिद के पास से झूठी बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार किया था। इस बात से आक्रोशित रिहाई मंच के नेताओं ने इसे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का सरकारी कदम बताते हुए यूपी विधानसभा पर घेरा डालो-डेरा डालो का आह्वान करते हुए अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 19 सितंबर 2013 को रिहाई मंच के विधानसभा घेरने के आह्वान के बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया और एक ऐतिहासिक धरने की समाप्ति का दिन 19 सितंबर बना। यह वही दिन था जिस दिन पाँच साल पहले दिल्ली में बाटला हाउस में फर्जी मुठभेड़ हुआ था। रिहाई मंच की मुहिम अनवरत जारी है और ऐसे आंदोलन, नींव की वो ईटें हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र खड़ा है।
 -अनिल यादव
मो0-09454292339
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शुक्रवार, 19 जून 2015

हिन्दुत्ववादी सरकार में दलित नरसंहार

गुरुवार, 18 जून 2015

हिन्दुत्ववादी सरकार में दलित नरसंहार

 राजस्थान का जाट बाहुल्य नागौर जिला जिसे जाटलैंड कह कर गर्व किया जाता है, आधिकारिक रूप से अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए एक ‘अत्याचारपरक जिला‘ है। यहाँ के दलित आज भी दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत से ही जीवन जीने को मजबूर है। दलित अत्याचार के निरंतर बढ़ते मामलों के लिए कुख्यात इस जाटलैंड का एक गाँव है डांगावास, जहाँ पर तकरीबन 16 सौ जाट परिवार रहते हैं। इस गाँव को जाटलैंड की राजधानी कहा जाता रहा है। यहाँ पर सन 1984 तक तो दलितों को वोट डालने का अधिकार तक प्राप्त नहीं था, हालाँकि उनके वोट पड़ते थे, मगर नाम उनका और मतदान कोई और ही करता था। यह सिर्फ वोटों तक सीमित नहीं था, जमीन के मामलों में भी कमोबेश यही हालात हैं। जमीन दलितों के नाम पर और कब्जा दबंग जाटों का। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 (बी) भले ही यह कहती हो कि किसी भी दलित की जमीन को कोई भी गैर दलित न तो खरीद सकता है और न ही गिरवी रख सकता है, मगर नागौर सहित पूरे राजस्थान में दलितों की लाखों एकड़ जमीन पर सवर्ण काबिज हैं, डांगावास में ही ऐसी सैंकड़ों बीघा जमीन है, जो रिकॉर्ड में तो दलित के नाम पर दर्ज है, लेकिन उस पर अनधिकृत रूप से जाट काबिज हैं।
    डांगावास के एक दलित दौलाराम मेघवाल के बेटे बस्तीराम की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन पर चिमनाराम नामक दबंग जाट ने 1964 से कब्जा कर रखा था, उसका शुरू-शुरू में तो यह कहना था कि यह जमीन हमारे पास 1500 रुपये में गिरवी है, बाद में दलित बस्ती राम के दत्तक पुत्र रतना राम ने  न्यायालय की मदद ले कर अपनी जमीन से चिमनाराम जाट का कब्जा हटाने की गुहार करते हुए एक लम्बी लड़ाई लड़ी और अभी हाल ही में नतीजा उसके पक्ष में आया। दो माह पहले मिली इस जीत के बाद दलित रतना राम मेघवाल ने अपनी जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया और वहीं परिवार सहित रहना प्रारम्भ कर दिया। यह बात चिमनाराम जाट के बेटों ओमाराम तथा कानाराम जाट को बहुत बुरी लगी, उसने जे0सी0बी0 मशीन लाकर उक्त भूमि पर तालाब बनाना शुरू कर दिया और खेजड़ी के हरे पेड़ काट डाले। इस बात की लिखित शिकायत रतना राम मेघवाल की ओर  से 21 अप्रैल 2015 को मेड़ता थाने में की गई, लेकिन नागौर जिले के पुलिस महकमे में जाट समुदाय का प्रभाव ऐसा है कि उनके विरुद्ध कोई भी अधिकारी कार्यवाही करना तो दूर की बात है, सोच भी नहीं सकता है, इसलिए कोई कार्यवाही नहीं की गई। इसके बाद दलितों को जान से खत्मकर देने की धमकियाँ मिलने लगीं और यह भी पता चला कि जाट शीघ्र ही गाँव में एक पंचायत बुलाकर दलितों से जबरन यह जमीन खाली करवाएँगे अथवा मारपीट कर सकते हंै, तो इसकी भी लिखित में शिकायत 11 मई को रतना राम मेघवाल ने मेड़ता थाने को देकर अपनी जान माल की  सुरक्षा की गुहार की, फिर भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।
    14 मई 2015 की सुबह 9 बजे के आस पास डांगावास गाँव में जाट समुदाय के लोगों ने अवैध पंचायत बुलाई, जिसमें ज्यादातर वे लोग बुलाये गए, जिन्होंने दलितों के नाम वाली जमीनों पर गैरकानूनी कब्जे कर रखे हैं, इस हितसमूह ने तय किया कि अगर रतना राम मेघवाल इस तरह अपनी जमीन वापस ले लेगा तो ऐसे तो सैंकड़ांे बीघा जमीन और भी है जो हमें छोड़नी पड़ेगी, अतः हर हाल में दलितों का मुँह बंद करने का सर्वसम्मत फैसला करके सब लोग हमसलाह होकर हथियारों, लाठियों, बंदूकांे, लोहे की सरियों इत्यादि से लैश होकर तकरीबन 500 लोगों की भीड़ डांगावास गाँव से 2 किमी दूरी पर स्थित उस जमीन पर पहँुची, जहाँ पर रतना राम मेघवाल और उसके परिजन रह रहे थे। उस समय खेत पर स्थित इस घर में 16 दलित महिला पुरुष मौजूद थे, जिनमें पुरोहित वासनी पादुकला के पोखर राम तथा गणपत राम मेघवाल भी शामिल थे। ये दोनों रतना राम की पुत्रवधू के सगे भाई हैं, अपनी बहन से मिलने आए हुए थे। दलितों को तो गाँव में हो रही पंचायत की  खबर भी नहीं थी कि अचानक सैंकड़ों लोग ट्रैक्टरों और मोटर साईकिलों पर सवार होकर आ धमके और वहाँ मौजूद लोगों पर धावा बोल दिया। उन्होंने औरतों को एक तरफ भेज दिया, जहाँ पर उनके साथ ज्यादती की गई तथा विरोध करने पर उनके हाथ पाँव तोड़ दिए गए, दो महिलाओं के गुप्तांगों में लकडि़याँ घुसेड़ दी गईं, वहीं दूसरी ओर दलित पुरुषों पर आततायी भीड़ का कहर टूट पड़ा। उन्हें ट्रैक्टरों से कुचल-कुचल कर मारा जाने लगा, लाठियों और लोहे के सरियों से हाथ पाँव तोड़ दिए गए, रतना राम के पुत्र मुन्ना राम पर गोली चलायी गई, लेकिन उसी समय किसी ने उसके सिर पर सरिये से वार कर दिया जिससे वह गिर पड़ा और गोली भीड़ के साथ आये रामपाल गोस्वामी को लग गई, जिसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
    जाटों की उग्र भीड़ ने मजदूर नेता पोखर राम के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाया तथा उनकी आँखों में जलती हुई लकडि़याँ डाल दीं, लिंग नोंच लिया। उनके भाई गणपत राम की आँखों में आक वृक्ष का दूध डाल कर आँखंे फोड़ दी गई। इस तरह एक पूर्व नियोजित नरसंहार के तहत पोखर राम, रतना राम तथा पांचाराम मेघवाल की मौके पर ट्रैक्टर से कुचल कर हत्या कर दी गयी तथा गणपत राम एवं गणेश राम सहित 11 अन्य लोगों को अधमरा कर दिया गया। मौत का यह तांडव दो घंटे तक जारी रहा, जबकि घटनास्थल से पुलिस थाना महज साढ़े तीन किमी दूरी पर स्थित है, लेकिन दुर्भाग्य से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक तथा मेड़ता थाने का थानेदार तीनों ही जाट होने के कारण उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी इस तांडव के लिए पूरा समय दिया और जब सब खत्म हो गया तब मौके पर पहँुच कर सबूत मिटाने और घायलों को हटाने के काम में लगे। मनुवादी गुंडों की दादागिरी इस स्तर तक थी कि जब उन्हें लगा कि कुछ घायल जिंदा बचकर उनके विरुद्ध कभी भी सिर उठा सकते है तो उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल पर हमला करके वहाँ भी घायलों की जान लेने की कोशिश की। अंततः घायलों को अजमेर उपचार के लिए भेज दिया गया और मृतकों का पोस्टमार्टम करवा कर उनके अंतिम संस्कार कर दिए गए।
    पीडि़त दलितों के मौका बयान के आधार पर पुलिस ने बहुत ही कमजोर लचर सी एफ0आई0आर0 दर्ज की तथा दूसरी ओर रामपाल गोस्वामी की गोली लगने से हुई मौत का पूरा इलजाम दलितों पर डालते हुए गंभीर रूप से घायल दलितों सहित 19 लोगों के खिलाफ हत्या का बेहद मजबूत जवाबी मुकदमा दर्जकर लिया गया। इस तरह जालिमों ने एक सोची समझी साजिश के तहत कर्ताधर्ता दलितों को तो जान से ही खत्म कर दिया, बचे हुओं के हाथ पाँव तोड़ कर सदा के लिए अपाहिज बना दिया और जो लोग उनके हाथ नहीं लगे या जिनके जिंदा बच जाने की सम्भावना है, उनके खिलाफ हत्या जैसी संगीन धाराओं का मुकदमा लाद दिया गया, इस तरह डांगावास में दबंग जाटों के सामने सिर उठा कर जीने की हिमाकत करने वाले दलितों को पूरा सबक सिखा दिया गया। राज्य की वसुंधरा राजे की सरकार ने इस निर्मम नरसंहार को जमीनी विवाद बताकर इसे दो परिवारों की आपसी लड़ाई घोषित कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। हालाँकि पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार के नुमाइंदों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि दो पक्षों के खूनी संघर्ष में सिर्फ एक ही पक्ष के लोग क्यों मारे गए तथा घायल हुए हैं, दूसरे पक्ष को किसी भी प्रकार की चोट क्यों नहीं पहँुची है और जब दलितों के पास आत्मरक्षा के लिए लाठी तक नहीं थी तो रामपाल को गोली मारने के लिए उनके पास बन्दूक कहाँ से आ गई और फिर सभी दलित या तो घायल हो गए अथवा मार डाले गए तब वह बन्दूक कौन ले गया। जिससे गोली चलायी गई थी। मगर सच यह है कि दलितों की स्थिति गोली चलाना तो दूर की बात, वे थप्पड़ मारने का साहस भी अब तक नहीं जुटा पाए हैं। 23 मई को एक और घायल गणपत राम ने भी दम तोड़ दिया है, जिसकी लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया।
    नागौर जिला दलित समुदाय के लोगों की कब्रगाह बन गया है, यहाँ पर विगत एक साल में अब तक दर्जनों दलितों की हत्याएँ हो चुकी हैं, इसी डांगावास गाँव में जून 2014 में जाटों द्वारा मदन मेघवाल के पाँव तोड़ दिए गए थे, जनवरी 2015 में मोहन मेघवाल के बेटे चेनाराम की हत्या कर दी गई, बसवानी गाँव की दलित महिला जड़ाव को जिंदा जला दिया गया, उसका बेटा भी बुरी तरह से झुलस गया। मुंडासर की एक दलित महिला को ज्यादती के बाद ट्रैक्टर के गर्म सायलेंसर से दाग दिया गया, लंगोड़ में एक दलित को जिंदा ही दफना दिया गया, हिरड़ोदा में दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे पटक कर जान से मारने का प्रयास किया गया। इस तरह नागौर की जाटलैंड में दलितों पर कहर जारी है और राजस्थान का दलित लोकतंत्र की नई नीरो, चमचों की महारानी, प्रचंड बहुमत से जीत कर सरकार चला रही वसुंधराराजे के राज में अपनी जान के लिए भी तरस गया है। राज्य भर में दलितों पर अमानवीय अत्याचार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं और राज्य के आला अफसर और सूबे के वजीर विदेशों में ‘ रिसर्जेंट राजस्थान‘ के नाम पर रोड शो करते फिर रहे हंै। कोई भी सुनने वाला नहीं है, राज्य के गृह मंत्री तो साफ कह चुके हैं कि उनके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं जिससे अपराधियों पर अंकुश लगा सकें।  पुलिस अपराधियों में भय और आम जन में विश्वास’ के अपने ध्येय वाक्य के ठीक विपरीत ’आम जन में भय और अपराधियों में विश्वास’ कायम करने में सफल होती दिखलाई पड़ रही है। जाटलैंड का यह निर्मम दलित संहार संघ के कथित हिन्दुराष्ट्र में दलितों की स्थिति पर सवाल खड़ा कर रहा है।
 -भंवर मेघवंशी
मोबाइल: 09571047777
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

मंगलवार, 16 जून 2015

ताक-झांक : बाबा रामदेव की डायरी में

ताक-झांक : बाबा रामदेव की 

डायरी में

वैशाख शुक्ल-1, विक्रम संवत 2072
हरिद्वारआज राहुल गांधी ने संसद में मोदी सरकार को ललकारते हुए कहा कि वह सूट-बूट की सरकार है. बात मेरी समझ में नहीं आई. राहुल ने ऐसा क्यों कहा! जबकि मोदी जी का सूट तो कब का नीलाम हो चुका है. वह भी करोड़ों में. सोचता हूं मैं भी अपना सूट नीलाम करवा दूं. निश्चित ही मोदी जी के सूट से ज्यादा धनराशि प्राप्त होगी. इसके दो कारण है. पहला, मेरे कई धनवान चेले हैं. दूसरा, मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे रामलीला मैदान में पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस  से जान बचाई थी. आज भी लोग उस सूट को लेकर चुटकुले बनाते हैं और मेरा परिहास करते हैं. जबकि आपद धर्म में तो सब उचित होता है. आखिर अर्जुन ने भी अज्ञातवास में बृह्नलला का रूप धरा था. इससे क्या अर्जुन की शूरवीरता कम हो गई! आपद धर्म में जान बचाने के लिए उस समय जिस वीरांगना बहन का सूट मैंने लिया था, उसने मुझसे कभी उसे वापस नहीं मांगा. जब मैं खुद ही उसे वापस करने गया तो वह बोली कि रख लो बाबा, आप को ज्यादा सूट करता है.
मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस से जान बचाई थी

वैशाख शुक्ल-2, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा दिया मैंने. अरे यार! मेरी हैसियत मोदी जी के बराबर की है और हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर जी मुझे मंत्री का दर्जा दे रहे हैं. एक बार अपने बयान में मैंने खुद कहा था कि मैं चाहूं तो इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता हूं. ऐसे ही भारत सरकार पद्म भूषण देने का मन बना रही थी. इसकी औपचारिक घोषणा होने से पहले ही मैंने इसे लेने से मना कर दिया. कैबिनेट मंत्री पद छोड़कर मैंने एक बार फिर इतिहास रच दिया. लगातार दो त्याग किए मैंने. सोनिया जी का त्याग मेरे सामने कुछ भी नहीं.
वैशाख शुक्ल-4, विक्रम संवत 2072
हरिद्वार
कल कांग्रेस के प्रवक्ता मनु सिंघवी ने कहा कि मैंने योग को राजनीति से जोड़कर राजयोग शुरू कर दिया जिसमें योग पीछे और बाबा की राजनीति आगे है. मिथ्या आरोप है उनका. मैंने योग को राजनीति से नहीं जोड़ा है अपितु राजनीति में योग को जोड़ दिया है. राजनीति में योग करते-करते मैंने जाना कि वस्तुतः राजनीति भी योग का ही तो खेल है. योग अर्थात जोड़ अर्थात जोड़ना. राजनीति का मर्ज ही जोड़ों का दर्द है. नेता अपने लिए तो जोड़ता जाता है और समाज में दर्द बांटता जाता है. अपने तनिक से जोड़ के लिए वह किसी को भी दर्द बांट सकता है. बाबा सब जानता है. बाबा के अधिकांश शिष्य राजनीतिज्ञ ही तो हैं. वो भी कुशल. मैं योग कराते-कराते राज करने लगा तो कुछ छद्म राष्ट्रवादियों, मनु सिंघवी जैसे लोगों को सहन नहीं हो रहा है. देश में कितने योग गुरू हैं. कोई मेरी तरह से वीआईपी नहीं बन पाया. क्यों! क्योंकि उन्होंने योग में कुछ जोड़ा नहीं. यदि मैं योग में राजनीति को न जोड़ता तो मेरे विरोधी कब का मेरा आश्रम बंद करवा चुके होते. आज यदि योग और बाबा रामदेव एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं तो उसका कारण राजयोग ही है.
राहुल गांधी चिंतन करने विदेश चले जाते हैं. जबकि यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है और उसके चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है.
वैशाख शुक्ल-5, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
इस समय अपने  को कर्ण जैसा ही उपेक्षित महसूस कर रहा हूं. नरेंदर मोदी की ओर से लगातार उपेक्षा मिल रही है. जबकि उनकी जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था मैंने. उनकी सरकार बनने के पश्चात ही मैं हरिद्वार लौटा था. अपने योग शिविर को चुनाव प्रचार कार्यालय में बदल दिया था. परंतु मोदी जी…. अरे काहे का जी… यहां कौन-सा सबके सामने भाषण दे रहा हूं. चुनाव जीतने के बाद एक बार भी पतंजलि योगपीठ नहीं आए. हमारी तरफ पीठ करके बैठ गए. कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने वाला मैं ही था. मोदी के पक्ष में हवा बनाने के लिए मैं आचार्य बालकृष्ण के साथ आमरण अनशन पर बैठा. नौ दिन में ही मेरी हवा टाइट हो गई थी. यहां तक कि अस्पताल पहुंच गया. तब श्रीश्री रविशंकर जी के हाथों जूस पी कर अपना अनशन तोड़ा. उस समय वह जूस नहीं समुद्र मंथन से निकला हुआ साक्षात अमृत लगा था मुझे. तब लोगों ने कैसे-कैसे सवाल किए थे. बाबा आप योगी होकर अस्पताल पहुंच गए जबकि बालकृष्ण का बाल भी बांका न हुआ था. कितनी भद्द पिटी थी मेरी. जिस मोदी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था उसी ने मुझे से दांव खेल दिया. सोचता हूं किसी दिन आश्रम में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और संजय जोशी को बुला कर अपनी व्यथा सुनाऊं!
वैशाख शुक्ल-6, विक्रम संवत 2072
करनाल
योग और आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए मुझे भी भारत रत्न मिलना चाहिए. मेरा काम सुश्रुत,धनवंतरी से बढ़कर है. मैंने योग को दर्शनीय बनाया है. भारत रत्न की लालसा मेरे मन में तब से और ज्यादा बलवती हो गई, जब से इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा को पदम भूषण मिला. वह भी शिक्षा और साहित्य में उनके योगदान के लिए. उन्होंने कितनी किताबें लिखी हैं,  बाबा को पता ही नहीं. जबकि बाबा सब जानता है. आश्रम में ही रहने वाले मेरे एक प्रिय शिष्य ने आज मुझसे कहा कि रजत शर्मा वाली अपनी जिज्ञासा आप गूगलबाबा को बताइए न. यह सुनकर मेरे कान खडे़ हो गए. मैंने सबसे पहले उससे सवाल किया, ‘तेरा गूगल बाबा योग तो नहीं सिखाता है न!’ वह हंसा. परंतु उसका चमत्कारी गूगल बाबा भी रजत शर्मा के द्वारा शिक्षा और साहित्य में किए गए योगदान को खोजने में असफल हो गया. इससे एक बात सिद्ध होती है कि मेरे पास  ‘दिव्य फार्मेसी’ है तो वर्तमान सरकार के पास ‘दिव्य दृष्टि’ है.
यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
वैशाख शुक्ल-7, विक्रम संवत 2072
करनाल
आज मेरे एक शिष्य ने पूछा, ‘बाबा आप प्रवचन देते हैं कि भाषण. पता नहीं चलता.’ आज सुबह से बैठा मैं इसी बात को सोच रहा हूं. शिष्य की बात पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा कर रहा हूं. मध्यरात्रि हो चुकी है परंतु अभी तक सफलता नहीं मिली.
वैशाख शुक्ल-8, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
शेर की तरह दहाड़ने वाले  गिरिराज सिंह आज मीनाकुमारी की तरह रोते हुए आए. आते ही बोले, ‘बाबा जुबान पर काबू रखने के लिए कोई आसन बताइए.’ मैंने उनको झट से सिंहासन करवा दिया. इसे करने के बाद गिरिराज बाबू बोले कि क्या बाबा इसमें भी तो मेरी जुबान बाहर ही निकली रही. यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं रही कि यह आसन करते समय जुबान मुंह के बाहर निकालनी पड़ती है. अंत में अपना पिंड छुड़ाने के लिए मैंने उन्हें नभो मुद्रा जिसमें जुबान तालू में लगानी होती है और मांडुकी मुद्रा जिसमे जुबान को मसूढ़ों के ऊपर घुमाया जाता है, करवाया. इसको करने के बाद वह खुशी-खुशी वहां से चले गए. अबोध! अब यह बाबा उन्हें क्या बताता! यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-9, विक्रम संवत 2072
कुरुक्षेत्र
कुछ लोगों को शंका है कि योग से ज्यादा फायदा नहीं होता हैा.योग से बहुत फायदा होता हैं. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता! आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-11, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल गत माह की बेलैंस सीट देखी तब से  योग करने का मन नहीं कर रहा है. पिछने महीने पतंजलि उत्पाद केंद्र की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई. देखकर मन खिन्न है. आज पूरा दिन इसी सोच-विचार में व्यतीत करूंगा कि अब कौन-सा नया उत्पाद लॉन्च किया जाए. ‘दिव्य पुत्रजीवक बीज’ का अप्रत्याशित परिणाम मिला. उसका विपणन जोरों पर है. जिन्होंने इसका उपयोग किया उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता. हमने मुख्य समाचारपत्रों में प्रथम पृष्ठ पर पूरे-पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया था इसका. यद्यपि मीडिया ने इसके नाम को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. इन मूर्खों को पता नहीं कि अनजाने में वे मेरे उत्पाद का विज्ञापन ही कर रहे थे. प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है. आयुर्वेद के नाम रोज नई-नई ऐरी-गैरी कंपनियां पैदा हो रही हैं. आसन क्रिया से अधिक उत्पादों को बेचने में कसरत है. तनाव बहुत बढ़ गया है. शाम के पांच बज रहे हैं. अभी-अभी भ्रामरी और सुप्त भद्रासन  किया है ताकि तनाव कम हो और मन शांत रहे.
वैशाख शुक्ल-12, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
विपश्यना! पाली भाषा का शब्द. जिसका मतलब होता है जो जैसा है, वैसा देखना. इसी के लिए राहुल गांधी विदेश गए थे.  अच्छा है. जिस वय में बालक बिपाशा के लिए ध्यानमग्न होते हैं वे विपश्यना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. होना भी चाहिए क्योंकि पार्टी की दशा चिंतनीय है. पंरतु ऐसा करना उनके पार्टी के हित में हो सकता है, राष्ट्रहित में नहीं. उन्होंने हमारी परंपरा का पालन नहीं किया. हमारे यहां हिमालय में जाकर चिंतन-मनन करने की परंपरा रही है. देखो तो राहुल की वजह से विपश्यना का कितना प्रचार हो गया. अगर वह प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, कपालभाति करते तो कितना अच्छा होता! सबकुछ भूलभाल के मेरे योग शिविर में ही आ सकते थे. वह तो अच्छा है कि यहां सबकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि विदेश जाकर विपश्यना करें. वरना तो मेरा योग का धंधा मंदा हो जाता. वैसे जब मैं राहुल को शहजादा कहता हूं तो क्या गलत कहता हूं. राहुल गांधी चिंतन करने के लिए विदेश जाते हैं और यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आम आदमी के चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है अब देखना है कि राहुल गांधी के चिंतन से क्या निकलता है!
- अनूप मणि त्रिपाठी
लोकसंघर्ष पत्रिका  में शीघ्र  प्रकाशित

गौहत्या पर प्रतिबंध: वैज्ञानिक पशुपालन या सांस्कृतिक राष्ट्रवादी

गौहत्या पर प्रतिबंध: वैज्ञानिक पशुपालन या सांस्कृतिक राष्ट्रवादी

हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गौरक्षा के लिए चलाए जा रहे अभियान का उद्देश्य राजनैतिक है। ये संगठन उच्च जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं और उस पदक्रम आधारित व सामंती संस्कृति.जो ऊँची जातियों को विशेषाधिकार देती है.को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देना चाहते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा ने सन् 1995 में 'महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम 1976' में संशोधन किया था। इस संशोधन अधिनियम को 20 साल बाद, सन् 2015 में, राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस संशोधन अधिनियम का उद्देश्य गौवंश की रक्षा नहीं बल्कि अतिवादी व अराजक हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को, हाशिए पर पड़े समुदायों,विशेषकर मुसलमानों, को भयाक्रांत करने का अवसर उपलब्ध करवाना है। 
सन् 1976 के पशु संरक्षण अधिनियम, जिसे सन् 1988 में संशोधित किया गया था, में केवल गाय ;व उसके नर व मादा बछड़ों का वध प्रतिबंधित किया गया था और कानून का उल्लंघन करने वालों को छः माह तक के कारावास से दंडित किए जाने का प्रावधान था। यदि अदालत चाहे तो अपराधी पर रूपये 1000 तक का जुर्माना भी लगा सकती थी। 
सन् 2015 का अधिनियम,एक प्रजातांत्रिक, संवैधानिक राज्य को एकाधिकारवादी, सांस्कृतिक राज्य में परिवर्तित करता है.एक ऐसे राज्य में जो अतिशय शक्तिसंपन्न है और जिसके तंत्र को नागरिकों के रसोईघरों, रेफ्रिजिरेटरों और खाने की थाली में झांकने का अधिकार है। अधिनियम में गाय के अलावा बैलों और सांडों का वध भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिस तथ्य पर अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया है वह यह है कि यह अधिनियम यूएपीए ;गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम या टाडा ;आंतकवादी व विध्वंसकारी गतिविधियां निवारण अधिनियम या पोटा ;आतंकवादी गतिविधियां निवारण अधिनियम जितना ही भयावह है। इस अधिनियम के लागू होने से उन अतिवादी व मुख्यधारा के हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को प्रोत्साहन मिलेगा जो कई तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में संलग्न हैं। ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं ऐसे ट्रक व अन्य वाहनों को रोकना जिनमें मवेशी ढोए जा रहे हों व मवेशियों का मालिक, विक्रेता या क्रेता या वाहन का मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो। ये समूह, जिनमें अक्सर चार से छः संडमुसंड व्यक्ति होते हैं,ड्रायवर से कागजात मांगते हैंए उन कागजातों को फाड़कर फेंक देते हैं और मवेशी लूट लेते हैं। अगर ड्रायवर मुसलमान हो तो उसकी पिटाई लगाते हैं, पुलिस को बुला लेते हैं और झूठा प्रकरण दर्ज करवाकर वाहन को जब्त करवा देते है। उसके बाद वे मीडिया को बुलाकर यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान, गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे और उन्होंने उन्हें रोका।
राज्य और पवित्र गाय
सरकार का कहना है कि 2015 का अधिनियम,संविधान के चौथे भाग के अनुच्छेद 48 के अनुरूप है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों से संबंधित है। ये नीति निदेशक तत्व अदालतों के जरिए लागू नहीं करवाए जा सकते। अनुच्छेद 48 कहता है,'राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण व सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।' राज्य सरकार ने बंबई हाईकोर्ट को बताया कि यह अधिनियम इसलिए लागू किया गया है ताकि गौवंश की रक्षा हो सके। सरकार का यह भी कहना था कि गाय के दूध, गोबर और मूत्र का इस्तेमाल कीटनाशक और अन्य औषधीय उत्पादों में किया जाता है। राज्य सरकार के इस दावे की किसी वैज्ञानिक शोध से पुष्टि नहीं हुई है और ना ही सरकार,अदालत के समक्ष ऐसे किसी भी शोध का हवाला दे सकी। जहां तक बैल के भारवाही पशु के रूप में इस्तेमाल का सवाल है, इस आधार पर तो फिर भैंसों, ऊँटों और घोड़ों के वध को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सरकार ने प्राचीन वैदिक ग्रंथों का हवाला देकर भी अपने नये कानून को उचित ठहराया। यहां तक कि 'नेशनल कमीशन ऑन केटल' की रपट में भी वैदिक ग्रंथों और 'स्मृतियों' के आधार पर यह 'साबित' किया गया है कि गाय एक उपयोगी पशु है! सच यह है कि ऊँची जातियों की धार्मिक परंपराओं का सहारा लिए बिना, गौवध पर प्रतिबंध को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। 
अगर सन् 2015 के अधिनियम का उद्देश्य महाराष्ट्र के पशुधन का उसके दूध, गोबर और मूत्र के उत्पादों की खातिर संरक्षण करना और भारवाही पशु के रूप में बैल की उपयोगिता की दृष्टि से उसे वध से बचाना है तो फिर अधिनियम की धारा 5डी के अंतर्गत, किसी व्यक्ति के पास अन्य राज्यों से आयात किए गए गौमांस का पाया जाना अपराध घोषित क्यों किया गया है। निश्चित तौर पर अगर महाराष्ट्र के बाहर से गौमांस आयात किया जाता है तो उससे राज्य के पशुधन में कमी नहीं आएगी और ना ही राज्य में उपलब्ध गायों के दूध,गोबर या मूत्र की मात्रा घटेगी! दूसरी ओरए गौवंश के राज्य से बाहर निर्यात ;सिवा वध के लिए करने की अनुमति क्यों दी गई है ? गौवंश को चाहे वध के लिए निर्यात किया जाए या किसी अन्य उद्देश्य के लिएए महाराष्ट्र तो अपना पशुधन खोएगा ही और साथ ही दूध, गोबर और मूत्र भी खोएगा। 
दरअसल, इस अधिनियम का उद्देश्य ना तो गौवंश का संरक्षण है और ना ही उसके दूध, गोबर व मूत्र का उपलब्धता सुनिश्चित करना। इस अधिनियम का असली उद्देश्य है पुलिस और कार्यपालिका को दमन करने का एक और हथियार उपलब्ध करवाना। इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर नजर डालिये। धारा 5ए, 5बी और 5सी में गौवंश का वध के लिए परिवहन, गौवंश का वध के लिए खरीदना.बेचना और गाय या बैल का मांस किसी व्यक्ति के पास पाया जाना अपराध घोषित किया गया है। यह अधिनियम किसी भी पुलिस अधिकारी,जो कि उपनिरीक्षक से निचले दर्जे का नहीं होगा, या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे वाहन, जिसका इस्तेमाल गौवंश को ढोने के लिए किया जा रहा हो या किये जाने का अंदेशा हो, को रोक सकता है और उसमें प्रवेश कर उसकी तलाशी ले सकता है। अधिनियम इस तरह की तलाशी लेने के लिए किसी भी परिसर के द्वार या ताले को तोड़ने का अधिकार भी पुलिस को देता है। स्पष्ट है कि अभी जो गौरक्षक दल गैरकानूनी ढंग से काम कर रहे हैं उन्हें यह अधिनियम कानूनी अधिकार दे देगा। कोई भी पुलिस अधिकारी उन्हें अधिकृत कर सकेगा कि वे किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ले सकते हैं। पुलिस अधिकारियों को ऐसी गायों, बछड़ों व बैलों को जब्त करने का अधिकार होगा जिन्हें वध के इरादे से बेचाए खरीदा या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा रहा हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'इरादे' का आरोप किसी पर भी बहुत आसानी से जड़ा जा सकता है और उस व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि उसका 'इरादा' यह नहीं था। 
इस अधिनियम के उल्लंघन के लिए निर्धारित सजा 10 गुना कर दी गई है। इस अधिनियम के तहत दोषी पाये जाने वाले को पांच साल तक का कारावास हो सकता है और उस पर दस हजार रूपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कारावास की न्यूनतम अवधि छः माह और जुर्माने की न्यूनतम राशि रूपये 1000 होगी। इस प्रकार,संशोधन के पहले जो अधिकतम सजा दी जा सकती थी, उसे अब न्यूनतम बना दिया गया है। अगर आपके पास से कम मात्रा में कोई नशीली दवा ;नार्कोटिक ड्रग जब्त होती है तो संभावना यह है कि आपको अदालत किसी पुनर्वास केंद्र में भेजे जाने का आदेश देगी। परंतु यदि आपके पास से गौवंश का मांस जब्त होता है तो आप एक साल तक के लिए जेल भेजे जा सकते हैं। शायद सरकार की दृष्टि में किसी व्यक्ति के पास से गौमांस मिलना, उसके पास से ड्रग्स मिलने से ज्यादा गंभीर अपराध है। हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को हिंदुओं के ड्रग्स के आदी हो जाने से ज्यादा चिंता इस बात की है कि कहीं उनके पास गौमांस न हो।   
अधिनियम का सबसे कठोर और भयावह प्रावधान यह है कि गौवंश का वध, परिवहन,राज्य से बाहर निर्यात खरीदी या बिक्री या गाय या बैल का मांस पाया जाना अधिनियम का उल्लंघन नहीं है, यह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर होगी। भारतीय विधिशास्त्र में आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता। इस सिद्धांत के कुछ ही अपवाद हैं। इनमें शामिल हैं अपवादात्मक परिस्थितियों में अत्यंत गंभीर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए विशेष कानून उदाहरणार्थ गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम ;यूएपीए या आतंकवाद.निरोधक कानून। हत्या या राष्ट्रद्रोह के मामलों में भी आरोपी को निर्दोष माना जाता है और उसे दोषी सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है। सवाल यह है कि किसी गरीब व्यक्ति को यदि इस अधिनियम के तहत आरोपी बना दिया गया तो वह स्वयं को कैसे निर्दोष साबित करेगा ? राज्य या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति आप के घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस सकता है, आपके रसोईघर और थाली में क्या है, यह देख सकता है, आपके फ्रिज में झांक सकता है और 'अवैध' मांस जब्त कर सकता है और आपको सींखचों के पीछे डाल सकता है। अब यह आपकी जिम्मेदारी होगी कि आप जेल में रहते हुए अपने आपको निर्दोष साबित करें। 
इस अधिनियम के लागू होते ही हिंदू धर्म के स्वनियुक्त रक्षक अतिसक्रिय हो उठे। वैसे भी वे न तो संविधान का सम्मान करते हैं और ना ही कानून के राज में उनकी आस्था है। उत्तरी महाराष्ट्र का मालेगांव,मुस्लिम.बहुत नगर है। वहां पर कुछ लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ इस अधिनियम के तहत् रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस ने कार्यवाही की और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। मालेगांव पुलिस ने तबस्सुम बरनगरवाला को बताया, 'प्रतिबंध लगते ही हिंदू समूह हमारे पीछे पड़ गये कि हम मुस्लिम घरों की जांच करें। लोग आपसी दुश्मनी के कारण झूठी शिकायतें लिखवा रहे हैं। कोई भी हिंदू आकर हमसे कह सकता है कि फलां मुसलमान के घर में जो गायें हैं उनका वह वध करने का 'इरादा' रखता है। ऐसे स्थिति में हम क्या करें?'मालेगांव पुलिस ने नगर के सभी ऐसे मुसलमानों, जिनके घर गायें पली हैं, को निर्देष दिया कि वे अपने जानवरों का पंजीयन करायें और गायों के मालिक की सभी गायों के साथ फोटो भी पुलिस को उपलब्ध करवायें। मालेगांव पुलिस ने एक नया रजिस्टर बनाया जिसका नाम रखा गया 'गाय, बैल,बछड़ा रजिस्टर'। मालेगांव की पुलिस अब उन मुसलमानों को ढूँढ रही है जिनके पास गायें हैं और इस बात का हिसाब रख रही है कि किस मुसलमान के पास कितनी गायें और कितने बछड़े हैं। मवेशियों के व्यवसाय और उनके परिवहन पर भी पुलिस नजर रख रही है। जिन हिंदुओं के पास गायें हैं उनसे अपने पशुओं का पंजीकरण करवाने के लिए नहीं कहा गया है क्योंकि पुलिस यह मानकर चल रही है कि केवल मुसलमान ही गौवध करते हैं हिंदू नहीं। 
महाराष्ट्र में पुलिसकर्मियों की पहले से ही बहुत कमी है। पुलिस को दलित.विरोधी हिंसा, आतंकवाद, ड्रग्स के बढ़ते व्यवसाय, भू.माफियाए महिलाओं के साथ बलात्कार व अन्य सैक्स अपराध, घरेलू हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा व अन्य संगठित अपराधों से निपटने के अलावा अब गायों और बछड़ों का हिसाब.किताब भी रखना पड़ेगा। 
इस अधिनियम का सबसे बड़ा शिकार बना है हमारा विधिशास्त्र। यह अधिनियम,पुलिस और स्वनियुक्त हिंदू रक्षकों को ऐसे अधिकारों से लैस करता है, जिनका इस्तेमाल वे मुसलमानों और दलितों का दमन करने और उन्हें परेशान करने के लिए कर सकते हैं। दलित, प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत से तो वंचित होंगे ही उनकी जीविका भी प्रभावित होगी क्योंकि उनमें से कई चमड़े का सामान बनाने के व्यवसाय में रत हैं। 
धर्मनिरपेक्ष आंदोलन और मानवाधिकार संगठनों ने इस अधिनियम का इस आधार पर विरोध किया है कि यह अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों,के अधिकारों पर अतिक्रमण है। सच यह है कि यह इससे भी ज्यादा है। हिंदुत्व की विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों की सरकार अब हमें यह बताना चाहती है कि हम क्या खाएं और क्या नहीं? अब आगे क्या? शायद अब सरकार हमें यह बताएगी कि अब हम कौनसे कपड़े पहने,कौनसी फिल्म देंखे या किस संगीत की महफिल में जाएं। सरकार अब शायद यह भी तय करना चाहेगी कि हम अपनी आजीविका के लिए क्या काम करें और शहर के किस इलाके में रहें। मुसलमानों को पहले शिकार इसलिए बनाया जा रहा है ताकि इस कानून का विरोध केवल मुसलमानों की ओर से होए पूरे समाज की ओर से नहीं। परंतु सच यह है कि इस तरह के कानून हर उस व्यक्ति के लिए खतरे की घंटी हैं जो प्रजातंत्र में विश्वास रखता है। ऐसे हर व्यक्ति को इस कानून और इस तरह के अन्य कदमों का खुलकर विरोध करना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

मंगलवार, 26 मई 2015

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ

नरेन्द्र मोदी ने 25 मई 2015 को प्रधानमंत्री के रूप में एक साल पूरा कर लिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इस एक साल में मोदी की क्या उपलब्धियां रहीं,यह उतना ही विवादास्पद है जितना कि मोदी का व्यक्तित्व। जहां प्रधानमंत्री के समर्थक और अनुयायी यह अतिश्योक्तिपूर्ण दावा कर रहे हैं कि मोदी ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल की हैं वहीं उनके विरोधी, उन वायदों की सूची गिनवा रहे हैं जो पूरे नहीं हुए। उनके कार्यकाल का निष्पक्ष और ईमानदार विश्लेषण करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है। हम यहां उन कुछ प्रवृत्तियों की चर्चा करेंगे जो मोदी के कार्यकाल में उभरीं और उस दिशा पर विचार करेंगे, जिस ओर उनके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार देश को ले जा रही है।
आम चुनाव के समय नारा दिया गया था 'अब की बार, मोदी सरकार' और यह सचमुच मोदी की ही सरकार है। यह न तो एनडीए की सरकार है और ना ही भाजपा की। अखबारों के अनुसार, एनडीए के गठबंधन साथियों ने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की है। महाराष्ट्र के स्वाभिमानी शेतकारी संगठन और अकाली दल, भूमि अधिग्रहण अधिनियम में प्रस्तावित संशोधनों के विरोधी हैं। शिवसेना ने भाजपा की तुलना अफजल खान की सेना के महाराष्ट्र पर आक्रमण से की। पिछली यूपीए सरकार के विपरीत, प्रधानमंत्री शायद यह संदेश देना चाहते हैं कि वे एक कड़े प्रशासक हैं और सभी निर्णय वे स्वयं लेते हैं। प्रजातंत्र में सबको साथ लेकर चलना होता है,सभी के हितों का ख्याल रखना होता है। कुछ महीनों पहले, अखबारों में एक फोटो छपी थी जिसमें प्रधानमंत्री मोदी एक ऊँची कुर्सी पर बैठे हुए थे और बाकी सभी कैबिनेट मंत्रियों की कुर्सियां नीचे थीं। संदेश स्पष्ट था। प्रधानमंत्री ने किस हद तक अपने मंत्रियों पर शिकंजा कस रखा है यह इस बात से जाहिर है कि मंत्रियों को अपने निजी सचिवों की नियुक्तियों के लिए भी प्रधानमंत्री कार्यालय से अनुमति लेनी पड़ती है। कारण यह बताया गया है कि प्रधानमंत्री नहीं चाहते कि मंत्रिगण अपने रिश्तेदारों या परिचितों को अपना निजी सचिव बनाएं। परंतु क्या इसके लिए एक सामान्य निर्देश जारी करना पर्याप्त नहीं होता ?क्या प्रधानमंत्री को अपने मंत्रियों पर इतना भरोसा भी नहीं है कि वे उनके निर्देशों का पालन करेंगे? यह भी साफ नहीं है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने मंत्रियों के प्रस्तावित निजी सचिवों के संबंध में क्या जांच.पड़ताल की।
केंद्रीयकरण
मोदी सरकार में सभी शक्तियां, प्रधानमंत्री कार्यालय में केंद्रीकृत कर दी गई हैं। सभी मंत्रालयों के सचिवों की पीएमओ तक सीधी पहुंच है और पीएमओ किसी भी मंत्रालय से कोई भी फाईल बुलवा सकता है। इससे निश्चित तौर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आई है परंतु हर तेज निर्णय हमेशा सबसे अच्छा निर्णय नहीं होता। प्रधानमंत्री ने फ्रांस की राफेल कंपनी से लड़ाकू हवाई जहाज खरीदने का सौदा, बिना रक्षामंत्री की मौजूदगी या सहमति के किया। प्रधानमंत्री इस एक वर्ष में दुनिया के बहुत से देशों में गए। इनमें भूटान, श्रीलंका, नेपाल, इंग्लैण्ड,जर्मनी, अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, चीन और मंगोलिया शामिल हैं। विदेश मंत्री, ईराक में फंसे 39 भारतीयों को निकालने और अन्य इसी तरह के कामों में व्यस्त रहीं। यहां तक कि नेपाल में भूकंप के बाद भारत सरकार ने जो राहत पहुंचाई उसका श्रेय भी केवल मोदी को दिया गया। जिन भी देशों में मोदी गए, वहां उन्होंने अप्रवासी भारतीयों की सभाओं को संबोधित किया और स्वदेश की राजनीति के संबंध में टिप्पणियां कीं।
किसी एक व्यक्ति में सारी शक्तियां केंद्रित कर देने से उन लोगों को लाभ होता है जो उस व्यक्ति के करीबी हैं या जिनकी उस तक पहुंच है। वह व्यक्ति जितना अधिक शक्तिशाली होता है उसे उतने ही ज्यादा विवेकाधिकार प्राप्त होते हैं और वह जो नीतियां बनाता हैए उनसे उन लोगों को लाभ होता है जो उसके नजदीक हैं। प्रधानमंत्री की छवि कुबेरपतियों के मित्र की है। उनके 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' व 'मेक इन इंडिया' अभियानों से भी यही ध्वनित होता है। इन अभियानों के अंतर्गत उद्योगों की नियमन प्रणाली को लचीला बनाया जा रहा है, उन्हें विभिन्न अनुमतियां प्रदान करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है, कारपोरेट टैक्सों की दरें घटाई गई हैं, पर्यावरण संबंधी बंधन ढीले किए गए हैं और उद्योगपतियों को कर्मचारियों को जब चाहे रखने और जब चाहे हटाने की स्वतंत्रता दे दी गई है। इस सब से श्रमिकों की ट्रेड यूनियनें कमजोर हुई हैं व श्रमिक वर्ग की आमदनी घटी है। राज्य, भूमि अधिग्रहण करने में उद्योगपतियों की मदद कर रहा है और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने के लिए भारी मात्रा में धन खर्च कर रहा है। मुंबई.दिल्ली औद्योगिक गलियारा और मुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन चलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। इनकी तुलना पूर्व यूपीए सरकार की प्राथमिकताओं से कीजिए.यद्यपि वह भी उद्योगपतियों की मित्र थी.जिसने मनरेगा, खाद्य सुरक्षा व सूचना के अधिकार जैसी योजनाओं व कार्यक्रमों पर कम से कम कुछ धन तो खर्च किया।
एससी, एसटी व नीति आयोग 
अनुसूचित जातियों के लिए विशेष घटक योजना व आदिवासी उपयोजना के लिए केंद्रीय बजट 2015.16 में पिछले बजट की तुलना में प्रावधान क्रमश: रूपये 43,208 करोड़ से घटाकर रूपये 30,851 करोड़ और रूपये 26,715 करोड़ से घटाकर रूपये 19,980 करोड़ कर दिए गए। इन समुदायों के आबादी में अनुपात की दृष्टि से जितना धन इन योजनाओं के लिए उपलब्ध करवाया जाना चाहिए, बजट प्रावधान उससे काफी कम हैं।
अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हेपतुल्लाह को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अल्पसंख्यकों में शिक्षा और रोजगार के अवसरों की कमी से ज्यादा चिंता इस बात की है कि पारसी समुदाय की प्रजनन दर कैसे बढ़ाई जाए।
मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर उसके स्थान पर नीति आयोग की स्थापना कर दी। मोदी सरकार का तर्क था कि योजना आयोग की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है क्योंकि उसका गठन उस दौर में किया गया था जब सरकार का अर्थव्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण था। परंतु इस संदर्भ में यह याद रखे जाने की जरूरत है कि शनैः शनैः योजना आयोग अधिक समावेशी नीतियां अपना रहा था और उसी ने अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में बजट प्रावधान करने की अवधारणा प्रस्तुत की थी। आठवीं पंचवर्षीय योजना में पहली बार 'अल्पसंख्यक' शब्द का इस्तेमाल किया गया और इस बात पर जोर दिया गया कि समाज के हाशिये पर पड़े तबकों को मुख्यधारा के समकक्ष लाए जाने की जरूरत है। नौवीं पंचवर्षीय योजना में सामाजिक न्याय व सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के जरिए सभी के विकास की बात कही गई थी। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष प्रावधान लागू किए जाने का सिलसिला दसवीं पंचवर्षीय योजना से शुरू हुआ। इस योजना का फोकस महिलाओं व अल्पसंख्यकों सहित सभी वंचित व कमजोर वर्गों के सामाजिक.आर्थिक विकास पर था। ग्याहरवीं पंचवर्षीय योजना में अधिक समावेशी विकास की बात कही गई थी और सभी के लिए समान अवसर उपलब्ध करवाने पर जोर दिया गया था। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों के लिए और अधिक आर्थिक प्रावधान किए गए थे।
योजना आयोग की जगह नीति आयोग स्थापित करने के निर्णय को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। नीति आयोग का वंचित समूहों के विकास से कोई लेनादेना नहीं है। वह तो एक प्रकार का 'थिंक टैंक'है, जिसका जोर बाजार और औद्योगिक गलियारों के विकास और उद्योगों के लिए बेहतर आधारभूत संरचना उपलब्ध करवाने पर है।
शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्ता
प्रधानमंत्री मोदी के बाद उनके मंत्रिमंडल के जिस मंत्री की मीडिया में सबसे अधिक चर्चा रही वे थीं मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी। और वे लगभग हमेशा गलत कारणों से चर्चा में रहीं। मानव संसाधन विकास मंत्री का कई शैक्षणिक संस्थानों से कई मौकों पर टकराव हुआ और उन्होंने अनेक विवादास्पद निर्णय लिए। इनमें शामिल हैं दिल्ली विश्वविद्यालय के चार.वर्षीय स्नातक कार्यक्रम को समाप्त करनाए अमर्त्य सेन द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का दूसरी बार कुलाधिपति बनने से इंकारए परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व निदेशक अनिल काकोडकर व आरण्केण् शैवगांवकर का आईआईटी मुंबई के शासी निकाय से इस्तीफा,केंद्रीय विद्यालयों में शैक्षणिक सत्र के अधबीचए जर्मन की जगह संस्कृत को अनिवार्य विषय बनाना आदि। शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्ता को समाप्त करने के भरपूर प्रयास किए गए। हरियाणा में स्कूलों में गीता पढ़ाई जा रही है और राजस्थान के स्कूलों में सूर्यनमस्कार अनिवार्य बना दिया गया है।
आरएसएस नेता सुरेश सोनी व कृष्णगोपाल दत्तात्रेय और भाजपा के जेपी नड्डा व रामलाल ने मानव संसाधन विकास मंत्री से मिलकर यह मांग की कि स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रमों में 'सुधार' किए जाएं। इस मुद्दे पर कई बैठकें हुईं। 30 अक्टूबर 2014 को इस मुद्दे पर छठवीं बैठक आयोजित की गई। दीनानाथ बत्रा की लिखी पुस्तकों को गुजरात  सरकार ने स्कूली विद्यार्थियों के अतिरिक्त अध्ययन के लिए निर्धारित किया है। ये किताबें इतिहास को हिंदू राष्ट्रवादी चश्मे से देखती हैं और इनमें अप्रमाणित तथ्यों के आधार पर प्राचीन भारत का महिमामंडन किया गया है ताकि लोगों में श्रेष्ठता और गर्व का झूठा भाव जगाया जा सके। इतिहास को पौराणिक रंग दे दिया गया है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं कहा कि प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी की तकनीक उपलब्ध थी और इसका प्रमाण यह है कि भगवान गणेश का सिर हाथी का और शरीर मनुष्य का है। हम सब यह सोचकर चकित थे कि हाथी का कई क्विंटल वजनी सिर यदि किसी तरह मानव शरीर पर लगा भी दिया जाए तो वह मनुश्य उसका वजन कैसे सहन कर सकेगा। इसी तरह के वक्तव्य कई अन्य भाजपा नेताओं ने भी दिए जिनमें से कुछ ने कहा कि भारत में हजारों साल पहले परमाणु मिसाइलें थीं। विद्यार्थियों के सामने फंतासी और पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में परोसनाए उनके दिमाग को कुंद करना है। एक अच्छे विद्यार्थी का सबसे बड़ा गुण यही होता है कि वह किसी भी बात को आंख मूंचकर नहीं मानता और हर विश्वास व तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसता है।  
हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना
देश में हिन्दू राष्ट्रवादी सांस्कृतिक चेतना का तेजी से प्रसार हो रहा है। यह, हिन्दू धार्मिक चेतना से एकदम अलग है। हिन्दू धार्मिक चेतना का प्रकटीकरण कई स्वरूपों में हो सकता है जिनमें पवित्रता.अपवित्रता की अवधारणाए जो यह निर्धारित करती है कि कौन किसके साथ रोटी.बेटी का संबंध रख सकता है और कौन ऊँचा है और कौन नीचा से लेकर मीरा, कबीर, गुरूनानक, तुकाराम, रविदास आदि के प्रेमए सद्भाव, समानता, सत्य व अहिंसा पर आधारित समावेशी शिक्षाओं तक शामिल हैं। परंतु हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना एक प्रकार की राजनैतिक चेतना है जो जाति.आधारित ऊँचनीच को कायम रखते हुए हिन्दुओं को राजनैतिक रूप से एक करना चाहती है और जो 'दूसरे'को न केवल परिभाषित करती है वरन् यह भी सिखाती है कि उस 'दूसरे' से हिन्दुओं को अनवरत युद्धरत रहना है। हिन्दू राष्ट्रवादी चेतना,एकाधिकारवादी राज्य को आसानी से स्वीकार कर लेगी बशर्ते वह उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग के विशेषाधिकारों को कायम रखे और 'दूसरे' समुदाय का हिंसा से दमन करे और यहां तक कि उसे देश से भगा दे।
ध्रुवीकरण करने के उद्धेश्य से शुरू किया गया साम्प्रदायिक विमर्श दिन.प्रतिदिन और दुस्साहसी होता जा रहा है। कुछ राज्यों में गोड़से के मंदिर बन गए हैं और उसे हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। दिसम्बर 2014 से लेकर अब तक दिल्ली,पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा, कर्नाटक और मध्यप्रदेश में चर्चों पर हमले की कम से कम 11 घटनाएं हुई हैं।  शासक दल के सांसद और यहां तक कि मंत्री ऐसे वक्तव्य दे रहे हैं जिनके लिए उनपर दूसरे समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने के लिए भारतीय दण्ड संहिता की धारा 153ए के तहत कार्यवाही की जा सकती है। गिरिराज सिंह,साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची व अन्यों ने अलग.अलग समय पर कहा कि जो लोग राम में विश्वास नहीं करते वे हरामजादे हैंए मदरसे आतंकवाद के अड्डे हैं,मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ रही है, हिन्दू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए और जो लोग मोदी को वोट नहीं देते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। परंतु न तो इन भड़काऊ वक्तव्य देने वालों और ना ही चर्चों पर हमले करने वालों पर कोई कार्यवाही की गई।
घर वापसी अभियान जोरशोर से जारी है और आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने आगरा में गैर.हिन्दुओं को जबरदस्ती हिन्दू बनाए जाने को औचित्यपूर्ण बताते हुए अत्यंत गिरी हुई भाषा का उपयोग किया। उन्होंने यह मांग की कि 'हमारा माल वापिस कर दो' मानो मुसलमान कोई संपत्ति हों। भागवत के खिलाफ कार्यवाही करने की बजाए गृह मंत्री ने धर्मांतरण विरोधी कानून बनाए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसी तरह, कई संगठनों ने यह बीड़ा उठा लिया है कि वे हिन्दू लड़कियों की शादी गैर.हिन्दुओं से नहीं होने देंगे भले ही लड़के और लड़की को इसमें कोई आपत्ति न हो।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन केवल मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने से संतुष्ट नहीं हैं। वे राज्य की शक्ति का प्रयोग उनके खिलाफ करना चाहते हैं। गुजरात विधानसभा ने हाल में एक अत्यंत भयावह तथाकथित आतंकवाद.निरोधक विधेयक पारित किया है और सरकार के कहने पर राष्ट्रपति ने महाराष्ट्र सरकार के बीस साल पुराने गौवध निषेध अधिनियम को अपनी स्वीकृति दे दी है। इन सभी कानूनों का उद्धेश्य अल्पसंख्यकों का दमन है।
-इरफान इंजीनियर

PAHLA SAAL--1

शुक्रवार, 29 मई 2015

मोदी सरकार का पहला साल नफरत फैलाने के नाम

नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आते ही मानों आरएसएस के सभी संगी.साथियों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का लाईसेंस मिल गया है। जहर उगलने के इस अभियान का उद्देश्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बनाये रखना है। एमआईएम के अकबरुद्दीन ओवेसी का घृणा फैलाने वाला भाषण निश्चित तौर पर घिनौना था और इस साल जनवरी में उनकी गिरफ्तारी के बाद अगर उन्हें 40 दिन जेल में बिताने पड़े तो यह बिलकुल ठीक हुआ। उनपर मुकदमा चलना चाहिए और उन्हें कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। परन्तु प्रवीण तोगडि़या, सुब्रमण्यम स्वामी, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, संजय राउत आदि का क्याए जिन्होंने सार्वजनिक मंचों से निहायत बेहूदा, कुत्सित और गैर.जिम्मेदाराना टिप्पणियां की हैं। क्या ओवेसी की तरह उन्हें भी गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए था ?
हिन्दुओं के स्व.घोषित दक्षिणपंथी रक्षक आरएसएस से जुड़े संगठनों के अलावा, अन्य कई व्यक्ति भी समाज को बांटने वाली बातें कह रहे हैं और सांप्रदायिक तनाव को हवा दे रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ गयी है क्योंकि वे जानते हैं कि अब सैयां कोतवाल बन गए हैं और उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत फैलाने का अभियान और तेज कर दिया है।
सर्वविदित है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के पहले से हीए भाजपा के साथियों.सहयोगियों ने लव जिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को उछाल कर माहौल गर्म करना शुरु कर दिया था और यह अभियान चुनाव में मोदी की जीत के बाद भी अनवरत चलता रहा। मोदी के सत्ता सम्हालने के कुछ ही समय बाद, पुणे में मोहसिन शेख नामक एक मुस्लिम आईटी कर्मचारी की हिन्दू जागरण सेना के गुंडों ने सड़क पर पीट.पीट कर हत्या कर दी थी। यह घटना बाल ठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किये जाने के बाद हुई। दिल्ली व हरियाणा के अलावा, मुंबई के पास पनवेल और आगरा में चर्चों पर हमले हुए।
साक्षी महाराज ने न केवल यह कहा कि गोडसे देशभक्त था वरन् उन्होंने हिंदू महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की सलाह भी दे डाली क्योंकि उनके अनुसार,मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा होने वाली है। साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को आठ बच्चे पैदा करने की सलाह दी। उन्होंने यह आह्वान भी किया कि आमिर खान, शाहरूख खान और सलमान खान जैसे मुसलमान फिल्मी सितारों का बहिष्कार किया जाना चाहिए। घृणा फैलाने वाले भाषण देने में प्रवीण तोगडि़या सबसे आगे हैं। उन पर इस सिलसिले में सबसे अधिक संख्या में प्रकरण दर्ज हैं। भाजपा सासंद योगी आदित्यनाथ भी रूक.रूक कर जहर उगलते रहते हैं। उनका कहना है कि अगर लवजिहाद के अंतर्गत एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनाया जाता है तो उसके बदले सौ मुसलमान लड़कियों को हिंदू बनाया जाना चाहिए। लवजिहाद के मुद्दे पर दुष्प्रचार जारी है और कई छोटे.बड़े नेता इसका इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए करते आ रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि मस्जिदों में सुअर पाले जाने चाहिए और यह भी कि मुसलमानों को हिंदू तीर्थस्थलों में प्रवेश नहीं मिलना चाहिए।
मोदी सरकार के दो मंत्रियों साध्वी निरंजन ज्योति और गिरिराज सिंह ने गैर.हिंदूओं और यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी की त्वचा के रंग के संबंध में अत्यंत अपमानजनक और निंदनीय बातें कहीं। निरंजन ज्योति ने कहा कि सभी गैर.हिंदू हरामजादे हैं। गिरिराज सिंह ने चुनाव के पहले कहा था कि जो लोग मोदी को वोट नहीं देना चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए परंतु इसके बाद भी उन्हें मंत्री बनाया गया। उन्होंने सोनिया गांधी के बारे में भी नस्लीय टिप्पणियां कीं। साक्षी महाराज भी गोडसे को देशभक्त मानते हैं और उनकी पार्टी के एक अन्य नेता केरल के गोपालकृष्णन का कहना है कि गोडसे को गांधी को निशाना बनाने की बजाए नेहरू को मारना था। यह बात उन्होंने आरएसएस के मुखपत्र 'केसरी' में अपने एक लेख में कही। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि ईश्वर केवल मंदिरों में रहता है, मस्जिदों और चर्चों में नहीं। इस वक्तव्य के निहितार्थ कितने खतरनाक हैं,यह कहने की आवश्यकता नहीं है। ये सारी टिप्पणियां केवल कुछ उदाहरण हैं उन भड़काऊ बातों कीए उन अनावश्यक टिप्पणियों की जो मोदी सरकार के पहले वर्ष में जिम्मेदार पदों पर बैठे भाजपा और संघ के नेताओं ने कीं। कहने की आवश्यकता नहीं कि इनसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के मन में डर और असुरक्षा का भाव बढ़ा। भाजपा के गठबंधन साथी शिवसेना के सांसद संजय राऊत ने तो मुसलमानों से मत देने का अधिकार ही छीन लेने की मांग की।
यह साफ है कि घृणा फैलाने वाले भाषण और वक्तव्य, विभाजनकारी राजनीति का कारण और प्रभाव दोनों हैं। वे समाज में व्याप्त गलत धारणाओं की अभिव्यक्ति हैं। उन बातों को खुल्लम.खुल्ला और भद्दे ढंग से कहा जा रहा है जिन्हें सांप्रदायिक पार्टियां हमेशा से दबेछुपे शब्दों में कहती आई हैं। ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें अचानक हवा में से पैदा हुई हैं। उनकी जमीनए राजनैतिक दलों के एक हिस्से द्वारा लंबे समय से तैयार की जा रही थी।
भारत के मामले में घृणा फैलाने वाले भाषण व टिप्पणियां, धर्म व भाषा के नाम पर की जाने वाली राजनीति का अंग रही हैं। इनका इस्तेमाल हिंसा भड़काने के लिए भी किया जाता है और वोट पाने के लिए समाज का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करने के लिए भी। हम सबको याद है कि राम मंदिर आंदोलन के दौरान, साध्वी रितंभरा अचानक उभर आई थीं। वे अपने प्रवचनों में अल्पसंख्यकों के संबंध में घोर अपमानजनक और भड़काऊ बातें करती थीं।
इसी तरह की बातें विहिप के कई साधु, सांप्रदायिक गैंग के छोटे.बड़े सदस्य, कुछ मुस्लिम फिरकापरस्त और तोगडि़या जैसे लोग भी करते रहे हैं। कई लोग ऐसी ही या इससे मिलती.जुलती बातों को मीठी चाशनी में लपेटकर परोसते रहे हैं। अपने राजनैतिक कैरियर के शुरूआती दिनों में मोदी भी बांटने वाली बातें किया करते थे परंतु समय के साथ उनकी रणनीति बदलती गई। वे अत्यंत चतुर राजनीतिज्ञ हैं और उन्हें अच्छी तरह से पता है कि उन्हें कब, क्या कहना चाहिए। गुजरात में दंगों के बाद मुसलमानों के लिए जो शरणार्थी शिविर लगाए गए थे उन्हें मोदी ने बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां बताया था। स्पष्टतः, वे इस गलत धारणा को हवा देने की कोशिश कर रहे थे कि मुस्लिम दंपत्तियों के हिंदुओं की तुलना में अधिक बच्चे होते हैं।
मुंबई में सन् 1992.93 के दंगों के दौरान, बाल ठाकरे भी अत्यंत भडकाऊ बातें किया करते थे और अपने शिवसैनिकों को मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा करने के लिए उकसाते थे। वे भी इसलिए बच निकले क्योंकि वे अपनी जहरीली टिप्पणियों को बड़ी धूर्तता से प्रस्तुत करते थे और इसलिए भी क्योंकि हमारे देश के कानून इस तरह के हैं कि घृणा फैलाने वाली बातें कहने वाला यह तर्क देकर बच निकलता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर व्यक्ति का मूलाधिकार है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि हमें किसी समुदाय की निंदा करने और किसी राजनैतिक दल की निंदा करने में अंतर करना चाहिए। राजनैतिक दलों की आलोचना की जा सकती है और की जानी चाहिए परंतु किसी समुदाय विशेष का अपमान करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दूसरे, कोई राजनैतिक संगठनए किसी धार्मिक समुदाय का प्रतिनिधि या रक्षक होने का दावा नहीं कर सकता।
यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण और दुःखद है कि 'दूसरे' से घृणा करना सिखाने वाली विचारधारा और भाषण हमारी राजनीति का अंग बन गए हैं और किसी विशेष धार्मिक समुदाय को राष्ट्र.राज्य का पर्यायवाची बताना आम हो गया है। इस तरह की पहचान.आधारित राजनीति वो लोग करते हैं जो समाज का ध्यान मूल मुद्दों से भटकाना चाहते हैं।
भारत में नफरत फैलाने वाले भाषणों का सिलसिला एक ओर मुस्लिम लीग तो दूसरी और हिंदू महासभा और आरएसएस ने शुरू किया था। ये संगठन यह मानते थे कि राष्ट्र किसी एक धार्मिक समुदाय का है। धार्मिक राष्ट्रवाद एक संकीर्ण विचारधारा है और 'दूसरों'  को राष्ट्र से बाहर धकेलना चाहती है। ये विश्वास, धीरे.धीरे दूसरे के प्रति घृणा में बदल जाते हैं। इसी घृणा के कारण स्वतंत्रता के पहले और पिछले दो दशकों में देश में भयावह दंगे हुए हैं।
भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं द्वारा भड़काऊ बातें कहने पर पार्टी के अधिकृत प्रवक्ताओं की एक ही प्रतिक्रिया होती है और वह यह कि ये संबंधित व्यक्तियों के 'व्यक्तिगत' विचार हैं। भाजपा के पास अपने बचाव का एक दूसरा रास्ता यह है कि वह दावा करती है कि विहिपए वनवासी कल्याण आश्रम व बजरंग दल जैसे संगठन स्वायत्त और स्वाधीन हैं और उन पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। सच यह है कि ये सभी संगठन आरएसएस द्वारा नियंत्रित संघ परिवार का भाग हैं और ये सभी भाजपा के साथ मिलकर संघ के हिंदू राष्ट्र के एजेंडे को साकार करने में जुटे हुए हैं। इन सब की कथनी और करनी का एक ही उद्देश्य है। कई लोग यह कहते हैं कि ये संगठन अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि आरएसएस ने इन सब संगठनों को अलग.अलग जिम्मेदारियां दे रखी हैं जिन्हें वे पूरी प्रतिबद्धता से निभाते हैं। मोदी सरकार के आने के बाद से इन संगठनों की आक्रामकता में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।
-राम पुनियानी