प्रति रक्षा के क्षेत्र में 100 फीसद
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश :"देशभक्ति "
के दावेदारो इससे उल्टा रास्ता
क्या होगा ?
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Posted: 12 Jul 2016 09:19 AM PDT
सांप्रदायिक राजनीति अपना एजेंडा लागू करने के लिए अतीत के इस्तेमाल में सिद्धस्त होती है। भारत के मध्यकालीन इतिहास को पहले ही तोड़ा-मरोड़ा जा चुका है। मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रान्ता व हिन्दुओं के पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया जाना आम है। और अब, प्राचीन इतिहास को तोड़-मरोड़ कर ब्राह्मणवाद को बौद्ध धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करने का अभियान चल रहा है। इस अभियान के अंतर्गत सांप्रदायिक ताकतों ने सम्राट अशोक पर निशाना साधा है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमृत्य सेन के अनुसार, हमारे देश के दो सबसे महान शासक थे अषोक और अकबर। आरएसएस के अनुषांगिक संगठन वनवासी कल्याण परिषद की राजस्थान शाखा के एक प्रकाशन के अनुसार, अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से विदेशी आक्रांताओं के लिए भारत पर हमला करना और उस पर विजय प्राप्त करना आसान हो गया। प्रकाशन में यह भी कहा गया है कि अशोक के नेतृत्व में बौद्ध धर्मावलंबियों ने राष्ट्रविरोधी भूमिका अदा की। उन्होंने यूनानी आक्रांताओं की मदद की ताकि वे ‘‘वैदिक धर्म’’ का नाश कर बौद्ध धर्म को उसकी खोई प्रतिष्ठा फिर से दिलवा सकें। यहां जिसे वैदिक धर्म बताया जा रहा है, वह, दरअसल, ब्राह्मणवाद है। यह दिलचस्प है कि इस लेख में कहा गया है कि बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक अशोक एक महान शासक थे। इसके विपरीत, अधिकांश इतिहासविदों और चिंतकों का मानना है कि अशोक की वे मानवीय नीतियां, जिन्होंने उन्हें महान बनाया, उनके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद ही अस्तित्व में आईं। अषोक के बारे में जो भ्रम फैलाया जा रहा है उसके कई आयाम हैं, जिन्हें ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म की राजनैतिक आवष्यकताओं के अनुरूप गढ़ा गया है। इनमें से बसिरपैर की एक मान्यता यह है कि भारत हमेशा से राष्ट्र रहा है। तथ्य यह है कि भारत स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरा। इसके पहले तक भारत में रियासतें और साम्राज्य थे। इन रियासतों और साम्राज्यों की सीमाएं निष्चित नहीं होती थीं और किसी रियासत या राज्य का आकार उसके शासक के साहस, महत्वाकांक्षा और सैन्य शक्ति सहित अन्य कारकों के आधार पर घटता बढ़ता रहता था। कई बार कुछ शासकों को अपने राज्य से पूरी तरह से हाथ धोना पड़ता था। अशोक के शासन के पहले भी सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। उस दौर में राजाओं द्वारा दूसरे शासकों की भूमि को हड़पने के प्रयास बहुत आम थे। प्राचीन भारत में मौर्य एक बड़ा साम्राज्य था। भारतीय उपमहाद्वीप पर कई राजवंषों का शासन रहा है। परंतु ऐसा कोई शासक नहीं है जिसने आज के संपूर्ण भारत पर शासन किया हो। तो फिर अशोक को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? अशोक, मौर्य वंश के शासक बिंदुसार के उत्तराधिकारी थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने इस साम्राज्य की नींव रखी थी और अशोक ने कलिंग (आज का ओडिसा) को साम्राज्य का हिस्सा बनाया था। कलिंग के युद्ध में भारी हिंसा हुई थी और इस खून-खराबे ने अशोक पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले लिया। इस तरह एक आक्रामक व असंवेदनशील शासक के मानवतावादी व्यक्ति में बदलने की प्रक्रिया अशोक द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने से शुरू हुई। उन्होंने लोगों की भलाई के लिए कई कदम उठाए। ब्राह्मणवादी रूढ़ियों का विरोध किया और अपने महल के दरवाज़े, अपने साम्राज्य के उन लोगों के लिए खोल दिए जिन्हें किसी भी प्रकार की कोई परेशानी थी। बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्होंने एक ऐसे राज्य का निर्माण किया जो सहृदय और जनता का संरक्षक था। उनके विचार और उनकी नीतियां उनके शिलालेखों से जानी जा सकती हैं, जो देश के कई हिस्सों में स्तंभों और चट्टानों पर उत्कीर्ण हैं। इन शिलालेखों से पता चलता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक ने ऐसी नीतियां अपनाईं जो लोगों के प्रति प्रेम और सहानुभूति से प्रेरित थीं और जिनसे कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। यह महत्वपूर्ण है कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी अशोक ने समाज की विविधता को खुले दिल से स्वीकार किया। उनका एक शिलालेख कहता है कि शासक को अपनी प्रजा की आस्थाओं में विविधता को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने बौद्ध धर्म को विष्व धर्म बनाया। उन्होंने अपने विचार तलवार के ज़ोर पर नहीं बल्कि षब्दों और तर्कों से फैलाए। उनका संदेष था कि दुनिया में कष्ट और दुःख कम करने के लिए हमें षांति, सहिष्णुता और खुलेपन की नीतियां अपनानी होंगी। इन कारणों से अशोक को महान बताया जाता है। इसके उलट, लेख में कहा गया है कि अशोक, बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक एक महान षासक थे। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में अशोक से बड़े साम्राज्य पर किसी ने शासन नहीं किया। उनका धम्म शासक और प्रजा दोनों के लिए नैतिक संहिता का निर्धारण करता है। अषोक अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे भी नैतिकता के पथ पर चलेंगे। उनके षिलालेख 12 में जो लिखा है उसकी प्रासंगिकता आज भी है और हमें उसके षब्दों को याद रखना चाहिए। इस षिलालेख में सार्वजनिक जीवन में सहिष्णुता और सभ्य व्यवहार अपनाने की बात कही गई है। यह षिलालेख ‘‘वाणी के संयम’’, ‘‘अपने धर्म की तारीफ न करने’’ और ‘‘दूसरे के धर्म की निंदा न करने’’ की बात कहता है (सुनील खिलनानी, इंकारनेषन्सः इंडिया इन 501 लाईव्स, पृ. 52)। ‘‘उन्होंने बौद्ध धर्म को अपने प्रजाजनों पर नहीं लादा। उनकी षांति, दूसरों पर आक्रमण न करने और सांस्कृतिक विजय की नीतियों के कारण वे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक चरित्र हैं’’ (आरएस षर्मा, एन्षियेंट इंडिया, एनसीईआरटी, 1995, पृ. 104)। वे उसी सांस्कृतिक व राजनैतिक बहुवाद के प्रतीक थे जो गांधी और नेहरू की विचारधारा के केंद्र में थी। चार सिंहों का उनका प्रतीक, भारतीय मुद्रा में अंकित है और उनका चक्र, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का भाग है। अशोक के षासन को कभी कोई सैन्य चुनौती नहीं मिली। वे 50 से भी अधिक वर्षों तक षासक रहे। 205 ईसा पूर्व में यूनानी सम्राट एन्टियोकस ने उत्तर-पष्चिम से आक्रमण किया और पंजाब व अफगानिस्तान सहित कुछ उत्तर-पष्चिमी हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। अशोक को असली चुनौती बाहरी आक्रांताओं से नहीं बल्कि उनके साम्राज्य के अंदर से मिली। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार पर ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी। अशोक ने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान जानवरों की बलि देने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे ब्राह्मणों की आय में कमी आई। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वर्ण और जाति व्यवस्था कमज़ोर पड़ी। जिस धार्मिक धारा को सांप्रदायिक ताकतें वैदिक धर्म बता रही हैं वह दरअसल तत्समय में प्रभावकारी ब्राह्मणवाद था। इन कारकों के चलते अशोक के साम्राज्य में प्रतिक्रांति हुई। प्रतिक्रांति का नेतृत्व किया अशोक के पोते बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र षुंग ने, जो कि एक ब्राह्मण था। उसने सम्राट को मौत के घाट उतार दिया और अशोक के साम्राज्य के सिंध के हिस्से में षुंग वंष के षासन की स्थापना की। इस प्रतिक्रांति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके मूल देष से गायब हो गया। अंबेडकर लिखते हैं, ‘‘सम्राट अशोक ने जानवरों की बलि देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके कारण लोगों ने धार्मिक कर्मकांड संपन्न करवाने के लिए ब्राह्मणों को बुलाना बंद कर दिया। ब्राह्मण पुरोहित बेरोज़गार हो गए। उनका महत्व और सम्मान भी कम हो गया। इसलिए ब्राह्मणों ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ के विरूद्ध पुष्यमित्र षुंग के नेतृत्व में विद्रोह किया। षुंग एक सामवेदी ब्राह्मण था और बृहद्रथ की सेना का सेनापति भी’’ (राइटिंग एंड स्पीचेस, खंड-3, पृ. 167)। आठवीं शताब्दी के बाद से षंकर ने बुद्ध की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रखी। बुद्ध कहते थे कि यही दुनिया असली दुनिया है और हमें इसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। षंकर कहते थे कि यह दुनिया एक माया है। शंकर की विचारधारा ने अंततः ब्राह्मणवाद को देश में पुनस्र्थापित कर दिया और 1200 ई. के बाद बौद्ध धर्म यहां से पूरी तरह गायब हो गया। फिर अषोक के षासनकाल को आलोचना का विषय क्यों बनाया जा रहा है? अषोक के बौद्ध धर्म अपनाने से ब्राह्मणवाद को बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्राह्मणवाद, हिंदू धर्म पर हावी था। अषोक, अहिंसा और बहुवाद में विष्वास करते थे। ये दोनों ही मूल्य हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के खिलाफ हैं, जिसकी राजनीति का हिंसा अभिन्न भाग होती है। हिंदू राष्ट्रवादी भी ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना चाहते हैं। तो जहां एक ओर दलितों को संघ परिवार के झंडे तले लाने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं बौद्ध धर्म पर हल्ला बोला जा रहा है और सामाजिक पदक्रम को बनाए रखने के सघन प्रयास हो रहे हैं। बौद्ध धर्म जातिविहीन समाज का प्रतीक था। वह बहुवाद और षांति का पैरोकार था। हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा अषोक पर हमला, दरअसल, इन्हीं मूल्यों पर हमला है। यह कहा जा रहा है कि अषोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने से ‘भारत’ कमज़ोर हुआ। सच यह है कि उस समय भारत अस्तित्व में ही नहीं था। मौर्य एक साम्राज्य था राष्ट्र-राज्य नहीं। साम्राज्य बनते-बिगड़ते रहते हैं। अहिंसा की नीति अपनाने के बाद भी मौर्य साम्राज्य 50 वर्षों तक बना रहा। उसे कमज़ोर किया ब्राह्मणवादियों ने। प्राचीन भारत के इतिहास के लेखन के काम में संघी इतिहासविदों की घुसपैठ का लक्ष्य अशोक और उन जैसे अन्य शासकों के महत्व को कम करना और उन्हें बदनाम करना है। . -राम पुनियानी |
| शर्म कभी नहीं आएगी |
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Posted: 30 Jun 2016 08:21 PM PDT
आधुनिक युग में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। जिसके द्वारा हम समाज के सभी पहलुओं को उठाने का कार्य करते हैं। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक या फिर राजनैतिक सभी प्रकार की गतिविधियों को सोशल मीडिया ने अपने अंदर समा लिया है । किसी भी लोकतंत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंम्भ होते हंै न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और पत्रकारिता। वर्तमान समय में पत्रकारिता ने देश के अधिकतर मनुष्यों को अपने कार्य में परोक्ष रूप से भागी बनाया है। क्योंकि उसका सबसे बड़ा कारण है-सोशल साइट्स, सोशल साइट्स ही वर्तमान मीडिया का आधुनिक रूप है। इसलिए बहुत से विद्वान सोशल मीडिया को पत्रकारिता की माता भी स्वीकार करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है, सोशल साइट्स पर हैश टैग करके किसी भी मुद्दे को इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया को मुहैया कराना, इसके बाद उस मुद्दे पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संज्ञान लेती भी है, या नहीं उसका भी एक कारण है ज्त्च्!! यदि किसी चैनल विशेष को ऐसा प्रतीत होता है कि मुद्दा उनकी विचारधारा के अनुकूल है, तो उस पर बहस होती है, अन्यथा उसको ठंडे बस्ते में डालकर छोड़ दिया जाता है, लेकिन सबसे सशक्त माध्यम सोशल मीडिया पर हैश टैग करके मुद्दों को आगे बढ़ाया जाता है, कभी-कभी मुद्दा केवल सोशल मीडिया से ही आगे बढ़ता है और राजनेताओं तक पहुँच जाता है, जिससे कोई भी सांसद उस मुद्दे को संसद में उठाकर पक्ष या विपक्ष पर वार करता है। सोशल मीडिया का यदि हम विश्लेषण करें तो लगभग 200 साइट्स हैं, मुख्यतः हमारे मस्तिष्क में फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, ब्लॉग और व्हाट्सएप्प आदि का नाम सर्वप्रथम आता है, क्योंकि इन माध्यमों से कोई भी सूचना माइक्रोसैकेण्ड के अनुसार देश-विदेश में पहुँच जाती है और क्रिया प्रतिक्रिया भी तुरंत प्राप्त हो जाती है। सोशल मीडिया की लोकप्रियता का अंदाजा इस वैश्विक परिवेश में अमरीका के यूनाइटेड साइबर स्कूल से लगाया जाता है। विभिन्न संचार माध्यमों को जन-जन तक पहँुचने में काफी समय लगा जैसे रेडियो को अड़तीस साल, टी.वी. को तेरह साल तथा इन्टरनेट को चार साल और फेसबुक जैसी साइट्स को सौ मिलियन लोगों तक पहुँचने में मात्र नौ महीने लगे। उसके बाद आवश्यक्तानुसार सोशल साइट्स आती रही और कम समय में अपनी प्रसिद्धि को प्राप्त होती रही। सोशल साइट्स केवल युवाओं को ही नहीं पसंद है, बल्कि अमरीका के साठ से अस्सी साल तक के बुजुर्ग इस पर सक्रिय रहते हैं। अब यह संख्या भारत में भी बहुत तेज गति से आगे बढ़ रही है।
सोशल साइट्स ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का ऐसा स्वतंत्र माध्यम दिया है, जिसके जरिए वह अपनी बात दुनिया के किसी भी व्यक्ति को पलक झपकते ही पहुँचा सकता है और उसका परिणाम पॉजिटिव या नेगेटिव चिह्न में प्राप्त कर सकता है। वर्तमान समय में युवा जानकारी के लिए अधिकतर सोशल मीडिया पर ही निर्भर रहता है। यह बात दूसरी है कि जानकारी का स्रोत प्रामाणिक है या अप्रामाणिक। संयुक्त राष्ट्र अमरीका में पचहत्तर प्रतिशत लोग अपनी जानकारी को बढ़ाने के लिए ब्लॉग का प्रयोग करते हैं। एक तरह से सूचनाओं, जानकारियों का विकेंद्रीकरण हुआ है। क्योंकि अब लोग किसी सूचना के लिए व्यक्ति या संस्था पर आश्रित नहीं हैं, बल्कि बस एक क्लिक करके सूचनाओं का भण्डार आपके समक्ष खुल जाता है और आप उपयोगी जानकारियों का संग्रह करके उसका आवश्यकतानुसार प्रयोग भी कर सकते हैं तथा कुछ सेकण्ड में अपनी प्रतिक्रिया पक्ष या विपक्ष में भी व्यक्त कर सकते हैं जबकि पारम्परिक मीडिया में आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते, जो खबर आपको प्रसारित की गई है उसकी प्रामाणिकता में भी संशय रहता है। यदि हम सूचनाओं और आंदोलनों का अवलोकन करें, तो हम देखते हैं कि अनेक आंदोलनों का मुख्य सूचना का माध्यम सोशल साइट्स ही था जैसे अरब क्रांति, वाल स्ट्रीट, लीबिया, मिश्र और ट्यूनीशिया आदि देशो में भी आंदोलनों को मुखर रूप देने का कार्य सोशल साइट्स ने ही किया जिससे सत्ता पक्ष की चूलें हिलती हुई नजर आईं और युवाओं ने अपनी अभिव्यक्ति से वहाँ की तानाशाही सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया। यदि हम भारत के परिप्रेक्ष्य में दृष्टिपात करें तो हम देखते हैं कि अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या फिर बाबा रामदेव का आन्दोलन हो, सबको मुख्यतः सोशल मीडिया ने ही रंग दिया और उस आन्दोलन ने सफल होते हुए तत्कालीन सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिससे आगामी चुनाव में उसको सत्ता से हाथ धोना पड़ा और युवाओं को तत्कालीन सरकार की भ्रष्टाचारी नीतियों से भी अवगत कराया गया। वर्तमान सरकार का यदि हम मूल्यांकन करें तो हम देखते हैं कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अधिकतर सत्ता के गलियारों से संचालित होती है, जिससे सत्ता के षड्यंत्र और दमनकारी नीतियों का लोगों को पूर्णतया पता नहीं चल पाता, जो हल्की फुलकी खबरें भी मालूम होती हैं उसमें कुछ खास जनता को जागरूक करने के लिए नहीं होता। सोशल मीडिया ने सत्ता की सभी दमनकारी नीतियों और षड्यंत्रकारी कार्यों का विश्लेषण तर्कपूर्ण करके उसको बहुत हद तक बैकफूट पर लाकर खड़ा कर दिया है, जैसे शिक्षा नीति हो या फिर धर्म से षड्यंत्र की नीति, नित्य रोज नए-नए शगूफों के माध्यम से वर्तमान सरकार बहुसंख्यक को रिझाने के लिए धार्मिक उन्माद, मानसिकता, साम्प्रदायिकता, लव जिहाद, गोमांस प्रकरण, रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या या फिर कन्हैया कुमार और उनके साथियों को देशद्रोही साबित करने का षड्यंत्र हो, इन सब काले कारनामों को युवाओं ने सोशल मीडिया के ही माध्यम से हैश टैग किया और अपने आन्दोलन को देशभर के लोगों तक पहुँचाया, जो बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कुछ प्रसारित किया। मुख्यतः सोशल मीडिया ने इन सब आंदोलनों को सबसे अधिक कवरेज दिया और यह जन आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हो पाया। जिस प्रकार से सोशल साइट्स को लोग अपने धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए प्रयोग करते हैं, ठीक उसी प्रकार कुछ सांप्रदायिक ताकतंे भी इसका प्रयोग करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की भी पूर्ति करती हैं, जैसे असम हिंसा में लोगों को भयभीत करके उनको पलायन के लिए मजबूर किया गया। आजकल भारत में भी वीडियो या मैसेज के माध्यम से देश में घृणा का माहौल उत्पन्न करके राजनैतिक लाभ साधा जाता है, जैसे मुजफ्फरनगर दंगे से पहले कुछ राजनेताओं ने वहाँ की जनता को उलटी सीधी वीडियो दिखाकर एक धर्म विशेष के खिलाफ आक्रोशित करके मानवता का कत्ल कराया, जिससे पूरी मानवता उसके लिए शर्मशार हुई। दूसरी तरफ आजकल साइबर आतंकवाद भी इसका दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहा है। आम लोगों की तरह आतंकवादी भी इसका उपयोग अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए कर रहे हैं, जिसमें छद्म नामों से फेसबुक, ट्वीटर आदि पर अपनी फेक आईडी बनाकर मासूम नौजवानों को अपने चंगुल में फंसाकर और धन का लालच देकर उनका दोहन करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की पूर्ति कर रहे हैं। आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प के माध्यम से नफरत फैलाने का कार्य चरम सीमा पर है। इसमें कार्य करने वाले कुछ ऐसे लोग हैं, जिनको राजनैतिक पार्टियाँ अपने हित को साधने के लिए धर्म की मखमली चादर में लपेटे हुए हैं। पार्टियाँ यह कार्य मैसेज, फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर अपने किराए के यूजर से कराती हैं, जिससे समाज में तर्कहीन और तथ्यहीन जानकारी पहुँचती है, जिससे सामज को तोड़कर अपने वोट बैंक की पॉलिटिक्स को साधा जाता है। ऐसे आरोप देश की अनेक राजनैतिक पार्टियों को लग चुके हैं जैसे-कांग्रेस, बीजेपी और आप। इसकी सच्चाई जानने के लिए आप फेसबुक के हिंदी या अंग्रेजी न्यूज चैनल के आधिकारिक फेसबुक पेज पर जाएँ, तो देखेंगे कि हर तीसरा कमेंट एक जैसा होगा तथा उसमें तथ्यहीन, कुतर्क सम्मत जानकारी होगी, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह कमेंट किसी एक व्यक्ति ने प्रचारित किया है अपनी पार्टियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए। सोशल साइट्स को आजकल कुछ पारंगत लोग आईडी, ईमेल हैक करके उसका दुष्प्रयोग कर रहे हैं, जैसे विकिलीक्स ने बहुत सारे खुलासे विभिन्न देशों के सन्दर्भ में किए। जिसमें पूँजीपति देशों की मंशा और उनके राजनैतिक कूटनीति का पता चलता है। सोशल साइट्स को कम उम्र के बच्चे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कि अभी किशोरावस्था में हैं जिससे उनके ऊपर मानसिक, शारीरिक और व्यावहारिक तौर पर असर देखने को मिल रहा है कुछ वयस्क और अवयस्क लोग सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक वीडियो और फोटो शेयर करते हैं, जिससे टीनेजर में कामुकता और समय से पहले वयस्क होने की प्रवृत्ति को वे महसूस करने लगते हैं जो कि सभ्य समाज के लिए अत्यंत घातक है तथा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी बच्चे का व्यवहार माता-पिता और समाज के लिए सही नहीं होता है। एक शोध से मालूम हुआ है कि फेसबुक का प्रयोग करने वाले एक करोड़ से ज्यादा सदस्य चैदह साल से कम आयु के हैं। आजकल सोशल साइट्स सिर्फ अपनी बात और विचार रखने भर का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह रिश्तों को जोड़ने का भी माध्यम है, जिस प्रकार से सोशल साइट्स पर केवल नफरत ही नहीं परोसी जाती हैं बल्कि मोहब्बत के भी रंग भरे जाते हंै जहाँ पर बहुत से नए मित्र बनते है, वहीं दूसरी तरफ पुराने मित्र भी मिलते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन को एक-दूसरे से शेयर करते हैं, जिसके माध्यम से देश-विदेश में बैठे पुराने या नए मित्रों से बात पल भर में हो जाती है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो देश-विदेश में बैठे रिश्तेदारों से आजकल पल भर में अनेक सोशल साइट्स के माध्यम से वीडियो कालिंग हो जाती है, जिससे रिश्तों में एक अलग मिठास का अनुभव होता है और रिश्ते मजबूत बने रहते हैं। वर्तमान समय में हम सोशल मीडिया का सही उपयोग करके समाज को कुछ बेहतर प्रस्तुत कर सकते हैं, यदि देश और राज्य की सरकारों ने इस पर समय रहते काबू नहीं पाया तो आए दिन बढ़ती मानसिक साम्प्रदायिकता और नफरत का माहौल नहीं रुक पाएगा, जो इस सभ्य समाज के लिए हानिकारक है। अर्थात हम कह सकते हैं कि यदि सही प्रयोग किया गया तो सोशल मीडिया, सोशल मीडिया ही रहेगा, वरना शोषण मीडिया बनकर समाज को अनेक प्रकार से ठगता रहेगा। इसके सही प्रयोग से हमारी पहचान देश ही नहीं विश्व स्तर पर बनेगी और हम वसुधैव कुटुम्बकम् का सही मतलब दुनिया को समझा पाएँगे। -अकरम हुसैन मोबाइल - 08791633435 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित |