बुधवार, 29 जून 2016

kisan

िसानो-खं ेत मज़दू रो की ब ं ढ़ती आत्महत्याएँ और कर्ज़ की समस्या ft+Eesnkj dkSu gS\ jkLrk D;k gS\ बीती 26 अप्रैल को पं जाब के बरनाला ज़िले के जोधपर ु गाँव में सदखोरों का क ू र्ज़ा चका पाने में असमर ु ्थ किसान और उसकी माँ द्वारा ज़हरीली दवाई पीकर खदक़ु ुशी करने की भयानक घटना ने एक बार फिर से राज्य के सं वेदनशील लोगों को हिला कर रख दिया। किसान बलजीत के पास 2 एकड़ ज़मीन थी और उसके बाप पर तेजा सिं ह नाम के सदखू ़ोर का कर्ज़ा था जो उनके मरने के बाद बलजीत के सिर आ गया। कई तरह की हेरा-फे रियों, ज़्यादा ब्याज लगाने और सरकारी महकमों में जोड़- तोड़ करके तेजा सिं ह ने बलजीत की ज़मीन अपने नाम करा ली। जब तेजा सरकारी अधिकारियों और पलिु स के साथ ज़मीन पर कब्ज़ा करने आया तो गाँव के लोगों की मौजदगी में बलजीत ू सिं ह ने घर की छत पर चढ़कर ज़हरीली दवाई पी ली, उसको देखकर उसकी मां बलबीर कौर ने भी बाकी की दवाई पी ली और अस्पताल ले जाते समय दोनों की मौत हो गयी। यह त्रासदी कृषि प्रधान राज्य पं जाब में खेती के सं कट में जी रहे ग़रीब किसानों और मज़दरों की द ू र्दनाक हालत को दिखाने वाली एक प्रतिनिधि घटना ह।ै राज्य के अख़बारों में लगभग रोज़ खदक़ु ुशी की कोई नयी ख़बर छपती ह। ैऐसी ख़बरों के कुछ अश हम यहाँ ं दे रहे हैं। पं जाबी ट्रिब्यून ्यू 27 अप्रैल के सं पादकीय के अनसार, ''प ु ं जाब में इस समय औसतन हर दो दिनों में तीन किसान कर्ज़े के बोझ के कारण खदक़ु ुशी करते हैं। के न्द्रीय कृषि राज्यमत्ं री की ओर से सं सद में पेश किये गये आँकड़ों के अनसार प ु ं जाब में इस साल 11 मार्च तक 56 किसानों ने खदक़ु ुशी की है जबकि अख़बारी रिपोर्टों के अनसार ु सिर्फअप्रैल महीने में 26 तारीख तक 40 किसान आत्महत्या कर चकुे हैं। किसान खदक़ु ुशियों के मामले में महाराष्ट्र के बाद पं जाब देश में दसरे नम ू ्बर पर आ गया ह। ैराज्य के तीन विशव् विद्यालयों की ओर से किये गये सर्वेक्षण के अनसार 2000 से 2011 के दौरान राज ु ्य में कृषि से सम्बन्धित 6926 व्यक्तियों ने खदक़ु ुशी की जिनमें से 3954 किसान और 2972 खेत मज़दर ू थे। पं जाब सरकार ने 2011 के बाद किसानों और खेत मज़दरों ू की खदक़ु ुशियों के बारे में ना तो कोई नया सर्वेक्षण करवाया है और ना ही इनका रिकार्डरखने के लिए कोई तं त्र क़ायम किया हैजबकि इस समय के दौरान कृषि सं कट और गहरा होने के कारण खदक़ु ुशियों की गिनती में बहु त ज़्यादा वद् ृधि हुई ह।’’ ै यहाँ देखा जाये तो सबसे ज़्यादा खदक़ु ुशियाँ सं गरूर (1,132), फिर मानसा (1,013) और बठिं डा (827) में हुई हैं। यह तस्वीर सिर्फ पं जाब की ही नहीं बल्कि पर ूे भारत की ह। ै देश में सबसे ज़्यादा, 45 प्रतिशत किसानों की आत्महत्याएँ महाराष्ट्र में होती हैं। सरकारी आँकड़ों के अनसार जनवरी से ु जन 2015 के दौरान 1300 ू किसानों ने खदक़ु ुशी की, मतलब रोज़ाना 7 किसानों ने खदक़ु ुशी की। पं जाब कृषि यनि‍ ू वर्सि‍टी, लधिु याना के डा. सखपाल अपने लेख ु में लिखते हैं, “राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ्यू के अनसार 2012 में देश में हर ु रोज़ 46 किसान खदक़ु ुशी करते थे। भारत में बड़े स्तर पर खदक़ु ुशियों का सिलसिला नयी आर्थिक नीति‍याँ लागू होने के बाद 1990 के आखिर में देखने को मिलता ह। ै1997 से 2006 के दौरान 10,95,219 व्यक्तियों ने खदक़ु ुशी की, जिनमें से 1,66,304 किसान थे। किसानों का यह आँकड़ा अब बढ़कर तीन ला

कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल

लोकसंघर्ष !


Posted: 27 Jun 2016 07:19 PM PDT
मोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित सामाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहाँ पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
    यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी, के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनैतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहाँ ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर सवर्ण कही जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थी। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनैतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनैतिक सुधार।
    इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वे थे। अब वे राजनैतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
        वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनैतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनैतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ अवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन मुलायम, लालू या नीतीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में
सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग आंदोलन के नाम पर सिर्फ सवर्णों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
    दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धि हो गई हो और वे इसके बल पर सत्ता तक पहुँच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गई। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनैतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया। जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीड़ित की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनैतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिए से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिस पर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनैतिक बहसों को केंद्रित किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी।
    दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनैतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाइयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी। उसका मुसलमानों या ईसाइयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक
धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
    यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनैतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गाँव-गाँव तक पहुँचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गाँव-गाँव और पिछड़ी जातियों तक पहुँचाया। जहाँ स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
    वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढाँचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहाँ गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए
विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थीं, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है। इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता चलाती है तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी इस पर उनका लाजवाब तर्क था कि ब्राह्मणों को राजनीति में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया। इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। इसीलिए सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नीतीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णों की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल राजनीति ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूँढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीति ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक,आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।
   -राजीव कुमार यादव
 मोबाइल: 09452800752 
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

सोमवार, 27 जून 2016

देश का पिछड़ा वर्ग: भूत, वर्तमान और भविष्य


Posted: 26 Jun 2016 07:17 PM PDT

 “We must shape our course ourselves and by ourselves." -Babasaheb Ambedkar

  भारतीय वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था के दुष्प्रभाव इतने गहरे और प्रभावी हैं कि तमाम संवैधानिक उपचारों और लंबे समय तक चलने वाले जनसंघर्ष और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के बाद भी अभी तक कोई स्वस्थ सामाजिक संरचना देश में निर्मित नहीं की जा सकी है। देश का पिछड़ा वर्ग यहाँ की विशालकाय आबादी है। भिन्न-भिन्न जातियों के समूह इस वर्ग में सम्मिलित हैं यद्यपि जातीय अस्मिताओं में जी रहे इस वर्ग में रंचमात्र भी वर्गबोध होता तो यह आज इस देश का प्रभु वर्ग होता। यह वह वर्ग है जिसने औपनिवेशिक भारत में दलितों और अंत्यजों के साथ दोहरीगुलामी झेली है। ये अंग्रेजों के गुलाम तो थे ही साथ ही साथ देश की सवर्ण जातियों के गुलाम अलग से थे। सवर्ण जातियों का अपना एक अलग एजेंडा रहा है। विदेशी आक्रमण कारियों के शासन से लेकर मुगलों ब्रिटिशों तक वे अपने हितों और स्वार्थों के लिए तत्काल सत्ता के साथ हो जाते थे। उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी से कोई सरोकार नहीं था। भारत की सवर्ण जातियों ने अनेक मुस्लिम, तुर्क, गुलाम शासकों की दीवानी और दरबारी की। वे मुगलों के दरबार में उनके सेनापति और नवरत्न बनकर रहे, उनसे रोटी-बेटी का संबंध रखा। अंग्रेजों से ठेके लेने और राय बहादुर तथा राजा के खिताब पाने के लिए वे उनके भी चापलूस बने रहे। सवर्णों ने भारत की दलित-पिछड़ी जातियों को हाशिए पर
धकेल कर अंग्रेजों से प्राप्त न केवल आर्थिक उत्पादन के स्रोतों पर बल्कि राजनैतिक सत्ता पर भी अधिकार कर लिया। वही रंग आज भी विभिन्न राजनैतिक पार्टियों में दिखता है। ये केवल सत्ता के साथ रहना ही जानते हैं।  दूसरी तरफ पिछड़े वर्ग की कोई सांस्कृतिक अस्मिता नहीं रही। दलितों ने फिर भी एक दीर्घकालीन आंदोलन चलाया। क्योंकि उनके तो अस्तित्व पर ही संकट था। वे तो अमानवीय स्थितियों में जी रहे थे। उनके पास अंबेडकर जैसे नेता भी थे और उन्होंने लंबी लड़ाई लड़कर अपनी खोई हुई अस्मिता को प्राप्त किया। आज सरकारी नौकरियों से लेकर प्रत्येक क्षेत्र में दलितों का संतोषप्रद प्रतिनिधित्व है। लेकिन यदि सिरे से कोई गायब है तो वह हैं पिछड़े। पिछड़े वर्ग की कई सांस्कृतिक, राजनैतिक समस्याएँ हैं। इनके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं था न ये अस्पृश्यता के शिकार थे। जिसका फायदा उठाकर सवर्ण हिन्दुत्व और ब्राह्मणवाद ने इन्हें सवर्ण बनाने का सफल प्रयास जारी रखा तथा दलितों का उत्पीड़न करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक राजनीति में इन्हें राजनैतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया। जबकि अपनी मूल सामाजिकता में भारत की पिछड़ी जातियाँ सांप्रदायिक नहीं हैं। ब्राह्मण धर्म के चंगुल में फँसने के कारण इनका और भी बुरा हश्र हुआ। देश के मंदिर-मठों में सबसे अधिक चढ़ावा यही चढ़ाते हैं क्योंकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी की लगभग साठ फीसदी है। इनके द्वारा किए गए धार्मिक दान और चढ़ावे के बल पर ही इस देश का ब्राह्मणवाद फलता-फूलता और मुटाता है। पिछड़े व्यवसाय के स्तर पर किसान, पशुपालक, कामगार और खेतिहर मजदूर हैं। इसी तरह पसमांदा मुसलमानों में पिछड़ी जातियाँ नाई, जुलाहे, कसाई, घोसी, धुनिया आदि हैं। लक्ष्यार्थ यह कि देश में सबसे अधिक मेहनत का या शारीरिक श्रम का कार्य भी यही करते हैं क्योंकि सवर्ण जातियों ने पूर्णतया स्वयं को शारीरिक श्रम से दूर कर रखा है। प्रकारांतर से भारत की 15 प्रतिशत सवर्ण आबादी देश की पचासी प्रतिशत दलित, पिछड़ी, अल्पसंख्यक और आदिवासी जनता के श्रम पर न केवल जीती है बल्कि उसी की प्रदान की गयी शक्ति से उसको शासित और शोषित भी करती है। पिछड़े आज भी सवर्णों के लठैत बने हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन ने कुर्मी और यादव जैसी जातियों को थोड़ी बहुत जमीन अवश्य दिला दी लेकिन कहार, लोहार, निषाद, महरा, केवट, माली, नाई और कुम्हार जैसी पिछड़ी जातियाँ लगभग भूमिहीन ही रहीं। ये अभी भी गाँवों में रहती हैं। बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक भारत की सवर्ण जातियाँ पूरी तरह से शहरों में बस चुकी थीं। जमींदारी उन्मूलन ठीक से न होने की वजह से इनके पास पर्याप्त भूमि थी जिसे या तो इन्होंने बेच दिया या फिर शहर में रहकर ही खेतिहर मजदूरों से उस पर कृषि कराते रहे। उनके खेतिहर मजदूर भी पिछड़ी जाति के थे। इससे उन्हें दोहरा लाभ हुआ एक तो वे शहर में अंग्रेजी शिक्षा पाकर महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर काबिज हो गए और दूसरी तरफ कृषि के उत्पादन का लाभ भी उन्हें मिला जिससे उनकी स्थिति निरंतर सुदृढ़ होती गई और सामाजिक असमानता बढ़ती रही। दलितों का भी एक बड़ा जनसमूह शहरों की तरफ निकल गया। अंबेडकर ने दलितों को शहरों की ओर जाने का नारा दिया, उनकी नजर में भारतीय गाँव ‘जातीय भेदभाव का नर्क’ थे। इससे दलितों को लाभ भी हुआ। वे न केवल सरकारी नौकरियों में स्थान बना सके बल्कि एक समझदार, जागरुक मध्यवर्ग और उनके हितों-अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक दलित बुद्धिजीवी वर्ग भी अस्तित्व में ला सके। पिछड़े वर्ग का दुर्भाग्य रहा कि वह सवर्णवाद के झाँसे में आ गया और स्वयं को श्रेष्ठ हिन्दू मानने (क्षत्रिय आदि) एवं अपने आंतरिक ब्राह्मणवाद के चक्कर में फँसकर ही उसकी स्थिति आज इतनी सोचनीय हो गई है। पिछड़ा वर्ग केवल वोट बैंक बना रहा। स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की गति अत्यंत धीमी रही है। पिछड़ों के लिहाज से और भी धीमी। अंग्रेजों से सत्ता का जो हस्तांतरण हुआ वह भारत की सवर्ण जातियों को हुआ। भारत का पहला प्रधानमंत्री और भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। उन्होंने सामाजिक न्याय को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि यह उनके वर्चस्ववादी हितों के खिलाफ थी। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट को लंबे समय तक कांग्रेस के सवर्ण नेतृत्व ने दबाए रखा। जब तक इसे लागू किया जाता तब तक देश की सरकारी नौकरियों पर पूरी तरह से सवर्ण काबिज हो चुके थे। देश की दूसरी सवर्णवादी पार्टी भाजपा ने सांप्रदायिक सवर्ण हिन्दू संगठन आरएसएस के सहयोग से मण्डल के विरोध में कमंडल की राजनीति प्रारम्भ की और देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया। यह सत्य है किं मण्डल कमीशन के पश्चात पिछड़ों को जो 27 फीसदी आरक्षण मिला उससे उनकी राजनैतिक मानसिकता में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। मुंगेरीलाल, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे बड़े सामाजिक क्रांतिकारी नेता भी पिछड़े वर्ग में सामने आए। किन्तु आज भी केंद्रीय सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व केवल 12 फीसदी है जबकि उनकी आबादी लगभग 60 फीसदी है। हालात बहुत बुरे हैं। जितने सोचे जा रहे थे उससे अधिक ! देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल एक प्रोफेसर और एक वाइस चांसलर पिछड़ी जाति का है। देश के शीर्ष बीस अरबपतियों में एक भी पिछड़ा नहीं है। इसी तरह मीडिया, फिल्म, न्याय पालिका, कारपोरेट और साहित्य में भी पिछड़ों का यही हाल है। यह महज इत्तिफाक नहीं है कि आजादी के आधी सदी से अधिक का समय बीतने के बाद भी पिछड़ों की इतनी बुरी हालत है। इसके पीछे भयानक सवर्ण, वर्चस्ववादी, यथास्थितिवाद है। पिछड़ों को कई कानूनी दाँव-पेचों से समाज की मुख्य
धारा में आने से रोका जा रहा है। सवर्णवाद और हिन्दुत्व की बूटी से पिछड़े अपने वोट बैंक की ताकत को भी भूल जाते हैं और यही ब्राह्मणवाद की सफलता है। किन्तु अब पिछड़ों में एक नई चेतना देखी जा रही है। उन्होंने अपने कबीर, फुले, अंबेडकर और पेरियार जैसे नायकों को पहचान लिया है। ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा जैसे विचारकों को भी पिछड़ों ने समझ लिया है। इन्हें अपनी वोट की ताकत को पहचानना होगा और अपने हक की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरना होगा। सबसे पहले तो जातिवार जनगणना के आँकड़ों को सार्वजनिक करने की माँग करनी होगी। इससे पता चल जाएगा की इनकी आबादी की वास्तविक स्थिति क्या है। तभी ये अपनी आबादी के अनुपात में
प्रतिनिधित्व माँग सकेंगे। हालाँकि इस विषय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों का ढुलमुल रवैया है क्योंकि दोनों ही सवर्णवादी राजनीति करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को पिछड़ा बताकर वोट मांगते हैं लेकिन पिछड़ों के हक की बात पर मौन धारण कर लेते हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए ब्राह्मणवादी मोहन भागवत उन्हें निर्देश देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि पिछड़ों का वोट ही भारतीय राजनीति का भविष्य तय करता है लेकिन पिछड़ों का भविष्य और वर्तमान हमेशा हाशिए पर क्यों रखा जाता है? इस प्रश्न पर पिछड़ों को विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा आयोग को अभी तक संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया है। आरक्षण एक्ट के लिए पिछड़ों को माँग करनी चाहिए। आरक्षण एक्ट के तहत यह कानून होना चाहिए कि, किसी संस्था में आरक्षण के नियमों का विधिवत पालन न होने पर उस संस्था के प्रमुख को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय। क्योंकि व्यवस्था में बैठे हुए सवर्ण साजिश करके पिछड़े वर्ग की सीटों को सामान्य में बदलकर उस पर स्वजातीय भर्ती कर लेते हैं। यह सब खुले आम हो रहा है। पिछड़ों को सोचना चाहिए के वे इस देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाले वर्ग की श्रेणी में हैं, जिसकी मेहनत का कोई और मजा लूट रहा है। सांप्रदायिकता और उग्र हिन्दुत्व से इन्हें दूर रहना चाहिए क्योंकि यह सारा ढोंग इन्हीं का हक लूटने के लिए किया जाता है। जातीय और धार्मिक भेदभाव को भूल कर पिछड़ों को एक वर्ग के रूप में सामने आना चाहिए तभी वे अपने अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। हिंदुओं के पिछड़े और मुसलमानों के पसमांदा मुसलमान एक जैसे ही हैं। उनकी उनके धर्म में एक जैसी ही हालत है। इसलिए पिछड़ा, पिछड़ा एक समान होना चाहिए वह हिन्दू हो या मुसलमान! हजारों साल से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जड़ें जमाए हुए सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होना होगा। दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तो पहले से ही पिछड़ों के साथ हैं।
   -संतोष अर्श
मोबाइल: 09033510239
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के जून अंक 2016  में प्रकाशित

शुक्रवार, 24 जून 2016

बिजली कर्मचारी हड़ताल


बिजली कर्मचारी हड़ताल 
एस्मा लगाकै सरकार कर्मचारी आंदोलन दबावै देखो ।।
निजीकरण करकै बिजली का जनता नै लुटवावै देखो ।।
ठेके पै देकै बिजली विभाग जनता के दुःख घने बढाये 
बिजली बिल अनतोले देखो लोगां ताहिं जाकै पकड़ाये
मानस धक्के खावैं दफ्तरां के बिल ठीक नहीं हो पावै देखो ।।
सारी मांग कर्मचारियों की पूरी करने आली लागैं देखो
बिजली रेट मत बढ़ाओ जनता की मांग ये उठावैं देखो
बिजली के रेट बढ़ाकै या आज जनता नै सतावै देखो ।।
कर्मचारी एकता जिंदाबाद या जनता मदद मैं आवैगी
दुखी होरी सै बहोत घणी सुर मैं सुर जनता मिलावैगी
लडां मिलकै नै आज लड़ाई संघर्ष सफलता पावै देखो।।
आज आरपार की लड़ाई निजीकरण कै खिलाफ लडांगे
नहीं डरां इस एस्मा तै अपनी माँगाँ पर कति अडांगे
रणबीर करो होंसला एकबै सरकार झुक ज्यावै देखो ।।





नीतू जी की हत्या के विरोध में

नीतू जी की हत्या के विरोध में हुडा सिटी पार्क में सभा का आयोजन किया गया जिसमें बहुत से जनसंगठनों ने, परिवार सदस्यों ने , मोहल्ले के लोगों ने हिस्सेदारी की और २७ जून को एक महाप्रदर्शन का फैंसला किया / हुडा सिटी पार्क में २७ जून को सुबह दस बजे रोहतक और आस पास के गाँवों के लोग इसमें शामिल होंगे । यह एकेले नीतू की हत्या का मसला नहीं है बल्कि हरेक नागरिक की सुरक्षा का मसला भी है । विनोद ,ओमनाथ जी , महाबीर मालिक , राज कुमारी जी , वीणा मालिक और अंजू ने संम्बोधन किया ।









मंगलवार, 21 जून 2016

ईब कोन्या


एक बै एक साड़ी बेचन आला गाम मैं आग्या | उसने एक घरबारन  को कहया -- देखै के सै घनी बढ़िया साड़ी सै | बस  चालीस रपईयाँ की | ले कै देख | सारी उमर याद राखैगी | घर बारन बोली --- ना बाबा ना | इसका रांग कच्चा निकल गया तो मैं क्या करूंगी ? देनी है तो बीस रपयीयों में दे दे | घनी ए वार खींच तान चलती रही | हार कै साड़ी आला बोल्या -- चाल जो तेरा जी  करै  वो दे दे | घरबारण नै  साड़ी के बीस रपईये दे दिए | उस दिन पीछे उसने साड़ी का पैंडा ए ना छोड्या | पड़ोसन कहती ---हाय ! कितनी बढ़िया साड़ी ! कित तैं खरीद कै ल्याई ? 
हफ्ते मैं मैली करदी साड़ी | घरबारण गयी जोहड़ पै साड़ी धोवन | सारा जोहड़ लाल कर दीया साड़ी नै | सारा रंग   छूट ग्या | छूटती ए  बोली -- ओहले  म नै के बेरा था  रंग उतर ज्यागा | पर उस कै बाकी कति नहीं रही | नयों बोली --आवन दे जाये रोये नै | पीसे उलटे नहीं लिए तो मेरा भी नाम धमलो नहीं | फेर एक मिहना बाट  देखी पर जाये रोया कोनी आया | रमलू बोल्या --इसी इसी तो इब्बी रैहरी सें म्हारे गाम मैं | भैंसवाल  मैं तो सुन्या करते अक  वहां के लोग बावले सें | एक भैंसवाल का रिश्तेदार आरया  था ओ  बोल्या अक ईब कोन्या रैहरे बावले | रमलू नै फेर एक चुटकला सुनाया ----
म्हारा एक कलास फैलो था धनपत खरखौदे का ओ ब्याह दिया भैंसवाल  | नया नया ब्याह | दोनूं फिल्म देखण चाले गये राज टाकीज मैं | फिल्म शुरू होगी | न्यूज आई | उसमें कई बूढ़े बैठे होक्का पीवन लागरे थे | देखते की साथ धनपत की बहु नै तै एक हाथ लम्बा घूँघट कर लिया | हाफ टेम हुया तै धनपत नै बुझी अक किसी लागी फिल्म ? तै वा बोली शुरू होंते की साथ वे बूढ़े आगे थे | मने तो जिब घूँघट कर लिया था | फिल्म कोन्या देखण पाई | ओ भैंसवालिया बी सुनै था ओ बोल्या उसनै तो कदे गाम मैं घूँघट ना काढ्या तै वहां क्यूकर काढ लिया ? कमलू अर ठमलू  जोर के हंस पड़े अर बोले अक  यो  ठीक कहवै सै रमलू अक भैंस वाल के लोग इब्बी बावले रैहरे सें | भैंस वाल की छोरी भैंसवाल  मैं घूँघट थोड़े ए ना काढैगी|

सोमवार, 20 जून 2016

मध्य प्रदेश में महिला स्वास्थ्य

मध्य प्रदेश   में महिला स्वास्थ्य में सुधार लाना एक चुनौती है. यह चुनौती संसधानों की कमी के कारण नहीं पैदा हुई बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं के निचले ढांचे में सुधार का अभाव और विभिन्न योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाने के कारण है। यह साफ नजर आ रहा है कि जमीनी स्तर पर महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विकल्पों पर विचार नहीं किया जा रहा है। यद्यपि पिछले दशकों की तुलना में मातृत्व मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है पर इसके बावजूद प्रदेश में अभी भी प्रति वर्ष 7700 मातृत्व मृत्यु हो रही है।
सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत भी महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत यह निहित है कि वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु को तीन चौथाई कम करना है। यदि सरकारी आंकड़ों को ही देखें, तो म.प्र. का आर्थिक सर्वेक्षण 2006-07 के अनुसार 10 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु का औसत 498 प्रति लाख था, जो कि वर्तमान में 379 प्रति लाख के स्तर पर आ गया है। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य नीति के अनुसार वर्ष 2011 तक मातृत्व मृत्यु दर को 220 प्रति लाख के स्तर तक लाना है। यह लक्ष्य 1997 के 498 प्रति लाख मातृत्व मृत्यु दर के आधार पर रखा गया था। मीडियम टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी- 2006 में 2005 की स्थिति में मातृत्व मृत्यु दर 400 प्रति लाख माना गया है।
यदि हाल ही में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें (यद्यपि मध्यप्रदेश सरकार इन आंकड़ों को नहीं मानती और इसे लेकर राज्य सरकार ने केन्द्र के समक्ष आपति भी दर्ज करा दी है) तो कई तथ्य सामने आते हैं। इस सर्वेक्षण में आए परिणामों में यह पाया गया है कि मध्यप्रदेश में अपने पिछले प्रसव के दरम्यान प्रसव पूर्व तीन आवश्यक जांच कराने वाली माताओं की संख्या 42.2 प्रतिशत है, किसी डॉक्टर, नर्स, ए.एन.एम., एल.एच.डब्ल्यु या प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की निगरानी में प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 37.1 प्रतिशत है, संस्थागत प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 29.7 प्रतिशत है, प्रसव के दो दिनों के अंदर प्रसव बाद की स्वास्थ्य निगरानी पाने वाली माताओं की संख्या 27.9 प्रतिशत है, सामान्य से कम बी.एम.आई. वाली महिलाओं की संख्या 40.1 प्रतिशत है, 15-49 वर्ष की एनिमिया ग्रस्त विवाहित महिलाओं की संख्या 57.6 प्रतिशत है और एनिमिया ग्रस्त 15-49 वर्ष की गर्भवती महिलाओं की संख्या 57.9 प्रतिशत है।
सारा मामला इन्हीं आंकड़ों की विष्वसनीयता पर आकर टिक गया है। रकार बार-बार इन आंकड़ों को कठघरे में खड़ा कर यह दर्शाने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। यह सही है कि जितनी योजनाएं चल रही है, उसका बेहतर क्रियान्वयन हो तो निश्चय ही गुणात्मक सुधार देखने को मिलेगा पर स्वास्थ्य विभाग का निचला ढांचा इतना कमजोर हो गया है कि इस दावे पर विश्वास करना संभव नहीं है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। सरकार स्वयं इस बात को स्वीकार कर रही है कि प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी है, खासतौर से महिला डॉक्टरों की तब महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य कैसे मिल रहा है? पिछले विधान सभा सत्र में महिला डॉक्टरों की कमी को लेकर बहुत कम समय के लिए, पर गंभीर चर्चा हुई थी, जिसमें यह कहा गया कि आयुष की महिला डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर उन्हें ग्रामीण अंचलों में पदस्थ कर महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएगी पर अभी तक इस पर क्या हुआ, की जानकारी किसी को नहीं है।
प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, बल्कि इस पर अमल करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी के विधायक डॉ. सुनीलम् प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। जन स्वास्थ्य के मुद्दे पर कार्यरत डॉक्टर एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का भी स्पष्ट रूप से यह कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपना, दोनों विरोधाभाशी काम है। जन स्वास्थ्य अभियान के डॉ. अजय खरे का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की प्रक्रिया को उल्टी दिशा में ले जाने वाला कदम है. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने से तमाम सरकारी दावों के बावजूद महिला एवं बाल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, तब न मातृ मृत्यु में कमी लाई जा सकती है और न ही बाल मृत्यु में। यह प्रदेश के लिए दुखद बात है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया। इस स्थिति को सुधारने के बजाय इसे निजी हाथों में देने की तैयारी का अर्थ आम लोगों से स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार को छिनने की साजिश ही हो सकती है। डॉ. खरे का कहना है कि अभी भी जिन समुदायों एवं इलाकों में महिला एवं बाल मृत्यु ज्यादा है, उन इलाकों से स्वास्थ्य केन्द्रों तक आना लोगों के लिए खर्चीला काम है, इस पर भी यदि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी कर दिया गया, तो लोग स्वास्थ्य केन्द्रों में जाने के बजाय नीम-हाकिम एवं बाबाओं की शरण में ही जाएंगे। उसके बाद स्वास्थ्य की स्थिति सुधरेगी या फिर बिगड़ेगी, आसानी से समझा जा सकता है।
यदि इन तथ्यों को देखा जाये, तो पता चलता है कि प्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए नीतिगत प्रयासों की ज्यादा जरूरत है। वर्तमान में सरकार मातृत्व स्वास्थ्य के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है, जिसमें - जननी सुरक्षा योजना, गर्भवती महिला हेतु सुविधा, संस्थागत प्रसव योजना, प्रसव हेतु परिवहन एवं उपचार योजना प्रमुख हैं। पर सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पा रहा है या नहीं¬सिर्फ यही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन का रवैया, गरीबी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव आदि कई कारण हैं, जो माहिला स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में चुनौती हैं।
राजू  कुमार