िसानो-खं ेत मज़दू
रो की ब ं ढ़ती आत्महत्याएँ और कर्ज़ की समस्या
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बीती 26 अप्रैल को पं
जाब के
बरनाला ज़िले के जोधपर
ु गाँव में
सदखोरों का क ू र्ज़ा चका पाने में असमर ु ्थ
किसान और उसकी माँ द्वारा ज़हरीली
दवाई पीकर खदक़ु ुशी करने की भयानक
घटना ने एक बार फिर से राज्य के
सं
वेदनशील लोगों को हिला कर रख
दिया। किसान बलजीत के पास 2 एकड़
ज़मीन थी और उसके बाप पर तेजा सिं
ह
नाम के सदखू ़ोर का कर्ज़ा था जो उनके
मरने के बाद बलजीत के सिर आ गया।
कई तरह की हेरा-फे रियों, ज़्यादा ब्याज
लगाने और सरकारी महकमों में जोड़-
तोड़ करके तेजा सिं
ह ने बलजीत की
ज़मीन अपने नाम करा ली। जब तेजा
सरकारी अधिकारियों और पलिु स के
साथ ज़मीन पर कब्ज़ा करने आया तो
गाँव के लोगों की मौजदगी में बलजीत
ू
सिं
ह ने घर की छत पर चढ़कर ज़हरीली
दवाई पी ली, उसको देखकर उसकी मां
बलबीर कौर ने भी बाकी की दवाई पी
ली और अस्पताल ले जाते समय दोनों
की मौत हो गयी। यह त्रासदी कृषि प्रधान
राज्य पं
जाब में खेती के सं
कट में जी रहे
ग़रीब किसानों और मज़दरों की द
ू र्दनाक
हालत को दिखाने वाली एक प्रतिनिधि
घटना ह।ै
राज्य के अख़बारों में लगभग रोज़
खदक़ु ुशी की कोई नयी ख़बर छपती
ह। ैऐसी ख़बरों के कुछ अश हम यहाँ ं
दे रहे हैं। पं
जाबी ट्रिब्यून
्यू 27 अप्रैल के
सं
पादकीय के अनसार, ''प ु ं
जाब में इस
समय औसतन हर दो दिनों में तीन
किसान कर्ज़े के बोझ के कारण खदक़ु ुशी
करते हैं। के न्द्रीय कृषि राज्यमत्ं री की
ओर से सं
सद में पेश किये गये आँकड़ों
के अनसार प ु ं
जाब में इस साल 11 मार्च
तक 56 किसानों ने खदक़ु ुशी की है
जबकि अख़बारी रिपोर्टों के अनसार
ु
सिर्फअप्रैल महीने में 26 तारीख तक 40
किसान आत्महत्या कर चकुे हैं। किसान
खदक़ु ुशियों के मामले में महाराष्ट्र के
बाद पं
जाब देश में दसरे नम
ू ्बर पर आ
गया ह। ैराज्य के तीन विशव् विद्यालयों
की ओर से किये गये सर्वेक्षण के
अनसार 2000 से 2011 के दौरान राज ु ्य
में कृषि से सम्बन्धित 6926 व्यक्तियों ने
खदक़ु ुशी की जिनमें से 3954 किसान
और 2972 खेत मज़दर
ू थे। पं
जाब
सरकार ने 2011 के बाद किसानों और
खेत मज़दरों
ू की खदक़ु ुशियों के बारे में
ना तो कोई नया सर्वेक्षण करवाया है
और ना ही इनका रिकार्डरखने के लिए
कोई तं
त्र क़ायम किया हैजबकि इस
समय के दौरान कृषि सं
कट और गहरा
होने के कारण खदक़ु ुशियों की गिनती
में बहु
त ज़्यादा वद्
ृधि हुई ह।’’ ै यहाँ
देखा जाये तो सबसे ज़्यादा खदक़ु ुशियाँ
सं
गरूर (1,132), फिर मानसा (1,013)
और बठिं
डा (827) में हुई हैं।
यह तस्वीर सिर्फ पं
जाब की ही
नहीं बल्कि पर
ूे भारत की ह। ै देश में
सबसे ज़्यादा, 45 प्रतिशत किसानों
की आत्महत्याएँ महाराष्ट्र में होती हैं।
सरकारी आँकड़ों के अनसार जनवरी से
ु
जन 2015 के दौरान 1300
ू किसानों ने
खदक़ु ुशी की, मतलब रोज़ाना 7 किसानों
ने खदक़ु ुशी की। पं
जाब कृषि यनि
ू वर्सिटी,
लधिु याना के डा. सखपाल अपने लेख
ु
में लिखते हैं, “राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड
ब्यूरो
्यू के अनसार 2012 में देश में हर
ु
रोज़ 46 किसान खदक़ु ुशी करते थे।
भारत में बड़े स्तर पर खदक़ु ुशियों का
सिलसिला नयी आर्थिक नीतियाँ लागू
होने के बाद 1990 के आखिर में देखने
को मिलता ह। ै1997 से 2006 के दौरान
10,95,219 व्यक्तियों ने खदक़ु ुशी की,
जिनमें से 1,66,304 किसान थे। किसानों
का यह आँकड़ा अब बढ़कर तीन ला
बुधवार, 29 जून 2016
कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल
लोकसंघर्ष ! |
सोमवार, 27 जून 2016
देश का पिछड़ा वर्ग: भूत, वर्तमान और भविष्य
शुक्रवार, 24 जून 2016
बिजली कर्मचारी हड़ताल
बिजली कर्मचारी हड़ताल
एस्मा लगाकै सरकार कर्मचारी आंदोलन दबावै देखो ।।
निजीकरण करकै बिजली का जनता नै लुटवावै देखो ।।
ठेके पै देकै बिजली विभाग जनता के दुःख घने बढाये
बिजली बिल अनतोले देखो लोगां ताहिं जाकै पकड़ाये
मानस धक्के खावैं दफ्तरां के बिल ठीक नहीं हो पावै देखो ।।
सारी मांग कर्मचारियों की पूरी करने आली लागैं देखो
बिजली रेट मत बढ़ाओ जनता की मांग ये उठावैं देखो
बिजली के रेट बढ़ाकै या आज जनता नै सतावै देखो ।।
कर्मचारी एकता जिंदाबाद या जनता मदद मैं आवैगी
दुखी होरी सै बहोत घणी सुर मैं सुर जनता मिलावैगी
लडां मिलकै नै आज लड़ाई संघर्ष सफलता पावै देखो।।
आज आरपार की लड़ाई निजीकरण कै खिलाफ लडांगे
नहीं डरां इस एस्मा तै अपनी माँगाँ पर कति अडांगे
रणबीर करो होंसला एकबै सरकार झुक ज्यावै देखो ।।
एस्मा लगाकै सरकार कर्मचारी आंदोलन दबावै देखो ।।
निजीकरण करकै बिजली का जनता नै लुटवावै देखो ।।
ठेके पै देकै बिजली विभाग जनता के दुःख घने बढाये
बिजली बिल अनतोले देखो लोगां ताहिं जाकै पकड़ाये
मानस धक्के खावैं दफ्तरां के बिल ठीक नहीं हो पावै देखो ।।
सारी मांग कर्मचारियों की पूरी करने आली लागैं देखो
बिजली रेट मत बढ़ाओ जनता की मांग ये उठावैं देखो
बिजली के रेट बढ़ाकै या आज जनता नै सतावै देखो ।।
कर्मचारी एकता जिंदाबाद या जनता मदद मैं आवैगी
दुखी होरी सै बहोत घणी सुर मैं सुर जनता मिलावैगी
लडां मिलकै नै आज लड़ाई संघर्ष सफलता पावै देखो।।
आज आरपार की लड़ाई निजीकरण कै खिलाफ लडांगे
नहीं डरां इस एस्मा तै अपनी माँगाँ पर कति अडांगे
रणबीर करो होंसला एकबै सरकार झुक ज्यावै देखो ।।
नीतू जी की हत्या के विरोध में
नीतू जी की हत्या के विरोध में हुडा सिटी पार्क में सभा का आयोजन किया गया जिसमें बहुत से जनसंगठनों ने, परिवार सदस्यों ने , मोहल्ले के लोगों ने हिस्सेदारी की और २७ जून को एक महाप्रदर्शन का फैंसला किया / हुडा सिटी पार्क में २७ जून को सुबह दस बजे रोहतक और आस पास के गाँवों के लोग इसमें शामिल होंगे । यह एकेले नीतू की हत्या का मसला नहीं है बल्कि हरेक नागरिक की सुरक्षा का मसला भी है । विनोद ,ओमनाथ जी , महाबीर मालिक , राज कुमारी जी , वीणा मालिक और अंजू ने संम्बोधन किया ।
मंगलवार, 21 जून 2016
ईब कोन्या
एक बै एक साड़ी बेचन आला गाम मैं आग्या | उसने एक घरबारन को कहया -- देखै के सै घनी बढ़िया साड़ी सै | बस चालीस रपईयाँ की | ले कै देख | सारी उमर याद राखैगी | घर बारन बोली --- ना बाबा ना | इसका रांग कच्चा निकल गया तो मैं क्या करूंगी ? देनी है तो बीस रपयीयों में दे दे | घनी ए वार खींच तान चलती रही | हार कै साड़ी आला बोल्या -- चाल जो तेरा जी करै वो दे दे | घरबारण नै साड़ी के बीस रपईये दे दिए | उस दिन पीछे उसने साड़ी का पैंडा ए ना छोड्या | पड़ोसन कहती ---हाय ! कितनी बढ़िया साड़ी ! कित तैं खरीद कै ल्याई ?
हफ्ते मैं मैली करदी साड़ी | घरबारण गयी जोहड़ पै साड़ी धोवन | सारा जोहड़ लाल कर दीया साड़ी नै | सारा रंग छूट ग्या | छूटती ए बोली -- ओहले म नै के बेरा था रंग उतर ज्यागा | पर उस कै बाकी कति नहीं रही | नयों बोली --आवन दे जाये रोये नै | पीसे उलटे नहीं लिए तो मेरा भी नाम धमलो नहीं | फेर एक मिहना बाट देखी पर जाये रोया कोनी आया | रमलू बोल्या --इसी इसी तो इब्बी रैहरी सें म्हारे गाम मैं | भैंसवाल मैं तो सुन्या करते अक वहां के लोग बावले सें | एक भैंसवाल का रिश्तेदार आरया था ओ बोल्या अक ईब कोन्या रैहरे बावले | रमलू नै फेर एक चुटकला सुनाया ----
म्हारा एक कलास फैलो था धनपत खरखौदे का ओ ब्याह दिया भैंसवाल | नया नया ब्याह | दोनूं फिल्म देखण चाले गये राज टाकीज मैं | फिल्म शुरू होगी | न्यूज आई | उसमें कई बूढ़े बैठे होक्का पीवन लागरे थे | देखते की साथ धनपत की बहु नै तै एक हाथ लम्बा घूँघट कर लिया | हाफ टेम हुया तै धनपत नै बुझी अक किसी लागी फिल्म ? तै वा बोली शुरू होंते की साथ वे बूढ़े आगे थे | मने तो जिब घूँघट कर लिया था | फिल्म कोन्या देखण पाई | ओ भैंसवालिया बी सुनै था ओ बोल्या उसनै तो कदे गाम मैं घूँघट ना काढ्या तै वहां क्यूकर काढ लिया ? कमलू अर ठमलू जोर के हंस पड़े अर बोले अक यो ठीक कहवै सै रमलू अक भैंस वाल के लोग इब्बी बावले रैहरे सें | भैंस वाल की छोरी भैंसवाल मैं घूँघट थोड़े ए ना काढैगी|
सोमवार, 20 जून 2016
मध्य प्रदेश में महिला स्वास्थ्य
मध्य प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में सुधार लाना एक चुनौती है. यह चुनौती संसधानों की कमी के कारण नहीं पैदा हुई बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं के निचले ढांचे में सुधार का अभाव और विभिन्न योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाने के कारण है। यह साफ नजर आ रहा है कि जमीनी स्तर पर महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विकल्पों पर विचार नहीं किया जा रहा है। यद्यपि पिछले दशकों की तुलना में मातृत्व मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है पर इसके बावजूद प्रदेश में अभी भी प्रति वर्ष 7700 मातृत्व मृत्यु हो रही है।
सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत भी महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत यह निहित है कि वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु को तीन चौथाई कम करना है। यदि सरकारी आंकड़ों को ही देखें, तो म.प्र. का आर्थिक सर्वेक्षण 2006-07 के अनुसार 10 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु का औसत 498 प्रति लाख था, जो कि वर्तमान में 379 प्रति लाख के स्तर पर आ गया है। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य नीति के अनुसार वर्ष 2011 तक मातृत्व मृत्यु दर को 220 प्रति लाख के स्तर तक लाना है। यह लक्ष्य 1997 के 498 प्रति लाख मातृत्व मृत्यु दर के आधार पर रखा गया था। मीडियम टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी- 2006 में 2005 की स्थिति में मातृत्व मृत्यु दर 400 प्रति लाख माना गया है।
यदि हाल ही में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें (यद्यपि मध्यप्रदेश सरकार इन आंकड़ों को नहीं मानती और इसे लेकर राज्य सरकार ने केन्द्र के समक्ष आपति भी दर्ज करा दी है) तो कई तथ्य सामने आते हैं। इस सर्वेक्षण में आए परिणामों में यह पाया गया है कि मध्यप्रदेश में अपने पिछले प्रसव के दरम्यान प्रसव पूर्व तीन आवश्यक जांच कराने वाली माताओं की संख्या 42.2 प्रतिशत है, किसी डॉक्टर, नर्स, ए.एन.एम., एल.एच.डब्ल्यु या प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की निगरानी में प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 37.1 प्रतिशत है, संस्थागत प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 29.7 प्रतिशत है, प्रसव के दो दिनों के अंदर प्रसव बाद की स्वास्थ्य निगरानी पाने वाली माताओं की संख्या 27.9 प्रतिशत है, सामान्य से कम बी.एम.आई. वाली महिलाओं की संख्या 40.1 प्रतिशत है, 15-49 वर्ष की एनिमिया ग्रस्त विवाहित महिलाओं की संख्या 57.6 प्रतिशत है और एनिमिया ग्रस्त 15-49 वर्ष की गर्भवती महिलाओं की संख्या 57.9 प्रतिशत है।
सारा मामला इन्हीं आंकड़ों की विष्वसनीयता पर आकर टिक गया है। रकार बार-बार इन आंकड़ों को कठघरे में खड़ा कर यह दर्शाने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। यह सही है कि जितनी योजनाएं चल रही है, उसका बेहतर क्रियान्वयन हो तो निश्चय ही गुणात्मक सुधार देखने को मिलेगा पर स्वास्थ्य विभाग का निचला ढांचा इतना कमजोर हो गया है कि इस दावे पर विश्वास करना संभव नहीं है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। सरकार स्वयं इस बात को स्वीकार कर रही है कि प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी है, खासतौर से महिला डॉक्टरों की तब महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य कैसे मिल रहा है? पिछले विधान सभा सत्र में महिला डॉक्टरों की कमी को लेकर बहुत कम समय के लिए, पर गंभीर चर्चा हुई थी, जिसमें यह कहा गया कि आयुष की महिला डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर उन्हें ग्रामीण अंचलों में पदस्थ कर महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएगी पर अभी तक इस पर क्या हुआ, की जानकारी किसी को नहीं है।
प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, बल्कि इस पर अमल करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी के विधायक डॉ. सुनीलम् प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। जन स्वास्थ्य के मुद्दे पर कार्यरत डॉक्टर एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का भी स्पष्ट रूप से यह कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपना, दोनों विरोधाभाशी काम है। जन स्वास्थ्य अभियान के डॉ. अजय खरे का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की प्रक्रिया को उल्टी दिशा में ले जाने वाला कदम है. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने से तमाम सरकारी दावों के बावजूद महिला एवं बाल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, तब न मातृ मृत्यु में कमी लाई जा सकती है और न ही बाल मृत्यु में। यह प्रदेश के लिए दुखद बात है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया। इस स्थिति को सुधारने के बजाय इसे निजी हाथों में देने की तैयारी का अर्थ आम लोगों से स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार को छिनने की साजिश ही हो सकती है। डॉ. खरे का कहना है कि अभी भी जिन समुदायों एवं इलाकों में महिला एवं बाल मृत्यु ज्यादा है, उन इलाकों से स्वास्थ्य केन्द्रों तक आना लोगों के लिए खर्चीला काम है, इस पर भी यदि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी कर दिया गया, तो लोग स्वास्थ्य केन्द्रों में जाने के बजाय नीम-हाकिम एवं बाबाओं की शरण में ही जाएंगे। उसके बाद स्वास्थ्य की स्थिति सुधरेगी या फिर बिगड़ेगी, आसानी से समझा जा सकता है।
यदि इन तथ्यों को देखा जाये, तो पता चलता है कि प्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए नीतिगत प्रयासों की ज्यादा जरूरत है। वर्तमान में सरकार मातृत्व स्वास्थ्य के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है, जिसमें - जननी सुरक्षा योजना, गर्भवती महिला हेतु सुविधा, संस्थागत प्रसव योजना, प्रसव हेतु परिवहन एवं उपचार योजना प्रमुख हैं। पर सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पा रहा है या नहीं¬सिर्फ यही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन का रवैया, गरीबी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव आदि कई कारण हैं, जो माहिला स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में चुनौती हैं।
राजू कुमार
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