शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

बलराज सिंह एडवोकेट

“संतुलन” की गलत व्याख्या के जरिए विरोध के अधिकार को खोखला किया जा रहा है..

संविधान शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को कोई सरकारी कृपा या एहसान नहीं मानता। अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने के अधिकार को लोकतांत्रिक जवाबदेही के प्राथमिक साधनों के रूप में संरक्षण देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार इसकी पुष्टि कर चुका है।

इसके बावजूद, तथाकथित “संतुलन” के नाम पर की जाने वाली व्याख्याओं और कार्यपालिका की लगातार अपनाई जा रही कार्यप्रणाली ने इस अधिकार को ऐसी अनुमति में बदल दिया है, जिसका प्रयोग केवल उन्हीं समयों और स्थानों पर किया जा सकता है, जिन्हें उन्हीं अधिकारियों द्वारा चुना जाता है, जिनकी नीतियों के विरुद्ध नागरिक विरोध करना चाहते हैं।

इसकी मूल समस्या यह है कि एक असाधारण शक्ति को सामान्य नियंत्रण के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि उसे अब भी केवल नियमन कहा जा रहा है।

न्यायालय पहले ही अपनी सीमा निर्धारित कर चुका है

Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम भारत संघ (2018) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अपनी शिकायतों और मांगों को सामने रखने के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना एक मौलिक अधिकार है। न्यायालय ने जंतर-मंतर को प्रभावी रूप से बंद करने तथा दिल्ली के केंद्रीय क्षेत्रों में लगभग समान प्रकृति के बार-बार जारी किए जाने वाले दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के आदेशों को स्वीकार नहीं किया।

समस्या विरोध-प्रदर्शन के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके नियमन की विफलता में थी। न्यायालय ने ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया, जिनसे नियमन के साथ-साथ शांतिपूर्ण सभाएं भी जारी रह सकें। अनुमति की अनिवार्यता को प्रदर्शनों को पूरी तरह अस्वीकार करने का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

रामलीला मैदान मामला (2012) यह स्पष्ट करता है कि धारा 144 के अंतर्गत कोई आदेश वास्तविक और गंभीर सार्वजनिक व्यवस्था संबंधी खतरे पर आधारित होना चाहिए। इस शक्ति का प्रयोग सावधानीपूर्वक और मनमानेपन से मुक्त होकर किया जाना चाहिए। पर्याप्त सामग्री के बिना सो रही भीड़ को आसन्न खतरा मान लेना उचित नहीं था।

अनुराधा भसीन मामला (2020) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे प्रतिबंध आनुपातिक, अस्थायी और प्रकाशित होने चाहिए तथा वैध असहमति को दबाने के लिए यांत्रिक ढंग से बार-बार समान आदेश जारी नहीं किए जाने चाहिए।

अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (शाहीन बाग मामला, 2020) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह पुष्टि की कि प्रदर्शन सामान्यतः निर्धारित स्थानों पर होने चाहिए और सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चितकाल तक कब्जा नहीं किया जा सकता।

लेकिन इस निर्णय ने न तो यह अधिकार दिया कि स्थापित केंद्रीय प्रदर्शन स्थलों को दूर-दराज के स्थानों में बदल दिया जाए, जहां जनता और सत्ता के प्रमुख केंद्रों तक प्रदर्शन की पहुंच तथा दृश्यता कम हो जाए, और न ही इसने नियमित रूप से अग्रिम निषेधाज्ञाएं जारी करने को उचित ठहराया।

इन निर्णयों से सिद्धांत स्पष्ट है: यदि नागरिक केवल उन्हीं स्थानों और समयों पर एकत्र हो सकते हैं, जो कार्यपालिका को सुविधाजनक लगते हैं, और यदि पूर्व अनुमति को अस्पष्ट आधारों पर अस्वीकार किया जा सकता है, तो विरोध का मौलिक अधिकार पहले ही खोखला किया जा चुका है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 अब भी एक असाधारण शक्ति है

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163, जो पहले दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 144 थी, तात्कालिक खतरे या उपद्रव की आशंका वाले आपात मामलों के लिए बनाई गई शक्ति है। यह कोई सामान्य अनुमति-प्रणाली नहीं है।

बार-बार नए आदेश जारी करके स्थायी प्रतिबंध जैसी स्थिति पैदा करना, पूर्व अनुमति की ऐसी व्यवस्था लागू करना जो व्यवहार में पूर्ण प्रतिबंध बन जाए, और प्रदर्शनों को दूर-दराज के मैदानों में स्थानांतरित करना—ये सभी इस असाधारण शक्ति को सामान्य प्रशासनिक नियंत्रण में बदल देते हैं।

कानून की अस्थायी और असाधारण प्रकृति इसकी अनुमति नहीं देती।

अस्पष्टता तब पैदा होती है, जब लगातार जारी किए गए अल्पकालिक आदेशों को इस प्रकार स्वीकार कर लिया जाता है, मानो वे स्थायी प्रतिबंध लगाने के बराबर हों। यही समस्या तब भी सामने आती है, जब “निर्धारित प्रदर्शन स्थल” का हवाला देकर नागरिकों को ऐसे दूरस्थ स्थानों पर भेज दिया जाता है, जहां उनकी आवाज जनता और संबंधित सत्ता-केंद्रों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाती।

पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों के कर्तव्य

पुलिस और कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को असीमित विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है।

धारा 163 के अंतर्गत प्रत्येक आदेश के पीछे ऐसे ठोस तथ्य और सामग्री होनी चाहिए, जो तात्कालिकता को दर्शाएं। मजिस्ट्रेट को न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए यह संतुष्ट होना चाहिए कि तत्काल रोकथाम आवश्यक है। केवल सामान्य असुविधा या प्रदर्शनकारियों के संदेश से असहमति प्रतिबंध लगाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।

आदेश लिखित होना चाहिए, उसमें संबंधित तथ्यों का उल्लेख होना चाहिए और उसे विधिवत प्रकाशित किया जाना चाहिए।

प्रतिबंध लगाने के लिए सबसे कम कठोर और अधिकारों पर सबसे कम प्रभाव डालने वाले उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, भीड़ की संख्या निर्धारित करना, निश्चित समय तय करना, मार्ग निर्धारित करना अथवा यातायात का प्रबंधन करना—ये उपाय सामान्यतः पूर्ण प्रतिबंध लगाने से बेहतर हो सकते हैं।

कानून लागू करते समय स्पष्ट सूचना देना, लोगों को शांतिपूर्वक तितर-बितर होने का उचित अवसर प्रदान करना और केवल आवश्यकता पड़ने पर चरणबद्ध तरीके से बल का प्रयोग करना अनिवार्य है।

रामलीला मैदान के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने सो रही भीड़ के विरुद्ध आधी रात को की गई कार्रवाई की आलोचना की थी, क्योंकि उसमें पर्याप्त घोषणा नहीं की गई थी और बल का प्रयोग अनुपातहीन था।

प्रशासन का दायित्व केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि जहां नियमन संभव हो, वहां उन्हें सुगम बनाना भी है।

प्रदर्शनकारियों को ऐसे दूरस्थ स्थानों पर भेजना, जहां पहुंचना कठिन हो और जहां उनकी आवाज की सार्वजनिक पहुंच कम हो जाए, विरोध के अधिकार के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है—भले ही उन स्थानों को औपचारिक रूप से प्रदर्शन स्थल घोषित कर दिया गया हो।

वर्तमान स्थिति और सर्वोच्च न्यायालय का मौजूदा रुख

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में अधिसूचित व्यवस्था से बाहर कर दिया और वहां अनुमत सभाओं को अधिक दूर स्थित मैदानों की ओर स्थानांतरित कर दिया। जबकि 2018 के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने जंतर-मंतर को पूरी तरह बंद करने के बजाय वहां नियमन के साथ प्रदर्शन जारी रखने की व्यवस्था पर जोर दिया था।

संसद के निकट होना और जनता का ध्यान आकर्षित कर पाना किसी प्रदर्शन की प्रभावशीलता का अभिन्न हिस्सा है। यह कोई मामूली प्रशासनिक विषय नहीं है।

इसी अवधि के आसपास, नई दिल्ली में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) से संबंधित प्रदर्शनों से पहले पांच या उससे अधिक लोगों के एकत्र होने पर रोक लगाने वाले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के आदेश भी जारी किए गए।

सर्वोच्च न्यायालय के मौजूदा रुख से एक अस्पष्टता तो दूर होती है, लेकिन दूसरी अब भी बनी हुई है।

न्यायालय ने धारा 163 की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार करने से इनकार किया और 1961 के बाबूलाल पराते मामले का सहारा लिया, जिसमें तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता के संबंधित प्रावधान को वैध ठहराया गया था।

इसके साथ ही, न्यायालय ने विशिष्ट आदेशों और संबंधित कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर नोटिस जारी किया, वैध निषेधाज्ञाओं के दायरे से बाहर शांतिपूर्ण व्यक्तियों की अवैध हिरासत न होने देने का निर्देश दिया, साक्ष्यों को सुरक्षित रखने को कहा और संबंधित आदेशों को प्रस्तुत करने की मांग की।

इसका अर्थ है कि विशिष्ट प्रतिबंधात्मक आदेशों और प्रदर्शन स्थलों से संबंधित प्रशासनिक निर्णयों की न्यायिक समीक्षा का रास्ता अब भी खुला है।

लेकिन मूल प्रश्न अब भी अनुत्तरित है: क्या मामले-दर-मामले की जाने वाली यह न्यायिक समीक्षा इतनी प्रभावी और निरंतर होगी कि किसी असाधारण शक्ति के नियमित दुरुपयोग को रोका जा सके?

अनुच्छेद 19 को व्यवहार में खोखला करना

शारीरिक रूप से उपस्थित होकर, सार्वजनिक रूप से और सामूहिक रूप से एकत्र होना अभिव्यक्ति का एक विशिष्ट रूप है।

जब नागरिकों को व्यवस्थित रूप से दूरस्थ स्थानों तक सीमित कर दिया जाता है, जब पूर्व अनुमति को ऐसी व्यवस्था बना दिया जाता है जिसे मनमाने आधारों पर अस्वीकार किया जा सकता है, और जब कमजोर आधारों पर निवारक आदेश जारी करके विरोध को घेर लिया जाता है, तब अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के अधिकारों का वास्तविक प्रभाव लगातार कम होता जाता है।

“संतुलन” की भाषा व्यवहार में एकतरफा परिणाम पैदा करती है: संगठित होकर केंद्रीय स्थानों पर विरोध करना कठिन बना दिया जाता है।

कानून के आवश्यक मानक पहले से मौजूद हैं—तात्कालिकता दर्शाने वाले ठोस तथ्य, न्यूनतम प्रतिबंधात्मक उपाय, प्रक्रियात्मक संयम, आदेशों का प्रकाशन और जहां नियमन संभव हो, वहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन को सुगम बनाना।

किसी आपातकालीन शक्ति का सामान्य नियंत्रण के रूप में इस्तेमाल कानून के प्रति निष्ठापूर्ण अनुपालन नहीं है। यह मौलिक अधिकार के दायरे को असंवैधानिक रूप से संकुचित करना है।

संविधान उचित नियमन की अनुमति देता है। लेकिन वह लगातार नए आदेश जारी करके और प्रदर्शन स्थलों से संबंधित ऐसे निर्णयों के माध्यम से, जिन्हें पहले के न्यायिक निर्णय पहले ही अस्वीकार कर चुके हैं, किसी असाधारण शक्ति को स्थायी बाधा में बदलने की अनुमति नहीं देता।

एक संवैधानिक कानून के विद्यार्थी के रूप में मेरा मानना है

एक संवैधानिक कानून के विद्यार्थी के रूप में मेरा मानना है कि शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 (पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144) के बीच संबंध की नए सिरे से और प्रामाणिक व्याख्या करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार किया जाना आवश्यक है।

इस विषय से संबंधित न्यायशास्त्र का विकास केवल नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण के आधार पर होना चाहिए, जिसकी नींव संवैधानिक एवं लोकतांत्रिक सिद्धांतों और नैतिक मूल्यों में निहित हो।

केवल ऐसा दृष्टिकोण ही सुनिश्चित कर सकता है कि इस शक्ति का असाधारण स्वरूप सुरक्षित रहे, शांतिपूर्ण सभा के माध्यम से अपनी बात रखने के अधिकार का महत्व संरक्षित हो और अनुच्छेद 19(1)(a) तथा 19(1)(b) के अंतर्गत प्राप्त मौलिक अधिकार को ऐसी अनुमति तक सीमित न कर दिया जाए, जिसे कार्यपालिका अपनी सुविधा के अनुसार दे भी सकती है और रोक भी सकती है।

Balraj Singh