मंगलवार, 16 जून 2015

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल


   
लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। 'आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं', उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं ? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है ?
मोदी,आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं,जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है। उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं। लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय.समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार.विनिमय करते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को 'हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला' कहा जाता था। उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के क्रिया.प्रतिक्रिया, के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था। दंगों के बाद पीडि़तों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' बताया था।
दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की। दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई। अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए। अहमदाबाद का मुस्लिम.बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है। जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला। उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वालेए सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। धीरे.धीरे मोदी ने अपनी भाषा और अपने शब्दों को 'स्वीकार्य' स्वरुप देना शुरू किया। वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे 'मोदित्व' कहा जाने लगा। 
सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे। उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे 'पिंक रेवोल्यूशन' बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकारए बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है। यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को . जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे . अपना बोरिया.बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था। भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये। सन्  2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था। उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का 'बदला' लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
आरएसएस ने पिछले ;2014 चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें। सत्ता में आने के बादए परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी। आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग.अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई। चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे। दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे। उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई।
हाल ;जून 2015 में दिल्ली के पास अटाली में व्यापक हिंसा हुई जहां एक अधबनी मस्जिद को गिरा दिया गया और सैकड़ों मुसलमानों को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी। इस तरह की घटनाएं देश में जगह.जगह हो रही हैं और इनसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मजबूत हो रहा है। गैर.हिन्दुओं पर'हरामजादे' का लेबिल चस्पा करने वाली मंत्री महोदया अपने पद पर बनीं हुई हैं और निहायत घटिया नस्लीय टिप्पणी करने वाले भी सत्ता के गलियारों में काबिज हैं। हिन्दुत्व के प्रतीक सावरकर और गोड़से का महिमामंडन किया जा रहा है और बहुवाद के पैरोकार नेहरू की या तो निंदा की जा रही है या उनके महत्व को कम करके बताया जा रहा है। गांधीजी को 'सफाईकर्मी' बना दिया गया है और हिन्दू.मुस्लिम एकता के उनके मूल संदेश को दरकिनार कर दिया गया है। केन्द्र सरकार के संस्थानों में ऐसे लोगों को चुन.चुनकर पदस्थ किया जा रहा है जो पौराणिकता और इतिहास में कोई भेद नहीं करते और जातिप्रथा को उचित ठहराते हैं। इनमें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के नए अध्यक्ष प्रोफेसर सुदर्शन राव शामिल हैं। आरएसएस से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाएं सरकार को यह बता रही हैं कि शिक्षा नीति क्या होनी चाहिए और स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देने की कोशिश हो रही है।
मुस्लिम समुदाय की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं? उन्हें प्रधानमंत्री से असल में क्या कहना चाहिए? उन्हें सबसे पहले ऐसी नीतियों की जरूरत है जिससे उनमें सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो। पिछले तीन दशकों में हुई व्यापक और क्रूर हिंसा ने इस समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है। हिंसा के अलावा, मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया गया और सामूहिक सामाजिक सोच को इस तरह से तोड़ा.मरोड़ा गया जिससे विघटनकारी विचारधारा को बढ़ावा मिले और मुसलमानों पर निशाना साधा जा सके। और यह सब करने के बादए पीडि़त समुदाय को ही हिंसा का जनक और कारण बताया जाता रहा है! अल्पसंख्यकों के खिलाफ तरह.तरह के दुष्प्रचार हुए और इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हुआ। जब तक मुसलमानों के खिलाफ समाज में व्याप्त गलत धारणाएं दूर नहीं की जाएंगी तब तक साम्प्रदायिक हिंसा पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।
इस तरहए पूरी व्यवस्था का ढांचागत हिन्दुत्वीकरण किया जा रहा है और बहुवाद, जो कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केन्द्रीय तत्व था, की कीमत पर सावरकर.गोलवलकर की विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है।
मुसलमानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है आर्थिक दृष्टि से उनका हाशिए पर पटक दिया जाना। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि एक मुस्लिम युवक जीशान अली खान को खुल्लमखुल्ला यह कह दिया गया कि उसके धर्म के कारण उसे नौकरी नहीं दी जा सकती और एक मुस्लिम लड़की मिशाब कादरी को उसका घर खाली करने के लिए कहा गया क्योकि वह एक धर्म विशेष में आस्था रखती थी। 'सबका साथ सबका विकास' केवल नारा रह गया है और जैसा कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह ने किसी और संदर्भ में कहा था, वह केवल एक जुमला था। किसी भी विविधतापूर्ण समाज में वंचित समुदायों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठानाए समाज और राज्य की जिम्मेदारी है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भिजवाई गई धनराशि को लौटा दिया था। सच्चर समिति की सिफारिशों की तो अब कोई चर्चा ही नहीं करता। जाहिर है कि 'सबका विकास' इस सरकार के लक्ष्यों में कतई शामिल नहीं है।
मुसलमानों का एक तबका यह तर्क दे रहा है कि मोदी का 'हृदय परिवर्तन' हो गया है और अब वे अपनी पार्टी के सांप्रदायिक तत्वों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आरएसएस की बात सुनना उनने कम कर दिया है। यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जा रहा है और इसे फैलाने वालों में ज़फर सरेसवाला और एसएम मुश्रिफ जैसे लोग शामिल हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब संघ परिवार का कोई न कोई नेता राममंदिर के निर्माण की मांग या धार्मिक अल्पसंख्यकों का अपमान न करे। और यह सब बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। घरवापसी और लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता की आग को सुलगाए रखने की कोशिश हो रही है। जो लोग'हृदय परिवर्तन' की बात कर रहे हैं वे यह नहीं जानते कि आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक, विचारधारा की दृष्टि से कितने कट्टर होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कहा था कि वे आरएसएस के स्वयंसेवक पहले हैं और प्रधानमंत्री बाद में।
कुछ आरएसएस समर्थक मुस्लिम नेता, मोदी के साथ जाना चाहते हैं और मोदी ने उन्हें वायदा किया है कि वे उनके लिए आधी रात को भी उपलब्ध रहेंगे। इन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एहसान जाफरी के साथ क्या हुआ था। वे मोदी से सहायता की भीख मांगते रहे परंतु मोदी शायद बहरे हो गए थे। जाफरी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी जहां थे, जाफरी उससे थोड़ी ही दूरी पर थे और उस समय आधी रात नहीं हुई थी।
समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी यह चाहिए कि वह जागे, आत्मचिंतन करे और बहुवाद व प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करे। मुस्लिम समुदाय को प्रजातांत्रिक ढंग से आंदोलन चलाने होंगे ताकि समुदाय के सदस्यों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। मूलाधिकारों के उल्लंघन का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। इस मामले में वे अंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं जिन्होंने प्रजातांत्रिक रास्ते पर चलकर दलितों की बेहतरी के लिए काम किया। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वो गांधी और मौलाना आजाद की राह पर चले, जो विविधता का अपनी दिल की गहराई से सम्मान करते थे न कि केवल दिखावे के लिए। मुसलमानों के लिए बिछाए जा रहे जाल में उन्हें नहीं फंसना चाहिए। खोखले शब्दों की जगह उन्हें संबंधित व्यक्तियों के कार्यों और उसकी विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए।
-राम पुनियानी

बुधवार, 10 जून 2015

राष्ट्रीय विभूतियों पर कब्जा जमाने की संघी कवायद

Posted: 06 Jun 2015 08:23 PM PDT
पिछले कुछ वर्षों से, राजनैतिक और सामाजिक स्तरों पर कुछ राष्ट्रीय विभूतियों का महिमामंडन करने और कुछ का कद घटाने के सघन प्रयास हुए हैं। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के पिछले शासनकाल ;1998.2004 में संसद परिसर में सावरकर के तैलचित्र का अनावरण किया गया था।
कुछ विभूतियों की भूमिका को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करने और कुछ की छवि बिगाड़ने के खेल में आरएसएस पुराना उस्ताद है,यद्यपि अन्य राजनैतिक समूह भी ऐसा करते रहे हैं। संघ की मशीनरी, कुछ नेताओं का महिमामंडन, कुछ को नजरअंदाज करने और कुछ को बदनाम करने का काम दशकों से करती आई है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संघ परिवार के कई सदस्य महात्मा गाँधी के हत्यारे गोडसे की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। एक भाजपा सांसद ने गोडसे को देशभक्त बताया तो दूसरे ने फरमाया कि गोडसे ने गलत व्यक्ति को निशाना बनाया था। उसे नेहरु की हत्या करनी चाहिए थी। कई लोगों ने माँग की है कि अलग.अलग स्थानों पर गोडसे की मूर्तियाँ स्थापित करने के लिए जमीन आवंटित की जाए।
सरदार पटेल को नेहरु के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अपने एक भाषण में मोदी ने कहा कि नेहरु की जगह पटेल को देश का पहला प्रधानमंत्री होना चाहिए था। नेहरु को कलंकित करने का मानों अभियान.सा छेड़ दिया गया है। हाल में, नेहरु को संकुचित मनोवृत्ति वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए मोदी ने एक ऐसी बात कही जो कि सच नहीं है। उन्होंने कहा कि नेहरु, सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में नहीं गए थे। तथ्य यह है कि नेहरू ने पटेल के अंतिम संस्कार, जो कि मुंबई में हुआ था, में भाग लिया था। जहाँ तक गांधीजी का सवाल है, उन्हें केवल साफ.सफाई के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। महात्मा गाँधी का कद इतना ऊंचा है कि उनके समावेशी राष्ट्रवाद में विश्वास न करने वाले भी उन्हें श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया में बापू श्रद्धा के पात्र हैं। अब चूँकि गांधीजी के कद को कम करना संघ परिवार के बस की बात नहीं है इसलिए उनके हिन्दू.मुस्लिम एकता के सन्देश को दरकिनार कर,राष्ट्रीय एकता की उनकी सीख को भुलाकर, उन्हें केवल स्वच्छता अभियान का शुभंकर बना दिया गया है।
अब संघ परिवार अम्बेडकर पर कब्जा करने की जुगत में है। यह कहा जा रहा है कि अम्बेडकर और आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार की आस्था एक.से मूल्यों में थी। उदाहरण के लिएए दोनों अस्पृश्यता के खिलाफ थे। आरएसएस के अंग्रेजी और हिंदी मुखपत्र क्रमश: 'आर्गनाइजर' व 'पाञ्चजन्य' ने अंबेडकर पर केंद्रित विशेष परिशिष्ट निकाले, जिनमें उनकी शिक्षाओं को इस तरह से तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि आरएसएस की हिंदुत्व की विचारधारा और अंबेडकर के मूल्यों में अनेक समानताएं हैं। अंबेडकर ने सामाजिक न्याय और प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान तो दिया ही था, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी जाति के उन्मूलन के लिए उनका संघर्ष। यहां यह याद रखना समीचीन होगा कि जहां अंबेडकर जाति के उन्मूलन की बात कहते थेए वहीं संघ ने 'सामाजिक समरसता मंच' की स्थापना की है, जो विभिन्न जातियों के बीच 'समरसता' के लिए काम करता है। यह संस्था जाति की अवधारणा को चुनौती नहीं देती और ना ही जाति के उन्मूलन की बात करती हैए जो कि अंबेडकर के प्रिय लक्ष्य थे।
संघ परिवार जो कवायद कर रहा है, उसके दो स्पष्ट उद्देश्य हैं। चूंकि आरएसएस ने कभी देश की स्वाधीनता की लड़ाई में हिस्सेदारी नहीं की इसलिए उसके पास खुद का कोई स्वाधीनता संग्राम सेनानी है ही नहीं। यही कारण है कि उसे सावरकर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने के मिथक को गढ़ना पड़ा। सावरकर ने अपने जीवन के शुरूआती दौर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ काम किया था परंतु अंडमान के सेल्युलर जेल में कुछ दिन सजा काटने के बाद वे ब्रिटिश.विरोधी क्रांतिकारी की जगह अंग्रेज सरकार के समर्थक बन गए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार से लिखित माफी मांगी और फिर कभी किसी ब्रिटिश.विरोधी आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। आरएसएस का सावरकर के सिवा ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जिसने अंग्रेजों का तनिक भी विरोध किया हो। वैसे तो सावरकर भी आरएसएस के सदस्य नहीं थे यद्यपि उनका और संघ का उद्देश्य एक ही था.हिंदू राष्ट्र की स्थापना।
संघ परिवार के कई सदस्य गोडसे के प्रति श्रद्धा रखते हैं और उसे एक महान विभूति मानते हैं। गोडसे ने आरएसएस की शाखाओं में प्रशिक्षण प्राप्त किया और बाद में हिंदू महासभा की पुणे इकाई का सचिव बन गया। चूंकि कई भाजपा नेताओं ने भी खाकी हाफपेंट पहनकर आरएसएस की शाखाओं में भाग लिया है इसलिए वे गोडसे और अपनी हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा में कई समानताएं पाते हैं और गांधीजी के हत्यारे के प्रशंसक हैं। सावरकर और गोडसे के प्रतीकों का उपयोग वे हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए करते हैं। हिंदू राष्ट्रवादए उस भारतीय राष्ट्रवाद से बिलकुल भिन्न है जो कि भारतीय संविधान की बुनियाद है। ऐसा करना उनके लिए इसलिए जरूरी है क्योंकि वे स्वयं को सबसे बड़ा राष्ट्रवादी सिद्ध करना चाहते हैं। यहए इस तथ्य के बावजूद कि उनका राष्ट्रवादए हिंदू राष्ट्रवाद हैए भारतीय राष्ट्रवाद नहीं। वे सावरकर की शुरूआती ब्रिटिश.विरोधी गतिविधियों को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना चाहते हैं जबकि सच यह है कि सावरकर ने अपनी जेल यात्रा के बाद से स्वाधीनता संग्राम से दूरियां बना लीं थीं और आरएसएस का तो स्वाधीनता आंदोलन से कोई लेनादेना ही नहीं था।
इसके साथ.साथए संघ परिवार पटेल और नेहरू को एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। उद्देश्य है नेहरू के कद को छोटा करना। पटेल और नेहरू एक.दूसरे के निकट सहयोगी थेय दोनों महात्मा गांधी के अनुयायी थे और दोनों ने मिलजुल कर राष्ट्रीय आंदोलन में हिस्सेदारी की और बाद में स्वाधीन भारत के पहले मंत्रिमंडल में एक साथ काम किया। दरअसलए आरएसएसए नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनकी असंदिग्ध प्रतिबद्धता और फिरकापरस्ती से किसी स्थिति में समझौता न करने की उनकी नीति को कभी पचा नहीं सका। वे पटेल को नेहरू का विरोधी सिद्ध करना चाहते हैं जबकि सच यह है कि पटेल भी पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष नेता थे।
आरएसएस अपने कुछ नेताओं की छवि को चमकाना भी चाहता है। संघ के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर,संघ कार्यकर्ताओं की कई पीढि़यों के प्रेरणास्त्रोत रहे हैं। उनकी पुस्तक 'व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफांइड' ने हजारों संघ कार्यकर्ताओं की सोच को आकार दिया है। गोलवलकर,हिटलर की कार्यप्रणाली को उचित मानते थे और हिटलर ने जिस तरह के राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया था, उसके प्रशसंक थे। उनकी यह पुस्तक लंबे समय तक आरएसएस कार्यकर्ताओं की बाईबल थी। इस पुस्तक का एक उद्धरण, संघ की विचारधारा का संक्षिप्त और सटीक विवरण प्रस्तुत करता हैः 'जर्मनी का राष्ट्रीय गौरव चर्चा का विषय है। अपनी नस्ल तथा संस्कृति की शुद्धता की रक्षा करने के लिएए देश की यहूदी नस्ल काए यहूदियों का सफाया करके जर्मनी ने सारी दुनिया को स्तंभित कर दिया था। यहाँ नस्लीय गौरव के चरमोत्कर्ष की अभिव्यक्ति हुई है। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया है कि बुनियादी भिन्नताओं वाली नस्लों तथा संस्कृतियों का एक एकीकृत समग्रता में घुलमिल पाना लगभग असंभव ही है। यह हम हिन्दुस्तान के लोगों के लिए एक अच्छा सबक है कि इससे सीखें और लाभ उठाएँ' ;व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड, पृष्ठ 27, नागपुर, 1938। लगभग एक दशक पहले, आरएसएस को चुनावी.राजनैतिक मजबूरियों के चलते इस पुस्तक से शर्मिंदगी महसूस होने लगी और संघ की ओर से यह कहा जाने लगा कि यह पुस्तक गोलवलकर ने लिखी ही नहीं थी! इस पुस्तक की प्रतियां बाजार से गायब हो गईं। परंतु यहां हमें यह स्मरण रखना होगा कि संघ ने ऐसा केवल चुनावी गणित के कारण किया न कि किसी विचारधारात्मक परिवर्तन के कारण।
अब संघ दीनदयाल उपाध्याय को अपने सर्वोच्च चिंतक के रूप में प्रचारित कर रहा है। दीनदयाल उपाध्याय ने 'एकात्म मानवतावाद' की अवधारणा को गढ़ा। इस विचारधारा का मूल भाव यह है कि सामाजिक रिश्तों' विशेषकर जाति' के मामले में यथास्थिति बनाए रखी जाए। एकात्म मानवतावाद पर जोर, आरएसएस की राजनीति के असली और गहरे एजेण्डे की ओर संकेत करता है। संघ, राष्ट्रीय विभूतियों में से कुछ का महिमामंडन करके और कुछ को बदनाम कर हिंदुत्ववादी राजनीति का प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। यह राजनीति ऊपरी तौर पर तो एक धर्म पर आधारित है परंतु असल में यह हिंदू श्रेष्ठी वर्ग का राजनीतिक एजेंडा लागू करने की कोशिश है। और इस एजेण्डे को पूरा करने के लिए यदि समाज के निम्न तबकों में से कुछ को साथ मिलाना भी पड़े तो आरएसएस को इससे परहेज नहीं है। आश्चर्य नहीं कि आरएसएस एक ऐसी संस्कृति का वाहक है जो सांप्रदायिक और प्रतिगामी है। यही हिंदू राष्ट्रवाद का एजेण्डा भी है।
-राम पुनियानी
 

मोदी सरकार की पहली वर्षगांठ-भाग.2

Posted: 08 Jun 2015 05:56 AM PDT



पिछले अंक से जारी
न्यायपालिका से टकराव: प्रजातांत्रिक संस्थाओं की अवहेलना
मोदी सरकार ने अगस्त 11ए 2014 को लोकसभा में 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग विधेयक 2014' व 'संविधान ;121वां संशोधन: विधेयक 2014' प्रस्तुत किए। इन दोनों विधेयकों को राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्तियां आयोग ;एनजेएसी: के गठन के लिए लाया गया था। एनजेएसी अधिनियम में उस प्रक्रिया का वर्णन किया गया है, जो कि एनजेएसी भारत के मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों व उच्च न्यायालय के अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनाएगा। अगर न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलिजियम व्यवस्था में कमियां थीं तो एनजेएसी एक ऐसी दवा हैए जो मर्ज को और बिगाड़ेगी। इस आयोग के अध्यक्ष होंगे भारत के मुख्य न्यायाधीश। इसके सदस्यों में केन्द्रीय विधि मंत्री, उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश व दो प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होंगे। प्रतिष्ठित विधिवेत्ताओं का नामांकनए प्रधानमंत्री,विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की सदस्यता वाली त्रिसदस्यीय समिति करेगी।
इस समय देश की विभिन्न अदालतों में व विशेषकर उच्च व उच्चतम न्यायालयों में जितने भी मुकदमे चल रहे हैं, उनमें से अधिकांश में भारत सरकार एक पक्षकार है। न्यायिक नियुक्तियां आयोग में केंद्रीय कानून व न्याय मंत्री.जो कि सबसे बड़े पक्षकार के प्रतिनिधि हैं.और भारत के मुख्य न्यायाधीश.जिन्हें उन कई मुकदमों में निर्णय सुनाना है, जिनमें भारत सरकार एक पक्षकार है.एक साथ बैठेंगे। एक बड़ी पुरानी कहावत है कि न्याय न केवल होना चाहिए वरन् होते हुए दिखना भी चाहिए। अगर विधि मंत्री और आयोग के दो में एक विधिवेत्ता सदस्य मिल जाएं तो उनके पास किसी भी प्रस्तावित नियुक्ति को वीटो करने का अधिकार होगा क्योंकि एनजेएसी एक्ट में यह व्यवस्था है कि अगर आयोग के दो या दो से अधिक सदस्य किसी व्यक्ति के नाम पर सहमत न हों तो आयोग उसकी नियुक्ति की सिफारिश नहीं करेगा। जाहिर है कि एनजेएसी अधिनियम का उद्देश्य, केंद्र सरकार के प्रति नर्म रूख रखने वाले या उसकी पसंद के व्यक्तियों की उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियां सुनिश्चित करना है। भारत में लंबित मुकदमों का अंबार है। इन मुकदमों के जल्द से जल्द निपटारे और न्याय व्यवस्था को अधिक सुगम व सरल बनाने के लिए कुछ करने की बजाए,मोदी सरकार अपनी पसंद के जजों की नियुक्ति करने की जुगत भिड़ा रही है। ज्ञातव्य है कि जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तब मोदी और उनके मंत्रिमंडल के अनेक साथियों पर कई मुकदमे चले थे और उनके दो निकटस्थ सहयोगियों.मायाबेन कोडनानी और अमित शाह.को अदालतों ने दोषी करार दिया था।
एनजेएसी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करेगा। कुछ समय पहले प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका का आह्वान किया था कि वो आत्मावलोकन व आत्म.मूल्यांकन के लिए आंतरिक मशीनरी विकसित करे। उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू व अन्य न्यायाधीशों को यह सलाह भी दी थी कि वे इस पर विचार करें कि कहीं 'पांच सितारा कार्यकर्ता' व 'पांच सितारा परिप्रेक्ष्य' तो न्यायपालिका पर हावी नहीं हो रहा है। एक तरह से यह कार्यपालिका के मुखिया द्वारा सार्वजनिक रूप से न्यायपालिका पर आक्षेप था। मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ताओं को'पांच सितारा कार्यकर्ता' कहना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बल्कि आधारहीन भी था। इससे ऐसा प्रतीत होना स्वाभाविक था कि कार्यपालिका, न्यायपालिका से टकराव की ओर बढ़ रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने एनजेएसी की कार्यवाही में भाग लेने से यह कहकर इंकार कर दिया कि उच्चतम न्यायालय,एनजेएसी के गठन को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।
मोदी सरकार ने सूचना का अधिकार अधिनियम ;आरटीआई के अंतर्गत मुख्य सूचना आयुक्त और खाली पड़े चार आयुक्तों के पदों पर नियुक्तियां नहीं की। इस कारण आरटीआई अर्थहीन.सा हो गया। केंद्रीय सूचना आयोग में 2011 में छः आयुक्तों ने 22,351 प्रकरणों का निपटारा किया था वहीं 2014 में सात आयुक्तों ने केवल 16,006 मामले निपटाए।
मोदी सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति भी नहीं की। हिंदू राष्ट्रवादियों की जयजयकार के बीचए 'टीम अन्ना' ने लोकपाल की नियुक्ति के लिए कानून बनाए जाने की मांग को लेकर लंबा आंदोलन किया था। टीम अन्ना का मानना था कि लोकपाल की नियुक्ति से भ्रष्टाचार की समस्या समाप्त हो जाएगी। मोदी सरकार ने चुनाव के पहले जनता से यह वायदा किया था कि वो देश को भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाएगी परंतु उसने तो लोकपाल की नियुक्ति करने तक की ज़हमत नहीं उठाई।
सांस्कृतिक व नैतिक पुलिस 
जहां एक ओर सड़कों और चौराहों पर नैतिकता और संस्कृति के स्वनियुक्त रक्षकों की गतिविधियों में तेजी से वृद्धि हुई वहीं मोदी सरकार ने केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड के अध्यक्ष पद पर पहलाज निहलानी की नियुक्ति कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह समाज पर अनुदारवादी व दकियानूसी परंपराएं लादने की हामी है। निहलानी फिल्म निर्माता हैं परंतु इस क्षेत्र में उनकी कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। हां,उन्होंने मोदी के प्रचार के लिए एक फिल्म जरूर बनाई थी जिसका शीर्षक थाए 'हर हर मोदी, घर घर मोदी'।
फिल्म प्रमाणीकरण अपीलीय अभिकरण ने एक फिल्म 'मेसेंजर ऑफ गॉड' को प्रमाणीकृत कर दिया। इसके पहलेए सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म, जिसमें डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरूमीत राम रहीम सिंह की मुख्य भूमिका है, को पास करने से इंकार कर दिया था। इसके कारण बोर्ड की पूर्व मुखिया लीला सैमसन के लिए उनके पद पर बने रहना कठिन हो गया और उनके साथ बोर्ड के 12 अन्य सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया।
बोर्ड के 12 सदस्यों इरा भास्कर, एमके रैना, पंकज शर्मा, टीजी थियागराजन, शाजी करूण, अंजुम राजाबलि, शुभ्रा गुप्ता, निखिल अल्वा, राजीव मसंद, मनमंग दाई, केसी शेखर बाबू व आईके प्रभु ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर को भेजे एक संयुक्त ईमेल में अपने इस्तीफे की सूचना देते हुए लिखा किए 'लंबे समय से हमारे धैर्य की परीक्षा ली जा रही थी और अंततः, हालिया घटनाक्रम के बाद, अध्यक्षा सुश्री लीला सैमसन ने मजबूर होकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया.हम लोग काफी लंबे समय से कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों की मांग करते आए हैं जो कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणीकरण बोर्ड की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए आवश्यक हैं। परंतु 'कई बार सिफारिशें और अपीलें भेजने,मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों व सचिवों के साथ कई बैठकों के आयोजन और पिछले मंत्री के साथ एक मुलाकात के बाद भी मंत्रालय ने एक भी सकारात्मक कदम नहीं उठाया'।
पहलाज निहलानी के काम करने के तरीके के विरूद्ध सेंसर बोर्ड में विद्रोह हो गया। बोर्ड के एक प्रतिष्ठित सदस्य अशोके पंडित ने निहलानी को एक 'आदिम बादशाह' बताया जो कि बोर्ड को अपना'व्यक्तिगत साम्राज्य'समझता है।  बोर्ड के कई सदस्य पहलाज निहलानी की निर्णय लेने की तानाशाहीपूर्ण प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं और ना ही वे फिल्मों में जबरन कांटछांट करने की उनकी प्रवृत्ति से इत्तेफाक रखते हैं। वे निहलानी द्वारा बनाई गई 'गालियों' की सूची से भी सहमत नहीं हैं,जिसमें हिंदी के 15 और अंग्रेजी के 13 ऐसे शब्द शामिल हैंए जिन्हें निहलानी के अनुसार, किसी फिल्म में नहीं होना चाहिए। फिल्मी दुनिया ने निहलानी पर 'नैतिक पुलिस' बनने का प्रयास करने का आरोप लगाया तो फिल्म निर्माता विशाल भारद्वाज ने कहा कि वे तालिबान की तरह व्यवहार कर रहे हैं।
पांच सितारा कार्यकर्ता
गुजरात के सन् 2002 के दंगों के बाद, प्रधानमंत्री मोदी को कई सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर किए गए ऐसे मुकदमों का सामना करना पड़ा था, जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि उनकी और उनकी सरकार की गुजरात दंगों में भूमिका थी। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने औद्योगिकरण के नाम पर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की जमीनें जबरदस्ती अधिग्रहित किए जाने का विरोध भी किया था। जो लोग विस्थापित किए गएए उनमें मुख्यतः आदिवासी और दलित थे। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने उन लोगों के पक्ष में भी आवाज़ उठाई जिन्होंने गुजरात कत्लेआम के पीडि़तों की न्याय की लड़ाई लड़ी थी। यही कारण है कि मोदी सरकार,मानवाधिकार संगठनों पर निशाना साध रही है। प्रधानमंत्री की 'पांच सितारा कार्यकर्ता' वाली टिप्पणी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। 'विदेशी योगदान नियमन अधिनियम';एफसीआरए के अंतर्गत 'सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस' की तीस्ता सीतलवाड और 'ग्रीनपीस' की प्रिया पिल्लई की जांच की गई। उनको मिलने वाले अनुदान और सहायता के स्त्रोतों की पड़ताल की गई और प्रिया पिल्लई को तो इंग्लैंड जाने से रोक दिया गया। वहां वे इसलिए जा रही थीं ताकि इंग्लैंड में पंजीकृत एस्सार कंपनी द्वारा छत्तीसगढ़ में किए जा रहे भारी पर्यावरणीय नुकसान के बारे में ब्रिटिश सांसदों के समक्ष एक प्रस्तुतिकरण दे सकें। इन कार्यकर्ताओं को इसलिए निशाना बनाया गया ताकि अन्य एनजीओ, हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों की रक्षा से तौबा कर लें और नागरिक समाजए पर्यावरणीय व श्रम कानूनों के उल्लंघनों पर नजर रखना बंद कर दें और बड़े औद्योगिक घराने, देश की प्राकृतिक संपदा को खुलकर लूट सकें और श्रमिकों का शोषण कर अपने खजाने भर सकें।
जहां एक ओर सरकार मानवाधिकारों के रक्षकों को सींखचों के पीछे पहुंचाने के लिए हर तरह की कोशिश करती रही वहीं माया कोडनानी व बाबू बजरंगी जैसे कई दोषसिद्ध अपराधी, मोदी सरकार के पहले साल में जेलों से बाहर आने में कामयाब हो गए। इनमें गुजरात के ऐसे कई पुलिस अधिकारी शामिल हैं जिनपर झूठी मुठभेड़ों में निर्दोष लोगों को मारने के आरोप हैं। डीजी वंझारा, एमके अमीन व अन्य कई पुलिस अधिकारियों को जमानत मिल गई। जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वंझारा ने कहा कि उनके 'अच्छे दिन' आ गए हैं। गुजरात सरकार ने तुलसीराम प्रजापति को फर्जी मुठभेड़ में मार गिराने संबंधी मामले में गुजरात के पूर्व पुलिस महानिदेशक पीसी पांडे पर मुकदमा चलाने की इजाजत नहीं दी।
सरकार की पलटियां
मोदी सरकार को अलग.अलग मुद्दों पर पलटियां खाने के लिए कई लोगों ने कटघटरे में खड़ा किया। कांग्रेस द्वारा प्रकाशित एक पुस्तिका में शुरूआती 180 दिनों के 25 यू.टर्नों की सूची दी गई है। इनमें शामिल हैं सौ दिन के भीतर विदेशों में जमा काला धन वापिस लाना व हर भारतीय के खाते में 15 लाख जमा करना आदि। बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अगर काला धन वापिस आया तो भी उसे हर भारतीय के खाते में जमा नहीं कराया जाएगा और यह भी कि हर भारतीय को 15 लाख रूपये मिलने की बात तो चुनाव प्रचार का एक जुमला थी।
स्वच्छ भारत अभियान से भी बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ। यह अभियान केवल नारेबाजी और प्रतीकात्मकता तक सीमित रह गया। इस अभियान को असफल होना ही था क्योंकि सरकार की इसमें बहुत कम भूमिका थी और मुख्य काम नागरिकों को करना था। साफ.सफाई का उच्च स्तर बनाए रखने के लिए ढ़ेर सारे संसाधनों और उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। चाहे वह जमीन हो, हवा, पानी या मनुष्य का दिमाग.सफाई बनाए रखना एक कठिन और खर्चीला काम है। इस अभियान ने गांधी की तौहीन की। गांधीजी की विराट भूमिका को केवल साफ.सफाई तक सीमित कर दिया गया। सरकार ने क्रिसमस के त्योहार का महत्व घटाने की कोशिश भी की। इसके लिए 25 दिसंबर को सुशासन दिवस मनाया गया।
हमें क्या करना चाहिए
हाशिए पर पड़े वर्गों के कुछ हिस्सेए विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले लोगों का मोदी सरकार से मोहभंग हो रहा है। हम यह नहीं कहते कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार का प्रदर्शन बेहतरीन था। परंतु यह सरकार उससे भी बुरी साबित हुई है।
दलितए आदिवासी, श्रमिक व छोटे व सीमांत कृशकों जैसे वंचित समुदायों के लिए अच्छे दिन केवल सरकार की नीतियों के प्रभाव से उन्हें परिचित करवाने से नहीं आएंगे। इन वर्गों के लोगों को साम्प्रदायिकता की अफीम चटाई जा रही है ताकि वे अपनी समस्याओं के असली स्त्रोत को न पहचान सकें और एक दूसरे वंचित तबके.अल्पसंख्यकों.को अपना शत्रु समझ लें। साम्प्रदायिक राजनीति का मूलमंत्र ही यह है कि समाज के एक वंचित व दमित तबके को दूसरे वंचित व दमित तबके से भिड़ा दिया जाए। दरअसल सबसे राक्षसी कुटिलता वाली शासन प्रणाली वह नहीं होती जिसमें ऊपर बैठे लोग नीचे वालों को नियंत्रित करते हैं बल्कि वह होती है जिसमें ऊपर बैठे लोग सभी को आपस में लड़वाते रहते हैं।
हमें लोगों की भौतिक जिंदगी बेहतर बनाने के लिए तो लड़ना ही हैए हमें अपनी संस्कृति व परंपराओं का आलोचनात्मक परीक्षण भी करना होगा। भारत विविधताओं का देश है और हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है जो विद्यार्थियों को विविधता और बहुवाद का सम्मान करना सिखाए।
----------इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 2 जून 2015

हरयाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिद्रश्य

हरयाणा का सामाजिक सांस्कृतिक परिद्रश्य
रणबीर सिंह दहिया
हरयाणा एक कृषि प्रधान प्रदेश के रूप में जाना जाता है द्यराज्य के समृद्ध और सुरक्षा के माहौल में यहाँ के किसान और मजदूर व  महिला और पुरुष ने अपने खून पसीने की कमाई से नई तकनीकों , नए उपकरणों , नए खाद बीजों व पानी का भरपूर इस्तेमाल करके खेती की पैदावार को एक हद तक बढाया  ,जिसके चलते हरयाणा के एक तबके में सम्पन्नता आई मगर हरयाणवी समाज का बड़ा हिस्सा इसके वांछित फल नहीं प्राप्त कर सका ।
         किसी भी समाज में बराबरी और न्याय की स्थिति का जायजा इस बात से लिया जा सकता है कि उस समाज के वंचित, अभावग्रस्त और कमजोर तबके तक बुनियादी सुविधाओं की पहुंच कितनी हुई है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, सड़क और मकान ऐसी बुनियादी सुविधाएं हैं जो गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। शिक्षा को सामाजिक विकास की धुरी तथा गुणवत्तापूर्ण जीवन के लिए अपरिहार्य माना जाता है। अनुभव बताते हैं कि सरकारें तमाम बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ इन तबकों तक शिक्षा की पहुंच की अनदेखी करती रही हैं। समाज के एक बड़े हिस्से को अभी तक सही मायने में ये सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाई हैं। इस मायने में विकास के दावों और नारों  की जमीनी हकीकत के बीच खाई नजर आती है। यह एक सच्चाई है कि हरयाणा के आर्थिक विकास के मुकाबले में सामाजिक विकास बहुत पिछड़ा रहा है ।  ऐसा क्यों हुआ ?  यह एक गंभीर सवाल है और अलग से एक गंभीर बहस कि मांग करता है । हरयाणा  के सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र पर शुरू से ही इन्ही संपन्न तबकों का गलबा रहा है । यहाँ  के काफी लोग फ़ौज में गए और आज भी हैं मगर उनका हरयाणा में क्या योगदान रहा इस पर ज्यादा ध्यान नहीं गया है ।  इसी प्रकार देश के विभाजन के वक्त जो तबके हरयाणा में आकर बसे उन्होंने हरयाणा कि दरिद्र संस्कृति को कैसे प्रभावित किया य इस पर भी गंभीरता से सोचा जाना शायद बाकी है ।  क्या हरयाणा की संस्कृति महज रोहतकए जींद व सोनीपत जिलों कि संस्कृति है? क्या हरयाणवी डायलैक्ट एक भाषा का रूप ले ले सकता है ? महिला विरोधी, दलित विरोधी तथा प्रगति विरोधी तत्वों को यदि हरयाणवी संस्कृति से बाहर कर दिया जाये तो हरयाणवी संस्कृति में स्वस्थ पक्ष क्या बचता है ? इस पर समीक्षात्मक रुख अपना कर इसे विश्लेषित करने कि आवश्यकता है ।  क्या पिछले दस पन्दरा सालों में और ज्यादा चिंताजनक पहलू हरयाणा के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल में शामिल नहीं हुए हैं ? व्यक्तिगत स्तर पर महिलाओं और पुरुषों ने बहुत सारी सफलताएँ हांसिल की हैं ।  समाज के तौर पर १८५७ की आजादी की पहली जंग में सभी वर्गों , सभी मजहबों व सभी जातियों के महिला पुरुषों का सराहनीय योगदान रहा है ।  इसका असली इतिहास भी कम लोगों तक पहुँच सका है ।
            हमारे हरयाणा के गाँव में पहले भी और कमोबेश आज भी गाँव की संस्कृति , गाँव की परंपरा , गाँव की इज्जत व शान के नाम पर बहुत छल प्रपंच रचे गए हैं और वंचितों,  दलितों व महिलाओं के साथ न्याय कि बजाय बहुत ही अन्याय पूर्ण व्यवहार किये जाते रहे हैं । उदाहरण के लिए हरयाणा के गाँव में एक पुराना तथाकथित भाईचारे व सामूहिकता का हिमायती रिवाज रहा है कि जब भी तालाब (जोहड़) कि खुदाई का काम होता तो पूरा गाँव मिलकर इसको करता था ।  रिवाज यह रहा है कि गाँव की हर देहल से एक आदमी तालाब कि खुदाई के लिए जायेगा ।  पहले हरयाणा के गावों क़ी जीविका पशुओं पर आधारित ज्यादा रही है ।(पेस्टोरल सोसाइटी )।   गांव  के कुछ घरों के पास १०० से अधिक पशु होते थे ।  इन पशुओं का जीवन गाँव के तालाब के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा  होता था ।  गाँव क़ी बड़ी आबादी के पास न ज़मीन होती थी न पशु होते थे ।  अब ऐसे हालत में एक देहल पर तो सौ से ज्यादा पशु हैं  वह भी अपनी देहल से एक आदमी खुदाई के लिए भेजता था और बिना ज़मीन व पशु वाला भी अपनी देहल से एक आदमी भेजता था ।  वाह कितनी गौरवशाली और न्यायपूर्ण परंपरा थी हमारी ! यह तो महज एक उदाहरण है परंपरा में गुंथे अन्याय को न्याय के रूप में पेश करने का ।
             महिलाओं के प्रति असमानता व अन्याय पर आधारित हमारे रीति रिवाज , हमारे गीत, चुटकले व हमारी परम्पराएँ आज भी मौजूद हैं ।  इनमें मौजूद दुभांत को देख पाने क़ी दृष्टि अभी विकसित होना बाकी है ।  लड़का पैदा होने पर लडडू बाँटना मगर लड़की के पैदा होने पर मातम मनाना , लड़की होने पर जच्चा को एक धडी घी और लड़का होने पर दो धडी घी देना, लड़के क़ी छठ मनाना, लड़के का नाम करण संस्कार करना,  शमशान घाट में औरत को जाने क़ी मनाही , घूँघट करना इज़्ज़त का प्रतीक , यहाँ तक कि गाँव कि चौपाल से घूँघट करना आदि बहुत से रिवाज हैं जो असमानता व अन्याय पर टिके हुए हैं ।  सामन्ती  पिछड़ेपन व सरमायेदारी बाजार के कुप्रभावों के चलते महिला पुरुष अनुपात चिंताजनक स्तर तक चला गया है ।  मगर पढ़े लिखे हरयाणवी भी इनका निर्वाह करके बहुत फखर महसूस करते हैं ।  यह केवल महिलाओं की संख्या कम होने का मामला नहीं है बल्कि सभ्य समाज में इंसानी मूल्यों की गिरावट और पाशविकता को दर्शाता है ।  हरयाणा में पिछले कुछ सालों से यौन अपराध , दूसरे राज्यों से महिलाओं को खरीद के लाना और उनका यौन शोषण तथा बाल विवाह आदि का चलन बढ़ रहा है ।  सती, बाल विवाह, अनमेल विवाह के विरोध में यहाँ बड़ा सार्थक आन्दोलन नहीं चला ।  स्त्री शिक्षा पर बल रहा मगर को एजुकेसन का विरोध किया गया ।  स्त्रियों कि सीमित सामाजिक भूमिका की भी हरयाणा में अनदेखी की गयी ।  उसको अपने पीहर की संपत्ति में से कुछ नहीं दिया जा रहा जबकि इसमें उसका कानूनी हक़ है ।  चुन्नी उढ़ा कर शादी करके ले जाने की बात चली है ।  दलाली संस्कृति , भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी से पैसा कमाने की बढती प्रवृति चारों तरफ देखी जा सकती है ।  यहाँ समाज के बड़े हिस्से में अन्धविश्वास , भाग्यवाद , छुआछूत , पुनर्जन्मवाद , मूर्तिपूजा , परलोकवाद , पारिवारिक दुश्मनियां , झूठी आन.बाण के मसले, असमानता  पलायनवाद , जिसकी लाठी उसकी भैंस , मूछों के खामखा के सवाल , परिवारवाद ,परजीविता ,तदर्थता आदि सामंती विचारों का गहरा प्रभाव नजर आता है।   ये प्रभाव अनपढ़ ही नहीं पढ़े लिखे लोगों में भी कम नहीं हैं ।   हरयाणा के मध्यमवर्ग का विकास एक अधखबडे मनुष्य के रूप में हुआ ।  आधा विवेकशील ,आधा अविवेकशील । विवेक का अनुपात कम ज्यादा देखा जा सकता  है ।
          तथाकथित स्वयम्भू पंचायतें नागरिक के अधिकारों का हनन करती रही हैं और महिला विरोधी व दलित विरोधी तुगलकी फैसले करती रहती हैं और इन्हें नागरिक को मानने पर मजबूर करती रहती हैं ।  राजनीति  व प्रशासन मूक दर्शक बने रहते हैं या चोर दरवाजे से इन पंचातियों की मदद करते रहते हैं । अब तो खुलम खुला राजनितिक समर्थन मिल रहा है ।  यह अधखबड़ा  मध्यम वर्ग भी कमोबेश इन पंचायतों के सामने घुटने टिका देता है ।  हरयाणा में सर्व खाप पंचायतों द्वारा जाति, गोत ,संस्कृति ,मर्यादा आदि के नाम पार महिलाओं के नागरिक अधिकारों के हनन में बहुत तेजी आई है और अपना सामाजिक वर्चस्व बरक़रार रखने के लिए जहाँ एक ओर ये जातिवादी पंचायतें घूँघट ,मार पिटाई ,शराब ,नशा ,लिंग पार्थक्य ,जाति के आधार पर अपराधियों को संरक्षण देना आदि सबसे पिछड़े विचारों को प्रोत्साहित करती हैं वहीँ दूसरी ओर साम्प्रदायिक ताकतों के साथ मिलकर युवा लड़कियों की सामाजिक पहलकदमी और रचनात्मक अभिव्यक्ति को रोकने के लिए तरह तरह के फतवे जारी करती हैं ।  जौन्धी ,नयाबांस की घटनाएँ तथा इनमें इन पंचायतों द्वारा किये गए तालिबानी फैंसले जीते जागते उदाहरण हैं ।  युवा  लड़कियां केवल बाहर ही नहीं बल्कि परिवार में भी अपने लोगों द्वारा यौन.हिंसा और दहेज़ हत्या की शिकार हों रही हैं ।  ये पंचायतें बड़ी बेशर्मी से बदमाशी करने वालों को बचाने की कोशिश करती है ।  अब गाँव की गाँव गोत्र की गोत्र और सीम के लगते गाँव के भाईचारे की गुहार लगाते हुए हिन्दू विवाह कानून १९५५ ए में संसोधन की बातें की जा रही हैं । धमकियाँ दी जा रही हैं और जुर्माने किये जा रहे हैं।  हरयाणा के रीति रिवाजों की जहाँ एक तरफ दुहाई देकर संशोधन की मांग उठाई जा रही है वहीँ हरयाणा की ज्यादतर आबादी के रीति रिवाजों की अनदेखी भी की जा रही है ।
           गाँव की इज्जत के नाम पर होने वाली जघन्य हत्याओं की हरयाणा में बढ़ोतरी हों रही है ।  समुदाय , जाति या परिवार की इज्जत बचाने के नाम पर महिलों को पीट पीट कर मार डाला जाता है  उनकी हत्या कर दी जाति है या उनके साथ बलात्कार किया जाता है ।  एक तरफ तो महिला के साथ वैसे ही इस तरह का व्यवहार किया जाता है जैसे उसकी अपनी कोई इज्जत ही न हों , वहीँ उसे समुदाय की इज्जत मान लिया जाता है और जब समुदाय बेइज्जत होता है तो हमले का सबसे पहला निशाना वह महिला और उसकी इज्जत ही बनती है ।  अपनी पसंद से शादी करने वाले युवा लड़के लड़कियों को इस इज्जत के  नाम पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया जाता है ।
           यहाँ के जाने माने  सांगियों अलीबक्श , दीप चंद , हरदेवा ,  लख्मीचंद ,बाजे भगत ,मांगेराम ,चंदरबादी, धनपत ,खेमचंद व दयाचंद व  कवि मेहर सिंह दहिया की रचनाओं का गुणगान तो बहुत किया गया या हुआ है मगर उनकी आलोचनात्मक समीक्षा की जानी अभी बाकी है।   रागनी कम्पीटिसनों का दौर एक तरह से खत्म सा  हो गया  है । ऑडियो कैसेटों की जगह सी डी ने ली  अब पेन ड्राइव या मोबाइल चिप्स का दौर है इनमें सुनी जा रही रागनियों की  सार वस्तु में पुनरुत्थान वादी व अंध उपभोग्तवादी मूल्यों का घालमेल साफ नजर आता है ।  हरयाणा के  लोकगीतों पर भी समीक्षातमक काम कम हुआ है ।  महिलाओं के दुःख दर्द का चित्रण काफी है ।  हमारे त्योहारों के अवसर के बेहतर गीतों की बानगी भी मिल जाति है । 
        गहरे संकट के दौर हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात गोत्र व धर्म के ऊपर लडवा कर हमारी इंसानियत के जज्बे को , हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है ।  गऊ हत्या या गौ.रक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है ।  दुलिना हत्या कांड और अलेवा कांड गौ के नाम पर फैलाये जा रहे जहर का ही परिणाम हैं ।यह गौ भक्ति और ज्यादा उग्र रूप धार रही है ।  इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मंदिर दिखाई देने लगे हैं । राधा स्वामी  और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है ।
         सांस्कृतिक स्तर पर हरयाणा के चार पाँच क्षेत्र हैं  और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं ।  हरेक  गाँव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं ।  जातीय भेदभाव एक ढंग से कम हुए हैं मगर अभी भी गहरी जड़ें जमाये हैं ।  आर्थिक असमानताएं तेजी से  बढ़ रही हैं ।  सभी सामाजिक व नैतिक बंधन तनावग्रस्त होकर टूटने के कगार पर हैं ।  बेरोजगारी बेहताशा बढ़ी है ।  मजदूरी के मौके भी कम से कमतर होते जा रहे हैं ।  मजदूरों का जातीय उत्पीडन भी बढ़ा है । प्रवासी मजदूरों की हालत और भी बदतर हो रही है ।  दलितों पर अन्याय बढ़ा है वहीँ उनका असर्सन भी बढ़ा है । कुँए  अभी भी अलग अलग हैं । परिवार  के पितृसतात्मक ढांचे में परतंत्रता बहुत ही तीखी हों रही है ।  पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जा रहे हैं । मगर इनकी जगह जनतांत्रिक ढांचों का विकास नहीं हों रहा । तलाक  के केसिज की संख्या कचहरियों में बढती जा रही है ।  इन सबके चलते महिलाओं और बच्चों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है ।  मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा आर्थिक संकट की गिरफ्त में है । खेत  मजदूरों ,भठ्ठा मजदूरों ,दिहाड़ी मजदूरों व माईग्रेटिड मजदूरों का जीवन संकट गहराया है । लोगों  का गाँव से शहर को पलायन बढ़ा है । आशा वर्कर , मिड डे मील वर्कर आदि की समस्याएं बढ़ी हैं । हालाँकि असंगठित क्षेत्र में ट्रेड यूनियन्ज की दखलंदाजी बढ़ी है। 
                   कृषि में मशीनीकरण बढ़ा है ।  तकनीकवाद का जनविरोधी स्वरूप ज्यादा उभार कर सामने आया है ।  ज़मीन की ढाई एकड़ जोत पर ८० प्रतिशत के लगभग किसान पहुँच गया है ।  ट्रैक्टर ने बैल की खेती को पूरी तरह बेदखल कर दिया है ।  थ्रेशर और हार्वेस्टर कम्बाईन ने मजदूरी के संकट को बढाया है ।  शामलात  जमीनें खत्म सी हों रही हैं ।  कब्जे कर लिए गए या आपस में जमीन वालों ने बाँट ली ।  अन्न की फसलों का संकट है ।  पानी की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है ।  नए बीज ,नए उपकरण , रासायनिक खाद व कीट नाशक दवाओं के क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की दखलंदाजी ने इस सीमान्त किसान के संकट को बहुत बढ़ा दिया है।  प्रति  एकड़ फसलों की पैदावार घटी है जबकि इनपुट्स की कीमतें बहुत बढ़ी हैं।  किसान  का कर्ज भी बढ़ा है । स्थाई  हालातों से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर तेजी से बढ़ रहा है । अन्याय व अत्याचार बेइन्तहा बढ़ रहे हैं। । किसान  वर्ग के इस हिस्से में उदासीनता गहरे पैंठ  गयी है और एक निष्क्रिय परजीवी जीवन , ताश खेल कर बिताने की प्रवर्ति बढ़ी है।  हाथ से काम करके खाने की प्रवर्ति का पतन हुआ है ।  साथ ही साथ दारू व सुल्फे का चलन भी बढ़ा है और स्मैक जैसे नशीले पदार्थों की खपत बढ़ी है ।  मध्यम वर्ग के एक हिस्से के बच्चों ने अपनी मेहनत के दम पर सॉफ्ट वेयर आदि के क्षेत्र में काफी सफलताएँ भी हांसिल की हैं ।  मगर एक बड़े हिस्से में एक बेचैनी भी बखूबी देखी जा सकती है ।  कई जनतांत्रिक संगठन इस बेचैनी को सही दिशा देकर जनता के जनतंत्र की लडाई को आगे बढ़ाने में प्रयास रत दिखाई देते हैं।  अब समर्थन का ताना बाना टूट गया है और हरयाणा में कृषि का ढांचा बैठता जा रहा है।   इस ढांचे को बचाने के नाम पर जो नई कृषि नीति या नीति  परोसी जा रही है उसके पूरी तरह लागू होने के बाद आने वाले वक्त में ग्रामीण आमदनी , रोजगार और खाद्य सुरक्षा की हालत बहुत भयानक रूप धारण करने जा रही है और साथ ही साथ बड़े हिस्से का उत्पीडन भी सीमायें लांघता जा रहा है।  साथ ही इनकी दरिद्र्ता बढती जा रही है । बेरोजगार  नौजवान और  किसान सल्फास की गोलियां खाकर या फांसी लगाकर आत्म हत्या को मजबूर हैं। 
                 गाँव के स्तर पर एक खास बात और पिछले कुछ सालों में उभरी है वह यह कि  कुछ लोगों के प्रिविलेज बढ़ रहे हैं ।  इस नव धनाड्य वर्ग का गाँव के सामाजिक सांस्कृतिक माहौल पर गलबा है।  पिछले  सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता , सुख भ्रान्ति और नए नए  सम्पन्न तबकों ..परजीवियों ,मुफतखोरों और कमीशन खोरों .. में गुलछर्रे उड़ने की अय्यास कुसंस्कृति तेजी से उभरी है ।  नई नई कारें ,कैसिनो ,पोर्नोग्राफी ,नंगी फ़िल्में , घटिया केसैटें ,  हरयाणवी पॉप ,साइबर सैक्स, नशा व फुकरापंथी हैं। कथा वाचकों के प्रवचन ,झूठी हसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्र्ता को दूर करने के लिए अपनी जगह बनाते जा रहे हैं।  जातिवाद व साम्प्रदायिक विद्वेष , युद्ध का उन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि  सम्मलेन बड़े उभार पर हैं ।  इन नव धनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथा वाचकों को खींच लाई है ।  विडम्बना है कि  तबाह हों रहे तबके भी कुसंस्कृति के इस अंध उपभोगतावाद से छद्म ताकत पा रहे हैं ।
                     दूसर तरफ यदि गौर करेँ तो सेवा क्षेत्र में छंटनी और अशुरक्षा का आम माहौल बनता जा रहा है, इसके बावजूद कि विकास दर ठीक बताई जा रही है । कई हजार कर्मचारियों के सिर पर छंटनी कि तलवार चल चुकी है और बाकी कई हजारों के सिर पर लटक रही है ।  सैंकड़ों फैक्टरियां बंद हों चुकी हैं ।  बहुत से कारखाने यहाँ से पलायन कर गए हैं ।  छोटे छोटे कारोबार चौपट हों रहे हैं ।  मारुती के वर्कर्ज के साथ की गयी जालिम उत्पीड़न मजदूरों की हालत बयां करता है ।  संगठित क्षत्र सिकुड़ता और पिछड़ता जा रहा है , असंगठित क्षेत्र का तेजी से विस्तार हों रहा है ।  फरीदाबाद उजड़ने कि राह पर है , सोनीपत सिसक रहा है , पानीपत का हथकरघा उद्योग गहरे संकट में है , यमुना नगर का बर्तन उद्योग चर्चा में नहिं है , सिरसा ,हांसी व रोहतक की धागा मिलें बंद हों गयी ।  धारूहेड़ा में भी स्थिलता साफ दिखाई देती है ।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में और शिक्षा के क्षेत्र में बाजार व्यवस्था का लालची व दुष्ट्कारी खेल सबके सामने अब आना शुरू हो गया है । सार्वजनिक क्षेत्र में  साठ साल में खड़े किये ढांचों को या तो ध्वस्त किया जा रहा है या फिर कोडियों के दाम बेचा जा रहा है । शिक्षा आम आदमी की पहुँच से दूर खिसकती जा रही है । स्वास्थ्य के क्षेत्र में और भी बुरा हाल हुआ  है । गरीब मरीज के लिए सभी तरफ से दरवाजे बंद होते जा रहे हैं । लोगों को इलाज के लिए अपनी जमीनें बेचनी पड़  रही हैं । आरोग्य कोष या राष्ट्रिय बीमा योजनाएं ऊँट के मुंह  में जीरे के समान हैं । उसमें भी कई सवाल उठ रहे हैं ।मुख्य मंत्री मुफ्त इलाज योजना सिसक रही है । पी जी आई एम एस रोहतक भी खस्ता हाल बना दिया जा रहा है ।
             आज के दिन व्यापार धोखाधड़ी में बदल चुका  है । यही हाल हमारे यहाँ की ज्यादातर राजनैतिक पार्टियों का हो चुका है । आज के दिन हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप ले लिया है । हरियाणा में दरअसल सभ्य भाषा का विकास ही नहीं हो पाया है । लठ की भाषा का प्रचलन बढ़ा है । भ्रम व् अराजकता का माहौल बढ़ा है । लोग किसी भी तरह मुनाफा कमाकर रातों रात करोड़पति से अरब पति बनने  के सपने देखते हैं । मनुष्य की मूल्य व्यवस्था ही उसकी विचारधारा होती है । मनुष्य कितना ही अपने को गैर राजनैतिक मानने की कोशिश करे फिर भी वह अपनी जिंदगी  में मान मूल्यों का निर्वाह करके इस या उस वर्ग की राजनीति कर रहा होता है । विचार धारा का अर्थ है कोई समूह ,समाज या मनुष्य खुद को अपने चारों ओर की दुनिया को, अपनी वास्तविकता को कैसे देखता है । इस सांस्कृतिक क्षेत्र के भिन्न भिन्न पहलू हैं । धर्म, परिवार , शिक्षा , प्रचार माध्यम , सिनेमा, टी वी ,रेडियो ,ऑडियो ,विडिओ ,अखबार , पत्र ..पत्रिकाएँ , अन्य लोकप्रिय साहित्य , संस्कृति के अन्य लोकप्रिय रूप जिनमें लोक कलाएं ही नहीं जीवन शैलियों से लेकर तीज त्यौहार , कर्मकांड , विवाह , मृत्यु भोज आदि तो हैं ही साथ में  टोन टोटके , मेले ठेले भी शामिल हैं । इतिहास और विचारधारा की समाप्ति की घोषणा करके एक सीमा तक भ्रम अवश्य फैलाया जा सकता है मगर वर्ग संघर्ष को मिटाया नहीं जा सकता । यही प्रकृति का नियम भी है और विज्ञानं सम्मत भी । इंसान पर निर्भर करता है कि वह मुठठी  भर लोगों के विलास बहुल जीवन की झांकियों को अपना आदर्श मानते हुए स्वप्न लोक के नायक और नायिकाओं के मीठे मीठे प्रणय गल्पों में मजा ले, मानव मानवी की अनियंत्रित यौन आकांक्षाओं को जीवन की सबसे बड़ी प्राथमिकता के रूप में देखें , औरत की देह को जीवन का सबसे सुरक्षित क्षेत्र बना डालें या अपने और आम जनता के विशाल जीवन और उसके विविध संघर्षों  को आदर्श मानकर वैचारिक उर्जा प्राप्त करे । समाज का बड़ा तबका बेचैन है अपनी गरिमा को फिर से अर्जित करने को। कुछ जनवादी संगठन इस बेचैनी को आवाज देने व जनता को वर्गीय आधारों पर लामबंद करने को प्रयासरत हैं ।
         आने वाले समय में गरीब और कमजोर तबकों , दलितों, युवाओं और  खासकर महिलाओं का अशक्तिकरण तथा इन तबकों का और भी हासिये पर धकेला  जाना साफ़ तौर पर उभरकर आ रहा है। इन तबकों का अपनी जमीं से उखड़ने ,उजड़ने व् तबाह होने का दौर शुरू हो चुका है और आने वाले समय में और तेज होने वाला है । हरियाणा में आज शिक्षित,अशिक्षित,और अर्धशिक्षित युवा लड़के व लड़कियां मारे मारे घूम रहे हैं । एक तरफ बेरोजगारी की मार है और दूसरी तरफ अंध उपभोग की लम्पट संस्कृति का अंधाधुंध प्रचार है । इनके बीच में घिरे ये युवक युवती लम्पटीकरण का शिकार तेजी से होते जा रहे हैं । स्थगित रचनात्मक उर्जा से भरे युवाओं को हफ्ता वसूली , नशाखोरी , अपराध और दलाली के फलते फूलते कारोबार अपनी और खिंच रहे हैं । बहुत छोटा सा हिस्सा भगत सिंह की विचार धारा से प्रभावित होकर सकारात्मक एजेंडे पर इन्हें लामबंद करने लगा है । ज्ञान विज्ञानं आन्दोलन ने भी अपनी जगह बनाई है ।
       प्रजातंत्र में विकास  का लक्ष्य सबको समान  सुविधाएँ और अवसर उपलब्ध करवाना होता है । विकास के विभिन्न सोपानों को पर करता हुआ संसार यदि एक हद तक विकसित हो गया है तो निश्चय ही उसका लाभ बिना किसी भेदभाव के पूरी दुनिया की पूरी आबादी को मिलना चाहिए परन्तु आज का यथार्थ ही यह है कि ऐसा  नहीं हुआ । आज के दौर में तीन खिलाड़ी नए उभर कर आये हैं ;पहला डब्ल्यू टी ओ विश्व  व्यापर संगठन ए दूसरा विश्व बैंक व तीसरा अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ।  खुली बाजार व्यवस्था के ये हिम्मायती दुनिया के ल
लिए समानता की बात कभी नहीं करते बल्कि संसार में उपलब्ध महान अवसरों को पहचानने और उनका लाभ उठाने की बात करते हैं ।  गड़बड़ यहीं से शुरू होने लगती है । बहुराष्ट्रीय संस्थाओं का बाजार व्यवस्था पर दबदबा कायम है । आज छोटी बड़ी लगभग 67000 बहुराष्ट्रीय संस्थाओं की 1,70,000 शाखाएं विश्व के कोने कोने में फ़ैली हुई हैं । ये संस्थाएं विभिन्न देशों की राजनैतिक , सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी हस्तक्षेप करने लगी हैं । ध्यान देने योग्य बात है कि इन सबके केन्द्रीय कार्यालय अमेरिका ,पश्चिम यूरोप या जापान में हैं । इनकी अपनी प्राथमिकतायें हैं । बाजार वयवस्था इनका मूल मन्त्र है । हरियाणा को भी इन कंपनियों ने अपने कार्यक्षेत्र के रूप में चुना  है । गुडगाँव एक जीता जागता उदाहरन  है । साइनिंग गुडगाँव तो सबको दिखाई देता है मगर सफरिंग गुडगाँव को देखने को हम तैयार ही नहीं हैं ।
       आज के दौर में बाहर  से महाबली बहुराष्ट्रीय निगम और उनका जगमगाता बाजार और भीतर से सांस्कृतिक फासीवादी ताकतें समाज को अपने अपने तरीकों से विकृत कर रही हैं । इस   बाजारवाद ,कट्टरवाद  की मिलीभगत जग जाहिर है । इनमें से एक ने हमारी लालच ,हमारी सफलताओं की निकृष्ट इच्छाओं को सार्वजनिक कर दिया है और दुसरे ने हमारे मनुष्य होने को और हमारे आत्मिक जीवन को दूषित करते हुए हमें एक हीन मनुष्य में तब्दील कर दिया है । यह ख़राब किया गया मनुष्य जगह जगह दिखाई देता है जिसमें धैर्य और सहिष्णुता बहुत कम है और जिसके भित्तर की उग्रता और आक्रामकता दुसरे को पीछे धकेल कर जल्दी से कुछ झपट लेने ,लूट लेने और कामयाब होकर खिलखिलाने की बेचैनी को बढ़ा  रही हैं ।  इस समय में समाज के गरीब नागरिकों को अनागरिक बनाकर अदृश्य हाशियों की ओर फैंका जा रहा है । उनके लिए नए नए रसातल खुलते जा रहे हैं जबकि समाज का एक छोटा सा मगर ताकतवर हिस्सा मौज मस्ती का परजीवी जीवन बिता रहा है । समाज के इस छोटे से हिस्से के अपने उत्सव मनते रहते हैं जो की एक कॉकटेल पार्टी की संस्कृति अख्तियार करते जा रहे हैं । बाकि हरियाणवी समाज की जर्जरता बढाने के साथ साथ इस तबके के राग रंग बढ़ते हैं क्योंकि संकट से बचे रहने का , मुसीबतों को दूर धकेलने का तात्कालिक उपाय यही है । यह लोग बाजार में उदारतावाद और संस्कृति में संकीर्णतावाद व  पुनरूत्थानवाद  के समर्थक हैं । आजकल प्रचलित हरियाणवी सीडियों में परोसे जा रहे वलगर गीत नाटकों को यही ताकतें बढ़ावा दे रही हैं । असल में हमारा समाज पाखंडों और झूठों पर टिका हुआ अनैतिक समाज है । इसलिए हमें जोर जोर से नैतिकता शब्द का उच्चारण करना जरूरी लगता है । वस्तुत हमारे समाज में लाख की चोरी करने वाला यदि न पकड़ा जाये तो पकडे जाने वाले एक रुपये की चोरी करने वाले की तुलना में महान  बना रह सकता है ।
            बड़ी होशियारी से हमारे मन मस्तिष्क पर बाजारवाद का स्वप्न चढ़ाया जा रहा है । तमाम ठाठ बाठ के सपनों में उलझाकर बेखबरी में हमें जिधर धकेल जा रहा है हम उधर ही धिकते जा रहे हैं । इसीलिए आज यह प्रश्न अति गंभीर हो  उठा है कि  जिस ग्लोबल विलेज की चर्चा की जा रही है वह आम आदमी और खासकर गरीबों के रहने लायक है भी या नहीं ? अब जबकि टेलीविजन और नेट  के माध्यम से  यह बाजार घर घर में प्रवेश कर चुका है तो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भी यह टेलीविजन बगैर परिश्रम किये ऐसो आराम परोसने का कम कर रहा  है अगर यकीं न हो तो जरा उन विज्ञापनों पर ध्यान दें जिसमें अमुक वस्तुओं को खरीदने पर कहीं कर तो कहीं सोना  कहीं टी वी  तो कहीं और कुछ दिलाने का सपना दिखा वस्तुओं का विक्रय बढाया जाता है ।
         चंद मिनटों में करोडपति बन ने की उम्मीद जगाई जाती हैं । कुल मिलाकर किस्सा यह बनता है कि परिश्रम ,कर्तव्य , इमानदारी इत्यादि को घर के कूड़ा दान में फैंको और  खरीदो खरीदो और खरीदो और  मौज  करो ।
        रातों रात अमीरी  के सपने देखता युवा वर्ग इस अंधी दौड़ में तेजी से शामिल होता जा रहा है जिसमें सफलता के लिए कोई भी कीमत जायज हो सकती है । धन प्राप्ति के लिए जायज नाजायज कुछ भी किया जा सकता है । हमें जल्दी से जल्दी वो सारे ऐशो आराम एवम मस्ती चाहिए जो टी वी के द्वारा दिन रात परोसे जा रहे हैं । हमें बहकाया जा रहा है , निकम्मा बनाया जा रहा है । अश्लीलता को मौज मस्ती का पर्याय बता दिनोंदिन हमें अति उप भोग्तावाद की अंधी गली में धकेल जा रहा है जहाँ से बाहर  निकलना बहुत मुश्किल होता  है । अधनंगे वस्त्रों का फैशन शो अब महानगरों से निकल कर कस्बों व् गाँव तक पहुँच रहा है । युवा वर्ग लालायित हो उनकी नक़ल करने की होड़ में दौड़ रहा है ।
             मल्टीनेशनल मालामाल हो रहे हैं , भारतीय कारीगर भुखमरी की और जा रहे हैं । आज आसामी सिल्क, बालूचेरी की कारीगरी , कतकी पोचमपल्ली या बोकई के कारीगरों को मल्टीनेशनल के होड़ में खड़ा कर दिया गया है। अब इस गैर  बराबरी की  होड़ में भारतीय कारीगर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो  कैसे टिक पायेगा ? इम्पोर्टिड चीजों को प्रचारित कर उन्हें स्टेटस सिम्बल बनाया जा रहा है और भारतीय कशीदाकारी को तबाह किया जा रहा है । भारतीय बेहतर कालीनों को बाल मजदूरी के नाम पर पश्चिमी देश प्रतिबंधित कर रहे हैं ताकि भारतीय वास्तु वहां के बाजार में प्रवेश न कर पाए । मगर उनकी वस्तुएं हमारे बाजार पर छा  जाएँ ।
हमारे भारतीय हुनर के लिए यह मौत का फरमान ही तो है । बाजारवाद की इस होड़ में मल्टीनेसनल के सामने
हमारी कारीगरी ही नहीं भारतीय कम्पनियाँ भी कब तक टिक पाएंगी यह एक अहम् सवाल है। पूरे भारत के सभी दरवाजे उनके लिए खोल दिए गए हैं ।
              अब मैकडोनाल्ड को ही लिया जाये ।  यह महानगरों तक नहीं सिमित रहा । अब तो शहर शहर , गली गली में मैकडोनाल्ड  हमारे बच्चों को बर्गर ,पिज्जा फ्री के उपहार दे कर खाने की आदत डालेगा , रिझाएगा , फँसाएगा ताकि कल को वह पूरी , परांठा , इडली , डोसा भूल जाये और बर्गर ओइज्ज के बगैर रह ही नहीं पाए । आखिर बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं जिसने उनको जीता उसी की तूती बोलेगी कल पूरे भारत देश में । पहले जैसे साम्राज्य स्थापित करने के लिए देश विशेष की संस्कृति , कारीगरी , हुनर, व्यवसाय एवं शिक्षा को नष्ट किया जाता था ताकि साम्राज्य की पकड़ देश विशेष पर और मजबूत हो । इसी प्रकार आज बाजार के लिए देश प्रदेश विशेष के हुनर , कारीगरी , व्यवसाय ,शिक्षा एवं संस्कृति पर ही हमला बोल जा रहा है और हमारे मीडिया इस मामले में मल्टीनेसनल की भरपूर सहायता कर रहे हैं । हरियाणा में अब गुनध्धा हुआ आट्टा  , अंकुरित मूंग, चना आदि भी विदेशी कम्पनियाँ लाया करेंगी । कूकीज , चाकलेट व केक हमारे घर की शोभा होंगे । जलेबी और रसगुल्ले अतीत की यादगार होंगे । भारतीय कुटीर ऊद्योग के साथ साथ अन्य कम्पनियाँ भी मल्टीनेसनल के पेट में चली जायेंगी ।
      सवाल यही है कि क्या बिना किसी विचार के इतना अन्याय से भरा असमानताओं पर टिका समाज टिका रह सकता है ? यदि नहीं तो इसके ठीक उल्ट विचार भी अवश्य है जो एक समता पर टिके नयायपूर्ण समाज की परिकल्पना रखता है । उस विचार से नजदीक का सम्बन्ध बनाकर ही इस बेहतर समाज के निर्माण में हम अपना योगदान दे सकते हैं । इसके बनाने के सब साधन इसी दुनिया में इसी हरियाणा में मौजूद हैं । जरूरत है उस नजर को विक्सित  करने की । आज मानवता के वजूद को खतरा है । यह इस विचारधारा का या उस विचारधारा का मसला नहीं है । यह एक देश का सवाल नहीं है यह एक प्रदेश का सवाल नहीं है यह पूरी दुनिया का सवाल है । जिस रस्ते पर दुनिया अब जा रही है इस रस्ते पर मानवता का विनाश निश्चित है । हरियाणा के विकास मॉडल में भी यह साफ़ प्रकट हो रहा है । नव वैश्वीकरण की प्रक्रिया से विनाश ही होगा विकास नहीं । मगर अब दुनिया यह सब समझ रही है । हरियाना वासी भी समझ रहे हैं । मानवता अपनी गर्दन इस वैश्वीकरण की कुल्हाडी के नीचे नहीं रखेगी । मानवता का जिन्दा रहने का जज्बा और मनुष्य के विचार की शक्ति ऐसा होना असंभव कर देगी । हरियाणा में नव जागरण ने अपने पाँव रखे हैं । युवा लड़के लड़कियां , दलित, और महिलाएं इसके अगवा दस्ते होंगे और समाज सुधर का काम अपनी प्रगतिशील दिशा अवश्य पकड़ेगा।
आज के  हरयाणा की चुनौतियां
हरयाणा प्रदेश  ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2014 तक पहुंचा है ।  इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं ।  इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है । पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था इसके बनने  के वक्त । उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत  रंग ले कर आई  जिसने सड़कों का जाल बिछाया , बिजली गावों  गावों  तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखि जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।
नए बीज, नए उपकरण , नयी खाद , नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के एक हिस्से में हरित क्रांति ने क्षेत्र की खेती की पैदावार को बढ़ाया । वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती जा रही है । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं ।  हरित क्रांति से एक धनाढय़ वर्ग पैदा हुआ जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ की राजनैतिक , आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे इंसान का विकास किया है जो कुछ बातों  में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । इसके व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो । इस अधखबडे व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक है और एक  नवजागरण आंदोलन की शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्विदालयों का खोलना एक अचीवमैंट  के रूप में पेश किया जा रहा है वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विश्वविदालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो , हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रीयों का कारोबार बढ़ा है ।  दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियायों की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं हाँ घटाया बेशक हो । इंस्टीच्युट खोल दिए गए कई कई सौ करोड़ की इमारतें खड़ी करके मगर उनकी फैकल्टी उनकी कार्य प्रणाली की किसी को कोई चिंता नहीं है । विश्वविदयालयों के उपकुलपतियों की नियुक्तियों में यू जी सी की गाइड लाइन्स की धजियां उड़ाई जाती रही हैं । सबके लिए एक समान स्कूल की अनदेखी की जाती रही है जबकि यह सम्भव है और समय इसकी  मांग करता है ।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्राइवेट सैक्टर की दखलंदाजी बढ़ी है । एम्पैनलमेंट  का कारोबार खूब चल रहा है । सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं जैसे तैसे स्टाफ की कमी ए डाक्टरों की कमी एकहीं कुछ और कमियों के चलते ए घिसट रही हैं । गरीब जन की सेहत के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के माधयम से इलाज के रस्ते बंद होते जा रहे हैं । जितनी भी स्वास्थ्य सेवा की योजनाएं गरीबों के लिए हैं उनमें एक्जीक्यूसन की भारी कमियां हैं और योजना में भी कई कमियां हैं । प्राइवेट नर्सिंग होम के लिए केंद्र में पारित एक्ट भी हरयाणा में लागू नहीं किया है । इसलिए प्राइवेट  नर्सिंग होम्ज की लूट दिनोदिन आमनवीय रूप अख्तियार करते हुए बढ़ती जा रही है । सरकारी हॉस्पिटलज में सी टी स्कैन की महीनों लम्बी तारीखें दी जाती है । मुख्य मंत्री मुफ्ती इलाज योजना सैद्धांतिक तोर पर बहुत ठीक योजना होते हुए भी इसकी एक्जीक्यूसन बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी सर्वे दो  के मुकाबले सर्वे तीन  में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।
सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप स सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी से हो रहा है । सकारातमक अजेंडा न होने के कारण आज युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफत में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के , महिला उत्पीड़न के  केसिज बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है । असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है , पुरुष है , प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है । एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित तबको द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है । दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद  में गरीब किसान , मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की , प्रवाशी मजदूर , माइग्रेटेड पापुलेशन , असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरयाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।
नैशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी  पी  में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरयाणा का सवरूप क्या होगा ?  इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी ? नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली ? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ? जेंडर फ्रैंडली , ईको फ्रैंडली और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरयाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव अजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस अजेंडे पर अपनी पोजीसन रखने को  कहा  जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीती के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।
रणबीर सिंह दहिया

AAJ KA DAUR AUR HARYANA

आज का हरियाणा-बहस के लिए
रणबीर दहिया
1857 की आजादी की पहली जंग में हरियाणा वासियों की काफी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रही। मगर उसके बाद विभाजन कारी ताकतों का सहारा लेकर अंग्रेजो ने हरियाणा की एकता को काफी चोट पहुंचाई। बाद में हरियाणा में यह कहावत चली कि ‘साहब की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी’ नहीं होना चाहिये ा नवजागरण के दौर में हरियाणा में आर्य समाज भी काफी लेट आया। महिला षिक्षा पर बहुत जोर लगाया आर्य समाज ने मगर सहषिक्षा का डटकर विरोध किया। एक और कहावत का चलन भी हुआ...म्हारे हरियाणा की बताई सै या विद्या की कमजोरी, बांडी बैल की के पार बसावै जब जुआ डालदे धोरी।
        ंआज का साम्राज्यवाद पहले के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा संगठित,ज्यादा हथियारबन्द और ज्यादा विध्वंसक है। नवस्वतंत्र या विकासषील देषों की खेतियों, देसी उद्योग धन्धों और सामाजिक संस्कृतियों को तबाह करने पर लगा है।दुनिया भर में साम्राज्यवादी वैष्वीकरण की यही विध्वंसलीला हम देख रहे हैं। नव सांमन्तवाद और नवउदारीकरण का दौर हरियाणा में पूरे यौवन पर नजर आता है। जहां एक तरफ हरियाणा ने आर्थिक तौर पर किसानों और कामगरों तथा मध्यमवर्ग  के लोगांेे के अथक प्रयासों से पूरे भारत में  दसूरा स्थान ग्रहण किया है वहीं दूसरी तरफ हरियाणा के ग्रामीण समाज का संकट षहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से गहराता जा रहा है। सामाजिक सूचकांक चिन्ताजनक स्थिति की तरफ इषारा करते नजर आते हैं।भूखी, नंगी, अपमानित और बदहाल आाबादी के बीच छदम सम्पन्नता के जगमग द्वीपों जैसे गुड़गांव पर जष्न मनाते इन नये दौलतमंदों का सफरिंग हरियाणा से कोई वासता नजर नहीं आता।  कुछ भ्रश्ट राजनितिज्ञों, भ्रश्ट पुलिस अफसरों, भ्रश्ट नौकरषाहों तथा भ्रश्ट कानून के रखवालों , गुण्डों के टोलों के पचगड्डे ने काले धन और काली संस्कृति को हरियाणा के प्रत्येक स्तर पर बढ़ाया है। फिलहाल देष के और हरियाणा के दौलतमंदों का बड़ा हिस्सा साम्राज्यवादी वैष्वीकरण का पैरोकार बना हुआ नजर आता है। वह सुख भ्रान्ति का षिकार है या समर्पण कर चुका है। वह पूरे हरियाणा या पूरे देष के बारे में नहीं महज अपने बारे में सोचता है। फसलों की, जमीन के बढ़ते बांझपन के कारण, पैदावार कम से कमतर होती जा रही है। तालाबों पर नाजायज कब्जे कर लिये गये जिनके चलते उनकी संख्या कम हो गई और जो बचे उनके आकार छोटे होते गये। अन्धाधुन्ध कैमिकल खादों और कीट नाषकों के इस्तेमाल
के कारण जमीन के नीचे का पानी प्रदूशित होता जा रहा है। गांव की षामलात जमीनों पर दबंग लोगांे  ने कब्जे जमा लिए हैं। सरकारी पानी की डिगियों की बुरी हालत है। पीने के पानी का व्यवसायिकरण बहुत से गावों में टयूबवैलों के माध्यम से हो गया। मगर गलियों का बुरा हाल है। यदि पक्की भी हो गई हैं तो भी पानी की निकासी का कोई भी उचित प्रबन्ध न होने के कारण जगह जगह पानी के चब्बचे बन गये हैं जो बहुत सी बीमारियों के जनक हैं। बिजली ज्यादातर समय गुल रहती है। बैल आमतौर से कहीं कहीं बचे हैं। भैंसों के सुआ लगा कर दूध निकालने की कुरीति बढ़ती जा रही है। सब्जियों में भी सुआ लगाने का चलन बहुत बढ़ता जा रहा है। खेती की जोत का आकार कम से कमतर हुआ है और दो एकड़ या इससे कम जोत के किसानों की संख्या किसी भी गांव में कुल किसानों की संख्या में सबसे जयादा है। गांव के रुरल आरटीजन गांव से उजड़कर षहरों कस्बों में जाने को मजबूर हुए हैं।  गांव के सरकारी स्कूलों का माहौल काफी खराब हो रहा है। इन स्कूलों में खाते पीते व दबंग परिवारों के बच्चे नहीं जाते। इसलिए उनकी देखभाल भी नहीं बची है। दलित और बहुत गरीब किसान परिवार के बच्चे ही इन स्कूलों में जाते हैं। उपर से सैमैस्टर सिस्टम और बहुत दूसरी नीतिगत खामियों के चलते माहौल और खराब हो रहा है।इस सबके चलते प्राइवेट स्कूलों की बाढ़ सी आ गई है। उंची फीसें इन स्कूलों का फैषन बन गया है। बीएड के कालेजों की एक बार बाढ़ आईए फिर नर्सिंग कालेजो की और फिर डैंटल कालेजों की। ज्यादातर प्राईवेट सैक्टर में हैं। बी एड कालेजों में से ज्यादातर बन्द होने के कगार पर हैं। प्राईवेट सैक्टर में दुकानदारी बढ़ी है और षिक्षा की गुणवता काफी कम हुई है। इन की समीक्षा अपने आप में एक लेख की मांग करता है। स्वास्थ्य के क्षे़त्र में 90 के बाद प्राईवेट सैक्टर 57 प्रतिषत हो गया है। गांव के सबसैंटर में,प्राईमरी स्वास्थ्य केन्द्र में या सामुदायिक केन्द्र में क्या हो रहा है यह गांव के दबंगों की चिन्ता का मसला कतई नहीं है। बल्कि इनमें काम करने वाल ेकुछ भ्रश्ट कर्मचारियो ं के साथ सांठगांठ करके ठीक काम करने वाले डाक्टरों व दूसरे कर्मचारियों को परेषान किया जाता है। गांव में सरकार द्वारा बनाई गई डिगियों का इस्तेमाल न के बराबर हो रहा है जिसके चलते प्राइवेट ट्यूबवैलांे से पानी खरीदना पड़ रहा है । अब भी पीने के पानी के कुंए अलग अलग जातियों के अलग अलग हैं। बहुत कम गांव हैं जहां सर्वजातीय कंुए हैं। खेती में ट्रैक्टर का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है। आज ट्रैक्टर से एक एकड़ की बुआही के रेट 350-400रुपये हो गये हैं। ट्यूबवैल से एक एकड़ की सिंचाई के रेट 80 रुपये घण्टा हो गये हैं। थ्रैशर से गिहूं निकालने के रेट1500रुपये प्रति एकड़ हो गये हैं। हारवैस्टर कारबाईन से गिहूं कटवाने के 1400 रुपये प्रति एकड़ और निकलवाने के रैपर के रेट 1200 प्रति एकड़ हो गये हैं। बड़ी बड़ी बहुराश्ट्रीय कम्पनियों का सामान हरेक गांव की छोटी से छोटी दुकानों पर आम मिल जाता है।
8-10 दुकानों से लेकर 40-50 दुकानों का बाजार छोटे बड़े सभी गांव में मौजूद है। छोटी छोटी किरयाने की दुकानों पर दारु के प्लास्टिक के पाउच आसानी से उपलब्ध हैं। पहले का डंगवारा जिसमें एक एक बैल वाले दो किसान मिलकर खेती कर लेते थे बिल्कुल खत्म हो गया है। पहले दो एकड़ वाला 10 एकड़ वाल ेकी जमीन बाधे पर लेकर बोता रहा है और काम चलाता रहा है। साथ एक दो भैंस भी रखता रहा है जिसका दूध बेचकर रोजाना के खर्चे पूरे करता है। पहले कहावत थी‘ ‘दूध बेच दिया इसा पूत बेच दिया’। आज दूध भी बेचना पड़ता है और बेटा भी बेचना पड़ता है। मगर आज 10 किल्ले वाला भी दो किल्ले वाले की जमीन बाधे पर लेकर बोता है। खेती में मषीनीकरण तेजी से हुआ और हरित क्रांन्ति का दौर षुरु हुआ। हरित क्रान्ति ने बहुत नुकसान किये हैं जो अपने आप में एक बहस और रिसर्च का विशय है। मगर किसानी के एक हिस्से को लाभ भी बहुत हुआ है। एक नया नव धनाढ़य वर्ग पैदा हुआ है हरियाणा में जिसका हरियाणा के हरेक पक्ष पर पूरा कब्जा है। इन्ही के दायरों में अलग अलग जातों के नेताओं का उभरना समझ में आता हैं । मसलन चौधरी देवीलाल जाटों के नेता, चौधरी चान्द राम दलितों के नेता- उनमें भी एक हिस्से के-। पंडित भगवतदयाल षर्मा पंडितों नेता ,राव बिरेन्द्र सिंह अहीरों के नेता आदि। इस धनाढ़य वर्ग का एक हिस्सा आढ़तियों में षामिल हो गया है। यह कम जमीन वाले किसान की कई तरह से खाल उतार रहा है। पुराने दौर के परिवारों में से डी एल एफ ग्रूप और जिन्दल ग्रूपों ने राश्टीय स्तर पर पहचान बनाई है। इसी धनाढ़य वर्ग में से कुछ भठ्ठों के मालिक हो गये हैं ,दारु के ठेकों के ठेकेदार हैं, प्राप्रटी डीलर बन गये हैं। इसी खाते पीते वर्गों के बच्चों में विदेषों में जा कर पढ़ने का या वहां जाकर नौकरी करने का रुझान पंजाब की तर्ज पर बढ़ता नजर आता है । नेताओं के बस्ता ठाउ भी इन्ही में से हैं। हरेक विभाग के दलाल भी इन्हीं लोगों में से पैदा हुए हैं। इन ज्यादातरों के और भी कई तरह के बिजिनैष हैं। इनका जीवन ए.सी. जीवन में  बदल गया है चाहे षहर में रहते हों या गांव में। हर तरह के दांव पेच लगाने में यह तबका बहुत माहिर हो गया है। जिन लोगांें की हाल में  जमीने बिकी हैं उन्होंने पैसा इन्वैस्ट करने का मन बनाया मगर पैसा लगाने की उपयुक्त जगह न पाकर वापिस गांव में आकर मकान का चेहरा ठीक ठ्याक कर लिया और एक 8-10 लाख की गाड्डी कार ले ली। एक मंहगा सा मोबाइल ले लिया। जिनके पास कई एकड़ जमीन थी और संयुक्त परिवार था उन्होंने सिरसा की तरफ या कांषीपुर में या मध्यप्रदेष में खेती की जमीनों में यह पैसा लगा दिया। कुछ लोगों ने 200-300 गज का प्लॉट षहर में लेकर सारा पैसा वहां मकान बनाने पर खर्च कर दिया। आगे क्या होगा उनका? इन बिकी जमीनों पर जीवन यापन करने वाले खेत मजदूर और बाकी के तबकों का जीना मुहाल हो गया है। यह दबंगों और मौकापरस्तों के समूह हरेक कौम में पैदा हुए हैं। इनका
वजूद जातीय , गोत्रों और ठोले पाने की राजनिति पर ही टिका है। ज्यादातर गांव में सड़कें पहुंच गई हैं बेषक खस्ता हालत में हों बहुत सी सड़कें। किसी भी गांव में चार पहियों के वाहनों की संख्या भी बढ़ी है। बहुराश्टीय कम्पनियों के प्रोडक्ट ज्यादातर गावों में मिलने लगे हैं। टी वी अखबार का चलन भी गांव के स्तर पर बढ़ा है। सी.डी. प्लेयर तो बहुत सें घरों में मिल जाएगा। मोबाइल फोन गरीब तबकों के भी खासा हिस्से के पास मिल जाएगा। संप्रेषन के साघन के रुप में प्रोग्रेसिव ताकतों को इसके बारे में सोचना होगा। माइग्रेटिड लेबर की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में भी बढ़ रही है। किसानी के एक हिस्से में अहदीपन बढ़ रहा है। गांव की चौपालों की जर्जर हालत हमारे सामूहिक जीवन के पतन की तरफ इषारा करती है। नषा, दारु और बढ़ता संगठित सैक्ष माफिया सब मिलकर गांव की संस्कृति को कुसंस्कृति के अन्धेरों में धकेलने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।पुरुश प्रघान परिवार व्यवस्था में छांटकर महिला भ्रूण हत्या के चलते ज्यादातर गांव में लड़कियों की संख्या काफी कम हो रही है। बाहर से खरीद कर लाई गई बंहुओं की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पुत्ऱ लालसा बहुत प्रबल दिखाई देती है यहां के माईडं सैट में। हर 10 किलो मीटर पर ‘षर्तिया छोरा’ के लिए गर्भवती महिला को दवाई देने वाले मिल जाएंगे। उंची से उंची पढ़ाई भी हमारे दकियानूसी विचारों में सेंध लगाने में असफल रही लगती है। जैंडर बलाइन्ड उच्च षिक्षा ने महिला विरोधी सामन्ती सोच को ही पाला पोसा लगता है। हमारे आपस के झगड़े बढ़े हैं। इस सबके चलते महिलाओं पर घरेलू हिंसा में बढ़ोतरी हुई  है। महिलाओं पर बलात्कार के केस बढ़े हैं। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ आदि के केस बढ़े हैं जिनमें से ज्यादातर केस दर्ज ही नहीं हो पाते। कचहरियों में तलाक के केसिज की संख्या बेतहासा बढ़ रही है। सल्फास की गोली खाकर हर रोज 1 या 2 नौजवान मैडीकल पंहुच जाते हैं। 30-40 ट्रक ड्राईवर हरेक गांव में मिल जाएंगे । एडस की बीमारी के इनमें से ज्यादातर वाहक हैं। सुबह से लेकर षाम तक ताष खेलने वाली मंडलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। युवा लड़कियों का यौन षोशण संगठित ढ़ंग से किया जा रहा है तथा सैक्ष रैकेटियर गांव गांव तक फैल गये हैं। इसके अलावा युवा लड़कियों में षादी से पहले गर्भ की तादाद बढ़ रही है। मौखिक तौर पर कुछ डाक्टरों का कहना है कि इस प्रकार के केसिज में 50 प्रतिषत से ज्यादा परिवार के सदस्य, रिस्तेदार, पड़ौसी ही होते है जो यौन षोशण करते हैं । महिला न घर के अन्दर ्रसुरक्षित रही है न घर से बाहर। युवा लड़कियों का गांव की गांव में यौण उत्पीड़न हरियाणवी ग्रामीण समाज की भयंकर तसवीर पेष करता है। गांव के युवाओं -लड़के लड़कियों - को अपनी स्थगित ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल करने का कोई अवसर हमारी दिनचर्या में नहीं है। इस सब के बावजूद बहुत सी लड़कियों व महिलाओं ने खेलों में हरियाणा का नाम रोषन किया है। केबल टी. वी. ज्यादातर बड़े गांव में पहुंच गया है। टी वी में आ रही बहुत
सी अच्छी बातों के साथ साथ देर रात बहुत सी जगह बल्यू फिल्में दिखाई जाती हैं। युवाओं में आत्म हत्या के केसिज बढ़ रहे हैं। महिलाओं के दुख सुख की अभिव्यक्ति महिला लोक गीतों में साफ झलकती दिखाई देती है। हमारे सांगों में पितृसतात्मक मूल्यों का बोलबाला दिखाई देता है। इसके साथ साथ महिला विरोधी और दलित विरोधी रुझान भी साफ झलकते हैं। मूल्यों के संदर्भ में हमारा साहित्य दबंग के हित की संस्कृति का ही निर्वाह करता नजर आता है खासकर  ज्यादातर सांगों के कथानक में। पूरे हरियाणवी चुटकलों के भण्डार में एक सेकुलर चुटकुला ढूंढ़ना बहुत मुष्किल काम है। फिल्में बनी मगर जयादा देर नहीं टिक पाई। कथानकों की कमजोरी, कमजोर कलात्मक पक्ष और सरकारों का कम प्रोत्साहन आदि इसके कई मुख्य कारनों में से रहे। रागनी कम्पीटीषन अपनी मौत मरे। वहां भी जातीय संकीणताएं देखी जा सकती हैं। बाजे भगत बेहतर सांगी होते हुए भी कहीं नजर नहीं आते क्योंकि जात से वे नाई थे। विडियो सी.डी. ने जोर पकड़ा मगर वह भी धाराषाही हो गई। कारण साफ है कि सम सामयिक विशय होते हुए भी हरियाणा के यथार्थ का सही सही कलात्मक चित्रण इनमें नहीं हो पाया। गहरे संकट के दौर में हमारी धार्मिक आस्थाओं को साम्प्रदायिकता के उन्माद में बदलकर हमें जात, गौत्र व धर्म के उपर लड़वा कर हमारी इन्सानियत के जज्बे को,हमारे मानवीय मूल्यों को विकृत किया जा रहा है। गउ हत्या या गौरक्षा के नाम पर हमारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है।‘दुलिना हत्या काण्ड’ और ‘अलेवा काण्ड’ गउ के नाम पर फैलाए जा रहे जहर का ही परिणाम हैं। इसी धार्मिक उन्माद और आर्थिक संकट के चलते हर तीसरे मील पर मन्दिर दिखाई देने लगे हैं। राधास्वामी और दूसरे सैक्टों का उभार भी देखने को मिलता है। सांस्कृतिक स्तर पर हरियाणा के चार पांच क्षेत्र हैं और इनकी अपनी विशिष्टताएं हैं। हरेक गांव में भी अलग अलग वर्गों व जातियों के लोग रहते हैं। जातीय भेदभाव गहरी जडें़ जमाए हैं।आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं।
  पिछले सालों के बदलाव के साथ आई छद्म सम्पन्नता, सुख भ्रान्ति और नए नए सम्पन्न तबकों-परजीवियों, मुफतखारों,और कमीष्नखोरों-की गुलछर्रे उडाने की अय्यास संस्कृति तेजी से उभरी है। नई नई कारें, कैसिनो, पोर्नोग्राफी,नंगी फिल्में,घटिया कैसटें ,हरियाणवी पॉप,साइबर सैक्स षाप्स, नषा, फुकरापंथी, कथा वाचकों के प्रवचन, झूठी हैसियत का दिखावा इन तबकों की सांस्कृतिक दरिद्रता को दूर करने के लिये अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। जातिवादी व साम्प्रदायिक विद्वेष,युद्धोन्माद और स्त्री द्रोह के लतीफे चुटकलों से भरे हास्य कवि सम्मेलन बड़े उभार पर हैं। इन नवधनिकों की आध्यात्मिक कंगाली नए नए बाबाओं और रंग बिरंगे कथावाचकों को खींच लाई है।
विडम्बना है कि तबाह हो रहे तबके भी संस्कृति के इस उभोक्तावाद से छदृम ताकत पा रहे हैं।
      एक गांव में ही दलितों का एक अलग ही गांव या बस्ती है। दबंग तबकों में दलित विरोध बहुत तरह से देखा जा सकता है। डिस्क्रीमिनेषन प्रत्यक्ष या परोक्ष रुप से मौजूद है। दलितों में अलग अलग हिस्सों में भी आपस में बहुत दूरयिां देखने को मिलती हैं। यहां के नेटिव बनिया और ब्राहम्ण की कल्चर अलग है ओर दबंग जातियों की अपनी ढ़पली अपना राग है। षादी ब्याह के मामलों में बनिया और पंडित कोमों में सहनषीलता है और लचीलापन है तभी इन कोमों में ब्याह षादी के मामलों में फतवे एक बार भी षायद जारी नहीं हुए हैं। किसानों में भी दबंग लोगांे की बातें ही चलती हैं। सामुहिकता और भाईचारे की दुहाई देकर जितनी पंचायतें हुई और जितने भी झगड़ों में इन्होंने समझौते करवाये उनमें 100 में से 99 फैंसले दबंग के हक में और पीड़ित के खिलाफ किये गये। बलात्कारी के केस के समझौतों में बलात्कारी को ही राहत दिलवाई गई। कत्ल के केस में जेल में बन्द कातिल को ही राहत दिलवाई गई ।ं तरीके अलग अलग हो सकते हैं मगर नतीजे हमेषा पीड़ित के खिलाफ ही हुए। कमजोर के हक में न्यायकारी फैंसला षायद ही कोई हों। इसी प्रकार ब्याह षादी के मामलों में गांव की गांव और गोत की गोत का केस एक मनोज बबली का ही केस है। बाकी सारे के सारे केस दो गौतों के बीच के हैं जिनमें ज्यादातर में बच्चों के माता पिताओं को बहन भाई बन कर रहने के फतवे जारी किए गये हैं और प्रेमियों के कत्ल किये गये हैं। या दूसरी तरह के उत्पीड़न किये गये हैं। गोत के गोत में षादी के मामले में राई का पहाड़ बनाया जा रहा है। असली मुद्दों से युवाओं का ध्यान बांटा जा रहा है। भावनात्मक स्तर पर लोगांे की भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है। किसानी के संकट से किसानों को दिषा भ्रमित किया जा रहा है। गांव के युवा लड़के और लड़की जिन्दगी के चौराहे पर खड़े हैं।
   एक तरफ नवसामन्तवादी और नवउदारवादी अपसंस्कृति का बाजार उन्हें अपनी ओर खींच रहा है। दूसरी ओर बेरोजगारी युवाओं के सिर पर चढ़ कर इनके जीवन को नरक बनाए है। नषा , दारु, सैक्स, पोर्नोग्राफी उसको दिषाभ्रमित करने के कारगर औजारों के रुप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। साथ ही समाज में व्याप्त पिछड़े विचारों और रुढ़ियों को भी इस्तेमाल करके इनका भावनात्मक षोशण किया जा रहा है। हरियाणा में खाते पीते मध्यमवर्ग और अन्य साधन सम्पन्न तबकों का साम्राज्यवादी वैष्वीकरण को समर्थन किसी हद तक सरलता से समझ में आ सकता
है जिनके हित इस बात में हैं कि स्त्रियां,दलित,अल्पसंख्यक और करोड़ों निर्धन जनता नागरिक समाज के निर्माण के संघर्श से अलग रहें।  लेकिन साधारण जनता अगर फासीवादी मुहिम में षरीक कर ली जाती है तो वह अपनी भयानक असहायता, अकेलेपन, हताषा,अन्णसंषय,अवरुद्ध चेतना , पूर्व ग्रहों उदभ्रांत कामनाओं के कारण षरीक होती है। फासीवाद के कीड़े जनवाद से वंचित ओर उसके व्यवहार से अपरिचित, रिक्त, लम्पट और घोर अमानुशिक जीवन स्थितियों में रहने वाले जनसमूहों के बीच आसानी सेपनपते हैं। यह भूलना नहीं चाहिये कि हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी ने जितना जनतन्त्र को बरता है उससे कहीं ज्यादा फासीवादी परिस्थ्तिियों में रहने का अभ्यास किया है। इसमें कोई षक नहीं कि हरियाणा में जहां आज अनैतिक ताकत की पूजा की संस्कृति का गलबा है वहीं अच्छी बात यह है कि षहीद भगत सिंह से प्रेरणा लेते हुए युवा लड़के लड़कियों का एक हिस्सा इस अपसंस्कृति के खिलाफ एक संुसंस्कृत सभ्य समाज बनाने के काम में सकारात्मक सोच के साथ जुटा हुआ है। साधुवाद इन युवा लड़के लड़कियों को। इतने बडे़ संकट को कोई जात अपनी अपनी जात के स्तर पर हल करने की सोचे तो मुझे संभव नहीं लगता । कैसे सामना किया जाए इसके लिए विभिन्न विचारकों के विचार आमन्त्रित हैं।
कुछ विचारणीय बिन्दू इस प्रकार हो सकते हैं-
1.         

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

Black Money in India

स्विस बैंक में 4479 करोड़ , देश में 14958 करोड़ रूपये का काला  धन
,एस आई टी का खुलासा
एच एस बी सी की जेनेवा ब्रांच में 628 भारतीय खाताधारक
339 खातों में काला धन , 289 में कुछ नहीं , 79 पर कार्यवाही शुरू
ब्लैक मनी  रोकने को एस आई टी की सिफारिशें
1 कैश रखने और   लाने ले जाने की सीमा 10 -15 लाख की जाये ।
2 . कैश के  लिए पैन कार्ड का उल्लेख करना अनिवार्य किया जाये ।
3 . एक लाख रूपये से ज्यादा का भुगतान चैक से किया जाये ।
4 . 50 लाख से ज्यादा की कर चोरी को अपराध माना जाये । ताकि प्रिवेंसन ऑफ मनी  लांडरिंग एक्ट के तहत कार्यवाही हो सके ।
5 . एक्सपोर्ट इम्पोर्ट आंकड़ों में गड़बड़ी की जाँच के लिए संस्था बनाई जाये जो अन्य देशों से आंकड़ों का मिलान करे ।
6 . शिपिंग बिल्स  एक्सपोर्ट  होने वाले सामान और मशीनरी का अंतर्राष्ट्रीय बाजार मूल्य होना चाहिए ।
7 . यदि कानून का उलंघन कर किसी व्यक्ति या कंपनी ने विदेश में संम्पत्ति खरीदी है तो फेमा में प्रावधान होना चाहिए । इससे उतने ही मूल्य की देश में  संम्पत्ति को जब्त किया जा सके ।
8 . फाइनेंसियल इंटेलिजेंस यूनिट और लॉ एनफोर्समेंट ऑथोरटीज  मामले में शामिल सभी पक्षों में बातहीत होनी चाहिए ।
9 . जहाँ ई डी ने संम्पत्ति जब्त की है और आयकर वसूला जाना है तो विभाग को जब्त की गयी संम्पत्ति से बकाया वसूली का अधिकार दिया जाये ।
10 . सेंट्रल केवायसी रजिस्ट्री बनाई जाये , ताकि वित्तीय लेन देन में मल्टीपल आईडेन्टिटी हटाई जा सके ।
11 . आयकर के 5000 पैंडिंग मामलों  सुनवाई के लिए मुम्बई में अतिरिक्त 5  सी जे ऍम अदालतें बनाई जाएँ
दैनिक भास्कर --13 दिसंबर 2014 , फ्रंट पेज

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

SOME QUESTIONS

पूजा आरती प्रकरण --1--कुछ सवाल उठाये जा रहे हैं 
1 . बस में घटना की शुरुआत कैसे हुई ?
2 . अगर लड़कियों को नीचे फेंका गया तो वीडियो में क्यूँ नहीं दिखाई दे रहा ?
3 . लड़कों ने क्या कहा वह वीडियो में क्यों नहीं है ? सिर्फ पिटाई का ही सीन है ।
4 . जब केस दर्ज करवाया तो तीनों लड़कों के नाम लड़कियों को कहाँ से पता चले ? क्या लड़ियाँ पहले से लड़कों को जानती थी ?
5 . क्या पहली बस ख़राब हुई थी और यह झगड़ा दूसरी बस में हुआ ?
6 . अगर यह प्री प्लांड था तो इसके पीछे कौन कौन हैं और इस सब का क्या मकसद था । अगर लड़ों के पास हथियार होते तो क्या लड़कियों की जान नहीं जा सकती थी ?
7 . जो महिलाएं अब बोल रही हैं वे पहले चुप क्यों थी ?
8 . क्या बसों में महिलाओं और लड़कियों के साथ रोजाना बेशुमार छेड़ छाड़ की घटनाएँ नहीं हो रही ?
9 . पहले हुई घटनाओं में बस में बैठी हुई सवारियों की पहल कदमी के उदाहरण  नहीं मिलते । एकाध exception हो सकती है ।

पूजा आरती प्रकरण -2 -- में उठाये जा रहे कुछ सवाल

1 . दूसरी वीडियो में कम से कम चार लड़के दिखाई दे रहे हैं ,वे सब कौन हैं ?
2 . क्या इनमें एक लड़का सिसाने का है और दूसरा थाणे गॉवों का है ? और दुसरे लडके कौन हैं ?
3 . काफी साफ़ है । इसका बनाने वाला कौन है ?
4. क्या इस घटना की पुलिस रिपोर्ट किसी तरफ से करवाई गयी ?
5. यदि नहीं तो फिर क्यों नहीं करवाई गयी ?
6. क्या कोई समझौता हुआ था ? समझौता करवाने वाले कौन थे ? उसकी शर्तें क्या थी ?
7. डेढ़ दो महीने के बाद इस वीडियो का वायरल  होने के क्या क्या पक्ष हो सकते हैं ?
8. क्या सरकार ने घोसना जल्द बाजी में तो नहीं करदी ?
क्या कानून सच को सामने लाकर दोषियों को सजा दे पायेगा ?
9.  लड़कियों की होंसला अफजाई इस सब के बावजूद नहीं की  चाहिए ?

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