सोमवार, 27 जून 2016

देश का पिछड़ा वर्ग: भूत, वर्तमान और भविष्य


Posted: 26 Jun 2016 07:17 PM PDT

 “We must shape our course ourselves and by ourselves." -Babasaheb Ambedkar

  भारतीय वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था के दुष्प्रभाव इतने गहरे और प्रभावी हैं कि तमाम संवैधानिक उपचारों और लंबे समय तक चलने वाले जनसंघर्ष और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के बाद भी अभी तक कोई स्वस्थ सामाजिक संरचना देश में निर्मित नहीं की जा सकी है। देश का पिछड़ा वर्ग यहाँ की विशालकाय आबादी है। भिन्न-भिन्न जातियों के समूह इस वर्ग में सम्मिलित हैं यद्यपि जातीय अस्मिताओं में जी रहे इस वर्ग में रंचमात्र भी वर्गबोध होता तो यह आज इस देश का प्रभु वर्ग होता। यह वह वर्ग है जिसने औपनिवेशिक भारत में दलितों और अंत्यजों के साथ दोहरीगुलामी झेली है। ये अंग्रेजों के गुलाम तो थे ही साथ ही साथ देश की सवर्ण जातियों के गुलाम अलग से थे। सवर्ण जातियों का अपना एक अलग एजेंडा रहा है। विदेशी आक्रमण कारियों के शासन से लेकर मुगलों ब्रिटिशों तक वे अपने हितों और स्वार्थों के लिए तत्काल सत्ता के साथ हो जाते थे। उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी से कोई सरोकार नहीं था। भारत की सवर्ण जातियों ने अनेक मुस्लिम, तुर्क, गुलाम शासकों की दीवानी और दरबारी की। वे मुगलों के दरबार में उनके सेनापति और नवरत्न बनकर रहे, उनसे रोटी-बेटी का संबंध रखा। अंग्रेजों से ठेके लेने और राय बहादुर तथा राजा के खिताब पाने के लिए वे उनके भी चापलूस बने रहे। सवर्णों ने भारत की दलित-पिछड़ी जातियों को हाशिए पर
धकेल कर अंग्रेजों से प्राप्त न केवल आर्थिक उत्पादन के स्रोतों पर बल्कि राजनैतिक सत्ता पर भी अधिकार कर लिया। वही रंग आज भी विभिन्न राजनैतिक पार्टियों में दिखता है। ये केवल सत्ता के साथ रहना ही जानते हैं।  दूसरी तरफ पिछड़े वर्ग की कोई सांस्कृतिक अस्मिता नहीं रही। दलितों ने फिर भी एक दीर्घकालीन आंदोलन चलाया। क्योंकि उनके तो अस्तित्व पर ही संकट था। वे तो अमानवीय स्थितियों में जी रहे थे। उनके पास अंबेडकर जैसे नेता भी थे और उन्होंने लंबी लड़ाई लड़कर अपनी खोई हुई अस्मिता को प्राप्त किया। आज सरकारी नौकरियों से लेकर प्रत्येक क्षेत्र में दलितों का संतोषप्रद प्रतिनिधित्व है। लेकिन यदि सिरे से कोई गायब है तो वह हैं पिछड़े। पिछड़े वर्ग की कई सांस्कृतिक, राजनैतिक समस्याएँ हैं। इनके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं था न ये अस्पृश्यता के शिकार थे। जिसका फायदा उठाकर सवर्ण हिन्दुत्व और ब्राह्मणवाद ने इन्हें सवर्ण बनाने का सफल प्रयास जारी रखा तथा दलितों का उत्पीड़न करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक राजनीति में इन्हें राजनैतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया। जबकि अपनी मूल सामाजिकता में भारत की पिछड़ी जातियाँ सांप्रदायिक नहीं हैं। ब्राह्मण धर्म के चंगुल में फँसने के कारण इनका और भी बुरा हश्र हुआ। देश के मंदिर-मठों में सबसे अधिक चढ़ावा यही चढ़ाते हैं क्योंकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी की लगभग साठ फीसदी है। इनके द्वारा किए गए धार्मिक दान और चढ़ावे के बल पर ही इस देश का ब्राह्मणवाद फलता-फूलता और मुटाता है। पिछड़े व्यवसाय के स्तर पर किसान, पशुपालक, कामगार और खेतिहर मजदूर हैं। इसी तरह पसमांदा मुसलमानों में पिछड़ी जातियाँ नाई, जुलाहे, कसाई, घोसी, धुनिया आदि हैं। लक्ष्यार्थ यह कि देश में सबसे अधिक मेहनत का या शारीरिक श्रम का कार्य भी यही करते हैं क्योंकि सवर्ण जातियों ने पूर्णतया स्वयं को शारीरिक श्रम से दूर कर रखा है। प्रकारांतर से भारत की 15 प्रतिशत सवर्ण आबादी देश की पचासी प्रतिशत दलित, पिछड़ी, अल्पसंख्यक और आदिवासी जनता के श्रम पर न केवल जीती है बल्कि उसी की प्रदान की गयी शक्ति से उसको शासित और शोषित भी करती है। पिछड़े आज भी सवर्णों के लठैत बने हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन ने कुर्मी और यादव जैसी जातियों को थोड़ी बहुत जमीन अवश्य दिला दी लेकिन कहार, लोहार, निषाद, महरा, केवट, माली, नाई और कुम्हार जैसी पिछड़ी जातियाँ लगभग भूमिहीन ही रहीं। ये अभी भी गाँवों में रहती हैं। बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक भारत की सवर्ण जातियाँ पूरी तरह से शहरों में बस चुकी थीं। जमींदारी उन्मूलन ठीक से न होने की वजह से इनके पास पर्याप्त भूमि थी जिसे या तो इन्होंने बेच दिया या फिर शहर में रहकर ही खेतिहर मजदूरों से उस पर कृषि कराते रहे। उनके खेतिहर मजदूर भी पिछड़ी जाति के थे। इससे उन्हें दोहरा लाभ हुआ एक तो वे शहर में अंग्रेजी शिक्षा पाकर महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर काबिज हो गए और दूसरी तरफ कृषि के उत्पादन का लाभ भी उन्हें मिला जिससे उनकी स्थिति निरंतर सुदृढ़ होती गई और सामाजिक असमानता बढ़ती रही। दलितों का भी एक बड़ा जनसमूह शहरों की तरफ निकल गया। अंबेडकर ने दलितों को शहरों की ओर जाने का नारा दिया, उनकी नजर में भारतीय गाँव ‘जातीय भेदभाव का नर्क’ थे। इससे दलितों को लाभ भी हुआ। वे न केवल सरकारी नौकरियों में स्थान बना सके बल्कि एक समझदार, जागरुक मध्यवर्ग और उनके हितों-अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक दलित बुद्धिजीवी वर्ग भी अस्तित्व में ला सके। पिछड़े वर्ग का दुर्भाग्य रहा कि वह सवर्णवाद के झाँसे में आ गया और स्वयं को श्रेष्ठ हिन्दू मानने (क्षत्रिय आदि) एवं अपने आंतरिक ब्राह्मणवाद के चक्कर में फँसकर ही उसकी स्थिति आज इतनी सोचनीय हो गई है। पिछड़ा वर्ग केवल वोट बैंक बना रहा। स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की गति अत्यंत धीमी रही है। पिछड़ों के लिहाज से और भी धीमी। अंग्रेजों से सत्ता का जो हस्तांतरण हुआ वह भारत की सवर्ण जातियों को हुआ। भारत का पहला प्रधानमंत्री और भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। उन्होंने सामाजिक न्याय को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि यह उनके वर्चस्ववादी हितों के खिलाफ थी। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट को लंबे समय तक कांग्रेस के सवर्ण नेतृत्व ने दबाए रखा। जब तक इसे लागू किया जाता तब तक देश की सरकारी नौकरियों पर पूरी तरह से सवर्ण काबिज हो चुके थे। देश की दूसरी सवर्णवादी पार्टी भाजपा ने सांप्रदायिक सवर्ण हिन्दू संगठन आरएसएस के सहयोग से मण्डल के विरोध में कमंडल की राजनीति प्रारम्भ की और देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया। यह सत्य है किं मण्डल कमीशन के पश्चात पिछड़ों को जो 27 फीसदी आरक्षण मिला उससे उनकी राजनैतिक मानसिकता में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। मुंगेरीलाल, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे बड़े सामाजिक क्रांतिकारी नेता भी पिछड़े वर्ग में सामने आए। किन्तु आज भी केंद्रीय सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व केवल 12 फीसदी है जबकि उनकी आबादी लगभग 60 फीसदी है। हालात बहुत बुरे हैं। जितने सोचे जा रहे थे उससे अधिक ! देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल एक प्रोफेसर और एक वाइस चांसलर पिछड़ी जाति का है। देश के शीर्ष बीस अरबपतियों में एक भी पिछड़ा नहीं है। इसी तरह मीडिया, फिल्म, न्याय पालिका, कारपोरेट और साहित्य में भी पिछड़ों का यही हाल है। यह महज इत्तिफाक नहीं है कि आजादी के आधी सदी से अधिक का समय बीतने के बाद भी पिछड़ों की इतनी बुरी हालत है। इसके पीछे भयानक सवर्ण, वर्चस्ववादी, यथास्थितिवाद है। पिछड़ों को कई कानूनी दाँव-पेचों से समाज की मुख्य
धारा में आने से रोका जा रहा है। सवर्णवाद और हिन्दुत्व की बूटी से पिछड़े अपने वोट बैंक की ताकत को भी भूल जाते हैं और यही ब्राह्मणवाद की सफलता है। किन्तु अब पिछड़ों में एक नई चेतना देखी जा रही है। उन्होंने अपने कबीर, फुले, अंबेडकर और पेरियार जैसे नायकों को पहचान लिया है। ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा जैसे विचारकों को भी पिछड़ों ने समझ लिया है। इन्हें अपनी वोट की ताकत को पहचानना होगा और अपने हक की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरना होगा। सबसे पहले तो जातिवार जनगणना के आँकड़ों को सार्वजनिक करने की माँग करनी होगी। इससे पता चल जाएगा की इनकी आबादी की वास्तविक स्थिति क्या है। तभी ये अपनी आबादी के अनुपात में
प्रतिनिधित्व माँग सकेंगे। हालाँकि इस विषय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों का ढुलमुल रवैया है क्योंकि दोनों ही सवर्णवादी राजनीति करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को पिछड़ा बताकर वोट मांगते हैं लेकिन पिछड़ों के हक की बात पर मौन धारण कर लेते हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए ब्राह्मणवादी मोहन भागवत उन्हें निर्देश देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि पिछड़ों का वोट ही भारतीय राजनीति का भविष्य तय करता है लेकिन पिछड़ों का भविष्य और वर्तमान हमेशा हाशिए पर क्यों रखा जाता है? इस प्रश्न पर पिछड़ों को विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा आयोग को अभी तक संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया है। आरक्षण एक्ट के लिए पिछड़ों को माँग करनी चाहिए। आरक्षण एक्ट के तहत यह कानून होना चाहिए कि, किसी संस्था में आरक्षण के नियमों का विधिवत पालन न होने पर उस संस्था के प्रमुख को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय। क्योंकि व्यवस्था में बैठे हुए सवर्ण साजिश करके पिछड़े वर्ग की सीटों को सामान्य में बदलकर उस पर स्वजातीय भर्ती कर लेते हैं। यह सब खुले आम हो रहा है। पिछड़ों को सोचना चाहिए के वे इस देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाले वर्ग की श्रेणी में हैं, जिसकी मेहनत का कोई और मजा लूट रहा है। सांप्रदायिकता और उग्र हिन्दुत्व से इन्हें दूर रहना चाहिए क्योंकि यह सारा ढोंग इन्हीं का हक लूटने के लिए किया जाता है। जातीय और धार्मिक भेदभाव को भूल कर पिछड़ों को एक वर्ग के रूप में सामने आना चाहिए तभी वे अपने अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। हिंदुओं के पिछड़े और मुसलमानों के पसमांदा मुसलमान एक जैसे ही हैं। उनकी उनके धर्म में एक जैसी ही हालत है। इसलिए पिछड़ा, पिछड़ा एक समान होना चाहिए वह हिन्दू हो या मुसलमान! हजारों साल से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जड़ें जमाए हुए सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होना होगा। दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तो पहले से ही पिछड़ों के साथ हैं।
   -संतोष अर्श
मोबाइल: 09033510239
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के जून अंक 2016  में प्रकाशित

शुक्रवार, 24 जून 2016

बिजली कर्मचारी हड़ताल


बिजली कर्मचारी हड़ताल 
एस्मा लगाकै सरकार कर्मचारी आंदोलन दबावै देखो ।।
निजीकरण करकै बिजली का जनता नै लुटवावै देखो ।।
ठेके पै देकै बिजली विभाग जनता के दुःख घने बढाये 
बिजली बिल अनतोले देखो लोगां ताहिं जाकै पकड़ाये
मानस धक्के खावैं दफ्तरां के बिल ठीक नहीं हो पावै देखो ।।
सारी मांग कर्मचारियों की पूरी करने आली लागैं देखो
बिजली रेट मत बढ़ाओ जनता की मांग ये उठावैं देखो
बिजली के रेट बढ़ाकै या आज जनता नै सतावै देखो ।।
कर्मचारी एकता जिंदाबाद या जनता मदद मैं आवैगी
दुखी होरी सै बहोत घणी सुर मैं सुर जनता मिलावैगी
लडां मिलकै नै आज लड़ाई संघर्ष सफलता पावै देखो।।
आज आरपार की लड़ाई निजीकरण कै खिलाफ लडांगे
नहीं डरां इस एस्मा तै अपनी माँगाँ पर कति अडांगे
रणबीर करो होंसला एकबै सरकार झुक ज्यावै देखो ।।





नीतू जी की हत्या के विरोध में

नीतू जी की हत्या के विरोध में हुडा सिटी पार्क में सभा का आयोजन किया गया जिसमें बहुत से जनसंगठनों ने, परिवार सदस्यों ने , मोहल्ले के लोगों ने हिस्सेदारी की और २७ जून को एक महाप्रदर्शन का फैंसला किया / हुडा सिटी पार्क में २७ जून को सुबह दस बजे रोहतक और आस पास के गाँवों के लोग इसमें शामिल होंगे । यह एकेले नीतू की हत्या का मसला नहीं है बल्कि हरेक नागरिक की सुरक्षा का मसला भी है । विनोद ,ओमनाथ जी , महाबीर मालिक , राज कुमारी जी , वीणा मालिक और अंजू ने संम्बोधन किया ।









मंगलवार, 21 जून 2016

ईब कोन्या


एक बै एक साड़ी बेचन आला गाम मैं आग्या | उसने एक घरबारन  को कहया -- देखै के सै घनी बढ़िया साड़ी सै | बस  चालीस रपईयाँ की | ले कै देख | सारी उमर याद राखैगी | घर बारन बोली --- ना बाबा ना | इसका रांग कच्चा निकल गया तो मैं क्या करूंगी ? देनी है तो बीस रपयीयों में दे दे | घनी ए वार खींच तान चलती रही | हार कै साड़ी आला बोल्या -- चाल जो तेरा जी  करै  वो दे दे | घरबारण नै  साड़ी के बीस रपईये दे दिए | उस दिन पीछे उसने साड़ी का पैंडा ए ना छोड्या | पड़ोसन कहती ---हाय ! कितनी बढ़िया साड़ी ! कित तैं खरीद कै ल्याई ? 
हफ्ते मैं मैली करदी साड़ी | घरबारण गयी जोहड़ पै साड़ी धोवन | सारा जोहड़ लाल कर दीया साड़ी नै | सारा रंग   छूट ग्या | छूटती ए  बोली -- ओहले  म नै के बेरा था  रंग उतर ज्यागा | पर उस कै बाकी कति नहीं रही | नयों बोली --आवन दे जाये रोये नै | पीसे उलटे नहीं लिए तो मेरा भी नाम धमलो नहीं | फेर एक मिहना बाट  देखी पर जाये रोया कोनी आया | रमलू बोल्या --इसी इसी तो इब्बी रैहरी सें म्हारे गाम मैं | भैंसवाल  मैं तो सुन्या करते अक  वहां के लोग बावले सें | एक भैंसवाल का रिश्तेदार आरया  था ओ  बोल्या अक ईब कोन्या रैहरे बावले | रमलू नै फेर एक चुटकला सुनाया ----
म्हारा एक कलास फैलो था धनपत खरखौदे का ओ ब्याह दिया भैंसवाल  | नया नया ब्याह | दोनूं फिल्म देखण चाले गये राज टाकीज मैं | फिल्म शुरू होगी | न्यूज आई | उसमें कई बूढ़े बैठे होक्का पीवन लागरे थे | देखते की साथ धनपत की बहु नै तै एक हाथ लम्बा घूँघट कर लिया | हाफ टेम हुया तै धनपत नै बुझी अक किसी लागी फिल्म ? तै वा बोली शुरू होंते की साथ वे बूढ़े आगे थे | मने तो जिब घूँघट कर लिया था | फिल्म कोन्या देखण पाई | ओ भैंसवालिया बी सुनै था ओ बोल्या उसनै तो कदे गाम मैं घूँघट ना काढ्या तै वहां क्यूकर काढ लिया ? कमलू अर ठमलू  जोर के हंस पड़े अर बोले अक  यो  ठीक कहवै सै रमलू अक भैंस वाल के लोग इब्बी बावले रैहरे सें | भैंस वाल की छोरी भैंसवाल  मैं घूँघट थोड़े ए ना काढैगी|

सोमवार, 20 जून 2016

मध्य प्रदेश में महिला स्वास्थ्य

मध्य प्रदेश   में महिला स्वास्थ्य में सुधार लाना एक चुनौती है. यह चुनौती संसधानों की कमी के कारण नहीं पैदा हुई बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव, स्वास्थ्य सेवाओं के निचले ढांचे में सुधार का अभाव और विभिन्न योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाने के कारण है। यह साफ नजर आ रहा है कि जमीनी स्तर पर महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए विकल्पों पर विचार नहीं किया जा रहा है। यद्यपि पिछले दशकों की तुलना में मातृत्व मृत्यु दर में कमी देखी जा रही है पर इसके बावजूद प्रदेश में अभी भी प्रति वर्ष 7700 मातृत्व मृत्यु हो रही है।
सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों के तहत भी महिला स्वास्थ्य को बेहतर बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके तहत यह निहित है कि वर्ष 2015 तक मातृत्व मृत्यु को तीन चौथाई कम करना है। यदि सरकारी आंकड़ों को ही देखें, तो म.प्र. का आर्थिक सर्वेक्षण 2006-07 के अनुसार 10 वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश में मातृत्व मृत्यु का औसत 498 प्रति लाख था, जो कि वर्तमान में 379 प्रति लाख के स्तर पर आ गया है। मध्यप्रदेश की स्वास्थ्य नीति के अनुसार वर्ष 2011 तक मातृत्व मृत्यु दर को 220 प्रति लाख के स्तर तक लाना है। यह लक्ष्य 1997 के 498 प्रति लाख मातृत्व मृत्यु दर के आधार पर रखा गया था। मीडियम टर्म हेल्थ सेक्टर स्ट्रेटजी- 2006 में 2005 की स्थिति में मातृत्व मृत्यु दर 400 प्रति लाख माना गया है।
यदि हाल ही में जारी तीसरे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर नजर डालें (यद्यपि मध्यप्रदेश सरकार इन आंकड़ों को नहीं मानती और इसे लेकर राज्य सरकार ने केन्द्र के समक्ष आपति भी दर्ज करा दी है) तो कई तथ्य सामने आते हैं। इस सर्वेक्षण में आए परिणामों में यह पाया गया है कि मध्यप्रदेश में अपने पिछले प्रसव के दरम्यान प्रसव पूर्व तीन आवश्यक जांच कराने वाली माताओं की संख्या 42.2 प्रतिशत है, किसी डॉक्टर, नर्स, ए.एन.एम., एल.एच.डब्ल्यु या प्रशिक्षित स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की निगरानी में प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 37.1 प्रतिशत है, संस्थागत प्रसव कराने वाली माताओं की संख्या 29.7 प्रतिशत है, प्रसव के दो दिनों के अंदर प्रसव बाद की स्वास्थ्य निगरानी पाने वाली माताओं की संख्या 27.9 प्रतिशत है, सामान्य से कम बी.एम.आई. वाली महिलाओं की संख्या 40.1 प्रतिशत है, 15-49 वर्ष की एनिमिया ग्रस्त विवाहित महिलाओं की संख्या 57.6 प्रतिशत है और एनिमिया ग्रस्त 15-49 वर्ष की गर्भवती महिलाओं की संख्या 57.9 प्रतिशत है।
सारा मामला इन्हीं आंकड़ों की विष्वसनीयता पर आकर टिक गया है। रकार बार-बार इन आंकड़ों को कठघरे में खड़ा कर यह दर्शाने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। यह सही है कि जितनी योजनाएं चल रही है, उसका बेहतर क्रियान्वयन हो तो निश्चय ही गुणात्मक सुधार देखने को मिलेगा पर स्वास्थ्य विभाग का निचला ढांचा इतना कमजोर हो गया है कि इस दावे पर विश्वास करना संभव नहीं है कि प्रदेश में महिला स्वास्थ्य में व्यापक सुधार हुआ है। सरकार स्वयं इस बात को स्वीकार कर रही है कि प्रदेश में डॉक्टरों की भारी कमी है, खासतौर से महिला डॉक्टरों की तब महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य कैसे मिल रहा है? पिछले विधान सभा सत्र में महिला डॉक्टरों की कमी को लेकर बहुत कम समय के लिए, पर गंभीर चर्चा हुई थी, जिसमें यह कहा गया कि आयुष की महिला डॉक्टरों को प्रशिक्षित कर उन्हें ग्रामीण अंचलों में पदस्थ कर महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएगी पर अभी तक इस पर क्या हुआ, की जानकारी किसी को नहीं है।
प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, बल्कि इस पर अमल करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी के विधायक डॉ. सुनीलम् प्रदेश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। जन स्वास्थ्य के मुद्दे पर कार्यरत डॉक्टर एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का भी स्पष्ट रूप से यह कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार के प्रयास और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को निजी क्षेत्र को सौंपना, दोनों विरोधाभाशी काम है। जन स्वास्थ्य अभियान के डॉ. अजय खरे का कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी हाथों में सौंपना, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की प्रक्रिया को उल्टी दिशा में ले जाने वाला कदम है. प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण करने से तमाम सरकारी दावों के बावजूद महिला एवं बाल स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, तब न मातृ मृत्यु में कमी लाई जा सकती है और न ही बाल मृत्यु में। यह प्रदेश के लिए दुखद बात है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया। इस स्थिति को सुधारने के बजाय इसे निजी हाथों में देने की तैयारी का अर्थ आम लोगों से स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार को छिनने की साजिश ही हो सकती है। डॉ. खरे का कहना है कि अभी भी जिन समुदायों एवं इलाकों में महिला एवं बाल मृत्यु ज्यादा है, उन इलाकों से स्वास्थ्य केन्द्रों तक आना लोगों के लिए खर्चीला काम है, इस पर भी यदि स्वास्थ्य सेवाओं को निजी कर दिया गया, तो लोग स्वास्थ्य केन्द्रों में जाने के बजाय नीम-हाकिम एवं बाबाओं की शरण में ही जाएंगे। उसके बाद स्वास्थ्य की स्थिति सुधरेगी या फिर बिगड़ेगी, आसानी से समझा जा सकता है।
यदि इन तथ्यों को देखा जाये, तो पता चलता है कि प्रदेश में मातृत्व स्वास्थ्य में सुधार लाने के लिए नीतिगत प्रयासों की ज्यादा जरूरत है। वर्तमान में सरकार मातृत्व स्वास्थ्य के लिए कई योजनाएं संचालित कर रही है, जिसमें - जननी सुरक्षा योजना, गर्भवती महिला हेतु सुविधा, संस्थागत प्रसव योजना, प्रसव हेतु परिवहन एवं उपचार योजना प्रमुख हैं। पर सवाल यह है कि इन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पा रहा है या नहीं¬सिर्फ यही नहीं, बल्कि अस्पताल प्रबंधन का रवैया, गरीबी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव आदि कई कारण हैं, जो माहिला स्वास्थ्य में सुधार लाने की दिशा में चुनौती हैं।
राजू  कुमार

शनिवार, 21 मई 2016

chor kaun

चौर कौन और कोतवाल कौन -----जाएँ तो जाएँ कहाँ ---- ??????????!!!!!!!!!!!!!!!!!! The person like Vadra dare to label the nation as " Banana Republic" . It is shame to the countrymen-------and it is because that Modi Sarkar is in indulgence with the Jumalas , not doing the groundwork as well as not taking care of the crooks . Just cacophonies , no real lyrics--------Congress is worst than BJP and BJP is worse than Congress--------goes on in a spiral fashion--------------In BJP govt. , even Vadra is free to say " Banana Republic" in reference to the nation's governance -----------what a tragic and shameful paraphernalia !!!!!!!! I hate congress but not less than BJP , though.
चौर कौन और कोतवाल कौन -----जाएँ तो जाएँ कहाँ ----
??????????!!!!!!!!!!!!!!!!!! समझें और समझाएं -------------------
पहल करें -------------पहिए का रुख बदलने का --------
मुश्किल है -----------ना मुमकिन तो नहीं
जागो, मेरे भाई जागो
शामिल हों: बदलाव की लड़ाई और तमन्ना
Join: Jago, Mere Bhai Jago

Abhay Vivek Aggroia



MODI JI KE 2 SAAL

2 years of Modi Govt: drought of ideas, drain of credibility



‘Achhe Din’ were supposed to have arrived in 2014, but didn’t. Even 2-years later, there is no trace of its much hyped arrival. In fact, the past 2-year period has been an exercise in creating circumstances that are antithetical to the sustenance of ‘Achhe Din’. But can a Government stoop to such lows that they start working against the interests of its own people?

Shri Narendra Modi’s crony capitalist friends invested heavily in his 2014 election campaign. They were instrumental in designing, funding & executing his surreal campaign and creating a demigod like aura around his person. 
So when the time came, it was obvious they would ask for returns. On 26 May 2014, Shri Modi became the Prime Minister of India, but the backrooms of his new Government had already been taken up by his corporate friends.

Their first targets were India’s farmers. Within the first 6 months itself, Modi Government initiated one of the most brazen attempts to capture the land of farmers – first through Amendments to UPA’s pro-farmer Land Acquisition Law and then through a series of Ordinances. They failed, and had to retreat in face of spirited opposition put up by the Congress party. 

Modi Government’s policy decisions & priorities are heavily skewed against the interests of India’s poor, farmers, labourers & unusually inclined towards the interests of few big business houses. 

The attitude of the Modi Government can be been summed up by their inaction & indifference in handling 2 years of drought. Cabinet Minister Ms. Uma Bharti even went on record saying “no one can prepare for a drought,” and when the Indian Railways sent a ‘water train’ to Maharashtra it sent a ‘bill’ for Rs 2 crore to the State Government. These two incidents are clear indicators that to the Modi administration farmers don’t matter. 

Shri Modi came to power comparing his performance with that of the UPA. Yet even a cursory glance at the data will show that the growth in Rural Income under UPA was 30%, while under the NDA it has only been 6%. Under the BJP, the average MSP increase has been a paltry 3% per annum, while under the Congress led UPA it averaged 14.87% per annum. 

Under the Modi Government, production of pulses and food grains have fallen from 5.99 million tonnes to 5.36 million tonnes for pulses, and 128.7 million tonnes to 124.2 million tonnes, respectively, between 2013 and 2015. For the farmer, the simple of act of farming has ceased to be profitable. 

An RTI application reveals that the profit margin to grow Urad Dal in 2014-15 stood at a paltry 33 paise/kg. Why would a farmer grow pulses for this rate of return? As the population grows, so does the demand for food. But the Modi administration doesn’t understand this, or rather, does not want to understand it.  

In times of drought, the BJP in its hubris has chosen to either ignore or look the other way when landmark legislations of the UPA, which could have been used to help the rural population, were being poorly implemented. MGNREGA has seen only 1.8% of the eligible people get 150 days of work in drought-hit states. Food Security Act has been implemented in only fits and starts. Caught in the middle of BJPs vendetta politics, the Indian farmers is starving, jobless & dying of thirst. 

The BJP likes to tout the difference between India and Bharat, the urban and the rural, and how they are the defenders of rural India. Yet under the watchful gaze of the Prime Minister, farmer suicides have grown by 209%! From 969 farmer suicides in 2014, this number has increased to 2993 in 2015. And this number is merely farmers who were forced to commit suicide because of crop related reasons, ignoring all systemic pressures which are placed on the farmer by a heartless Government. 

When the Government releases latest data in July, the number of farmers who have committed suicide will be significantly higher. To put it in perspective, in Maharashtra alone, as per a reply in the State Assembly, 3228 farmers have committed suicide, significantly higher than the official All-India number. 

This Government has convinced itself that rhetoric equals sound policy and effective action. But, Shri Narendra Modi should remember good rhetoric, devoid of substance, will not feed the farmer, nor improve the agriculture economy, which grew at 1% in 2015, after falling by 0.2% in 2014.

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