सोमवार, 11 जुलाई 2016

This is what Golwalkar says on this: ..only those movements are truly ‘National’ as aim at rebuilding, re-vitalizing and emancipating from its present stupor, the Hindu Nation. Those only are nationalist patriots, who, with the aspiration to glorify the Hindu race and Nation next to their heart, are prompted into activity and strive to achieve that goal. All others are either traitors, and enemies to the National cause, or, to take a charitable view, idiots. (p. 99-100)

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

सोशल साइट्स से पनपती मोहब्बत या नफरत

Posted: 30 Jun 2016 08:21 PM PDT
आधुनिक युग में सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। जिसके द्वारा हम समाज के सभी पहलुओं को उठाने का कार्य करते हैं। चाहे वह आर्थिक हो, सामाजिक या फिर राजनैतिक सभी प्रकार की गतिविधियों को सोशल मीडिया ने अपने अंदर समा लिया है । किसी भी लोकतंत्र के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंम्भ होते हंै न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और पत्रकारिता। वर्तमान समय में पत्रकारिता ने देश के अधिकतर मनुष्यों को अपने कार्य में परोक्ष रूप से भागी बनाया है। क्योंकि उसका सबसे  बड़ा कारण है-सोशल साइट्स, सोशल साइट्स ही वर्तमान मीडिया का आधुनिक रूप है। इसलिए बहुत से विद्वान सोशल मीडिया को पत्रकारिता की माता भी स्वीकार करते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है, सोशल साइट्स पर हैश टैग करके किसी भी मुद्दे को इलेक्ट्रॉनिक या प्रिंट मीडिया को मुहैया कराना, इसके बाद उस मुद्दे पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संज्ञान लेती भी है, या नहीं उसका भी एक कारण है ज्त्च्!! यदि किसी चैनल विशेष को ऐसा प्रतीत होता है कि मुद्दा उनकी विचारधारा के अनुकूल है, तो उस पर बहस होती है, अन्यथा उसको ठंडे बस्ते में डालकर छोड़ दिया जाता है, लेकिन सबसे सशक्त माध्यम सोशल मीडिया पर हैश टैग करके मुद्दों को आगे बढ़ाया जाता है, कभी-कभी मुद्दा केवल सोशल मीडिया से ही आगे बढ़ता है और राजनेताओं तक पहुँच जाता है, जिससे कोई भी सांसद उस मुद्दे को संसद में उठाकर पक्ष या विपक्ष पर वार करता है। सोशल मीडिया का यदि हम विश्लेषण करें तो लगभग 200 साइट्स हैं, मुख्यतः हमारे मस्तिष्क में फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब, ब्लॉग और व्हाट्सएप्प आदि का नाम सर्वप्रथम आता है, क्योंकि इन माध्यमों से कोई भी सूचना माइक्रोसैकेण्ड के अनुसार देश-विदेश में पहुँच जाती है और क्रिया प्रतिक्रिया भी तुरंत प्राप्त हो जाती है। सोशल मीडिया की लोकप्रियता का अंदाजा इस वैश्विक परिवेश में अमरीका के यूनाइटेड साइबर स्कूल से लगाया जाता है। विभिन्न संचार माध्यमों को जन-जन तक पहँुचने में काफी समय लगा जैसे रेडियो को अड़तीस साल, टी.वी. को तेरह साल तथा इन्टरनेट को चार साल और फेसबुक जैसी साइट्स को सौ मिलियन लोगों तक पहुँचने में मात्र नौ महीने लगे। उसके बाद आवश्यक्तानुसार सोशल साइट्स आती रही और कम समय में अपनी प्रसिद्धि को प्राप्त होती रही। सोशल साइट्स केवल युवाओं को ही नहीं पसंद है, बल्कि अमरीका के साठ से अस्सी साल तक के बुजुर्ग इस पर सक्रिय रहते हैं। अब यह संख्या भारत में भी बहुत तेज गति से आगे बढ़ रही है।
    सोशल साइट्स ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का ऐसा स्वतंत्र माध्यम दिया है, जिसके जरिए वह अपनी बात दुनिया के किसी भी व्यक्ति को पलक झपकते ही पहुँचा सकता है और उसका परिणाम पॉजिटिव या नेगेटिव चिह्न में प्राप्त कर सकता है। वर्तमान समय में युवा जानकारी के लिए अधिकतर सोशल मीडिया पर ही निर्भर रहता है। यह बात दूसरी है कि जानकारी का स्रोत प्रामाणिक है या अप्रामाणिक। संयुक्त राष्ट्र अमरीका में पचहत्तर प्रतिशत लोग अपनी जानकारी को बढ़ाने के लिए ब्लॉग का प्रयोग करते हैं। एक तरह से सूचनाओं, जानकारियों का विकेंद्रीकरण हुआ है। क्योंकि अब लोग किसी सूचना के लिए व्यक्ति या संस्था पर आश्रित नहीं हैं, बल्कि बस एक क्लिक करके सूचनाओं का भण्डार आपके समक्ष खुल जाता है और आप उपयोगी जानकारियों का संग्रह करके उसका आवश्यकतानुसार प्रयोग भी कर सकते हैं तथा कुछ सेकण्ड में अपनी प्रतिक्रिया पक्ष या विपक्ष में भी व्यक्त कर सकते हैं जबकि पारम्परिक मीडिया में आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कर सकते, जो खबर आपको  प्रसारित की गई है उसकी प्रामाणिकता में भी संशय रहता है। यदि हम सूचनाओं और आंदोलनों का अवलोकन करें, तो हम देखते हैं कि अनेक आंदोलनों का मुख्य सूचना का माध्यम सोशल साइट्स ही था जैसे अरब क्रांति, वाल स्ट्रीट, लीबिया, मिश्र और ट्यूनीशिया आदि देशो में भी आंदोलनों को मुखर रूप देने का कार्य सोशल साइट्स ने ही किया जिससे सत्ता पक्ष की चूलें हिलती हुई नजर आईं और युवाओं ने अपनी अभिव्यक्ति से वहाँ की तानाशाही सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया। यदि हम भारत के परिप्रेक्ष्य में दृष्टिपात करें तो हम देखते हैं कि अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या फिर बाबा रामदेव का आन्दोलन हो, सबको मुख्यतः सोशल मीडिया ने ही रंग दिया और उस आन्दोलन ने सफल होते हुए तत्कालीन सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, जिससे आगामी चुनाव में उसको सत्ता से हाथ धोना पड़ा और युवाओं को तत्कालीन सरकार की  भ्रष्टाचारी नीतियों से भी अवगत कराया गया।
    वर्तमान सरकार का यदि हम मूल्यांकन करें तो हम देखते हैं कि प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अधिकतर सत्ता के गलियारों से संचालित होती है, जिससे सत्ता के षड्यंत्र और दमनकारी नीतियों का लोगों को पूर्णतया पता नहीं चल पाता, जो हल्की फुलकी खबरें भी मालूम होती हैं उसमें कुछ खास जनता को जागरूक करने के लिए नहीं होता। सोशल मीडिया ने सत्ता की सभी दमनकारी नीतियों और षड्यंत्रकारी कार्यों का विश्लेषण तर्कपूर्ण करके उसको बहुत हद तक बैकफूट पर लाकर खड़ा कर दिया है, जैसे शिक्षा नीति हो या फिर धर्म से षड्यंत्र की नीति, नित्य रोज नए-नए शगूफों के माध्यम से वर्तमान सरकार बहुसंख्यक को रिझाने के लिए धार्मिक उन्माद, मानसिकता, साम्प्रदायिकता, लव जिहाद, गोमांस प्रकरण, रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या या फिर कन्हैया कुमार और उनके साथियों को देशद्रोही साबित करने का षड्यंत्र हो, इन सब काले कारनामों को युवाओं ने सोशल मीडिया के ही माध्यम से हैश टैग किया और अपने आन्दोलन को देशभर के लोगों तक पहुँचाया, जो बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी कुछ प्रसारित किया। मुख्यतः सोशल मीडिया ने इन सब आंदोलनों को सबसे अधिक कवरेज दिया और यह जन आन्दोलन के रूप में परिवर्तित हो पाया।
    जिस प्रकार से सोशल साइट्स को लोग अपने धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक कार्यों के लिए प्रयोग करते हैं, ठीक उसी प्रकार कुछ सांप्रदायिक ताकतंे भी इसका प्रयोग करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की भी पूर्ति करती हैं, जैसे असम हिंसा में लोगों को भयभीत करके उनको पलायन के लिए मजबूर किया गया। आजकल भारत में भी वीडियो या मैसेज के माध्यम से देश में घृणा का माहौल उत्पन्न करके राजनैतिक लाभ साधा जाता है, जैसे मुजफ्फरनगर दंगे से पहले कुछ राजनेताओं ने वहाँ की जनता को उलटी सीधी वीडियो दिखाकर एक धर्म विशेष के खिलाफ आक्रोशित करके मानवता का कत्ल कराया, जिससे पूरी मानवता उसके लिए शर्मशार हुई। दूसरी तरफ आजकल साइबर आतंकवाद भी इसका दुरुपयोग धड़ल्ले से कर रहा है। आम लोगों की  तरह आतंकवादी भी इसका उपयोग अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के लिए कर रहे हैं, जिसमें छद्म नामों से फेसबुक, ट्वीटर आदि पर अपनी फेक आईडी बनाकर मासूम नौजवानों को अपने चंगुल में फंसाकर और धन का लालच देकर उनका दोहन करके अपनी कुंठाग्रस्त इच्छाओं की पूर्ति कर रहे हैं। आजकल फेसबुक और व्हाट्सएप्प के माध्यम से नफरत फैलाने का कार्य चरम सीमा पर है। इसमें कार्य करने वाले कुछ ऐसे लोग हैं, जिनको राजनैतिक पार्टियाँ अपने हित को साधने के लिए धर्म की मखमली चादर में लपेटे हुए हैं। पार्टियाँ यह कार्य मैसेज, फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर अपने किराए के यूजर से कराती हैं, जिससे समाज में तर्कहीन और तथ्यहीन जानकारी पहुँचती है, जिससे सामज को तोड़कर अपने वोट बैंक की पॉलिटिक्स को साधा जाता है। ऐसे आरोप देश की अनेक राजनैतिक पार्टियों को लग चुके हैं जैसे-कांग्रेस, बीजेपी और आप।
    इसकी सच्चाई जानने के लिए आप फेसबुक के हिंदी या अंग्रेजी न्यूज चैनल के आधिकारिक फेसबुक पेज पर जाएँ, तो देखेंगे कि हर तीसरा कमेंट एक जैसा होगा तथा उसमें तथ्यहीन, कुतर्क सम्मत जानकारी होगी, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि यह कमेंट किसी एक व्यक्ति ने प्रचारित किया है अपनी पार्टियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए। सोशल साइट्स को आजकल कुछ पारंगत लोग आईडी, ईमेल हैक करके उसका दुष्प्रयोग कर रहे हैं, जैसे विकिलीक्स ने बहुत सारे खुलासे विभिन्न देशों के सन्दर्भ में किए। जिसमें पूँजीपति देशों की मंशा और उनके राजनैतिक कूटनीति का पता चलता है। सोशल साइट्स को कम उम्र के बच्चे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, जो कि अभी किशोरावस्था में हैं जिससे उनके ऊपर मानसिक, शारीरिक और व्यावहारिक तौर पर असर देखने को मिल रहा है कुछ वयस्क और अवयस्क लोग सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक वीडियो और फोटो शेयर करते हैं, जिससे टीनेजर में कामुकता और समय से पहले वयस्क होने की प्रवृत्ति को वे महसूस करने लगते हैं जो कि सभ्य समाज के लिए अत्यंत घातक है तथा मनोवैज्ञानिक तौर पर भी बच्चे का व्यवहार माता-पिता और समाज के लिए सही नहीं होता है। एक शोध से मालूम हुआ है कि फेसबुक का प्रयोग करने वाले एक करोड़ से ज्यादा सदस्य चैदह साल से कम आयु के हैं।
    आजकल सोशल साइट्स सिर्फ अपनी बात और विचार रखने भर का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह रिश्तों को जोड़ने का भी माध्यम है, जिस प्रकार से सोशल साइट्स पर केवल नफरत ही नहीं परोसी जाती हैं बल्कि मोहब्बत के भी रंग भरे जाते हंै जहाँ पर बहुत से नए मित्र बनते है, वहीं दूसरी तरफ पुराने मित्र भी मिलते हैं और अपने व्यक्तिगत जीवन को एक-दूसरे से शेयर करते हैं, जिसके माध्यम से देश-विदेश में बैठे पुराने या नए मित्रों से बात पल भर में हो जाती है। वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो देश-विदेश में बैठे रिश्तेदारों से आजकल पल भर में अनेक सोशल साइट्स के माध्यम से वीडियो कालिंग हो जाती है, जिससे रिश्तों में एक अलग मिठास का अनुभव होता है और रिश्ते मजबूत बने रहते हैं।
    वर्तमान समय में हम सोशल मीडिया का सही उपयोग करके समाज को कुछ बेहतर प्रस्तुत कर सकते हैं, यदि देश और राज्य की सरकारों ने इस पर समय रहते काबू नहीं पाया तो आए दिन बढ़ती मानसिक साम्प्रदायिकता और नफरत का माहौल नहीं रुक पाएगा, जो इस सभ्य समाज के लिए हानिकारक है। अर्थात हम कह सकते हैं कि यदि सही प्रयोग किया गया तो सोशल मीडिया, सोशल मीडिया ही रहेगा, वरना शोषण मीडिया बनकर समाज को अनेक प्रकार से ठगता रहेगा। इसके सही प्रयोग से हमारी पहचान देश ही नहीं विश्व स्तर पर बनेगी और हम वसुधैव कुटुम्बकम् का सही मतलब दुनिया को समझा पाएँगे।
 -अकरम हुसैन
मोबाइल - 08791633435
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित
 

आमि निर्दोष-1

Posted: 04 Jul 2016 07:01 AM PDT
      उनीदे शहर ने सुबह की अंगड़ाई ली। वह लौटी तो बड़बड़ाती आ रही थी- ‘हाय किसी ने उसकी नहीं सुनी। पन्द्रह अगस्त से एक दिन पहले ही मार डाला।....काहे का पन्द्रह अगस्त है.....हमारा तो जी खराब हो गया। जैसे अंग्रेज थे ऐसे ही ये हैं...’अखबार मेरी ओर उछालकर बोली- ‘लो पढ़ लो। आपका कानून कहता है कि मरने वाला झूठ नहीं बोलता। इसीलिए डाइंग डिक्लरेशन पर भरोसा करते हैं न? तो इस पर किसी ने भरोसा क्यों नहीं किया? फाँसी के तख्ते पर भी उसने यही कहा-मैं निर्दोष हूँ। वह भी तो मरने जा रहा था। अरे, जल्लाद तक काँप उठा। पर आपके कानून का कलेजा नहीं पसीजा।’ वह चाय लेने चली गई। जिस तरह वह ‘आपका कानून’ कह कह गई थी उससे मैं चैंका जरूर। लेकिन पिछले चार दिन से धनंजय चटर्जी को फाँसी के मामले में उसने अपना जो क्षोभ और उत्तेजना प्रकट की थी उसे देखते हुए मैंने न उलझना ठीक समझा।
अंततः छीन ली गईं धनंजय की साँसें।
अगस्त 15, 2004।
    कोलकाता। चैदह साल पहले एक किशोरी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी धनंजय चटर्जी को शनिवार सुबह यहाँ अलीपुर सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गई। धनंजय के बूढ़े माता-पिता और उसकी पत्नी ने खुद को अपने घर में कैद रखा और उसका शव लेने नहीं आए। बेटे की मौत की खबर पाकर उसके पिता बंशीधर चटर्जी और माँ बेला रानी देवी की तबियत बिगड़ गई।
दो शब्द
    फाँसी के तख्ते से उसने कहा- ‘‘मैं निर्दोष हूँ।’’ उसकी चीत्कार की प्रतिध्वनि हजारों मील दूर मैंने भी सुनी। कोर्ट-कचहरी और थाने-चैकियों में कानून के मकड़जाल में फँसे अनगिनत साधारण लोगों की वह चीत्कार थी। इस पुस्तक में काश्मीरा सिंह, शमसुद्दीन, अमित और मुस्तकीम से आप मिलेंगे। वे सब उसकी आह में आह मिला रहे थे।
    स्वतंत्रता की 57वीं सालगिरोह से एक दिन पूर्व ही उसे फाँसी दी गई थी। वह न तो ईसा और सुकरात की तरह महान दार्शनिक था और न ही सरदार भगत सिंह की तरह महान क्रान्तिकारी था। उसने अपने जीवन में कोई ऐसा काम भी नहीं किया था जिसके लिए समाज उसे आदरपूर्वक याद करता। वह स्थापित राज्य सत्ता के लिए कोई गंभीर चुनौती भी नहीं था। वह पाप-पुण्य का पुतला साधारण नागरिक था। उसे हमारे देश के न्याय तंत्र ने बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध का दोषी पाया था।
    वह धनंजय चटर्जी था।
    धनंजय चटर्जी से मेरा कोई परिचय, सम्बन्ध या सरोकार उसके जीते जी नहीं रहा। परन्तु 15 अगस्त 2004 की प्रातः मरणोपरान्त वह मेरे घर और मित्रों की चर्चा में मुख्य अतिथि था। वह चर्चा ही इस पुस्तक की प्रस्तुति है जहाँ धनंजय के हवाले से आपको हमारे न्यायनिकेतनों के हाल चाल की झलक भी मिलेगी।
    मेरा विनम्र प्रयास है कि तंत्र के क्रूर हाथों प्रजा को प्राप्त हो रही पीड़ा हमारे उन प्रभुओं तक पहुँचे और उसके जीवन के प्रति सम्मान का भाव न्याय के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो, यही इस कृति का अभीष्ट है।
    हाँ, साहित्य के शिल्प की दृष्टि से इस पुस्तक में दोष हो सकते हैं। मानवीय सम्वेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और यथार्थ की जो सशक्त अभिव्यक्ति कवि और लेखक कर सकते हैं, वह मुझ जैसे साधारण अधिवक्ता के लिए कहाँ संभव है! इसलिए शास्त्रीय साहित्यिक मापदण्डों पर जहाँ जो भी त्रुटि हो उसे किसी बालक की तोतली बोली के दोष मानकर क्षमा कर दें।
क्रमशः..........
-मधुवन दत्त चतुर्वेदी

लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2016 अंक में प्रकाशित

मानव जाति का हत्यारा टोनी ब्लेयर

Posted: 07 Jul 2016 05:30 AM PDT
भारत की जनता पर ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर इंग्लैंड सरकार ने जो अत्याचार किये थे. वह मानवजाति के लिए कलंक है और उसमें नर पिशाचों की आश्चर्यजनक भूमिका दिखाई देती है. दुनिया में अपने को उच्च समझने वाले यूरोपीय लोगों ने मानव जाति के ऊपर कैसे-कैसे अत्याचार किये. 
                ईराक में सद्दाम हुसैन को फांसी व जनता का नरसंहार इंग्लैंड, अमेरिका और उसकें दोस्त देशों ने किया और 6 लाख से अधिक लोगों को मार डाला था लेकिन जब चिलकॉट जांच समिति की रिपोर्ट आई है तो जिन आधारों के ऊपर ईराक में नरसंहार किया था. वह सब गलत पाए गए. आज भी लाखों विधवाएं बेसहारा हैं.
 इराक़ युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले की जांच के लिए गठित चिलकॉट जांच समिति अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने सद्दाम हुसैन की तरफ से दिख रहे ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और अप्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध में भेजा दिया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले का एक कारण यह बताया गया कि इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के अस्त्र है, जिनके चलते वह बड़ा खतरा पैदा कर सकते है लेकिन यह अनुमान पूरी तरह अतिरंजित था।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद टोनी ब्लेयर के खिलाफ इंग्लैंड में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं तो वहीँ ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 2003 के इराक़ युद्ध में मारे गए लोगों के परिवार से माफी मांगी है हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि वो परिवार उन्हें न कभी भूलेंगे और न माफ़ करेंगे. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि खुफिया सूचनाएं ग़लत थीं और युद्ध के बाद की योजना खराब थी. इसी के बाद से दुनिया के अन्दर आतंकवाद की एक लहर आई जिसने भी इंसानी खून को बहा रहे हैं  लेकिन इसकी शुरुवात अमेरिकी साम्राज्यवाद ने शुरू की थी और पूरी दुनिया में आतंकवादी और नर पिशाच की भूमिका में पहले इंग्लैंड और अब अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के चेहरे दिखाई देते हैं.इन देशों की खुशहाली का राज  मानव रक्त की नदियाँ बहा देने में छिपा हुआ है. साम्राज्यवाद का असली चेहरा एक खूनो दैत्य का चेहरा होता है जो पूरी दुनिया के अन्दर मानव जाति का रक्त पीने के लिए हमेशा लालायित रहता है और आज भी साम्राज्यवाद मानव रक्त को बहाकर मुनाफे को बढ़ा रहा है. दुनिया में आतंकवाद समाप्त करने के लिए ईराक युद्ध व सद्दाम हुसैन की फांसी के जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों को  पकड़ कर युद्ध अपराधी की तरह मुकदमा चला कर सजा-ए-मौत देनी चाहिए जिससे दुनिया के अन्दर शांति कायम हो सके नहीं तो विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष जो हथियार सौदागरों के एजेंट की भूमिका में हैं वह अपने हतियारों का प्रदर्शन करने के लिए इसी तरह नरसंहार करते रहेंगे और उसके प्रतिशोध में आतंकवाद जारी रहेगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 29 जून 2016

kisan

िसानो-खं ेत मज़दू रो की ब ं ढ़ती आत्महत्याएँ और कर्ज़ की समस्या ft+Eesnkj dkSu gS\ jkLrk D;k gS\ बीती 26 अप्रैल को पं जाब के बरनाला ज़िले के जोधपर ु गाँव में सदखोरों का क ू र्ज़ा चका पाने में असमर ु ्थ किसान और उसकी माँ द्वारा ज़हरीली दवाई पीकर खदक़ु ुशी करने की भयानक घटना ने एक बार फिर से राज्य के सं वेदनशील लोगों को हिला कर रख दिया। किसान बलजीत के पास 2 एकड़ ज़मीन थी और उसके बाप पर तेजा सिं ह नाम के सदखू ़ोर का कर्ज़ा था जो उनके मरने के बाद बलजीत के सिर आ गया। कई तरह की हेरा-फे रियों, ज़्यादा ब्याज लगाने और सरकारी महकमों में जोड़- तोड़ करके तेजा सिं ह ने बलजीत की ज़मीन अपने नाम करा ली। जब तेजा सरकारी अधिकारियों और पलिु स के साथ ज़मीन पर कब्ज़ा करने आया तो गाँव के लोगों की मौजदगी में बलजीत ू सिं ह ने घर की छत पर चढ़कर ज़हरीली दवाई पी ली, उसको देखकर उसकी मां बलबीर कौर ने भी बाकी की दवाई पी ली और अस्पताल ले जाते समय दोनों की मौत हो गयी। यह त्रासदी कृषि प्रधान राज्य पं जाब में खेती के सं कट में जी रहे ग़रीब किसानों और मज़दरों की द ू र्दनाक हालत को दिखाने वाली एक प्रतिनिधि घटना ह।ै राज्य के अख़बारों में लगभग रोज़ खदक़ु ुशी की कोई नयी ख़बर छपती ह। ैऐसी ख़बरों के कुछ अश हम यहाँ ं दे रहे हैं। पं जाबी ट्रिब्यून ्यू 27 अप्रैल के सं पादकीय के अनसार, ''प ु ं जाब में इस समय औसतन हर दो दिनों में तीन किसान कर्ज़े के बोझ के कारण खदक़ु ुशी करते हैं। के न्द्रीय कृषि राज्यमत्ं री की ओर से सं सद में पेश किये गये आँकड़ों के अनसार प ु ं जाब में इस साल 11 मार्च तक 56 किसानों ने खदक़ु ुशी की है जबकि अख़बारी रिपोर्टों के अनसार ु सिर्फअप्रैल महीने में 26 तारीख तक 40 किसान आत्महत्या कर चकुे हैं। किसान खदक़ु ुशियों के मामले में महाराष्ट्र के बाद पं जाब देश में दसरे नम ू ्बर पर आ गया ह। ैराज्य के तीन विशव् विद्यालयों की ओर से किये गये सर्वेक्षण के अनसार 2000 से 2011 के दौरान राज ु ्य में कृषि से सम्बन्धित 6926 व्यक्तियों ने खदक़ु ुशी की जिनमें से 3954 किसान और 2972 खेत मज़दर ू थे। पं जाब सरकार ने 2011 के बाद किसानों और खेत मज़दरों ू की खदक़ु ुशियों के बारे में ना तो कोई नया सर्वेक्षण करवाया है और ना ही इनका रिकार्डरखने के लिए कोई तं त्र क़ायम किया हैजबकि इस समय के दौरान कृषि सं कट और गहरा होने के कारण खदक़ु ुशियों की गिनती में बहु त ज़्यादा वद् ृधि हुई ह।’’ ै यहाँ देखा जाये तो सबसे ज़्यादा खदक़ु ुशियाँ सं गरूर (1,132), फिर मानसा (1,013) और बठिं डा (827) में हुई हैं। यह तस्वीर सिर्फ पं जाब की ही नहीं बल्कि पर ूे भारत की ह। ै देश में सबसे ज़्यादा, 45 प्रतिशत किसानों की आत्महत्याएँ महाराष्ट्र में होती हैं। सरकारी आँकड़ों के अनसार जनवरी से ु जन 2015 के दौरान 1300 ू किसानों ने खदक़ु ुशी की, मतलब रोज़ाना 7 किसानों ने खदक़ु ुशी की। पं जाब कृषि यनि‍ ू वर्सि‍टी, लधिु याना के डा. सखपाल अपने लेख ु में लिखते हैं, “राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ्यू के अनसार 2012 में देश में हर ु रोज़ 46 किसान खदक़ु ुशी करते थे। भारत में बड़े स्तर पर खदक़ु ुशियों का सिलसिला नयी आर्थिक नीति‍याँ लागू होने के बाद 1990 के आखिर में देखने को मिलता ह। ै1997 से 2006 के दौरान 10,95,219 व्यक्तियों ने खदक़ु ुशी की, जिनमें से 1,66,304 किसान थे। किसानों का यह आँकड़ा अब बढ़कर तीन ला

कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल

लोकसंघर्ष !


Posted: 27 Jun 2016 07:19 PM PDT
मोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित सामाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहाँ पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
    यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी, के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनैतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहाँ ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर सवर्ण कही जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थी। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनैतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनैतिक सुधार।
    इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वे थे। अब वे राजनैतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
        वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनैतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनैतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ अवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन मुलायम, लालू या नीतीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में
सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग आंदोलन के नाम पर सिर्फ सवर्णों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
    दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धि हो गई हो और वे इसके बल पर सत्ता तक पहुँच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गई। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनैतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया। जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीड़ित की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनैतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिए से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिस पर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनैतिक बहसों को केंद्रित किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी।
    दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनैतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाइयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी। उसका मुसलमानों या ईसाइयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक
धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
    यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनैतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गाँव-गाँव तक पहुँचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गाँव-गाँव और पिछड़ी जातियों तक पहुँचाया। जहाँ स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
    वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढाँचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहाँ गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं। यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए
विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थीं, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है। इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता चलाती है तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी इस पर उनका लाजवाब तर्क था कि ब्राह्मणों को राजनीति में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया। इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। इसीलिए सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नीतीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णों की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल राजनीति ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूँढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता। दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीति ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक,आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।
   -राजीव कुमार यादव
 मोबाइल: 09452800752 
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

सोमवार, 27 जून 2016

देश का पिछड़ा वर्ग: भूत, वर्तमान और भविष्य


Posted: 26 Jun 2016 07:17 PM PDT

 “We must shape our course ourselves and by ourselves." -Babasaheb Ambedkar

  भारतीय वर्ण-जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था के दुष्प्रभाव इतने गहरे और प्रभावी हैं कि तमाम संवैधानिक उपचारों और लंबे समय तक चलने वाले जनसंघर्ष और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के बाद भी अभी तक कोई स्वस्थ सामाजिक संरचना देश में निर्मित नहीं की जा सकी है। देश का पिछड़ा वर्ग यहाँ की विशालकाय आबादी है। भिन्न-भिन्न जातियों के समूह इस वर्ग में सम्मिलित हैं यद्यपि जातीय अस्मिताओं में जी रहे इस वर्ग में रंचमात्र भी वर्गबोध होता तो यह आज इस देश का प्रभु वर्ग होता। यह वह वर्ग है जिसने औपनिवेशिक भारत में दलितों और अंत्यजों के साथ दोहरीगुलामी झेली है। ये अंग्रेजों के गुलाम तो थे ही साथ ही साथ देश की सवर्ण जातियों के गुलाम अलग से थे। सवर्ण जातियों का अपना एक अलग एजेंडा रहा है। विदेशी आक्रमण कारियों के शासन से लेकर मुगलों ब्रिटिशों तक वे अपने हितों और स्वार्थों के लिए तत्काल सत्ता के साथ हो जाते थे। उन्हें देश की बहुसंख्यक आबादी से कोई सरोकार नहीं था। भारत की सवर्ण जातियों ने अनेक मुस्लिम, तुर्क, गुलाम शासकों की दीवानी और दरबारी की। वे मुगलों के दरबार में उनके सेनापति और नवरत्न बनकर रहे, उनसे रोटी-बेटी का संबंध रखा। अंग्रेजों से ठेके लेने और राय बहादुर तथा राजा के खिताब पाने के लिए वे उनके भी चापलूस बने रहे। सवर्णों ने भारत की दलित-पिछड़ी जातियों को हाशिए पर
धकेल कर अंग्रेजों से प्राप्त न केवल आर्थिक उत्पादन के स्रोतों पर बल्कि राजनैतिक सत्ता पर भी अधिकार कर लिया। वही रंग आज भी विभिन्न राजनैतिक पार्टियों में दिखता है। ये केवल सत्ता के साथ रहना ही जानते हैं।  दूसरी तरफ पिछड़े वर्ग की कोई सांस्कृतिक अस्मिता नहीं रही। दलितों ने फिर भी एक दीर्घकालीन आंदोलन चलाया। क्योंकि उनके तो अस्तित्व पर ही संकट था। वे तो अमानवीय स्थितियों में जी रहे थे। उनके पास अंबेडकर जैसे नेता भी थे और उन्होंने लंबी लड़ाई लड़कर अपनी खोई हुई अस्मिता को प्राप्त किया। आज सरकारी नौकरियों से लेकर प्रत्येक क्षेत्र में दलितों का संतोषप्रद प्रतिनिधित्व है। लेकिन यदि सिरे से कोई गायब है तो वह हैं पिछड़े। पिछड़े वर्ग की कई सांस्कृतिक, राजनैतिक समस्याएँ हैं। इनके अस्तित्व पर कोई संकट नहीं था न ये अस्पृश्यता के शिकार थे। जिसका फायदा उठाकर सवर्ण हिन्दुत्व और ब्राह्मणवाद ने इन्हें सवर्ण बनाने का सफल प्रयास जारी रखा तथा दलितों का उत्पीड़न करने और अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक राजनीति में इन्हें राजनैतिक औजार की तरह इस्तेमाल किया। जबकि अपनी मूल सामाजिकता में भारत की पिछड़ी जातियाँ सांप्रदायिक नहीं हैं। ब्राह्मण धर्म के चंगुल में फँसने के कारण इनका और भी बुरा हश्र हुआ। देश के मंदिर-मठों में सबसे अधिक चढ़ावा यही चढ़ाते हैं क्योंकि इनकी आबादी देश की कुल आबादी की लगभग साठ फीसदी है। इनके द्वारा किए गए धार्मिक दान और चढ़ावे के बल पर ही इस देश का ब्राह्मणवाद फलता-फूलता और मुटाता है। पिछड़े व्यवसाय के स्तर पर किसान, पशुपालक, कामगार और खेतिहर मजदूर हैं। इसी तरह पसमांदा मुसलमानों में पिछड़ी जातियाँ नाई, जुलाहे, कसाई, घोसी, धुनिया आदि हैं। लक्ष्यार्थ यह कि देश में सबसे अधिक मेहनत का या शारीरिक श्रम का कार्य भी यही करते हैं क्योंकि सवर्ण जातियों ने पूर्णतया स्वयं को शारीरिक श्रम से दूर कर रखा है। प्रकारांतर से भारत की 15 प्रतिशत सवर्ण आबादी देश की पचासी प्रतिशत दलित, पिछड़ी, अल्पसंख्यक और आदिवासी जनता के श्रम पर न केवल जीती है बल्कि उसी की प्रदान की गयी शक्ति से उसको शासित और शोषित भी करती है। पिछड़े आज भी सवर्णों के लठैत बने हुए हैं। स्वतंत्रता के बाद जमींदारी उन्मूलन ने कुर्मी और यादव जैसी जातियों को थोड़ी बहुत जमीन अवश्य दिला दी लेकिन कहार, लोहार, निषाद, महरा, केवट, माली, नाई और कुम्हार जैसी पिछड़ी जातियाँ लगभग भूमिहीन ही रहीं। ये अभी भी गाँवों में रहती हैं। बीसवीं सदी के अंतिम दशक तक भारत की सवर्ण जातियाँ पूरी तरह से शहरों में बस चुकी थीं। जमींदारी उन्मूलन ठीक से न होने की वजह से इनके पास पर्याप्त भूमि थी जिसे या तो इन्होंने बेच दिया या फिर शहर में रहकर ही खेतिहर मजदूरों से उस पर कृषि कराते रहे। उनके खेतिहर मजदूर भी पिछड़ी जाति के थे। इससे उन्हें दोहरा लाभ हुआ एक तो वे शहर में अंग्रेजी शिक्षा पाकर महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर काबिज हो गए और दूसरी तरफ कृषि के उत्पादन का लाभ भी उन्हें मिला जिससे उनकी स्थिति निरंतर सुदृढ़ होती गई और सामाजिक असमानता बढ़ती रही। दलितों का भी एक बड़ा जनसमूह शहरों की तरफ निकल गया। अंबेडकर ने दलितों को शहरों की ओर जाने का नारा दिया, उनकी नजर में भारतीय गाँव ‘जातीय भेदभाव का नर्क’ थे। इससे दलितों को लाभ भी हुआ। वे न केवल सरकारी नौकरियों में स्थान बना सके बल्कि एक समझदार, जागरुक मध्यवर्ग और उनके हितों-अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक दलित बुद्धिजीवी वर्ग भी अस्तित्व में ला सके। पिछड़े वर्ग का दुर्भाग्य रहा कि वह सवर्णवाद के झाँसे में आ गया और स्वयं को श्रेष्ठ हिन्दू मानने (क्षत्रिय आदि) एवं अपने आंतरिक ब्राह्मणवाद के चक्कर में फँसकर ही उसकी स्थिति आज इतनी सोचनीय हो गई है। पिछड़ा वर्ग केवल वोट बैंक बना रहा। स्वतंत्र भारत में सामाजिक न्याय की गति अत्यंत धीमी रही है। पिछड़ों के लिहाज से और भी धीमी। अंग्रेजों से सत्ता का जो हस्तांतरण हुआ वह भारत की सवर्ण जातियों को हुआ। भारत का पहला प्रधानमंत्री और भारत के सभी राज्यों के मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे। उन्होंने सामाजिक न्याय को लेकर कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि यह उनके वर्चस्ववादी हितों के खिलाफ थी। मण्डल कमीशन की रिपोर्ट को लंबे समय तक कांग्रेस के सवर्ण नेतृत्व ने दबाए रखा। जब तक इसे लागू किया जाता तब तक देश की सरकारी नौकरियों पर पूरी तरह से सवर्ण काबिज हो चुके थे। देश की दूसरी सवर्णवादी पार्टी भाजपा ने सांप्रदायिक सवर्ण हिन्दू संगठन आरएसएस के सहयोग से मण्डल के विरोध में कमंडल की राजनीति प्रारम्भ की और देश को सांप्रदायिकता की आग में झोंक दिया। यह सत्य है किं मण्डल कमीशन के पश्चात पिछड़ों को जो 27 फीसदी आरक्षण मिला उससे उनकी राजनैतिक मानसिकता में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। मुंगेरीलाल, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार जैसे बड़े सामाजिक क्रांतिकारी नेता भी पिछड़े वर्ग में सामने आए। किन्तु आज भी केंद्रीय सरकारी नौकरियों में उनका प्रतिनिधित्व केवल 12 फीसदी है जबकि उनकी आबादी लगभग 60 फीसदी है। हालात बहुत बुरे हैं। जितने सोचे जा रहे थे उससे अधिक ! देश के केंद्रीय विश्वविद्यालयों में केवल एक प्रोफेसर और एक वाइस चांसलर पिछड़ी जाति का है। देश के शीर्ष बीस अरबपतियों में एक भी पिछड़ा नहीं है। इसी तरह मीडिया, फिल्म, न्याय पालिका, कारपोरेट और साहित्य में भी पिछड़ों का यही हाल है। यह महज इत्तिफाक नहीं है कि आजादी के आधी सदी से अधिक का समय बीतने के बाद भी पिछड़ों की इतनी बुरी हालत है। इसके पीछे भयानक सवर्ण, वर्चस्ववादी, यथास्थितिवाद है। पिछड़ों को कई कानूनी दाँव-पेचों से समाज की मुख्य
धारा में आने से रोका जा रहा है। सवर्णवाद और हिन्दुत्व की बूटी से पिछड़े अपने वोट बैंक की ताकत को भी भूल जाते हैं और यही ब्राह्मणवाद की सफलता है। किन्तु अब पिछड़ों में एक नई चेतना देखी जा रही है। उन्होंने अपने कबीर, फुले, अंबेडकर और पेरियार जैसे नायकों को पहचान लिया है। ललई सिंह यादव और रामस्वरूप वर्मा जैसे विचारकों को भी पिछड़ों ने समझ लिया है। इन्हें अपनी वोट की ताकत को पहचानना होगा और अपने हक की लड़ाई के लिए सड़क पर उतरना होगा। सबसे पहले तो जातिवार जनगणना के आँकड़ों को सार्वजनिक करने की माँग करनी होगी। इससे पता चल जाएगा की इनकी आबादी की वास्तविक स्थिति क्या है। तभी ये अपनी आबादी के अनुपात में
प्रतिनिधित्व माँग सकेंगे। हालाँकि इस विषय पर भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों का ढुलमुल रवैया है क्योंकि दोनों ही सवर्णवादी राजनीति करती हैं। प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को पिछड़ा बताकर वोट मांगते हैं लेकिन पिछड़ों के हक की बात पर मौन धारण कर लेते हैं क्योंकि ऐसा करने के लिए ब्राह्मणवादी मोहन भागवत उन्हें निर्देश देते हैं। इसमें संदेह नहीं कि पिछड़ों का वोट ही भारतीय राजनीति का भविष्य तय करता है लेकिन पिछड़ों का भविष्य और वर्तमान हमेशा हाशिए पर क्यों रखा जाता है? इस प्रश्न पर पिछड़ों को विचार करना चाहिए। राष्ट्रीय अन्य पिछड़ा आयोग को अभी तक संवैधानिक दर्जा नहीं दिया गया है। आरक्षण एक्ट के लिए पिछड़ों को माँग करनी चाहिए। आरक्षण एक्ट के तहत यह कानून होना चाहिए कि, किसी संस्था में आरक्षण के नियमों का विधिवत पालन न होने पर उस संस्था के प्रमुख को कड़ी से कड़ी सजा दी जाय। क्योंकि व्यवस्था में बैठे हुए सवर्ण साजिश करके पिछड़े वर्ग की सीटों को सामान्य में बदलकर उस पर स्वजातीय भर्ती कर लेते हैं। यह सब खुले आम हो रहा है। पिछड़ों को सोचना चाहिए के वे इस देश में सबसे अधिक मेहनत करने वाले वर्ग की श्रेणी में हैं, जिसकी मेहनत का कोई और मजा लूट रहा है। सांप्रदायिकता और उग्र हिन्दुत्व से इन्हें दूर रहना चाहिए क्योंकि यह सारा ढोंग इन्हीं का हक लूटने के लिए किया जाता है। जातीय और धार्मिक भेदभाव को भूल कर पिछड़ों को एक वर्ग के रूप में सामने आना चाहिए तभी वे अपने अधिकार प्राप्त कर सकेंगे। हिंदुओं के पिछड़े और मुसलमानों के पसमांदा मुसलमान एक जैसे ही हैं। उनकी उनके धर्म में एक जैसी ही हालत है। इसलिए पिछड़ा, पिछड़ा एक समान होना चाहिए वह हिन्दू हो या मुसलमान! हजारों साल से भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जड़ें जमाए हुए सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकने के लिए एकजुट होना होगा। दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तो पहले से ही पिछड़ों के साथ हैं।
   -संतोष अर्श
मोबाइल: 09033510239
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के जून अंक 2016  में प्रकाशित