गुरुवार, 10 सितंबर 2015

अटाली की आवाज़ें

बुधवार, 9 सितंबर 2015

अटाली की आवाज़ें

हरियाणा के फरीदाबाद जिले के बल्लभगढ़ के नज़दीक अटाली गांव में 25 मई,2015 को सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिसके कारण अटाली के सभी मुस्लिम रहवासियों को गांव छोड़कर भागना पड़ा। मुसलमानों द्वारा गांव में पक्की मस्जि़द के निर्माण पर कुछ जाटों को आपत्ति थी। मुसलमान लगभग 50 साल से ज़मीन के एक टुकड़े पर नमाज़ अदा करते आए थे। किसी को इससे कोई तकलीफ नहीं थी।
दंगे में कुछ मुसलमान घायल हुए और कुछ घरों को आग के हवाले कर दिया गया। गांव के मुसलमानों ने कुछ दिन तक पुलिस स्टेशन में शरण ली। बाद में,कुछ जाट बुजुर्गों ने उन्हें गांव वापस लौटने के लिए राज़ी कर लिया। मस्जि़द के निर्माण पर एक अदालत ने रोक लगा दी और इस आदेश का गांव के मुसलमान पालन कर रहे हैं। गांव वापस आने के बाद मुसलमानों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। उन्हें कोई काम नहीं देता था और ना ही सामान बेचता था। बच्चों के लिए दूध भी उन्हें गांव के बाहर से खरीदकर लाना पड़ता था। मुस्लिम बच्चे, गांव के स्कूल में पढ़ नहीं सकते थे। गत् 1 जुलाई को इस गांव में फिर सांप्रदायिक हिंसा भड़की। सीएसएसएस के एक दल, जिसमें यह लेखकए संध्या म्हात्रे व नेहा दाभाड़े शामिल थे, ने 17.18 अगस्त को अटाली पहुंचकर वहां के सभी समुदायों के सदस्यों से बातचीत की। हम इस चर्चा के चुनिंदा अंश यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।
पुलिस की भूमिका
यह महत्वपूर्ण है कि अटाली के दंगा पीडि़तों को जाट बुजुर्गों ने सुरक्षा का आश्वासन देकर गांव लौटने के लिए राजी किया। ऐसा बहुत कम मामलों में होता है। जाट.बहुल मुजफ्फरनगर व शामली गांवों के मुस्लिम दंगा पीडि़त, आज भी अपने गांव नहीं लौट सके हैं। यद्यपि यह भी सच है कि गांव वापस आने के बाद, मुसलमानों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। अटाली की सांप्रदायिक हिंसा का एक दूसरा असाधारण पक्ष था पुलिस की रचनात्मक भूमिका। पुलिस ने मस्जिद के निर्माण के लिए सुरक्षा उपलब्ध करवाई। जिला पुलिस अधीक्षक ने हमें बताया कि 25 मई को वे गांव के मुसलमानों की रक्षा इसलिए नहीं कर सके क्योंकि दंगाईयों की संख्या, पुलिसकर्मियों से कहीं ज्यादा थी। परंतु बाद में उन्होंने मुसलमानों को सुरक्षित गांव से बाहर निकाला और पुलिस थाने के अहाते में रहने की इजाज़त दी। पुलिस के हस्तक्षेप से ही मुसलमानों का सामाजिक बहिष्कार खत्म हुआ। पुलिस ने गांव के दुकानदारों को चेतावनी दी कि यदि उन्होंने मुसलमानों को सामान बेचना शुरू नहीं किया तो उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की जाएगी। निःसंदेह, दुकानदारों को भी इस बहिष्कार से नुकसान हो रहा था और मुसलमान भी यह चाहते थे कि बहिष्कार जल्द से जल्द खत्म हो।
यद्यपि पुलिस ने मुसलमानों को पूरी सुरक्षा दी तथापि उसने जाट दंगाइयों के विरूद्ध समुचित कानूनी कार्यवाही नहीं की। पुलिस का कहना था कि यदि दंगाइयों को गिरफ्तार किया जाएगा तो इससे गांव में बहुत मुश्किल से स्थापित हुआ सांप्रदायिक सद्भाव समाप्त हो जाएगा। पुलिस की इसी हीला हवाली का लाभ उठाकर, शरारती तत्वों ने 1 जुलाई को फिर गांव में सांप्रदायिक हिंसा की। इसके बाद, हिंसा में सीधे लिप्त पाए गए 14 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया परंतु दंगे का षड़यंत्र रचने वाले और जाटों को मुसलमानों के खिलाफ भड़काने वाले अब भी खुलेआम घूम रहे हैं। हमने गिरफ्तार किए गए लोगों के परिवारों से मुलाकात की। वे सभी मस्जिद के निर्माण का समर्थन कर रहे थे। हो सकता है कि वे ऐसा इसलिए कर रहे हों ताकि वे यह साबित कर सकें कि उनके परिवारजन की गिरफ्तारी गलत है। धर्मवीर, जिनके लड़के को गिरफ्तार किया गया है, का कहना था कि मस्जि़द बननी चाहिए और बनेगी।
मस्जि़द
कई दशकों पहलेए मुस्लिम समुदाय को मृतकों को दफनाने के लिए गांव के बाहर ज़मीन का एक टुकड़ा दिया गया था। धीरे.धीरे गांव फैलता गया और कब्रिस्तान के आसपास भी मकान बन गए। इसके बाद, मुसलमानों को कब्रिस्तान के लिए गांव के और बाहर ज़मीन आवंटित कर दी गई और मुसलमान, पुराने कब्रिस्तान का इस्तेमाल नमाज़ पढ़ने के लिए करने लगे। उन्होंने वहां कुछ अस्थायी निर्माण भी किए। सन् 2009 में ज़मीन के इस टुकड़े के चारों ओर चहारदीवारी बना दी गई और आरसीसी के कुछ खंभे खड़े किए गए। तत्कालीन सरपंच प्रहलाद सिंह ने इस काम में मदद की। गांववालों को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। ज़मीन का यह टुकड़ा, भूअभिलेखों में वक्फ भूमि के रूप में दर्ज था।
गांव के एक मुस्लिम परिवार, जिसमें ईशाक अली और उनके भतीजे शाकिर अली और शब्बीर अली शामिल हैं, की आर्थिक स्थिति में पिछले कुछ वर्षों में बहुत सुधार आया। वे बिजली के लाईसेंसी ठेकेदार बन गए और उनका पंजीकरण भी हो गया। जिस भी गांव वाले को बिजली के तार आदि की फिटिंग करवानी होती थी या बिजली का मीटर लगवाना होता था, वह ईशाक के जरिए ही ये काम करवाता था। ईशाक और उनके भतीजों की बल्लभगढ़ के मुख्य बाजार में रेडीमेड कपड़ों की एक दुकान भी है। जैसा कि अमूमन होता हैए जैसे.जैसे मुसलमान परिवारों की आर्थिक स्थिति सुधरने लगती है उनमें कुछ परिवर्तन आने लगते हैं। जैसे, ऐसे परिवारों के पुरूष सदस्य दाढ़ी बढ़ाने लगते हैं और मुस्लिम टोपी पहनने लगते हैं। वे अन्य धर्मावलंबियों से कुछ अलग दिखना चाहते हैं। यही ईशाक के परिवार के मामले में हुआ। इस परिवर्तन से गांव के संपन्न जाट खुश नहीं थे। ईशाक का परिवार कुछ गैर.हरियाणवी उलेमाओं के संपर्क में भी आया। ये उलेमा फकीरों ;गांव के पिछड़े मुस्लिम रहवासियों की संस्कृति पर प्रभाव डालने लगे और इन उलेमा ने उनके आचार.विचार को 'सुधारने'का बीड़ा उठा लिया।  अब फकीर, दब्बू मजदूर नहीं रह गए थे जो संपन्न जाटों की परंपराओं का पालन करते और जाट पंचों के हुक्म को मानते। उन पर गांव के बाहर के लोगों का प्रभाव बढ़ने लगा। ये बाहरी लोग देवबंदी उलेमा थे। मुसलमानों के सामने अब दो सांस्कृतिक परंपराओं में से एक को चुनने का विकल्प था और उन्होंने जिसे ठीक समझाए चुना।
मस्जिद इस परिवर्तन का प्रतीक थी और इसलिए उसका विरोध हुआ। मस्जिद जितनी भव्य और बड़ी होती वह मुस्लिम समुदाय की अपनी अलग पहचान स्थापित करने की कोशिश का उतना ही बड़ा प्रतीक होती। जाटों ने मस्जिद की मीनारें बनाए जाने पर आपत्ति की और अजान के लिए लाऊडस्पीकर के इस्तेमाल पर भी। उनका कहना था कि मस्जिद बनने से बाहरी ;मुस्लिम उलेमा तत्व गांव में आने लगेंगे। मुसलमानों ने यह लिखकर दिया कि अजान के लिए लाऊडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
जब तक मुसलमान फकीर, मजदूर थे उनका गांव में स्वागत था। जब विभाजन के बाद गांव में कुछ मुसलमान बसने के लिए आए तो उन्हें अपना मकान बनाने के लिए जमीनें आवंटित की गईं। गांव के दबंग जाटों का दावा है कि जिस जमीन के टुकड़े पर मस्जिद बनाए जाने की कोशिश हुई थी,वह पंचायत की है। मुसलमान वहां नमाज पढ़ते रह सकते हैं परंतु वहां कोई पक्का निर्माण नहीं होना चाहिए। पंचायत ने उन्हें गांव के बाहर एक प्लाट आवंटित कर दिया है और यदि वे चाहें तो वहां पक्की मस्जिद बना सकते हैं।
शांति और सद्भाव के स्वर
गांव के सेवानिवृत्त संस्कृत व्याख्याता हुकुम सिंह के घर हमारे दल ने आठ.दस व्यक्तियों के समूह से लंबी बातचीत की। हम उन्हें भाईचारा समूह का नाम दे देते हैं। हुकुम सिंह को यह पता था कि बादशाह औरंगजेब के बड़े भाई दाराशिकोह ने 52 उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद किया था ताकि मुसलमान इन ग्रंथों को पढ़ सकें। जो अन्य लोग वहां थे, उनमें शामिल थे एक कालेज में अंग्रेजी प्राध्यापक जगदीश, रंजीत डाकिया,धर्मवीर,धर्मवीर और कुछ अन्य युवक। जगदीश की सोच काफी तार्किक थी और वह आंख बंद करके रीति.रिवाजों और परंपराओं का पालन करने के खिलाफ था। उसका कहना था कि पुरातन रीति.रिवाज हम लोगों को बांटते हैं।
भाईचारा समूह ने बताया कि सन् 1947 में गांव के मुस्लिम फकीर ;पिछड़ी जाति के मुसलमान दंगों के कारण असुरक्षित महसूस कर रहे थे तब गांववालों ने उन्हें समझा.बुझाकर पाकिस्तान जाने की बजाए वहीं रहने के लिए राजी किया। फकीर, जाट किसानों के खेतों में मजदूरी करते थे। जाट और फकीर एक दूसरे पर निर्भर थे परंतु इससे भी महत्वपूर्ण यह था कि फकीरों और जाटों में कोई खास फर्क नजर नहीं आता था। वे एक से कपड़े पहनते थे,एक सी भाषा बोलते थे और एक.सी सांस्कृतिक परंपराओं और रीति.रिवाजों का पालन करते थे। दोनों में सिर्फ एक ही अंतर था और वह था आराधना पद्धति का। भाईचारा समूह का कहना था कि गांव के मुसलमानों में बाहरी प्रभाव के कारण आ रहे परिवर्तनों से गांव के जाटों में असुरक्षा का भाव जाग रहा था। और यही असुरक्षा का भाव, मुसलमानों के खिलाफ पूर्वाग्रहों का स्त्रोत बन गया। उन लोगों ने हमसे ढेर सारे प्रश्न पूछे। वे हमसे यह जानना चाहते थे कि क्या इस्लाम की निगाह में वे काफिर हैं। और यह भी कि मदरसों में क्या सिखाया जाता है? क्या वहां आतंकवादी बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है? कुछ ने पूछा कि क्या मुसलमानों को अपने चचेरे.ममेरे भाई.बहनों से विवाह करने की इजाजत है? हमने उन्हें संक्षेप में बताया कि देश में कई तरह के मदरसे हैं और उनमें से कुछ में आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है और गैर.मुस्लिम बच्चों को भी भर्ती किया जाता है। हमने उन्हें यह भी बताया कि दूसरे समुदायों से ज्यादा, मुसलमान एक.दूसरे पर काफिर होने का आरोप लगाते हैं। भारत की सांझा संस्कृति पर भी हमारी चर्चा हुई। इन स्पष्टीकरणों के बाद समूह के सदस्यों ने हमसे खुलकर बातचीत करनी शुरू की और अपने समुदाय की सोच पर भी प्रश्नचिन्ह लगाए।
गांव में हुई दो घटनाओं का इस्तेमाल, मस्जिद और मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं भड़काने के लिए किया जा रहा है। इन मुद्दों की चर्चा भाईचारा समूह ने भी की। रंजीत डाकिया ने बताया कि गांव के एक मुस्लिम लड़के और एक हिन्दू लड़की घर छोड़कर भाग गए और उन्होंने शादी कर ली। जाट यह मानते हैं कि एक गांव में रहने वाले लड़के.लड़कियां आपस में भाई.बहन हैं और उनके बीच विवाह पाप है।  अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक विवाहों को और बड़ा पाप माना जाता है। मुस्लिम लड़के और हिन्दू लड़की शादी के बाद साथ रहने लगे और उन्हें एक पुत्र हुआ। मुसलमानों ने जाटों के घाव पर नमक छिड़कने के लिए उनसे कहा कि वे जाट लड़की की पहली संतान के जन्म के मौके पर किए जाने वाले रस्मो.रिवाज करें। हम इस घटनाक्रम की पुष्टि नहीं कर सके।
दूसरी घटना एक जाट पंचायत में हुई जिसमें मुसलमानों ने चुनौती देते हुए यह कहा कि चाहे उनके सिर कट जाएं परंतु वे मस्जिद बनाकर रहेंगे। जब हमने मुसलमानों से इस बावत पूछा तो उन्होने ऐसी कोई भी बात कहने से इंकार किया। उल्टे उन्होंने कहा कि जाटों का कहना था कि चाहे उनके सिर कट जाएंए वे गांव में मस्जिद नहीं बनने देंगे। मुसलमानों को जो विभिन्न समझौते करने पड़े और जाटों की शर्तें माननी पड़ीं,उससे दूसरी बात के सही होने की ज्यादा संभावना लगती है। हमारे लिए मुश्किल यह थी गांव में इतनी अलग.अलग तरह की बातें हमसे कही गईं कि हमारे लिए यह पता लगाना असंभव था कि क्या सच है और क्या झूठ।
हुकुम सिंह ने हमें बताया कि जब वे दिल्ली गए थे तब उन्हें वाट्सएप पर डाला गया एक चित्र दिखाया गया जिसके बारे में यह कहा गया कि वह अटाली के एक मंदिर का चित्र है, जिसे मुसलमानों ने क्षतिग्रस्त किया है। उन्होंने चित्र दिखाने वालों से यह साफ कहा कि अटाली में किसी मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया है और उस चित्र में जो मुसलमान दिखाए गए हैं वे अटाली के रहनेवाले नहीं हैं। वाट्सएप और सोशल मीडिया के अन्य मंचों पर इस तरह के अनेक संदेश और पोस्ट चल रहे हैं और ये भी तनाव को बढ़ाने में भूमिका अदा कर रहे हैं। उनकी राय थी कि भाजपा की दिल्ली में सरकार बनने के बाद से मुस्लिम.विरोधी विमर्श में तेजी आई है। आरएसएस की शाखाओं में किशोरों और युवाओं के दिमागों में ज़हर भरा जा रहा है।
भाईचारा समूह ने हमें बताया कि उन्होंने कुछ दिन पहले शांति स्थापना के लिए गांव में एक बैठक का आयोजन किया था। उनमें से कुछ, उन लोगों में शामिल थे जो 25 मई के दंगे के बादए मुसलमानों को थाने का अहाता छोड़कर गांव में फिर बसने के लिए मनाने गए थे। उन्होंने बताया कि पिछली बैठक में जमकर बहस मुबाहिसा हुआ। कुछ लोग, जो उनसे सहमत नहीं थे, भी बैठक में उपस्थित थे। बैठक में लगभग 60 प्रतिशत लोगों का मत था कि मुसलमानों को मस्जि़द बनाने की इज़ाजत दी जानी चाहिए क्योंकि जिस ज़मीन पर वह मस्जि़द बना रहे हैं वह उनकी है। इसके विपरीत, लगभग 40 प्रतिशत लोगों का कहना था कि मुसलमानों को 'पंचायत' की ज़मीन पर मस्जि़द नहीं बनाने दी जाने देनी चाहिए। भाईचारा समूह के एक सदस्य ने चर्चा के दौरान बड़ी बढि़या बात कही। उसने कहा कि 'जब गांव में शराब की दुकान हो सकती है तो मस्जि़द क्यों नहीं हो सकती?, भाईचारा समूह को इस बात का पछतावा था कि जब मुसलमानों का बहिष्कार हो रहा था तब उन्होंने उसका विरोध नहीं किया और ना ही गांव में मुसलमानों के खिलाफ कही जा रही बातों का खंडन किया।
समस्या की जड़.पंचायत राजनीति
गांव में दो पंचायते हैंए एक पारंपरिक और दूसरी संवैधानिक। पारंपरिक पंचायत के सभी सदस्य गांव के प्रतिष्ठित और वरिष्ठ रहवासी होते हैं और वह गांव में सामाजिक.सांस्कृतिक परंपराओं का पालन सुनिश्चित करने का काम करती है। संवैधानिक पंचायत, सरकारी तंत्र का हिस्सा है और उसका स्थानीय स्कूलों आदि पर नियंत्रण रहता है। संवैधानिक पंचायत चुनी जाती है। गांव के दबंग जाट बुजुर्ग, संवैधानिक पंचायत को ज्यादा पसंद नहीं करते क्योंकि उसमें सामान्यतः युवा लोग चुने जाते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान ज्यादा से ज्यादा लोगों से संपर्क करना होता है। संवैधानिक पंचायत के चुनाव में सभी बराबर होते हैं। पारंपरिक पंचायत के चुनाव के लिए कोई प्रचार नहीं होता और गांव के सम्पन्न परिवारों के बुजुर्ग जाट स्वमेव उसके सदस्य बन जाते हैं। संवैधानिक पंचायत के पास ढेर सारा सरकारी धन होता है जबकि पारंपरिक पंचायत के पास कोई धन नहीं होता।
अटाली एक छोटा गांव है जिसकी कुल आबादी 6,640 है। इनमें से 3,599 पुरूष हैं और 3,041 महिलाएं। गांव में कुल परिवारों की संख्या 1,193 है। पंचायत के पिछले चुनाव में वर्तमान सरपंच राजेश चौधरी और पिछले सरपंच प्रहलाद सिंह के बीच कड़ा मुकाबला था। गांव में 150 मुस्लिम परिवार रहते हैं और चुनाव में उनके वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शुरूआत में प्रहलाद सिंह ने मस्जि़द के निर्माण का समर्थन किया था। बाद में उसने अपने एक समर्थक के जरिए मस्जि़द के निर्माण के खिलाफ अदालत में मुकदमा दायर करवा दिया। राजेश ने मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के लिए मस्जि़द के निर्माण हेतु 21,000 रूपए का दान दिया। राजेश चौधरी का परिवार आज भी मस्जि़द के निर्माण के पक्ष में है और मुसलमानों के साथ भाईचारा बनाए रखना चाहता है।
गांव के प्रतिष्ठित और सम्पन्न जाट किसानों का कहना है कि संवैधानिक पंचायत, सारी समस्या की जड़ है। सरपंच के चुनाव के लिए कड़ा मुकाबला होता है और सभी उम्मीदवार मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए उन्हें तरह.तरह के वायदे करते हैं। नतीजे में, मुसलमानों को उससे कहीं ज्यादा मिल जाता है जिसके वे हकदार हैं। पारंपरिक रूप से वे केवल सुरक्षा के हकदार थे। गांव के प्रभुत्वशाली जाट इस बात से भी खफा हैं कि मुस्लिम समुदाय के अपेक्षाकृत समृद्ध परिवार 'बाहरी' संस्कृति अपना रहे हैं। परंतु वे अपने समुदाय के युवकों पर 'बाहरी' संस्कृति के प्रभाव से भी उतने ही चिंतित हैं। जाट युवकों की मान्यताएं और मूल्य अब केवल जाट परंपराओं पर आधारित नहीं रह गए हैं। वे मोबाइलों, वाट्सएप, इंटरनेट,टेलिविजन और अन्य स्त्रोतों से नई चीज़े सीख रहे हैं। बुजुर्गों का अब उतना सम्मान नहीं किया जाता जितना पहले किया जाता था। जाट लड़कियों का रहन.सहन भी बदल रहा है। शादियों के मामले में गोत्र संबंधी प्रतिबंध लगाना मुश्किल होता जा रहा है। प्रभुत्वशाली जाटों का मानना है कि यदि गांव का मुस्लिम समुदाय,पारंपरिक जाट परंपराओं का पालन करता रहेगा तो वे अपने समुदाय के युवकों से भी इस परंपरा का पालन करवा सकेंगे।
-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 26 अगस्त 2015

शराब की बढ़ती लत के दुष्परिणाम

शराब की बढ़ती लत के दुष्परिणाम

ऋतु सारस्वत
लेखक

शराब की बढ़ती लत के दुष्परिणाम
शराब की बढ़ती लत के दुष्परिणाम

गांव में औसतन प्रति व्यक्ति एक महीने में अपने रहने और खाने-पीने पर कुल 1053 रुपये खर्च करता है जबकि एक शहरी व्यक्ति इस पर 1984.46 रुपये खर्च करता है.
हाल में नेशनल सैंपल सर्वे संगठन के एक अध्ययन के मुताबिक यह तथ्य सामने आया है कि गांव में औसतन प्रति व्यक्ति एक महीने में अपने रहने और खाने-पीने पर कुल 1053 रुपये खर्च करता है जबकि एक शहरी व्यक्ति इस पर 1984.46 रुपये खर्च करता है. इस तरह शहरों में प्रति व्यक्ति उपभोग गांव के मुकाबले 88 प्रतिशत अधिक है. जहां शिक्षा पर शहरी व्यक्ति 160 रुपये प्रतिमाह खर्च करता है वहीं गांव में यह मात्र 37 रुपये है. परन्तु जो तथ्य सबसे अधिक चौंकाता है वह यह कि शराब पीने पर शहर का एक औसत व्यक्ति महीने में जहां 11.32 रुपये खर्च करता है वहीं गांव में रहने वाले व्यक्ति का खर्च 11.62 रुपये है.
संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक संस्था के मादक पदार्थ और अपराध विभाग (यूएनओडीसी) द्वारा जारी विश्व मादक पदार्थ रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्तमान में विश्व की कुल जनसंख्या का पांच प्रतिशत किसी न किसी रूप में मादक पदार्थों का सेवन करता है. इस संदर्भ में अगर भारत की बात की जाए तो लगभग 10.43 प्रतिशत भारतीय किसी न किसी रूप में मादक पदार्थों का सेवन करते हैं.
मादक पदार्थों के रूप में में भारतीय शराब का प्रयोग सर्वाधिक करते हैं. देश के तीव्र आर्थिक विकास और वैश्वीकरण ने सामाजिक मान्यताओं को काफी हद तक परिवर्तित कर दिया है और इस परिवर्तन की पराकाष्ठा यह है कि कुछ क्षेत्रों में शराब पीना 'स्टेसस सिंबल' बन चुका है. इसे 'वर्किंग क्लास कल्चर' का नाम दिया जाने लगा है और इसी सोच का परिणाम है शराब की खपत में लगातार बढ़ोतरी. भारतीय संस्कृति की बदलाव की बयार ने महिलाओं को भी इस लत का शिकार बना दिया है. चकाचौंध से भरी जीवन शैली और मदिरापान को आम स्वीकृति मिलने के बाद किशोर और युवा वर्ग  द्वारा नियमित रूप से शराब का प्रयोग किया जा रहा है. डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में उन युवाओं की तादाद बढ़ती जा रही है जो येन केन प्रकारेण शराब पीने की शुरुआत करते हैं और फिर इसके आदी हो जाते हैं. कम समय में अधिक से अधिक पाने की चाह ने अथाह तनाव, अवसाद, बेचैनी, चिन्ता जैसी रुग्णताओं को जन्म दिया है और इससे मुक्ति पाने का आसान रास्ता युवा पीढ़ी को शराब का सेवन दिखाई देता है जिससे कुछ पल के लिए ही सही, वह स्वयं को विस्मृत कर देते हैं.
शराब एवं अन्य मादक पदार्थों को तनाव दूर भागने का साधन मानने वाले लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं है कि वह स्वयं अपनी मृत्यु को, उनके समीप पहुंचने का सहज और सरल मार्ग उपलब्ध करा रहे हैं. शराब के अधिक सेवन से अल्कोहलिक हेपेटाइटिस हो जाता है जिससे लीवर में सूजन आ जाती है, साथ ही लीवर की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं. लगातार शराब पीने वालों को लीवर सिरोसिस हो जाता है. इस बीमारी में ऊतक इस सीमा तक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं कि ये  न केवल रक्त बहाव को बाधित करते हैं बल्कि शरीर के अन्य अंगों को भी बेकार कर देते हैं. भारतीयोंं में ऐसे लोगों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है जिनमें लीवर की बीमारियों के कारण हेपेटाइटिस के वायरस फैल रहे हैं. पिछले एक दशक में हेपेटाइटिस वायरस फैलने की एक मुख्य वजह  शराब का सेवन माना जा रहा है. लीवर संबंधी बीमारियों के कारण 25 हजार भारतीय हर वर्ष मृत्यु का शिकार होते हैं.
शराब का सेवन जहां व्यक्ति विशेष के स्वास्थ्य के लिए घातक है वहीं समाज को भी रुग्णता प्रदान कर रहा है. संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार घरेलू हिंसा के लिए जिम्मेदार पुरुषों में से करीब 50 प्रतिशत को नशे का आदी पाया गया है. शराब का सेवन व्यक्ति के उच्च जोखिम व्यवहार की एक विस्तृत श्रृंखला को जन्म देता है. शराब का आदी व्यक्ति सिर्फ स्वयं को प्रभावित नहीं करता बल्कि उसके साथ वह अपने परिवार को भी आर्थिक एवं मानसिक आघात पहुंचाता है. मादक पदार्थ के दुष्चक्र से भारतीय मुक्त हो सकें इसके लिए आवश्यकता है कि सामाजिक और वैधानिक दोनों ही स्तरों पर कठोर कदम उठाए जाएं. इंडियन अल्कोहल पॉलिसी अलाइंस नामक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने देश का अल्कोहल एटलस जारी करते हुए बताया कि कैसे शराब से देश को नुकसान हो रहा है.
शराब से जहां देश पर लगातार बीमारियों का बोझ बढ़ रहा है, वहीं सड़क, दुर्घटनाओं की संख्या में भी वृद्धि हो रही है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लोगों में शराब के दुष्परिणामों के प्रति चेतना जगाकर, सरकारी स्तर पर शराब के प्रति आकर्षण कम करने और शराब सेवन को बढ़ावा देने वाले कारकों पर अंकुश लगाकर समस्या से निपटा जा सकता है . इसके साथ ही साथ शैक्षणिक एवं दंडात्मक दोनों साधन मादक पदार्थों का सेवन करने वाली युवा पीढ़ी को रोकने के कारगर उपाय 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

जादू टोने के इलाज से बचें

जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा
जादू टोने के इलाज से बचें 
1 वे विश्वास जो लोगों को ठीक कर देते हैं--
अ. विश्वास में मरीज को ठीक करने की बड़ी भारी ताकत होती है। एक बार एक आादमी के सिर में बहुत ज्यादा दर्द था । उसे एक औरत ने शकरकन्दी दी और कहा इसे खालो सिर दर्द जरुर ठीक हो जाएगा। आदमी ने औरत पर विश्वास किया और वह ठीक हो गया। उसका सिर दर्द शकरकन्दी के कारण ठीक नहीं हुआ बल्कि उसके विश्वास के कारण हुआ। आधुनिक विज्ञान में इसे  "प्लेसिबो इफ़्फ़ेक्ट " कहा जाता है। शरीर के अन्दर के डाक्टर को प्रभावित करता है यह विश्वास।
आ. भारत के गावों में जहरीले सांप के काटने के बहुत से घरेलू इनाज मिलेंगे।
ःःः सांप का पत्थर:ःः कुछ मिर्चें या नीम के पते खाना:ःः एक बाल्टी तने का रस पीना आदि
यह इलाज अलग अलग जगह पर अलग अलग मिलेंगे।
जहां तक हमारी जानकारी है घरेलू इलाजों का सांप के जहर पर कोई सीधा असर नहीं पड़ता । जो आदमी इस इलाज का असर हुआ बताते हैं इसका मतलब है कि सांप जहरीला नहीं था। यदि सांप जहरीला था और आादमी का घरेलू इलाज पर विश्वास है तो इससे उसे कुछ फायदा हो सकता है क्योंकि मरीज का उस इलाज में विश्वास है इसलिए उसका भय कम हो जाता है। उसकी नाड़ी धीमी रहती है। वह कम हिले डुलेगा या उसमें कम्पन्न भी कम होगा। उसके नतीजे के तौर पर उसके शरीर में जहर का प्रभाव धीमी गति से होगा । इस प्रकार खतरा कुछ कम होगा।
जहां तक हमारी जानकारी है
जहरीले जन्तुओं के चाहे सांप हो, चाहे स्कोरपियोन(बिच्छू ) हो , स्पाइडर हो,या दूसरे जहरीले जानवर हों के काटने के घरेलू इलाज नहीं हैं। मरीज का विश्वास भले ही कुछ काम करता हो । सांप के काटने पर आधुनिक इलाज करना जरुरी है। घरेलू इलाज में समय बर्बाद न करें।
2. वह विश्वास जो मरीज को ठीक करने की बजाय बीमार कर देते हैं --
विश्वास की ताकत जहां एक तरफ बीमारी को ठीक करती है वहीं दूसरी तरफ यह मनुष्य को नुकसान भी पहुंचा सकती है। यदि मनुष्य का दृृढ़ विश्वास है कि कुछ है जो उसे चोट पहुंचा सकता है। इस प्रकार उसका अपना भय उसके लिए बहुत नुकसान देह साबित हो सकता है। उदाहरण के लिए:ः
एक बार एक महिला को देखने के लिए बुलाया गया जिसको हाल ही में बच्चा गिर गया था और उसका रक्त स्राव हो रहा था। उसके घर के पास एक सन्तरे का पेड़ था। मैंने उसे एक गिलास सन्तरे का जूस पीने के लिए कहा। उसने पी लिया हालांकि उसे डर था कियह जूस उसे नुकसान पहुंचायेगा। इसके पीते ह ीवह और बीमार हो गई ।उसका निरीक्षण किया गया तो पाया कि शारीरिक स्तर प रवह बिल्कुल ठीक ठाक दिखाई दे रही थी। उसे विश्वास दिलाया । मगर उसने कहा वह मरने को है। आखिर कार डाक्टर ने उसे एक डी डबल्यू मतलब डिस्टिल्ड वाटर का टीका लगाया। उसका टीके में विश्वास था । वह जल्दी से ठीक हो गई । वास्तव में जूस ने उसका कोई नुकसान नहीं किया था । बल्कि उसका यह विश्वास कि इससे वह बीमार हो जायेगी ज्यादा नुकसान देह था।
    इसी प्रकार लोगों के दूसरी चीजों के बारे में भी विश्वास हैं जो कि उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं। इस महिला को एक तरह से तो इलाज में मदद की मगर दूसरी तरफ उसके विश्वास को कहीं न कहीं पुख्ता ही किया जो कि सही नहीं था । डाक्टर ने उसे ठीक करने का प्रयास किया । एक दिन जब वह बिल्कुल ठीक हो गई तो डाक्टर उसके घर गया और उससे मांफी मांगी जो डाक्टर ने किया था उसके लिए। उसने उसे समझाने का प्रयास किया कि यह सन्तरे का जूस नहीं था जिसने उसको बीमार किया था बल्कि उसका यह डर या विश्वास था कि इससे कहीं बीमार न हो जाए जिसने उसे बीमार किया। यह भी बताया कि ईंजैक्सन में पानी था उसने ठीक नहीं किया बल्कि उसको जो भय से मुक्ति मिली उसने ठीक किया।
डस प्रकार सन्तरे के जूस, पानी के टीके और उसके अपने दिमाग की प्रक्रियाओं को समझकर शायद वह औरत और उसका परिवार भय से मुक्त हुए और भविष्य में बेहतर ढंग से अपने स्वास्थ्य का ख्याल रख सकेंगे । क्योंकि हमारे स्वास्थ्य का सीधा समबन्ध इसके बारे में हमारी जानकारी और भय से आाजादी के साथ जुड़ा हुआ है।
- बहुत सी चीजें हमें इसलिए नुकसान पहुंचाती हैं, क्योंकि हमारा विश्वास है कि वे नुकसान दायक हैं।
जादू टोना- काला जादू- शैतान आंख या बुरी नजर
यदि मनुष्य यह सोचता है कि किसी में उसे नुकसान पहुंचाने की ताकत है तो वह वास्तव  में बीमार हो सकता है। यदि कोई यह सोचता है कि उस पर जादू टोना कर दिया गया है या उसको बुरी नजर लग गई है तो वास्तव में वह अपने अन्दर मौजूद भय का शिकार है।
    एक जादूगरनी की दूसरे लोगों पर कोई ताकत नहीं होती बल्कि उसमें यह खासियत होती है कि वह हमें यह विश्वास करवा दे कि वह ऐसा कर सकती है ।
इसलिए जो आदमी जादू टोने में विश्वास नहीं रखता उस पर जादू टोना नहीं किया जा सकता।
कुछ लोग समझते हैं कि उन पर जादू टोना कर दिया गया है। ऐसा कई बार तब सोचा जाता है जब उनको अजनबी और डरावनी बीमारियां हो जाती हैं। उदाहरण के तोर पर यौन अंगों का केंसर या लिवर मतलब जिगर का सिरोसिस।
इन बीमारियों के कारणों में टोने टोटके ये काले जादू का कोई स्थान नहीं है। उनके कुदरती दूसरे कारण हैं।
अपना पैसा जादू टोने के केन्द्रों पर बर्बाद मत करें जो टोने टोटके से इलाज का दावा करते हैं। उस जादूगरनी या ूपजबी से बदला लेने से भी कुछ नहीं होने वाला । यदि बीमारी गम्भीर है तो डाक्टर के पास इलाज के लिए जाएं।
जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा
सतनाम कन्वीनर        सुरेश कुमार को कन्वीनर
09466290728          09416232339

बुधवार, 29 जुलाई 2015

मैं भी चोर तूँ भी चोर

मैं भी चोर तूँ भी चोर

बन्दर चोर ,  मदारी चोर
बाबू और अधिकारी चोर
दफ्तर ये सरकारी चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

मुल्ला चोर , पुजारी चोर
राजा चोर , भिखारी चोर
बिकाऊ पत्रकार अखबारी चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

नेता चोर , अभिनेता चोर
क्रेता और विक्रेता चोर
बड़े -बड़े विजेता चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

जीजा चोर , साले चोर
कालेधन के काले चोर
बड़े - बड़े दिलवाले चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

डाक्टर चोर इंजीनियर चोर
जूनियर और सीनियर चोर
मिड- डे- मिल के टीचर चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

लौंडा चोर , डोकर चोर
सर्कस करता जोकर चोर
चिड़ियाघर का नौकर चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर
आँखों वाला अँधा चोर
कपडा पहने नंगा चोर
दाढ़ी टोपी बंदा चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

जज चोर, दीवान चोर
जिले का कप्तान चोर
कमिश्नर की कमान चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

खाला चोर, आपा चोर
आतंकवाद के आका चोर
गेरूआ पहने बाबा चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

कवि चोर शायर चोर
योद्धा चोर,कायर चोर
ख्यातिबद्ध हैं लायर चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

संता चोर, बंता  चोर
दो नंबर का धंधा चोर
अच्छे दिन का डंका चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर

छोटे चोर, बड़े चोर
वर्दी पहने खड़े चोर
आपस में खूब लड़े चोर
मैं भी चोर तूँ भी चोर
फेर काहे मोदी का शोर


आदिल सरफरोश
फर्रूखाबाद
साभार
हाशिये की आवाज
अगस्त , 2015





















मोदी, आतंकवाद और भारतीय मुसलमान

Posted: 28 Jul 2015 10:17 AM PDT
अपनी अमरीका यात्रा के ठीक पहले, अन्तर्राष्ट्रीय समाचार चैनल सीएनएन के फरीद ज़कारिया को दिए अपने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत के मुसलमान, भारत के लिए जियेगें और मरेंगे और वे भारत का कुछ भी बुरा नहीं करेंगे। इसके बाद, गत 8 जुलाई को, कजाकिस्तान में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मध्य एशिया और भारत की साँझा इस्लामिक विरासत की चर्चा की और कहा कि यह विरासत, अतिवादी ताकतों और विचारों को हमेशा खारिज करेगी। प्रधानमंत्री ने फरमाया कि भारत और मध्य एशिया, दोनों की इस्लामिक विरासत प्रेम और समर्पण के सिद्धांतों पर आधारित और इस्लाम के उच्चतम आदर्शों  ज्ञान, पवित्रता, करुणा और कल्याण से प्रेरित है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह दावा किया कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और इस्लामिक स्टेट (आईएस) उन्हें आकर्षित नहीं कर सका है।
इन्हीं मोदी ने सन 2001 में दावा किया था कि ‘‘सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते परन्तु सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं’’। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर अपने चुनाव अभियानों में उन्होंने इस जुमले का जमकर इस्तेमाल किया था। सन 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम के बाद, गुजरात का मीडिया मुस्लिम और इस्लाम विरोधी उन्माद भड़काने में लगा था। मोदी ने इस उन्माद को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने काफी बाद में ‘‘सद्भावना उपवास’’ रखे परन्तु यह कहना मुश्किल है कि वे कितनी ईमानदारी और निष्ठा से उपवास कर रहे थे। मोदी ने दंगाईयों की वहशियाना हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराया था। उनके अनुसार, दंगे, साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आगजनी की घटना - जिसे उन्होंने किसी भी जांच के पहले ही मुसलमानों का षड़यंत्र निरुपित कर दिया था - की प्रतिक्रिया थे।
गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के बाद, मोदी ने ‘गुजरात के गौरव’ को पुनस्र्थापित करने के लिए ‘गौरव यात्रा’ निकाली थी। उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा 2002 के दंगों के लिए सभी गुजरातियों को दोषी ठहराने से गुजरात के गौरव को चोट पहुँची है। मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में, गुजरात की पुलिस ने अनेक मुसलमानों को सीमा के उस पार के आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकवादी बताकर गोलियों से भून डाला था। सोहराबुद्दीन और इशरत जहां की हत्या की जांच हुई और इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह सहित कई पुलिस अधिकारी आरोपी बनाये गए।
प्रधानमंत्री मोदी यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों के उनके अलग-अलग, बल्कि
विरोधाभासी आंकलनों में से किसे वे सही मानते हैं। उनकी मुसलमानों के बारे में असली, ईमानदार राय क्या है? या, क्या उनकी सोच बदल गयी है? यदि हाँ, तो उन्हें ऐसी कौनसी नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिसके चलते उनकी सोच में परिवर्तन आया है?
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस महानिदेशकों, महानिरीक्षकों और केंद्रीय पुलिस संगठनों के मुखियाओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए नवंबर 2014 में कहा था कि आईएस, भारतीय उपमहाद्वीप में पैर जमाने की कोशिश  कर रही है और अलकायदा ने गुजरात, असम, बिहार, जम्मू कश्मीर व बांग्लादेश  की बड़ी मुस्लिम आबादी को देखते हुए, भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शाखा स्थापित कर दी है।
भारतीय मुसलमान और आतंकवाद
उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर चाहे जों हों, इसमें कोई संदेह नहीं कि वैष्विक आतंकी नेटवर्कों में भारतीय मुसलमानों की उपस्थिति और भागीदारी बहुत कम है। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं। दुनिया में इंडोनेशिया को छोड़कर इतनी संख्या में मुसलमान किसी अन्य देश में नहीं रहते। इसके बावजूद, भारतीय सुरक्षाबल और गुप्तचर एजेंसियां अब तक केवल चार ऐसे भारतीय मुस्लिम युवाओं की पहचान कर सकी हैं, जिन्होंने आईएस के स्वनियुक्त इस्लामिक खलीफा अबुबकर बगदादी द्वारा शुरू किए गए युद्ध में हिस्सा लिया है। ये चार युवक हैं अरीब मज़ीद, शाहीन तनकी, फरहाद शेख और अमन टण्डेल।
इन चार युवकों के अतिरिक्त, समाचारपत्रों की खबरों के अनुसार, बैंगलुरू में रहने वाले, भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक 24 वर्षीय कर्मचारी मेंहदी मसरूर बिस्वास पर आरोप है कि वह अपने ट्विटर हैंडल के जरिए, आईएस के आतंकी मिशन का प्रचार कर रहा था और बगदादी के नेतृत्व वाली सेना में भर्ती होने के लिए युवकों को प्रेरित कर रहा था। मंेहदी को चैनल 4 को दिए गए उसके एक साक्षात्कार केे आधार पर पकड़ा गया।
अब इसकी तुलना 90 देशों के 20,000 विदेशियों से कीजिए, जो बगदादी की सेना में भर्ती हुए हैं। नेषनल काउंटर टेरोरिज्म सेंटर के निदेशक निकोलस रासम्यूसेन के अनुसार, इनमें से 3,400पश्चिमी  राष्ट्रों से हैं। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक जेम्स क्लेपर के अनुसार, इनमें 180 अमेरिकी, 130 केनेडियन, 1200 फ्रांसीसी, 600 ब्रिटिश, 50 आस्ट्रेलियाई और 600 जर्मन शामिल हैं। इसके मुकाबले, भारत से मात्र चार और बांग्लादेश से मात्र 6 लोगों को आईएस का युद्ध लड़ने का दोषी पाया गया है। 
वैष्विक आतंकी संगठनोें में क्यों शामिल नहीं होते भारतीय?
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने कभी इस प्रश्न  पर विचार नहीं किया कि आखिर क्या कारण है कि भारत के 14 करोड़ मुसलमानों में से आईएस में केवल चार भर्ती हुए। इस प्रश्न पर विचार करने की बजाए, वे यह आरोप लगाने में जुटे रहते हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं। भारतीय मुसलमान देषभक्त हैं और भारत के हितों के खिलाफ नहीं जाएंगे, ये बातें मूलतः मुस्लिम-बहुल देशों की यात्राओं के दौरान कहीं गईं या विदेशी मीडिया से बातचीत में। और इनका उद्धेष्य अपनी ेउदारवादी छवि प्रस्तुत करना था।
जो भी हो, मूल प्रश्न यह है कि भारतीय मुसलमान, वैष्विक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित क्यों नहीं हुए? आईए, हम कुछ संभावित कारणों की चर्चा करें।
1.    भारतीय मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व मुख्यतः दारूल उलूम देवबंद और कुछ अन्य मदरसों जैसे नदवातुल उलेमा, लखनऊ से आता है। दारूल उलूम देवबंद का देश भर में फैले हजारों छोटे मदरसों और मकतबों पर नियंत्रण है। देवबंद के उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा-ए-हिन्द ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों मौलवियों और विद्यार्थियों की मौजूदगी में आतंकवाद के विरूद्ध फतवा जारी किया था। उन्होंने आतंकवाद को जड़मूल से उखाड़ फेंकने की शपथ भी ली थी। दारूल उलूम के रेक्टर हबीबुर रहमान के अनुसार, ‘‘इस्लाम हर तरह की अन्यायपूर्ण हिंसा, शान्ति भंग, खून खराबा, हत्या और लूटपाट का निषेध करता है और किसी भी स्वरूप में इनकी अनुमति नहीं देता।‘‘ जमायत ने लखनऊ, अहमदाबाद, हैदराबाद, कानपुर, सूरत, वाराणसी और कोलकाता में मदरसों के संचालकों की बैठकें और सम्मेलन आयोजित कर अपने आतंकवाद विरोधी संदेश  को उन तक पहुंचाया। जमायत ने एक ट्रेन बुक की, जिसमें उसके सदस्य और समर्थक देश भर में घूमे और शांति  और आतंकवाद-विरोध का संदेश फैलाया।
2.    इस्लाम, भारत में मुख्यतः शांतिपूर्ण ढंग से फैला है। भारत में इस्लाम पहली बार 7वीं सदी में केरल के तट पर अरब व्यवसायियों के साथ पहुंचा। इसका नतीजा यह है कि मुसलमान आज भी स्थानीय परंपराओें का पालन करते हैं औेर स्थानीय संस्कृति में घुलेमिले है। उनकी व गैर मुस्लिमों की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। उदाहरणार्थ, लक्षद्वीप के मुसलमान मातृवंषी परंपरा का पालन करते हैं और केरल के मुसलमानों के लिए ओणम उतना ही बड़ा त्यौहार है, जितना कि गैर मुसलमानों के लिए। अमीर खुसरो ने होली पर रचनाएं लिखी हैं, मौलाना हसरत मोहानी नियमित रूप से मथुरा जाते थे और उन्हंे भगवान कृष्ण से बेइंतहा प्रेम था। रसखान ने भगवान कृष्ण पर कविताएं रची हैं, बिस्मिल्ला खान की शहनाई भगवान शिव को समर्पित थी और दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। ये हमारे देश की सांझा सांस्कृतिक परंपराओं के कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें समाप्त करने की असफल कोशिश अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर देश को विभाजित कर की।
    भारत में इस्लाम के प्रभाव में वृद्धि मुख्यतः समावेशी  सूफी परंपराओं के कारण हुई, जिनकी ओर समाज के वंचित और हाशिए पर पड़े वर्ग सबसे अधिक आकर्षित हुए। सूफी (और भक्ति) संतों का मूलधर्म प्रेम था। वह्दतुलबूजूद (संसार में केवल एक ईश्वर है) और सुल्हकुल (पूर्ण शांति ) - ये सूफी परंपरा के मूल सिद्धांत थे। सूफी केवल ब्राह्यशांति की बात नहीं करते बल्कि अंतर्मन की शांति पर भी जोर देते थे। निजामुद्दीन औलिया रोज सुबह राम और कृष्ण के भजन गाया करते थे।
    कई नगरों और गांवों में ताजियों के जुलूस के दौरान हिन्दू महिलाएं आरती उतारती हैं। इस तरह की सांझा सांस्कृतिक जड़ों के चलते, भारतीय मुसलमानों के दिमागों में जेहाद का जहर भरना नामुमकिन नहीं तो बहुत मुष्किल जरूर है।  भारतीय मुस्लिम चेतना पर सूफी मूल्यों का गहरा प्रभाव है। एक आम भारतीय मुसलमान, अरब और दूसरे देषों के मुसलमानों की संस्कृति और अपनी संस्कृति में कुछ भी समानता नहीं पाता। वहाबी-सलाफी इस्लामिक परंपराओं को ‘‘सही परंपराएं‘‘ सिखाने के नाम पर फैलाने के लिए काफी संसाधन खर्च किए गए और गहन प्रयास हुए परंतु ये परंपराएं आज भी बहुत सीमित क्षेत्र में प्रभावी हैं। अलबत्ता हिन्दू राष्ट्रवादियों और उनके विमर्ष के मजबूत होते जाने से भारतीय मुसलमानों के अरबीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
    इसके विपरीत, कुछ पष्चिमी देशों में मुसलमानों में अलगाव का गहरा भाव है। उनमें से अधिकांश  एशियाई मूल के हैं और पष्चिमी संस्कृति में घुलमिल नहीं पाते। एशियाई मूल के लोग अपने समुदायों के बीच रहना पसंद करते हैं। युवाओं का सांस्कृतिक अलगाव, ‘सभ्यताओं के टकराव‘‘ के सिद्धांत के वशीभूत नस्लवादी शक्तियों द्वारा इस्लाम को निशाना बनाए जाने व ईराक और अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध में पष्चिमी सेनाओं की भागीदारी के कारण, इस्लामवादियों के लिए अपनी सेना में पष्चिमी देशों के युवकों को भर्ती करना अपेक्षाकृत आसान है।
3.     भारतीय मुसलमानों द्वारा की गई आतंकी गतिविधियों के लिए मुख्यतः प्रतिशोध की भावना जिम्मेदार है। 12 व 18 मार्च 1993 को मुंबई के झवेरी बाजार व अन्य स्थानों पर बम हमले, 28 जुलाई 2003 को इसी शहर के घाटकोपर में बेस्ट बस में बम धमाके और 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाके, वे कुछ आतंकी घटनाएं हैं जिनमें मुस्लिम युवक शामिल थे। परंतु इनमें से अधिकांश का उद्धेष्य मुंबई में 1992-93 के दंगों और सन्  2002 के गुजरात कत्लेआम का बदला लेना था। दिनांक 12 मार्च 1993 के बम धमाकों के  दोषी पाए गए कई आरोपियों ने मुकदमे के दौरान अपने बयानों में बताया कि उन्होने इस षड़यंत्र में हिस्सा इसलिए लिया था क्योंकि उन्होंने मुंबई में 1992-93 के दंगों में अपने प्रियजनों को मरते देखा था। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट (1998) में साम्प्रदायिक दंगों और बम धमाकों के परस्पर संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया था, ‘‘सिलसिलेवार बम धमाके, अयोध्या व बंबई के दिसंबर 1992 व जनवरी 1993 के घटनाक्रम की प्रतिक्रिया थे।‘‘  मुस्लिम युवकों के गुस्से और निराशा के भाव का कुछ पाकिस्तानी एजेसिंयों ने दुरूपयोग किया।
    परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि कई अन्य मुस्लिम देशों की तुलना में, भारतीय प्रजातंत्र बहुत बेहतर ढंग से काम कर रहा है। यद्यपि न्यायप्रणाली धीमी गति से काम करती है परंतु तीस्ता सीतलवाड जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों से गुजरात दंगों के पीडि़तों को न्याय मिला है। कुछ अपराधियों को अदालतों ने सजा सुनाई हैं और वे अब जेल में हैं। इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मामलों के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के कड़े रूख के चलते, सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोषों को मार गिराने की घटनाओं में तेजी से कमी आई है। चूंकि भारत में पीडि़तों को न्याय मिलने की उम्मीद रहती है इसलिए वे प्रतिशोध की आग में नहीं जलते और यही कारण है कि आईएस को यहां से अपनी सेना के लिए लड़ाके नहीं मिल पा रहे हैं।
    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए प्रजातांत्रिक स्पेस घटता जा रहा है। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों को लग रहा है कि अब सैयां कोतवाल हो गए हैं और इसलिए वे बिना हिचक के मुसलमानों पर बेसिरपैर के आरोप लगा रहे हैं, उनका मताधिकार छीनने की मांग कर रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं और मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बता रहे हैं। अगर यही कुछ चलता रहा तो मुसलमानों को आईएस और अन्य आतंकवादी संगठनों के चंगुल से लंबे समय तक दूर रखना संभव नहीं होगा।
-इरफान इंजीनियर
 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

कॉर्पोरेट के मुनाफे

कॉर्पोरेट के मुनाफे के खुदा के सामने मजदूर को जिबह किया जा रहा है.- सत्यकी रॉय

एक साल बुरा हाल कॉर्पोरेट के मुनाफे के खुदा के सामने मजदूर को जिबह किया जा रहा है. सत्यकी रॉय मोदी सरकार श्रम सुधारों को लागू करने के लिए बहुत उत्सुक दिखाई दे रही है क्योंकि उद्योगपतियों की तरफ से इसकी मांग काफी लम्बे अर्शे की जा रही है. अक्तूबर 2014 में प्रधानमंत्री ने भारत में बनाओ नारे की रौशनी में श्रम के महत्त्व को रेखांकित करते हुए कहा श्रम से जुड़े मुद्दों को मजदूरों के नजरिये से देखने की जरूरत है बजाय मालिकों के. हालांकि तथाकथित श्र्मयोगी के नारे के पीछे वास्तविक चिंता भारत में मजदूरों की भयावह हालत को संबोंधित करना नहीं था. बल्कि इसका इस्तेमाल तो ‘इंडिया इंक’ को संतुष्ट करना था जो उनके प्रति दृढ़ सरकार के समय में अपना बेहतर वक्त की उम्मीद लगाए बैठे हैं. जैसा कि देश में बहुमत श्रम शक्ति बिना किसिस काम के बैठी है इसलिए वह अतिरिक्त श्रम का फायदा उठाने की जुगत में हैं; लोग कम मजदूरी में गैर-मानवीय हालातों में काम करने को तैयार हैं. इसलिए भारत के नीचे के स्तर पर रहने की दौड़ जीतने के लिए एक आदर्श उम्मीदवार है. भारत में श्रम सुधारों का मतलब है मजदूर वर्ग के संस्थागत और कानूनी अधिकारों का सत्यानाश करना और दुनिया को बताना कि निरंकुश मुनाफा कमाने के लिए हमारा देश सबसे बेहतरीन जगह है. पहला कदम लघु कारखाना (रोजगार और ससेवाओं की अन्य हालातों का विनियमन) कानून, 2014 को पेश करना था. जिन कारखानों में 40 मजदूर तक काम करते हैं यह कानून उन्हें 16 श्रम कानूनों की पकड़ा से बाहर कर देता है जैसे फैक्ट्री एक्ट, औद्योगिक विवाद अधिनियम, ईएसआई अधिनियम औरमातृत्व लाभ अधिनियम आदि. फैक्ट्री एक्ट हाल ही में बधाई गयी श्रमिकों की संख्या (बिजली के साथ) 10 से 20 और 20 से 40 (बिना बिजली के) पर ही लागू होगा. इसका मतलाब यह है कि करीब 12.6 लाख मजदूर संगठित विनिर्माण क्षेत्र में जो कि भारत की कुल फेक्टारियों की संख्या के 65 प्रतिशत हिस्से में काम करते हैं और जिनमे 40 मजदूर से कम काम करते हैं वे फेक्टरी एक्ट के मुताबिक़ श्रम कानूनों के दायरे में नहीं आयेंगे. औद्योगिक विवाद अधिनियम के अनुसार अब तक जिन फेक्टरियों में 100 मजदूर काम कर रहे हैं उन्हें छटनी से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी. इस कानून के तहत अब यह सीमा 100 मजदूरों से 300 मजदूर कर दी गयी है. ये सुझाव दर्शाते हैं कि इन बदलावों से भारत की 93 प्रतिशत फेक्टारियों में बिना सरकार की अनुमति के मजदूरों की छटनी की जा सकती है. ठेका श्रम अधिनियम में संसोधन के अनुसार अब निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में जो मजदूर श्रम कानून के दायरे में आयेंगे उनकी संख्या भे 20 से बढ़ाकर 50 कर दी गयी है. सरकार 'व्यापार करने में आसानी' की रफ़्तार को बढाने के लिए श्रम कानूनों पर व उसके कार्यान्वयन की निगरानी में ढील देना चाहती है. जब श्रम कानूनों की धज्जिया उड़ाने से मुनाफ़ा बढ़ता है कोई कैसे उम्मीद कर सकता है कि वे कारखाना मालिक खुद श्रम कानूनों के कार्यान्वयन पर ध्यान रखेंगे? लेकिन सरकार रिटर्न और रजिस्टरों के स्वरूपों को सरल बनाने के नाम पर उन्हें 16 बड़े श्रम कानूनों को लागू करने से बचा रही है. उद्योग इस तरह की आजादी का खवाब बड़े लम्बे समय से देख रहे हैं और मोदी सरकार भारतीय कंपनियों की साख पर निर्भर करती है! दुनिया में भारत में 14 वर्ष से कम आयु वाले सबसे ज्यादा बाल मजदूर है. ये बाल मजदूर कृषि, लघु कार्यशाला, सड़कों पर कूड़ा बीनने, कुली, गलियों में सामान बेचने वाले व्यवसायों में काम करने के साथ-साथ खतरनाक उद्योगों जैसे शीशा बनाने वाले उद्योग, खदानों, भवन निर्माण, कालीन बनाने, जरी बनाने तथा पटाखे बनाने जैसे उद्योगों में काम करते हैं. सरकार द्वारा प्रस्तावित बाल श्रम (निषेध एवं विनियमन) संशोधन विधेयक के जरिए बाल श्रम अधिनियम, 1986 को संसोधित करना चाहती है. यह प्रस्तावित विधेयक यद्दपि 14 वर्ष से नीचे के बच्चों के लिए बाल श्रम पूरी तरह प्रतिबन्ध लगाने का प्रस्ताव करता है वहीँ यह कानून उन बच्चों की इजाज़त देता है कि स्कूल के बाद के समय में वे अपने परिवार की साहयता के लिए काम कर सकते हैं.इस प्रावधान से वास्तव में अनुबंधित आधार पर घर में बाल श्रम रोजगार और उसे बाहर आउटसोर्स करना आसान होगा। भारत में एक बच्चे की कानूनी परिभाषा के बारे में कई व्याख्याएं मौजूद हैं. बाल श्रम कानून के मुताबिक़ 14 वर्ष के कम आयु वाला बालक है. बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की कन्वेंशन के अनुसार वह व्यक्ति बालक है जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है. प्रस्तावित विधेयक 'किशोर' जैसे टर्म का जिक्र करता है और इसका मतलब है वह व्यक्ति जिसकी उम्र 14 व 18 वर्ष के बीच में है. बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुसार बालक वह व्यक्ति है जिसने 18 वर्ष की उम्र हाशिल नहीं की है. विधेयक किशोरों को खतरनाक व्यवसायों जैसे खदान, जव्लान्शीन पदार्थ या विस्फोटक पदार्थों से जुड़े व्यवसायों में काम करने की अनुमति नहीं देता है जैसा कि अनुसूची में परिभाषित किया गया है. अन्य शब्दों में 14 से 18 साल के बच्चों को गैर खतरनाक उद्योगों में काम करने की अनुमति देता है जो कि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का उल्लंघन है और यह कानून इसकी भी कमियां छोड़ देता है कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू इकाइयों में बिना रोक-टोक के काम करें. विधेयक हालांकि बाल श्रमिकों के पुनर्वास के प्रावधान के बारे में चुप है और 14 से 18 वर्ष के बाल श्रम के काम करने से उठे विवाद और उनकी काम करने के हालातों पर चर्चा के मामले में शांत है. माध्यम कार्ग के विचार तंत्र में श्रम कानूनों पर चर्चा नहीं होती है. बड़े पैमाने पर समाज में स्पष्ट चुप्पी शायद नव-उदारवादी शासन द्वारा और अपनी सांस्कृतिक मशीन के जरिए लगता है इन सुधारों के लिए एक सामाजिक मंजूरी का काम कर रही है. लेकिन सुधारों के प्रति इतनी प्रतिबद्धता वैचारिक ज्यादा है बजाये इसके कि अक्सर तर्क दिया जाता है कि तत्काल उद्देश्य की आवश्यकता के लिए है. सरकार सुधारों को बढ़ावा इसलिए दे रही है ताकि श्रम बाजार में मौजूदा 'कठोरता' को कम किया जा सके. लेकिन वास्तविकता में श्रम बाज़ार कितना ‘कठोर’ है? अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार व्यक्तियों के अनुपात में अनौपचारिक रोजगार में कार्यरत (जिसमें अनौपचारिक और औपचारिक क्षेत्र शामिल है) 2009-10 में गैर कृषि क्षेत्र एमिन इनकी संख्या 83.6 प्रतिशत थी जोकि चीन के (32.6%) , ब्राज़ील (42.2%) से ज्यादा है. इसका मतलब साफ़ है कि भारत में बहुमत मजदूर श्रम कानूनों के दायरे से बाहर हैं. अगर हम कृषि को सिमें शामिल कर ले तो करीब 93 प्रतिशत मजदूर उनके काम के लिए काननों सहायता से बाहर हैं. दुसरे, फेक्टरी खंड में (जोकि फेक्टरी एक्ट १९४८ में आते हैं,) या उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के अनुसार श्रमिकों की औसत की हिस्सेदारी कुल श्रमिकों का लगभग एक तिहाई है. इसलिए भी औपचारिक क्षेत्र में श्रमिकों के एक तिहाई हिस्से को मालिकों ने उन कानूनी हकों से दूर कर दिया है जो स्थायी मजदूरों पर लागू होते हैं. आखिर वह औसत श्रम लागत क्या है जिसे मालिकान ओर नीचे गिराना चाहते हैं? उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण के डेटा के अनुसार 2012-13 में वेतन और अन्य सुविधाओं का औसत बहुत ही कम 2.17 प्रतिशत के स्तर पर था. क्या हम विश्विक स्तर पर प्रतियोगिता करने के लिए इसे और ज्यादा नीचे लाना चाहते हैं? 1980 के दशक में विनिर्माण उद्योग में पूरे मूल्य को जोड़ने के बाद(उत्पादन करने के अलावा) वेतन का औसत 26 प्रतिशत था और इस दशक के आधे में आते-आते यह 10 प्रतिशत रह गया और उसी समय में मुनाफा 5.3 प्रतिशत से बढ़कर 21.3 प्रतिशत हो गया. ये आंकड़े निश्चित रूप से साबित करते हैं कि वर्षों से श्रम द्वारा कमाए गए धन के महत्वपूर्ण हिस्से को उसने खो दिया है. इस परिवेश में शायद ही तर्कसंगत है कि श्रम सुधारों की दिशा में सरकार द्वारा अथक प्रयास 'उच्च'मजदूरी को नीचे लाने के उद्देश्य की आवश्यकता का कुछ लेना-देना है. यह तो लालची पूंजीपतियों के लिए सरकार नंगी सेवा है ताकि वे श्रम प्रक्रिया पर नियंतार्ण कर सके

एक साल बुरा हाल

एक साल बुरा हाल - भाजपा सरकार का खतरनाक एजेंडा सामने आया किसानों को खेती से खदेडऩे का खेल

एक साल बुरा हाल - भाजपा सरकार का खतरनाक एजेंडा सामने आया
किसानों को खेती से खदेडऩे का खेल
- वीजू कृष्णन
भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में इसका वादा किया गया था और खुद नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि भाजपा की सरकार किसानों के ‘अच्छे दिन’ लाएगी और किसानों की आत्महत्याएं खत्म कराएगी। वादा किया गया था कि भाजपा की सरकार खेती के लिए तथा ग्रामीण विकास के लिए सार्वजनिक निवेश बढ़ाएगी, किसानों के लिए उत्पादन लागत के ऊपर से 50 फीसद दिलाकर खेती की लाभकरता बढ़ाने के लिए कदम उठाएगी, खेती की लागत सामग्री व ऋण सस्ते मुहैया कराएगी, खेती में आधुनिकतम प्रौद्योगिकियां तथा ज्यादा पैदावार देने वाले बीज लाएगी, मनरेगा को खेती से जोड़ेगी, अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से फसल के नुकसान की भरपाई करने के लिए फसल बीमा लागू करेगी, ग्रामीण ऋण सुविधाओं का विस्तार करेगी, किसानों को विश्व बाजार में कीमतों में बहुत भारी-उतार चढ़ावोंं से बचाने के लिए मूल्य स्थिरीकरण कोष कायम करेगी, आदि आदि।
वादे और कठोर सचाई
          भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में यह वादा भी किया गया था कि ‘‘भाजपा, राष्टï्रीय भूमि उपयोग नीति अपनाएगी, जो अनुपजाऊ जमीन के वैज्ञानिक अधिग्रहण तथा उसके विकास को देखेगी, किसानों के हितों की रक्षा करेगी और खाद्य उत्पादन के लक्ष्यों को तथा देश के आर्थिक लक्ष्यों को ध्यान में रखेगी।’’ 60 वर्ष से अधिक आयु के किसानों के लिए कल्याणकारी कदमों का और छोटे व सीमांत किसानों व खेत मजदूरों के लिए कल्यणकारी कदमों का भी भरोसा दिलाया गया था। भाजपा के चुनाव घोषणापत्र में और नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों में शब्दश: भारतीय किसानों की ‘‘मन की बात’’ को सूचीबद्घ ही किया जा रहा था। किसान इससे ज्यादा और मांग भी क्या सकते थे?
          मोदी के नेतृत्ववाली भाजपा सरकार के राज में खेती का संकट और बढ़ गया है। खेती की वृद्घि दर में भारी गिरावट हुई है और यह दर 2014 के 3.7 फीसद से घटकर, सिर्फ 1.1 फीसद पर आ गयी है। 2014 के दिसंबर में, जब मोदी सरकार के छ: महीने ही हुए थे, मध्यावधि आकलन में किसानों की आत्महत्याओं में 26 फीसद बढ़ोतरी हुई थी। भाजपा शासित महाराष्टï्र में यह बढ़ोतरी 40 फीसद थी। 2014 के अगस्त से 2015 के बीच किसान आत्महत्याओं का आंकड़ा तेजी से बढक़र 1,373 पर पहुुंच गया। बेमौसमी बारिश और ओलावृष्टिï से देश भर में करीब 2 करोड़ हैक्टेयर में खड़ी फसलों का भारी नुकसान होने और सरकार के इस संकट के प्रति उदासीन बने रहने के चलते, किसानों की आत्महत्याओं में और तेजी आयी है। हरियाणा, पंजाब, गुजरात, प0 बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी अभूतपूर्व पैमाने पर किसान आत्महत्याएं हुई हैं। हरियाणा में ही 2015 के अप्रैल के बाद से 60 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की हैं। बजाए इसके कि इन मुसीबत के मारे किसानों के परिवारों की तकलीफों को दूर किया जाता, उन्हें असरदार तरीके से मुआवजा दिया जाता और किसानों के बीच भरोसा पैदा करने के लिए फौरन कदम उठाए जाते, हरियाणा की भाजपायी सरकार के कृषि मंत्री ने घोर असहिष्णुतापूर्ण टिप्पणी करते हुए, हताशा में आत्महत्या करने वाले किसानों को ‘‘कायर’’ और ‘‘अपराधी’’ ही करार दे दिया। महाराष्टï्र में भी भाजपा के मंत्रियों ने ऐसी ही असंवेदनशील टिप्पणियां की थीं। केंद्रीय कृषि मंंत्री ने संसद में यह दावा किया किया था कि हरियाणा में एक भी किसान ने आत्महत्या नहीं की है। भाजपा की सरकार की तरह की आपराधिक नकार की मुद्रा ही अपनाए हुए है और न सचाई को स्वीकार कर रही है और न इस सिलसिले में कुछ भी कर रही है।
 
किस का साथ किस का विकास
          अपने चुनाव प्रचार अभियान के भाषणों में मोदी का सबसे ज्यादा जोर इस पर था कि उत्पादन लागत के ऊपर से कम से कम 50 फीसद अतिरिक्त दिलाने के जरिए, किसानों के लिए लाभकरता बढ़ाायी जाएगी। मोदी सरकार ने सबसे बड़ा धोखा इसी मामले में किया है। भाजपा की सरकार ने गेहूं तथा धान के दाम में सिर्फ 50 रु0 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है और ज्यादातर दूसरी पैदावारों के मामले में तो न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई बढ़ोतरी ही नहीं की है। 20 फरवरी 2015 को इस भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहा था कि किसानों को उत्पादन लागत पर 50 फीसद अतिरिक्त देना संभव ही नहीं है। इसके ऊपर से लागत सामग्री के दाम बढ़ते ही जा रहे हैं और भाजपा की सरकार ने उनके दाम पर नियंत्रण रखने के लिए कुछ किया ही नहीं है।
          इस तरह खेती की पैदावार के दाम तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य अलाभकर ही बने हुए हैं और उनसे खेती की लागत तक पूरी नहीं होती है। इसके ऊपर से सरकारी खरीद की व्यवस्था को तेजी से ध्वस्त किया जा रहा है और निजी खिलाडिय़ों को मुसीबत के मारे किसानों का शोषण करने का मौका  दिया जा रहा है। कटे पर नमक छिडक़ने वाली बात यह कि भाजपा की केंद्र सरकार ने यह फरमान भी जारी कर दिया है कि कोई भी राज्य गेहूं या धान के लिए तय किए गए समर्थन मूल्य पर कोई बोनस नहीं दे सकता है और जो भी राज्य ऐसा बोनस देगा, वहां से भारतीय खाद्य निगम खरीदी नहीं करेगा। यह फरमान इस बहाने से किया गया है कि इस तरह का बोनस ‘‘बाजार को बिगाड़ता’’ है।
          मोदी सरकार ने किसानों से खाद्यान्न की सरकारी खरीद करने वाली एजेंसी, भारतीय खाद्य निगम को ध्वस्त करने और 2013 के खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत मिलने वाली खाद्य सुरक्षा को कमजोर करने के कदम भी तेज कर दिए हैं। हालांकि, विश्व व्यापार संगठन में यह सरकार इसका दिखावा कर रही थी कि देश के किसानों के हितों तथा खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, वास्तव में यह सरकार खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम तथा सार्वजनिक भंडारण कार्यक्रमों को कमजोर करने के जरिए, ठीक वहीं सब कर रही है, जिसकी मांग अमरीका तथा योरपीय यूनियन और विश्व व्यापार संगठन द्वारा की जा रही थी। किसी भी तरह का सार्थक मूल्य स्थिरीकरण कोष कायम करने के लिए कोई भी ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। साफ है कि यह सरकार किसानों की कीमत पर बड़े कृषि उद्यमियों और व्यापारियों के ही हितों की रक्षा करना चाहती है।
निवेश में कटौतियां
          खेती में और ग्रामीण विकास में सार्वजनिक निवेश में भारी कटौती की गयी है। कृषि ऋणों तक किसानों के बड़े हिस्से की पहुंच ही नहीं है और लुटेरे सूदखोर महाजन किसानों को बेरोक-टोक लूट रहे हैं। संस्थागत ऋणों का बड़ा हिस्सा कृषि कारोबारियों और ‘‘शहरी काश्तकारों’’ ने ही हथिया लिया है। राष्टï्रीय नमूना सर्वेक्षण का एक ताजा सर्वे (70 वां चक्र, जनवरी-दिसंबर 2013), ‘भारत में खेतिहर परिवारों की स्थिति का सर्वे’ बताता है कि भारत में 60 फीसद से ज्यादा ग्रामीण परिवार कर्ज के बोझ के नीचे दबे हुए हैं और आंध्र प्रदेश में ऐसे परिवारों का हिस्सा 92.9 फीसद है। फिर भी भाजपा की सरकार ने ग्रामीण परिवारों को कर्ज के बोझ से राहत दिलाने के लिए, संस्थागत ऋणों तक उनकी पहुंच बढ़ाने के लिए या सस्ते ऋण मुहैया कराने के लिए कुछ भी नहीं किया है। 2014-15 के बजट में कृषि तथा सहायक गतिविधियों के लिए 11,531 करोड़ रु0 का आवंटन रखा गया था, जिसमें बहुत मामूली बढ़ोतरी कर, 2015-16 के बजट में इसे सिर्फ 11,657 करोड़ रु0 किया गया है। जाहिर है कि वास्तविक मूल्य के हिसाब से इसमें कोई बढ़ोतरी ही नहीं हुई है।
          मनरेगा में भारी कटौती की गयी है और उसके लिए फंड ही नही मिल रहे हैं। भाजपा की सरकार इसे मौजूदा 6,576 ब्लाक से घटाकर,  2500 ब्लाकों तक सीमित कर देना चाहती है। याद रहे कि 2014-15 में केंद्र और राज्यों की सरकारों ने मिलकर यह अनुमान लगाया था कि मनरेगा के तहत 227 करोड़ कार्यदिवस के रोजगार की मांग आयेगी और इस मांग को पूरा करने के लिए उसी वित्त वर्ष में 61,000 करोड़ रु0 के आवंटन की जरूरत होगी। लेकिन, भाजपा की सरकार ने 2014=15 के बजट में इसके लिए सिर्फ 34,000 करोड़ रु0 का आवंटन किया और इस तरह अनुमानित राशि का 45 फीसद पहले ही काट लिया। 2015-15 के बजट में मनरेगा के लिए सिर्फ 34,699 करोड़ रु0 का आवंटन किया गया है। यह वास्तविक जरूरत से बहुत ही कम है।
          इसी तरह छोटे तथा मंझले किसानों और खेत मजदूरों के लिए कुछ भी नहीं किया गया है, जो घटती आय और बढ़ती कीमतों की दुहरी चक्की में पिस रहे हैं। देश में 600 जिले हैं और इसे देखते हुए सिंचाई तथा ऑर्गनिक खेती के  लिए कुल 5,600 करोड़ रु0 का आवंटन, इन दोनों योजनाओं के लिए हर जिले के लिए औसतन 9 करोड़ रु0 का आवंटन बैठता है। इसका अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इतने मामूली खर्च से न तो सिंचाई में कोई बढ़ोतरी हो सकती है और न ऑर्गनिक खेती को कोई बढ़ावा मिल सकता है।
धोखा ही धोखा
          अप्रत्याशित प्राकृतिक आपदाओं से फसलों के नुकसान की भरपाई करने के लिए चौतरफा कृषि बीमा योजना के वादे को भुला ही दिया गया है। हाल में आयी बेमौसमी बारिश तथा ओलावृष्टिï से हुई फसलों की भारी तबाही के बाद, भाजपा की सरकार ने पूरी तरह फसल तबाह होने का रकबा घटाकर वास्तविकता से करीब आधा कर दिया और इस तरह, करोड़ों किसानों को मुआवजे के दायरे से बाहर ही कर दिया। इसके बाद उसने करीब 12,000 रु0 प्रति एकड़ के मुआवजे का एलान किया और दावा किया कि यह अब तक का सबसे ज्यादा मुआवजा है। इस सिलसिले में यह उल्लेखनीय है कि हरियाणा, उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में, जहां इस आपदा के बाद हताशा में किसानों ने आत्महत्याएं की हैं, ज्यादातर मामलों में किसानों को कोई मुआवजा ही नहीं मिला था। यह भी गौरतलब है कि हरियाणा में कुछ हिस्सों में तो खेती के लिए जमीन का किराया ही करीब 45,000 रु0 प्रति एकड़ बैठता है। पैदावार की बाकी जो लागत आती है, ऊपर से आती है। ऐसे में 12,000 रु0 प्रति एकड़ का मुआवजा मिलने के बाद भी, किसान के सिर पर तो कर्ज का भारी बोझ रहेगा ही। इसके ऊपर से देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को मुआवजे के तौर पर 5 रु0, 63 रु0, 200 रु0 आदि के भी चैक दिए गए हैं। किसानों के सभी तबकों की आय में गिरावट का नतीजा यह हुआ है कि उन्हें अपनी परिसंपत्तियां बेचनी पड़ रही हैं और जहां ऐसा नहीं है वहां भी वे नयी प्रौद्योगिकी में, ट्रैक्टर आदि में और सिंचाई के बुनियादी ढांचे में निवेश नहीं कर पा रहे हैं।
          उधर भूमि अधिग्रहण कानून के मामले में भाजपा पूरी तरह से पल्टी मार गयी है। इस कानून पर अपने पहले के रुख से पलटते हुए भाजपा ने 2014 के दिसंबर में अध्यादेश के जरिए उक्त कानून में संशोधन थोप दिए। इन संशोधनों से कार्पोरेट मुनाफाखोरी के लिए और अचल संपत्ति के सट्टïाबाजार के लिए, किसानों की जमीनें लेना आसान हो जाएगा। वास्तव में इस सरकार ने 1894 के गुलामी के जमाने के भूमि अधिग्रहण कानून के सबसे दमनकारी प्रावधानों को ही वापस ला दिया है और अधिग्रहण के लिए उन पर स्वामित्व अधिकार रखने वाले किसानों और संबंधित भूमि पर निर्भर अन्य लोगों की सहमति हासिल करने की शर्त को हटा दिया है। इसके साथ ही इस तरह के अधिग्रहण के सामाजिक प्रभाव के अध्ययन की व्यवस्था को भी पूरी तरह से हटा दिया गया है।
          संशोधन कर जोड़ी गयी नयी धारा-10 (ए) के तहत, अनेक प्रकार की परियोजनाओं को उक्त शर्तों के दायरे से बाहर कर दिया गया है। इनमें विशेष श्रेणी में रखे गए पांच आइटमों में औद्योगिक कॉरीडोर तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के अंतर्गत आने वाली ढांचागत परियोजनाओं को भी रखा गया है। चूंकि ज्यादातर अधिग्रहण इन्हीं दो श्रेणियों में होता है, यह संशोधन 2013 में संसद द्वारा पारित कानून में रखी गयी न्यूनतम बचाव व्यवस्थाओं को भी पूरी तरह से नकारने का ही काम करेगा। इतना ही नहीं औद्योगिक कॉरीडोर की परिभाषा का विस्तार कर उसमें अधिसूचित सडक़ या रेल मार्ग के दोनों ओर की एक-एक किलोमीटर तक की जमीन ऐसे औद्योगिक कॉरीडोर के लिए जाने का प्रावधान शामिल कर लिया गया है। एक गणना के अनुसार, दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर के मामले में, जो देश के छ: राज्यों से होकर गुजरता है, कुल मिलाकर करीब 7 लाख वर्ग किलोमीटर यानी देश की खेती की कुल जमीन के 17.5 फीसद का, जबरिया अधिग्रहण किया जा रहा होगा।
          इस तरह की व्यवस्था में खाद्य सुरक्षा की रखवाली का भी कोई प्रबंध नहीं होगा क्योंकि बिना किसी रोक-टोक के उपजाऊ बहुफसली जमीनों का और असिंचित उत्पादक जमीनों का अधिग्रहण किया जा सकेगा। इसके साथ ही, भूमि के मालिकों तथा भूमि पर निर्भर दूसरे लोगों के पुनर्वास तथा पुनर्वसन की थोड़ी-बहुत भी व्यवस्था की सारी संभावनाओं को पूरी तरह से छोड़ दिया गया है। राष्टï्रीय और राज्य, दोनों ही स्तरों पर भूमि उपयोग नीति तय करने का कोई प्रस्ताव ही नहीं है। जमीन गंवाने वाले हरेक परिवार में से एक व्यक्ति को रोजगार दिलाने का सरकार के वादे का एक ही अर्थ है कि पूरे के  पूरे परिवार को उसके आय के मुख्य स्रोत से अलग करने के बाद, नाम के वास्ते परिवार में से एक व्यक्ति को रोजगार दे दिया जाएगा। इस मामले में भूमि पर निर्भर अन्य तबकों के लिए भी कोई प्रावधान ही नहीं है।
          साफ है कि इस एक साल में मोदी सरकार ने अपना हरेक  वादा तोड़ा है। मोदी के नेतृत्ववाली सरकार किसानों को कंगाल बनाने तथा बेदखल करने की और इस तरह उन्हें खेती छोडऩे पर मजबूर करने की सोची-समझी नीति पर चल रही है। इसी के हिस्से के तौर पर यह सरकार खेती के लिए सरकारी मदद से हाथ खींच रही है और आक्रामक तरीके से व्यापार उदारीकरण की नीति और अनेकानेक नवउदारवादी नीतियों पर चल रही है। अडानी, अंबानी आदि आदि के अच्छे दिन लाने के लिए, किसानों तथा खेत मजदूरों के हितों की बलि चढ़ायी जा रही है।